Cover Image for Angrezi Bhasha Ka Rog (अंग्रेजी भाषा का रोग) by Munshi Premchand - Non-Fiction
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सम्पादकीय•1931•3 मिनट

अंग्रेजी भाषा का रोग

Angrezi Bhasha Ka Rog

प्रेमचंद की तीखी टिप्पणी जिसमें उन्होंने राष्ट्रीय कार्यकर्ताओं और शिक्षित वर्ग में अंग्रेजी के बढ़ते रोग और मानसिक दासता की आलोचना करते हुए राष्ट्रभाषा हिन्दी को अपनाने पर बल दिया है।

Work Details

प्रकार: सम्पादकीय
वर्ष: 1931
पठन समय: 3 मिनट (336 शब्द)

हम 'हंस' के पाठकों का ध्यान इस विषय की ओर पहले भी आकृष्ट कर चुके हैं। हमें यह लिखते दुःख होता है कि हमारे राष्ट्रीय कार्यकर्ता भी इस रोग में उतने ही ग्रस्त हैं, जितने सरकार के कर्मचारी या वकील या कालेजों के अध्यापक। इसमें सन्देह नहीं कि वे खद्दर पहनने लगे हैं, पर उनके मनोभावों में लेशमात्र भी संस्कृति नहीं आयी। किसी कमेटी की बैठक में चले जाइए, आप खद्दरधारी महाशयों को फर्राटे से अंग्रेजी झाड़ते हुए पायेंगे। वह शब्द और वाक्य जो उन्होंने दैनिक पत्रों या अंग्रेजी पत्रों में पढ़े हैं, बाहर निकलने के लिए अकुलाते रहते हैं और अवसर पाते ही फूट निकलते हैं। हँसी तो तब आती है जब यह हजरत अंग्रेजी न जानने वाली महिलाओं के सामने भी अपने बाग्विलास से बाज नहीं आते। अंग्रेजी भाषा का यह जादू कब तक हमारे सिरों पर रहेगा? कब तक हम अंग्रेजी के गुलाम बने रहेंगे। इससे तो यही टपकता है कि राष्ट्रीयता अभी हृदय की गहराई तक नहीं पहुँचने पायी।

महात्मा गांधी के सिवाय हम किसी नेता को हिन्दी भाषा के प्रचार पर जोर देते नहीं देखते। यह विदित रहे कि जब तक हमारी राष्ट्रभाषा का निर्माण न होगा, भारतीय राष्ट्र का निर्माण ख्वाब और खयाल है। जापानी, जापानी में अपने भावों को प्रकट करता है, चीनी, चीनी भाषा में, ईरानी, फारसी में, लेकिन भारत की शिक्षित जनता अंग्रेजी पढ़ने और बोलने में अपना गौरव समझती है। कितने ही सज्जन तो यह कहने में संकोच नहीं करते कि हिन्दी लिखने या बोलने में उन्हें असुविधा होती है। यह सीधी-सादी मानसिक दासता है। बड़े से बड़ा हिन्दुस्तानी भी एक गोरे से बात करता है तो अंग्रेजी में। वह यह भूलकर भी नहीं सोचता कि अंग्रेज हिन्दुस्तानी में क्यों न बात करे। खैर, अंग्रेज से अंग्रेजी में बात करने को किसी हद तक क्षम्य भी मान लिया जा सकता है, लेकिन आपस में अंग्रेजी में बातचीत करने के लिए तो कोई दलील ही नहीं।


प्रकाशन इतिहास

[सम्पादकीय। 'हंस', सितम्बर, 1931 में 'अंग्रेजी वेष और भाषा रोग' शीर्षक से प्रकाशित। 'विविध प्रसंग' भाग-3 में संकलित।]

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "अंग्रेजी भाषा का रोग." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1931, https://munshipremchand.com/works/non-fictions/angrezi-bhasha-ka-rog. Accessed 22 Sep. 2026.