Cover Image for Laal Feeta ya Magistrate ka Istifa (लाल फीता या मजिस्ट्रेट का इस्तीफा) by Munshi Premchand - Short Story
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कहानी•1912•56 मिनट

लाल फीता या मजिस्ट्रेट का इस्तीफा

Laal Feeta ya Magistrate ka Istifa

प्रेमचंद की कहानी 'लाल फीता या मजिस्ट्रेट का इस्तीफा' डिप्टी मजिस्ट्रेट हरिबिलास की नैतिक दुविधा और ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीति के विरोध में पद-त्याग की प्रेरणादायक कथा है।

पात्र:बाबू हरिबिलास, ठाकुर करनसिंह, शिवबिलास
स्थान:उत्तर प्रदेश का एक देहाती इलाका

लाल फीता या मजिस्ट्रेट का इस्तीफा का मूल पाठ

विद्या पर' जाति-विशेष या कुल का एकाधिपत्य नहीं होता। बाबू हरिबिलास जाति के कुरमी थे। घर खेती-बारी होती थी, पर उन्हें बचपन से ही विद्याभ्यास का व्यसन था। यह विद्या-प्रेम देखकर उनके पिता रामबिलास महतो ने बड़ी बुद्धिमत्ता से काम लिया। उन्हें हल में न जोता। आष मोटा खाते थे, मोटा पहनते थे और मोटा काम करते थे, लेकिन हरिबिलास को कोई कष्ट न देते थे। वह पुत्र को रामायण पढ़ते देखकर खुशी से फूले न समाते थे। जब गाँव के लोग उनके पास अपने सम्मन या चिट्ठियाँ पढ़वाने आते, तो.गर्व से महतो का सिर ऊँचा हो जाता था। बेटे के पास होने की खुशी और फेल होने का रंज उन्हें बेटे से भी अधिक होता था और उसके इनामों को देखकर तो वह मानो स्वर्ग में पहुँच जाते थे। हरिबिलास का उत्साह इन प्रेरणाओं से और भी बढ़ता था, यहाँ तक कि शनैः शनैः मैट्रिकुलेशन की परीक्षा में पास हो गये। रामबिलास ने समझा था अब फसल काटने के दिन आये।

लेकिन जब मालूम हुआ कि यह विद्या का अन्त नहीं, बल्कि वास्तव में आरम्भ है तो उनका जोश ठंडा पड़ गया। किन्तु हरिबिलास का अनुराग अब कठिनाइयों को ध्यान में न लाता था। उस दृढ़ संकल्प के साथ जो बहुधा दरिद्र, पर चतुर युवकों में पाया जाता है, वह कालेज में दाखिल हो गया। रामबिलास हारकर चुप हो गये। वे दिनोंदिन अशक्त होते जाते थे और खेठी परिश्रम का दूसरा नाम है। कभी समय पर सिंचाई न कर सकते, कभी समय पर जुताई न हो सकती। उपज कम होती जाती थी, पर इस दुरवस्था में भी वह हरिबिलास की पढ़ाई के खर्च का प्रबन्ध करते रहते थे। धीरे-धीरे उनकी सारी जमीन रेहन हो गयी। यहाँ तक कि जब हरिबिलास एम. ए. पास हुए, तो एक अंगुल भूमि भी न बची थी। सौभाग्य से उनका नम्बर विद्यालय में सबसे ऊँचा था। अतएव उन्हें डिप्टी मैजिस्ट्रेय का पद मिल गया। रामबिलास ने यह समाचार सुना, ते पागलों की भाँति दौड़ा हुआ ठाकुरद्वारे में गया और ठाकुरजी के पैरों पर गिर पड़ा। उसे स्वप्न में भी ऐसी आशा न थी।


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बाबू हरिबिलास विद्वान्‌ ही न थे, सच्चरित्र भी थे। बड़े निर्भीक, स्पष्टवादी, दयालु और गम्भीर | न्याय पर उनकी अटल भक्ति थी। न्याय-पथ से पग-भर भी न टलते थे। प्रजा उनसे दबती थी, पर उन्हें प्यार करती थी। अधिकारी लोग उनका सम्मान करते थे, प्रर मन में उनसे शंकित रहते थे।

उन्होंने नीति-शास्त्र का खूब अध्ययन किया था। उन्हें इस शास्त्र से बहुत प्रेम था। वे कानून को ही अपना अफसर समझते थे। वे अफसरों को खुश रखना चाहते थे, लेकिन जब उनका हुक्म कानून के विरुद्ध होता तो वे उसे न मानते थे।

उन्हें नौकरी करते पाँच साल हो चुके थे। अलीगढ़ में तैनात थे। ठाकुर दलजीतसिंह के घर डाका पड़ा। पुलिस को असामियों पर सन्देह हुआ। कई गाँव के असामी पकड़े गये, गवाहियाँ बनायी गयीं और असामियों पर मुकदमा चलने लगा। बेचारे किसान निरपराध थे। चारों ओर कुहराम मच गया। कितने ही किसान जिलाधीश के पास जाकर रोये। जिलाधीश 5कुर साहब के मित्र थे, साल में दो-चार दावतें खाते, उनके हल्के में शिकार खेलते, उनकी मोटर और फिटन पर सवार होते थे। असामियों की गुस्ताखी पर बिगड़ गये। उन्हें डॉट-डपटकर दुत्कार दिया। ज्वाला और भी दहकी। साहब ने बाबू हरिबिलास को बंगले पर बुलाकर ताकीद की कि मुलजिमों को सजा अवश्य करना, नहीं जेल में बलवा हो जायगा; किंतु हरिबिलास को जब मालूम हुआ कि गवाह बनाये हुए हैं और ज्यादती ठाकुर साहब की है, तो उन्होंने मुल्जिमों को बरी कर दिया। हाकिम जिला ने यह फैसला सुना तो जामे बाहर हो गये। हरिबिलास की रिपोर्ट की, बदली हो गयी।

दूसरी बार फिर नीच जातिवालों के साथ न्याय करने का उन्हें ऐसा ही फल मिला। लखनऊ में थे, वहाँ देहाती मदरसों में नीच जातियों के लड़के दाखिल न होने पाते थे। कुछ तो अध्यापकों का विरोध था, उनसे ज्यादा गाँव के लोगों का। हरिबिलास दौरे पर गये और यह शिकायत सुनी, तो कई अध्यापकों की तम्बीह की, कई आदमियों पर जुमना किया। जमींदारों ने यह देखा तो उनसे द्वेष करने लगे। गुमनाम चिट्ठटियाँ, झूठी शिकायतों से भरी हुई हाकिमों के पास पहुँचने लगीं। तहसीलदारों ने जमींदारों को और भी उकसाया। एक कुरमी का इतने ऊँचे पद पर पहुँचना सभी को खटकता था। नतीजा यह हुआ कि लोगों ने अपने लड़के मदरसे से उठा लिये, कई मदरसे बन्द हो गये। हरिविलास की खासी बदनामी हो गयी । हाकिम जिला न उन्हें वहाँ रखना उचित न समझा। उनकी बदली कर दी। एक दरजा भी घट गया।

इन अन्यायों के होते हुए भी बाबू हरिबिलास का-सा कर्त्तव्यशील अफसर सारे प्रान्त में न था। उन्हें विश्वास था कि मेरे स्थानीय अफसर कितने ही पक्षपाती हों, उनकी नीति कितनी ही संकुचित हो, पर देश का शासन सत्य और न्याय पर ही स्थित है। अँग्रेजी राज्य की वह सदैव स्तुति किया करते थे। यह उसी शासन-काल की उदारता थी कि उन्हें ऐसा ऊँचा पद मिला था, नहीं तो उनके लिए यह अवसर कहाँ थे ? दीनों और असहायों की इतनी रक्षा किसने की ? शिक्षा की उन्‍नति कब हुई ? व्यापार का इतना प्रसार कब हुआ ?

राष्ट्रीय भावों की ऐसी जागृति कहाँ थी ? वह जानते थे कि इस राज्य में भी कुछ-न-कुछ बुराइयाँ अवश्य हैं। मानवीय संस्थाएँ कभी दोष-रहित नहीं हो सकतीं, लेकिन बुराइयों से भलाइयों का पल्‍ला कहीं भारी है। यही विचार थे, जिनसे प्रेरित होकर यूरोपीय महासमर में हरिबिलास ने सरकारी खैर-ख्वाही में कोई बात उठा नहीं रखी, हजारों रंगरूट भरती कराये, लाखों रुपये कर्ज दिलवाये और महीनों घूम-घूमकर लोगों को उत्तेजित करते रहे। उसके उपलक्ष्य में उन्हें राय बहादुर की पदवी मिल गयी।

जाड़े के दिन थे। डिप्टी हरिबिलास बाल-बच्चों के साथ दौरे पर थे। बड़े दिन की तातील हो गयी थी, इसलिए तीनों लड़के भी आये हुए थे। बड़ा शिवबिलास लाहौर के मेडिकल कालेज में पढ़ता था। मँझला संतबिलास इलाहाबाद में कानून पढ़ता था और छोटा श्रीबिलास लखनऊ के ही एक स्कूल का विद्यार्थी धा। शाम हो रही थी, डिप्टी साहब अपने तम्बू के सामने एक पेड़ के नीचे कुरसी पर बैठे हुए थे। इलाके के कई जमींदार भी मौजूद थे।

एक मुसलमान महाशय ने कहा, हुजूर, आजकल ताल में चिड़ियाँ खूब हैं। शिकार खेलने का अच्छा मौका है।

दूसरे महाशय बोले, हुजूर जिस दिन चलने को कहें, बेगार ठीक कर लिए जायेँ। दो-तीन डोंगियाँ भी जमा कर ली जाय॑ँ।

शिवबिलास-क्या अभी तक आप लोग बेगार लेते ही जाते हैं ? मु 'जी हाँ, इसके बगैर काम कैसे चलेगा ? मगर हाँ, अब मार-पीट बहुत करनी पड़ती

।! शस

एक ठाकुर साहब बोले, जब से गाँव के मनई बसरा में मजूर होके गये तब से कोऊ का मिजाजै नहीं मिलत |-बात तक तो सुनत नहीं है। ई लड़ाई हमका मटियामेट कै दिहेस। .

शिवबिलास-आप लोग मजूरी भी तो बहुत कम देते हैं।

ठाकुर-हुजूर, पहले दिन-भर में दुई पैसा देत रहेन, अब तो चार देइत हैं, तौनों पर कोऊ बिना मार-गारी खाये बात नहीं सुनत है।

शिवबिलास-खूब ! चार पैसे तो आप मजदूरी देते हैं और चाहते हैं कि आदमियों को गुलाम बना लें। शहर में कोई मजदूर आठ आने से कम में नहीं मिल सकता।

मुसलमान महाशय ने कहा, हुजूर बजा फरमाते हैं। चार पैसे में तो एक वक्‍त की रोटियाँ भी नहीं चल सकतीं। मगर यहाँ की रिआया सख्ती की ऐसी आदी हो गयी है कि हम चाहे आठ आने ही क्‍यों न दें, पर बिला सख्ती किये मुखातिब ही नहीं होती । हाँ, यह तो बतलाइए हुजूर, यह आजकल क्‍या हवा फिर गयी है कि जहाँ देखिए वहीं मदरसे बन्द का जाते हैं। सुनता हूँ बड़े-बड़े कालेज भी टूट रहे हैं। इससे तालीम का बड़ा नुकसान

गा।

बाबू हरिबिलास को मालूम था कि शिवबिलास इसका क्‍या जवाब देगा। उसके राजनैतिक विचारों से परिचित थे। दोनों आदमियों में प्रायः इस विषय पर वाद-विवाद होता रहता था। लेकिन वे न चाहते थे कि इन जमींदारों के सामने वे अपने स्वाधीन विचार प्रकट करें। शिवबिलास को बोलने का अवसर न देकर आप ही बोले, मैं तो इसे पागलपन समझता हूँ, निरा पागलपन। यह लोग समझते हैं कि इन कार्रवाइयों से वे हमारी सरकार को परास्त कर देंगे। कुछ लोग देहातों में पंचायतें भी बनाते फिरते हैं। इसका मतलब भी यही है कि सरकारी अदालतों की जड़ खोदी जाय; लेकिन कोई इन भलेमानुसों से पूछे कि क्या कानूनी गुत्यियाँ इन देहातियों के सुलझाये सुलझ जायँगी। जिस कानून के पढ़ने और समझने में उमरें गुजर जाती हैं, उसका व्यवहार यह हल जुत्ते क्या खाकर करेंगे। शासन की बुनियादी परम्परा सत्य और न्याय पर स्थित रही है और जब तक शासक लोग इस मूल तत्त्व को भूल न जायें, राज्य की अवनति नहीं हो सकती। हमारी सरकार ने सदैव इस आदर्श को अपने सामने रखा है। प्रत्येक जाति को, प्रत्येक व्यक्ति को उस रेखा तक कर्म और वचन की पूर्ण स्वाधीनता दे दी है कि जहाँ तक उससे दूसरों को कोई हानि न हो। यही न्यायप्रियता हमारी सरकार को अमर बनाये हुए है। जोर दिया जा रहा है कि लोग सरकारी नौकरियाँ छोड़ दें। इस उद्देश्य का पूरा होना और भी कठिन है। मैं यह मानता हूँ कि कर्मचारी लोग बड़ी संख्या में इस नीति पर चलें तो सरकार के काम में बाधा पड़ सकती है लेकिन ऐसा होना असप्भव-सा जान पड़ता है। कर्मचारियों में अच्छे और बुरे दोनों ही हैं। जो बुरे हैं वे नौकरी कभी न छोड़ेंगे, इसलिए कि बेईमानी और रिश्वत के ऐसे अवसर कहीं नहीं मिल सकते; जो अच्छे हैं उनके लिए भी यहाँ जाति-सेवा और उपकार का बड़ा विस्तृत क्षेत्र है। उन्हें किसी पर अन्याय करने के लिए मजबूर नहीं किया जाता। सरकार किसी गुप्त और प्रजाघातक नीति का व्यवहार नहीं करती। ऐसी दशा में वे लोग पृथक नहीं हो सकते। नौकरी को गुलामी कहकर उसकी निन्‍्दा की जाती है। लेकिन मैं उस वक्‍त तक इसे गुलामी नहीं समझ सकता, जब तक हमें अपने धर्म और आत्मा के विरुद्ध चलने पर विवश न किया जाय । जमींदारों ने ये बातें ध्यान से सुनीं। ऐसा जान पड़ता था कि इस विषय में सब-के-सब बाबू हरिबिलास से सहमत हैं। हाँ, शिवबिलास इन युक्तियों का प्रतिवाद करने के लिए अधीर हो रहे थे, पर इतने आदमियों के सामने मुँह खोलने का साहस न होता था।

इतने में बेगार ने चिड्डियों का यैला लाकर डिप्टी साहब झे आगे रख दिया। यद्यपि शहर यहाँ से 5 मील के लगभग था, पर एक बेगार प्रतिटिन डाक लाने के लिए भेजा जाता था। डिप्टी साहब ने उत्सुकता के साथ यैला खोला तो उसमें से लाल फीते से बँधा हुआ एक सरकारी “कम्युनिक” (प्रकाश पत्र) निकल पड़ा। उसे गौर से पढ़ने लगे।


3

आधी रात जा चुकी थी, किन्तु हरिबिलास अभी तक करवट बदल रहे थे। मेज पर लैम्प जल रहा था। वे उसी लाल फीते से बँधे हुए पत्र को बारबार देखते और विचारों में डूब जाते। वह लाल फीता उन्हें न्याय और सत्य के खून में रँगा हुआ जान पड़ता था। लगता किसी घातक की रक्तमय आँखें थीं जो उनकी ओर घूर रही थीं या एक ज्वाला-शिखा जो उनकी आत्मा और सत्य-ज्ञान को निगल जाने के लिए उनकी ओर लपकी चली जाती थी। वे सोच रहे थे, अब तक मैं समझता था कि मेरा कर्तव्य न्याय पर चलना है। अब मालूम हुआ कि यह मेरी भूल थी। मेरा कर्तव्य न्याय का गला घोंटना है, नहीं तो मुझे ऐसा आदेश क्यों मिलते ? क्‍या समाचार-पत्रों का पढ़ना भी कोठ अपराध है ? क्‍या दीन किसानों की रक्षा करना भी कोई पाप है ? मैं ऐसा नहीं समझता। मुझे उन साधु संन्यासियों पर कड़ी दृष्टि रखने का हुक्म दिया गया है जो धर्मोपदेश करते हुए दिखाई दें। यही नहीं, मुझे यह भी देखना चाहिए कि कौन गजी-गाढ़े के कपड़े पहने हुए हैं, किसके सिर पर कैसी टोपी है, उस टोपी पर कैसी छाप लगी हुई है। चरखा चलाने वालों पर भी नजर रखनी चाहिए मुझे उन लोगों के नाम भी अपने रोजनामचे में दर्ज करने चाहिए, जो राष्ट्रीय पाठशालाएँ खोलें, जो देहातों में पंचायतें बनायें, जो जनता को नशे की चीजें त्याग करने का उपदेश करें। इस आज्ञा के अनुसार वे भी राजविद्रोही हैं, जो लोगों में स्वास्थ्य के नियमों का प्रचार करें, ताउन और हैजे के प्रकोप से जनता की रक्षा करें, उन्हें मुफ्त दवाएँ दें, सारांश यह कि मुझे जाति के सेवकों का, हितैषियों का शत्रु बनना चाहिए। इसलिए कि मैं शासन का एक अंग हूँ।

उन्होंने एक बार फिर लाल फीते की ओर देखा। हाँ, तो इस दशा में मेरा कर्तव्य क्या है ? अपनी जाति का साथ दूँ या विजातीय सरकार का ? इस समस्या का कारण यही है कि हमारे शासक विजातीय हैं और उनका स्वार्थ प्रजा के हित से भिन्‍न है। वे अपनी जाति के स्वार्थ के लिए, गौरव के लिए, व्यापारिक उन्नति के लिए यहाँ के लोगों को अनंत काल तक इसी दशा में रखना चाहते हैं। इसीलिए प्रजा के राष्ट्रीय भावों को जागते देखकर वे उनको दबाने पर तुल जाते हैं। उन्हें वे सरल व्यवस्थायें आपत्तिजनक जँचने लगती हैं जिन्हे प्रजा अपने आत्म-सुधार के लिए करती है। नहीं तो क्या मद-त्याग के उपदेश भी सरकार की ऊखों में खटकते ? शासन का मुख्य धर्म है प्रजा की रक्षा, न्याय और शान्ति का विधान। अब तक मैं समझता था कि सरकार इस कर्तव्य को सर्वोपरि समझती है, इसलिए मैं उसका भक्त था।-जब सरकार अपने धर्म-पथ से हट जाती है तो मेरा धर्म भी यही है कि उसका साथ छोड़ दूँ। अपने स्वार्थ के लिए देश का द्रोही नहीं बन सकता। सरकार से मेरा थोड़े दिनों का नाता है, देश से जन्म-भर का। क्या इस अस्थायी अधिकार के गर्व में अपने स्थायी सम्बन्ध को भूल जाऊँ। इस अधिकार के लिए क्‍या अब मुझे देश का शत्रु बनना पड़ेगा ? क्या देश को अपने स्वार्थ पर न्यौछावर कर दूँ ? एक तो वे हैं जो देश-सेवा पर आत्म-समर्पण कर देते हैं, उसके लिए नाना प्रकार के कष्ट झेलते हैं। एक मैं अभागा हूँ, जिसका काम यह है कि उन देश-सेवकों की जान का गाहक बनूँ। लेकिन यह सम्बन्ध तोड़ दूँ तो निर्वाह कैसे हो ? जिन बच्चों को अब तक सभी सुख प्राप्त थे उन्हें अब दरिद्रता का शिकार बनना पड़ेगा। जिस परिवार का पालन-पोषण अब तक अपमीरों के ढंग पर होता था, उसे अब रो-रोकर दिन काटने पड़ेंगे। घर की जायदाद मेरी शिक्षा की भेंट हो चुकी, नहीं तो कुछ खेती-बारी ही करके गुजर करता। वही तो मेरा मौरूसी पेशा था। कैसा सनन्‍्तोषमय जीवन था, अपने पसीने की कमाई खाते थे और सुख की नींद सोते थे। इस शिक्षा ने मुझे चौपट कर दिया, विलास का दास बना दिया, अनावश्यकताओं की बेड़ी पैरों में डाल दी। अब तो उस पुराने जीवन की कल्पना मात्र से प्राण सूख जाता है।

हा ! हृदय में कैसी-कैसी अभिलाषाएँ थीं, कैसे-कैसे मनमोदक खाता था। शिवबिलास विलायत जाकर डाक्टरी पढ़ने का स्वप्न देख रहा है। सन्तबिलास को वकालत की धुन सवार है, छोटा श्रीबिलास अभी से सिविल सरविस की तैयार कर रहा है। अब इन सबों के मन्सूबे कैसे पूरे होंगे। लड़कों को तो खैर छोड़ भी दूँ तो वे किसी-न-किसी तरह गुजर कर ही लेंगे, लड़कियों का क्या करूँ। सोचा था, उनका विवाह उच्चकुल में करूँगा, जाति का भेद मिटा दूँगा। यह मनोकामना भी पूरी होती नहीं दीखती। कहीं दूसरी जगह नौकरी तलाश करूँ तो इतना वेतन कहाँ मिल सकता है ? रईसों के दरबार में पहुँचना कठिन है। सरकार की अवज्ञा करनेवाले को धरती-आकाश कहीं भी ठिकाना नहीं। परमात्मन्‌, तुम्हीं सुझाओ क्या करूँ ?

इन्हीं चिन्ताओं में पड़े-पड़े उन्हें नींद आ गयी।

एक सप्ताह बीत गया, पर बाबू हरिबिलास अभी तक दुविधा में ही पड़े थे। वह प्रायः उदास और खिन्‍न रहते थे। इजलास पर बहुत कम आते और आते भी तो मुकदमों की तारीख मुल्तवी करके फिर चले जाते। लड़के और लड़कियों से भी बहुत कम बातचीत करते, बात-बात पर झुँझला पड़ते, कुछ चिड़चिड़े हो गये थे। उन्होंन स्त्री से इस समस्या की चर्चा की, पर वह इस्तीफा देने पर उनसे सहमत न हुई। उसमें न्याय का वह ज्ञान न था जो हरिबिलास के हृदय को व्यथित कर रहा था। लड़कों से इस विषय में कुछ कहने का उन्हें साहस न होता था। डरते थे कि वे निराश, निरुत्साह हो जायँंगे। आनन्दमय जीवन की कैसी-कैसी कल्पनाएँ कर रहे होंगे, वह सब नष्ट हो जायँगी। इस विषय में तो अब उन्हें कोई' सन्देह न था कि सरकार ने सत्पथ को त्याग दिया और उसकी नौकरी से मेरा उद्धार नहीं हो सकता। ऐसा हुनर, कोई ऐसा उद्यम न जानते थे जिस पर उन्हें भरोसा होता। यहाँ तक कि साधारण क्रय-विक्रय भी उनके लिए कष्टसाध्य था। वे अपने को इस नौकरी के सिवा और किसी काम के योग्य न पाते थे। और न अब इतनी सामर्थ्य ही थी कि कोई नया उद्यम सीख सकें। स्वार्थ और कर्तव्य की उलझन में उनकी अत्यंत करुण दशा हो रही थी।


4

आठवें दिन उन्हें यह ख़बर मिली कि इस इलाके में मादक वस्तुओं का निषेध करने के लिए किसानों की एक पंचायत होनेवाली है, उपदेश होंगे, भजन गाये जायँगे और लोगों से मद-त्याग की प्रतिज्ञा ली जायगी। हरिबिलास मानते थे कि नशे के व्यसन से देश का सर्वनाश हुआ जाता है, यहाँ तक कि नीची श्रेणी के मनुष्यों को तो इसने अपना गुलाम ही बना लिया है, अतएव इसका बहिष्कार सर्वथा स्तुत्य है। पहले एक बार मादक-वस्तु-विभाग में रह चुके थे और उनके समय में इस विभाग की आमदनी खूब बढ़ गयी थी। उस वक्त इस प्रश्न को वे अधिकारियों की आँखों से देखते थे। टेम्परेन्स के उपदेशकों को सरकार का विरोधी समझते थे। लेकिन इस लाल फीतेवाले आज्ञापत्र ने उनकी काया ही पलट दी थी। सरकारी प्रजा-हित-नीति पर उन्हें लेशमात्र भी विश्वास न रहा था। इस आज्ञा के अनुसार उनका कर्त्तव्य था कि जाकर इस पंचायत की कार्राइयों को देखें और यदि इस त्याग के लिए किसी के साथ सख्ती या तिरस्कार करते पायें तो तुरन्त उसे बन्द कर दें। मनुष्योचित और पदोचित कर्त्तव्यों में घोर संग्राम हो रहा था। इसी बीच में हल्के का दारोगा कई सशस्त्र कान्सटेबलों और चौकीदारों के साथ आ पहुँचा और सलाम करने को हाजिर हुआ | हरिबिलास उसकी सूरत देखते ही लाल हो गये, जैसे फूस में आग लग जाय। कठोर स्वर से बोले, आप यहाँ कैसे आये?

दारोगा-हुजूर को इस पंचायत की इत्तिला तो मिली ही होगी। वहाँ फिसाद होने का खौफ है। इसलिए हुजूर की खिदमत में हाजिर हुआ हूँ।

हरिबिलास-मुझे इसका कोई भय नहीं है। हाँ, आपके जाने से फिसाद हो सकता है।

दारोगा ने विस्मित होकर कहा-मेरे जाने से !

हरिबिलास-हाँ, आपके जाने से। रिआया को आपस में लड़ाकर आप अपना उल्लू सीधा करते हैं। मैं आपको हथकंडों से खूब वाकिफ हूँ। आपको मेरे साथ चलने की जरूरत नहीं ।

दारोगा-सुपरिंटेन्डेन्ट साहब बहादुर का सख्त हुक्म है कि इस मौके पर हुजूर की खिदमत में हाजिर रहूँ।

हरिबिलास-तो क्या आप मुझे नजरबन्द करने आये हैं ?

दारोगा ने भयभीत होकर कहा-हुजूर की शान में मुझसे ऐसी...

हरिबिलास-मैं तुम्हारे साहब का गुलाम नहीं हूँ।

दारोगा-तो मेरे लिए कया आर्डर होता है ?

हरिबिलास-जाकर अपने साफे को जला डालिए और वरदी को फाड़कर फेंक दीजिए और इस गुलामी की जंजीर को, जो आपकी कमर मैं है और जिसे आप हुकूमत का निशान समझते हैं, तोड़लर आजाद हो जाइए। सरकारी हुक्मों की बहुत तामील कर चुके । डाके और चोरी की तफतीश खूब की और हराम का माल खूब जमा किया। अब जाकर कुछ दिनों घर बैठिए और अपने पापों का प्रायश्चित कीजिए । रिआया की जान व माल हिफाजत करने का स्वॉँग भरकर उनको अजाब में न डालिए यह किसानों की पंचायत है, लुटेरों का जत्या नहीं है, सब एक जगह बैठ कर नशेबाजी बन्द करने की तदवकीरें सोचेंगे। आपको मेरे साथ चलने की मुतलक जरूरत नहीं है।

बाबू हरिबिलास का मुखमंडल विमल क्रोध से उत्तेजित हो रहा था और आँखों से ज्योति निकल रही थी। दारोगा जी पर रोब छा गया और यह सोचते हुए कि या तो इन्होंने आज शराब पी है या इन पर कोई सख्त सदमा आ पड़ा है, थाने चले गये। ये शब्द बाबू हरिबिलास के अन्तःकरण से निकले थे। वह उनके अन्तिम निश्चय की घाषणा थी। दारोगा जी ने इधर पीठ फेरी उधर उन्होंने अपना इस्तीफा लिखना शुरू किया।

“महाशय ! मेरा विश्वास है कि शासन-संस्था ईश्वरी इच्छा का बाह्य स्वरूप है और उसके नियम भी ईश्वरीय नियमों की भाँति दया, सत्य और न्याय पर अवलम्बित हैं। मैंने इसी विश्वास के अधीन बीस वर्ष तक सरकार की सेवा की। जब कभी मेरे आत्मिक आदेश और सरकारी हुक्म में विरोध हुआ, मैंने यथासाध्य आत्मा का आदेश पालन किया। मैंने अपने को कभी प्रजा का स्वामी नहीं समझा, सदैव सेवक समझता रहा, इसलिए सरकारी पत्र न॑ं....तारीख....में जो आज्ञा दी गयी है वह मेरी आत्मा और धर्म के इतनी विरुद्ध है, और उसमें न्याय की ऐसी हत्या की गयी है, कि मैं उसका पालन करना घोर पाप समझता हूँ। मेरे विचार में वर्तमान शासन सत्पथ से सम्पूर्णतः विचलित हो गया है। यह आज्ञा प्रजा के जन्मसिद्ध स्वत्व को छीनना और उनके राष्ट्रीय भावों का वध करना चाहती है। यह उसका प्रत्यक्ष प्रमाण है कि शासकवृन्द प्रजा को अनन्त काल तक मूर्खता और अज्ञान में व्यस्त रखना चाहते हैं और उसकी जागृति से सशंक हैं। वह अपने उत्थान और सुधार के लिए जो प्रयत्न करना चाहती है उसे भी ताड़नीय समझते हैं, ऐसे दुष्कर्म में योग देना अपनी आत्मा, विवेक और जातीयता का खून करना है। अतएव अब मुझे इस राज-संस्था से असहयोग करने के सिवा और कोई उपाय नहीं है। मैं अपना पद-त्याग करता हूँ और प्रार्थना करता हूँ कि मुझे बिना विलम्ब इस बन्धन से मुक्त किया जाय |”


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बावू हरिबिलास ने समझा था कि इस्तीफा मंजूर होने में कुछ देर लगेगी; लेकिन दूसरे ही दिन तार द्वारा मंजूरी आ गयी। उनकी जगह पर एक महाशय नियुक्त हो गये। हरिबिलास ने बड़ी खुशी से चार्ज दिया, किन्तु शाम होते-होते उनकी यह खुशी गायब हो गयी और अनेक चिन्ताओं ने आ घेरा। बजाज के कई सौ रुपये बाकी थे, नौकरों का वेतन भी बाकी पड़ा हुआ था, बँगले का किराया छः महीने से न दिया गया था, हलवाई का हिसाब-किताब चुकाना था, ग्वाले कें कुछ रुपये आते थे। इधर वे इजलास पर बैठे हुए चार्ज दे रहे थे, उधर उनकी कोठी के द्वार पर लेनदारों की भीड़ लगी हुई थी। वे चार्ज देकर लौटे तो यह समूह देखकर उनका दिल बैठ गया। यों वे कुछ हाल और कुछ बकाया के रुपये अपनी सुविधा के अनुसार दे दिया करते थे। लेकिन आज जब हाल और बकाया दोनों ही चुकाना पड़ा, तो यह रकम इस तरह बढ़ी जैसे साफ फर्श को हटा देने से नीचे गर्द का एक ढेर दिखाई देने पलगता है। उन्हें अब तक यह अनुमान ही न हुआ था कि मैं इतने रुपयों का देनदार हूँ। सेविंग बैंक की सारी बचत इसी फुटकर हिसाब के चुकाने में समाप्त हो गयी। अब घोड़े, टमटम आदि की भी जरूरत न थी। उन्हें नीलाम करके हाथ में कुछ रुपये कर लेना चाहते थे। दूसरे दिन प्रातःकाल जब वे चीजें नीलाम होने लगीं तो वे इस हृदय-विदारक दृश्य को सहन न कर सके। हताश होकर घर में गये तो उनकी आँखें सजल थीं ! सुमित्रा ने उन्हें दुखी देखकर सहदयतापूर्ण भाव से कहा-व्यर्थ दिल इतना छोटा करते हो। रंज करने की कोई बात नहीं, यह तो और खुशी की बात है कि जिस काम के करने में अधर्म था उससे गला छूट गया। अब तुम्हें किसी पर अन्याय करने के लिए कोई मजबूर तो न करेगा। भगवान किसी-न-किसी तरह बेड़ा पार लगावेंगे ही। अपने भाई-बन्दों पर अन्याय करते तो उसका दोष, पाप हमारे ही बाल-बच्चों पर न पड़ता ? भगवान को कुछ अच्छा करना था, तभी तो उसने तुम्हारे मन में यह बात डाली। , इन बातों से हरिबिलास को कुछ तस्कीन हुई। सुमित्रा पहले इस्तीफा देने पर राजी

न होती थी, पर पति को मानसिक कष्ट से निवृत्त करने की इच्छा ने उसके धैर्य और संतोष को सजग कर दिया था।

हरिबिलास ने सुमित्रा की ओर श्रद्धाभाव से देखकर कहा, जानती हो कितनी तकलीफें उठानी पड़ेंगी ?

सुमित्रा-तकलीफों से क्या डरना। धर्म-रक्षा के लिए आदमी सब कुछ सह लेता है। हमें भी तो आखिर ईश्वर के दरबार में जाना है। उसको कौन-सा मुँह दिखाते।

हरिबिलासं-क्या बताऊँ, मुझे तो इस वैज्ञानिक शिक्षा ने कहीं का न रखा। ईश्वर पर श्रद्धा ही नहीं रही। यद्यपि मैंने इन्हीं भावों से प्रेरित होकर इस्तीफा दिया है, पर मुझमें यह सजीव और चैतन्य भक्ति नहीं है। मुझे चारों ओर अन्धकार-ही-अन्धकार दिखता है। लड़के अभी तक अपने को सँभालने के योग्य नहीं हुए । शिवबिलास को साल भर और भी पढ़ा सकता तो वह घर संभाल लेता ! सन्‍्तविलास को अभी तीन साल तक सँभालने की जरूरत है, और बेचारे श्रीबिलास की तो अभी कोई गिनती ही नहीं । अब ये बेचारे अद्धड़ ही रह जायँगे। मालूम नहीं, मन में मुझे क्या समझते हों।._,

सुमित्रा-अगर उन्हें ईश्वर ने बुद्धि दी होगी तो अब वह तुम्हें अपना पिता समझने के बदले देवता समझने लगेंगी।


6

रात का समय था। शिवबिलास और उनके दोनों भाई बैठे हुए वार्तालाप कर रहे थे।

शिवबिलास ने कहा, आजकल दादा की दशा देखकर यही जी चाहता है कि गृहस्थी के जंजाल में न पड़ें। कल जब से इस्तीफा मंजूर हुआ है तब से उनका चेहरा ऐसा उदास हो गया है कि देखकर करुणा आती है। कई बार इच्छा हुई कि चलकर उन्हें तस्कीन दूँ, लेकिन उनके सामने जाते हुए स्वयं मेरी आँखें सजल हो जाती हैं। आखिर हमीं लोगों की चिन्ता उन्हें सता रही है, नहीं तो उन्हें अपनी क्‍या चिन्ता थी? चाहें तो किसी स्कूल या कालेज में अध्यापक हो सकते हैं। दर्शन और अर्थशास्त्र में बहुत कुशल हैं।

सनन्‍्तबिलास-आपने मेडिकल कालेज से अपना नाम नाहक कटवा लिया। यह विभाग तो बुरा न था। आप सरकारी नौकरी न करते, घर बैठकर तो काम कर सकते थे। दादा से भी न पूछा। वे सुनेंगे तो बहुत रंज होगा।

शिवबिलास-इसीलिए तो मैंने अब तक उनसे कहा नहीं ।"और फिर मौका भी नहीं मिला | डाक्टरी विभाग कितना ही अच्छा हो लेकिन मैंने जो संकल्प कर लिया है उस पर स्थिर हूँ। क्यों, तुम कुछ मदद कर सकोगे ?

श्रीबिलास-वह देखिये, मियाँ घोड़े अस्तबल से निकले। अब कल से किसी दूसरे कोचवान के पाले पड़ेंगे, मारते-मारते भुरकस निकाल देगा। टूटी टमटम भी सटर-पटर करती हुई चली।

सन्तबिलास-मैं तो परीक्षा के पहले शायद आपकी कुछ मदर न कर सकूँ। उसके बाद मुझसे जो काम चाहें, ले सकते हैं।

शिवबिलास-एम. ए. से क्‍यों तुम्हें इतना प्रेम है।

श्रीबिलास-एम. ए. का अर्थ है मास्टर आफ आर्ट्स”।

सन्तबिलास-यह मेरी बहुत पुरानी अभिलाषा है और अब लक्ष्य के इतना समीप आकर मुझसे नहीं हटा जाता।

शिवबिलास-अपने नाम के पीछे एम. ए., एल-एल. बी. का पुछल्ला लगाये बिना नहीं मानोगे।

सन्‍्त-(चिढ़कर) कोई और भी मानता है या मैं ही मानूँ। सभी तो इन उपाधियों पर जान देते हैं और क्‍यों न दें, समाज में इनका सम्मान कितना है। अभी तक शायद ही कोई ऐसा मनुष्य हो जिसने अपनी डिग्रियाँ छोड़ दी हों। वे लोग भी जो असहयोग के नेता थे - अपने नामों.के साथ.पुछल्ले लगाने में कोई आपत्ति नहीं समझते, नहीं बल्कि उस पर गर्व करते हैं। आपके राष्ट्रीय कालेजों में भी इन्हीं डिग्रियों की पूछ होती है। चरित्र को कोई पूछता भी नहीं। जब हम इसी कसौटी पर परखे जाते हैं तो मेरे उपाधि प्रेम पर किसी को हँसने की जगह नहीं है।

शिवबिलास-तुम तो नाराज हो गये। मेरा आक्षेप तुम पर नहीं बल्कि सभी उपाधि-प्रेमियों पर था। यदि असहयोगी लोग अभी तक उपाधियों पर जान दे रहे हैं तो इससे इस प्रथा का दूषण कम नहीं होता है। यह उनके लिए और भी निन्‍न्द्य है। लेकिन हाँ, अब हवा बदल रही है, सम्भव है थोड़े दिनों में यह प्रथा मिट जाय। तुम एक वर्ष में मेरी सहायता करने का वचन देते हो। इतने दिन तक एक समाचार-पत्र का बोझ मैं अकेले कैसे सँभाल सकूँगा।

सनन्‍्त-पहले यह तो बतलाइए आपकी नीति क्‍या होगी ? अगर आपने भी वही नीति रखी जो दूसरे पत्रों की है तो अलग पत्र निकालने की क्‍या जरूरत है ?

श्रीबिलास-मुझसे तो आप लोग पूछते ही नहीं। मैं भी मदरसा छोड़ रहा हूँ।

शिव-तुम मेरे कार्यलिय में लेखक बन जाना।

सन्‍्त-तुम क्‍यों बीच में बोल उठते हो ? हाँ, भाई साहब, आपने कौन-सी नीति ग्रहण करने झा निश्चय कियाह ?

शिव-मेरी नीति होगी सरल, किन्तु विवेकशील जीवन का प्रचार। मैं विलासिता और दिखावे की जड़ खोदने की चेप्टा करूँगा। हम आँखें बन्द किये हुए पच्छिमी जीवन की नकल कर रहे हैं। धन को हमने सर्वोच्च स्थान दे रखा है। हमारी कुलीनता, सम्मान, गौरव, प्रतिभा सब कुछ धन के अधीन हो गयी है। हम अपने पुरुषाओं के सनन्‍्तोष और संयम, त्याग को विल्कुल भूल गये हैं। जहाँ देखिए वहीं धनपतियों की, साहूकारों की, जमींदारों की पताका लहरा रही है। मैं दीन-रक्षा को अपना आदर्श बनाऊँगा। यद्यपि वे विचार नये नहीं है, कभी-कभी पत्रों में इन पर टिप्पणियाँ की जाती हैं, किन्तु अभी तक इनका महत्त्व दार्शनिक सिद्धान्तों से अधिक नहीं है, और वह भी यूरोप के बड़े-बड़े विद्वानों की नकल है। यह टिप्पणियाँ केवल मनोरंजन के लिए की जाती हैं, इसी कारण इनका किसी पर असर नहीं पड़ता। मेरा जीवन इस सिद्धान्त को चरितार्थ करेगा। ये विचार बरसों से मेरे मन में तरंगें मार रहे हैं। अब ये तरंगें बाहर निकलकर धन-लोलुपता और इन्द्रिय- लिप्सा की दीवारों से टकरायेंगी। में तुमसे सच कहता हूँ, धन का यह मान देखकर कभी-कभी मेरा रक्त खौलने लगता है। विद्वानों और गुणियों की इज्जत ही उठ गयी। एक समय यह था कि बड़े-बड़े सम्राट ज्ञानियों के सामने सिर झुकाते थे। आजकल तो धार्मिक संस्थाएँ भी धनियों का मुँह ताकती रहती हैं। हमारे साधु-महात्मा, उपदेशक देहातों में भूल कर भी नहीं जाते। वे ऊँचे-ऊँचे सुसज्जित पंडालों में व्याख्यान देते हैं, मोटरों पर हवा खाते और सुन्दर प्रासादों में निवास करते हैं। शोक तो यह है कि विद्वज्जन भी इसी धनदेव के उपासक हैं। जिन्हें संतोष और सरलता का नमूना होना चाहिए था वे भी अपनी विद्या और योग्यता को मोतियों के तौल बेचते हैं। धन-लालसा ने उन्हें भी ग्रस लिया, त्याग का तो लोप ही हो गया।

सनन्‍्त-आपके विचार तो साम्यवादियों से हैं। क्या आपको मालूम नहीं कि वे लोग विद्वानों को अपने समाज में क्या स्थान देते हैं ?

शिव-खूब मालूम है, ऐसे विद्वान्‌ इसी बर्ताव के योग्य हैं। जिस प्रकार भूमिवाले अपनी भूमि को, व्यापार वाले अपने व्यापार को भोग-विलास का साधन बनाते हैं इसी प्रकार विद्वान लोग भी अपनी विद्या और सिद्धि को इन्द्रियों के सुख पर बलिदान करते हैं। ऐसी दशा में उन्हें यदि धनियों और भूपतियों के साथ गिना जाता है तो कोई अन्याय नहीं है।

इतने में एक सुन्दरी बालिका कमरे में आयी। यह बाबू हरिबिलास की छोटी लड़की अंजनी-थी। कन्या पाठशाल में पढ़ती थी। श्रीबिलास ने कहा, आओ अंजनी आओ, ये दोनों महाशय तो बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं, हम-तुम भी अपने जीवन के छोटे-छोटे मन्सूबे बाँघें। मैंने तो खेती करने का विचार किया है।

अंजनी-मैं तुम्हारी गाय दुहूँगी, दही जमाऊँगी, घी निकालूँगी।

श्री-और चर्खा ?

अंजनी-भैया, मुझसे चर्खा न चलाया जायगा, यह बुढ़िया का काम है।

श्री-वाह इस चर्खे पर तो सब कुछ निर्भर है। हमारे देश में 70 करोड़ का कपड़ा हर साल विलायत से आता हैं। शायद 0 करोड़ का कपड़ा इटली, जापान, फ्रान्स आदि देशों से आता होगा। हम, तुम और भाग्यवती आध पाव सूत रोज कातें और साल में 900 दिन काम करें तो तीन मन सूत कात लेंगे। 3 मन सूत में कम-सेन्कम 00 जोड़े धोतियाँ तैयार होंगी। अगर एक जोड़े का दाम 4 रु. ही रखें, तो हम साल भर में 400 रु. की धोतियाँ बना लेंगे। धुनाई मैं आप कर लूँगा। यह 3 प्राणियों के साधारण परिश्रम का फल है। यदि देश की आबादी के केवल 50 लाख मनुष्य यह काम करने लगें तो हमारे देश को 80 करोड़ वार्षिक बचत हो जायगी। अगर एक करोड़ मनुष्य इस धन्धे में लग जाये तो हमें कपड़े के लिए अन्य देशों को एक पैसा भी न देना पड़े।

शिव-(हिसाब लगाकर) यार तुमने खूब हिसाब लगाया। इतने महत्त्वपूर्ण काम के लिए 50 लाख मनुष्यों की आवश्यकता है। मुझे अब तक यह अनुमान ही न था कि इतने कम आदमियों की मेहनत हमारी आवश्यकताओं को पूरी कर सकती है। चलो मैं भी तुम्हारी मदद करूँगा। अपने पत्र में घरेलू उद्योग-धन्धों का प्रचार करूँगा।

सन्‍्त-आपके और मेरे आदर्शों में बड़ा अन्तर है। मेरा विचार है कि बुद्धि और मस्तिष्क से काम करनेवालों की श्रमजीवियों पर सदैव प्रधानता रहेगी। उनके काम का महत्त्व कहीं अधिक है। यदि आप उनके लिए अवस्थानुकूल जीवनवृत्ति की व्यवस्था नहीं करेंगे, तो वे एकाग्रचित्त होकर विद्या की उन्‍नति न कर सकेंगे और उसका परिणाम बुरा होगा। सनन्‍्तोष और त्याग राष्ट्रीय अवनति के लक्षण हैं। उन्‍नत जातियाँ अधिकार, राज्य विस्तार, सम्पत्ति और गौरव पर जान देती हैं, यहाँ तक कि बोलशेविष्ट भी दिनोंदिन अपने राज्य की सीमाएँ बढ़ाते चले जाते हैं।

शिव-इस विषय पर फिर बातें होंगी, चलो इस समय मौका है, दादा घर में अम्माँ के पास बैठे हुए हैं, जरा उन्हें तसकीन दे आयें।


7

तीनों युवक जाकर हरिबिलास के सामने खड़े हो गये। उन्होंने चिन्तित भाव से शिवबिलास को देखकर पूछा, तुम्हारा कालेज कब खुलेगा ?

शिव-कालेज पन्द्रह जनवरी को खुलेगा, लेकिन मैं वहाँ जाना नहीं चाहता। नाम कटवा लिया।

हरिबिलास-यह तुमने कया नादानी की। तुम्हारी समझ में कया मैं चार महीने तक भी तुम्हरी सहायता न कर सकता। इसी एप्रिल में तो तुम्हारी परीक्षा होनेवाली थी, कम-से-कम मुझसे पूछ तो लेते, क्या मेरा इतना अधिकार भी नहीं है ?

शिव-इतनी भूल तो अवश्य हुई, लेकिन जब आपने न्याय के लिए अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया, तो मेरे लिए यह लज्जा की बात थी कि आपके आदर्श के विरुद्ध व्यवहार करता। मैंने डाक्टरी पढ़ने का इरादा छोड़ दिया। कम-से-कम इसे जीविका का आधार नहीं बनाना चाहता। मेरा विचार एक समाचार-पत्र निकालने का है।

हरिबिलास-जेलखाने जाने के लिए तैयार हो ?

शिवबिलास-यदि न्याय और सत्य की रक्षा के लिए जेल जाना पड़े तो मैं इस अहोभाग्य समझूँगा।

हरिबिलास-मालूम होता है तुम्हें हवा अच्छी तरह लग गयी। रुपयों का क्या प्रबन्ध किया ?

शिवबिलास-इसकी आप चिन्ता न कीजिए। मेरे कई मित्रों ने सहायता करने का वचन दिया है।

हरिबिलास-अच्छी बात है, इसका भी मजा चख लो। अभी राजनीति के चक्कर में आये नहीं हो, समझते हो जाति-सेवा जितनी स्तुत्य है उतनी सुगम भी है, पर तुम्हें शीघ्र ही अनुभव हो जायगा कि यहाँ पग-पग पर कॉँटे हैं। मैं ऐसा स्वार्थान्ध और भाव-शून्य नहीं हूँ कि तुम्हारे देशानुराग को दबाना चाहूँ। किन्तु इतना जता देना अपना कर्तव्य समझता हूँ कि खूब सोच-समझकर इस क्षेत्र में आना। अगर कुछ दूर चलकर हिम्मत छोड़ दी तो फिर कहीं मुँह दिखाने लायक न रहोगे। मैं तुमसे मदद नहीं चाहता, बल्कि मेरे लिए तो यह परम गौरव की बात है कि मेरा पुत्र देश-सेवा में तल्‍लीन हो जाय, अपने को जाति पर न्योछावर कर दे, केवल तुम्हें कठिनाइयों से सचेत कर देना चाहता हूँ। तुम कब जाओगे सन्तू ?

सन्त-मैं पन्द्रह जनवरी को जाऊँगा।

हरिबिलास-तुम्हें कितने रुपयों की जरूरत होगी। इसी महीने में तो तुम्हारे इम्तिहान की फीस भी देनी होगी।

सन्त-जी हाँ, कोई ढाई सौ की जरूरत है।

हरिबिलास-(बगलें झाँकते हुए) इससे कम में काम न चलेगा ?

सनन्‍्त-असम्भव है, छः महीनों की पेशगी फीस देनी है, इम्तहान की फीस, बोर्डिंग की फीस, सभी तो चुकानी है। एक सूट भी बनवाना थ्राहता हूँ। मेरे पास कोई अच्छा सूट नहीं है।

हरिबिलास-इस समय सूट रहने दो, फिर बनवा लेना, हाँ फीस का प्रबन्ध मैं कर दूँगा। इससे कहाँ मुक्ति ? पढ़ो तो मुश्किल से 5 महीने और फीस दो पूरे साल की।

सन्‍्त-तो फिर कुछ न कीजिए, मैं स्वयं कोई प्रबन्ध कर लूँगा। आपके ऊपर खामख्वाह बोझ नहीं डालना चाहता।

हरिबिलास-यह तुम्हारी बुरी आदत है कि जरा-जरा-सी बात पर चिढ़ जाते हो। मेरी हालत देख रहे हो, फिर भी तुम्हारी आँखें नहीं खुलतीं।

सनन्‍्त-तो क्‍या आपकी इच्छा है कि मैं कालेज से नाम कटा लूँ।

हरिबिलास-यह तो मेरी इच्छा नहीं है, लेकिन अब तुम्हें अवस्थानुसार अपना खर्च घटाना पड़ेगा। मुझे यह देखकर खेद होता है कि वर्तमान दशाओं का तुम्हारे ऊपर बिल्कुल असर नहीं हुआ। आज-कल समस्त देश सरल जीवन की ओर झुका है। कोई मनुष्य अपने ठाटबाट, टीमटाम पर गर्व करने का साहस नहीं कर सकता। रेशमी वस्त्र और डासन के जूते और सुनहरे चश्मे अब तुच्छ दृष्टि से देखे जाते हैं। विशेषतः शिक्षित समुदाय के विलास-प्रेम को तो जनता सर्वथा अक्षम्य समझती है। शिक्षित लोगों से अब सेवा और उत्सर्ग की आशा की जाती है। वकीलों पर अब सम्मान की दृष्टि नहीं पड़ती, लोग उनसे विमुख होते जा रहे हैं। धनलोलुप अध्यापकों को तो जनता घृणा की निगाह से देखती है। मैंने स्वार्थवश तुम्हें वकालत की प्रेरणा की थी, किन्तु अब मुझे विश्वास होता जाता है कि हमारी जाति की अवनति का एक मुख्य कारण यही पेशा है। इसकी बदौलत हमारी अदालतों में न्याय सर्वसाधारण के लिए अलभ्य हो रहा है। जब एक-एक पेशी के लिए दो-दो, चार-चार सौ, यहाँ तक कि दो-दो, चार-चार हजार लिये जाते हैं तो स्पष्ट है कि यह समय या परिश्रम का मूल्य नहीं बल्कि लोगों की ईर्ष्या और दुर्जनता का ब्याज है। जिस पेशे का आधार मानव-दर्बलताओं पर हो, वह समाज के लिए कभी मंगलकारी नहीं हो सकता। मैं तुम्हारे इरादे में विध्म नहीं डालना चाहता लेकिन यदि तुम वकालत को न्याय-रक्षा के लिए नहीं, विलास के लिए ग्रहण करना चाहते हो, तो बेहतर है कि तुम इसे तिलांजलि दे दो। '

सन्‍्तबिलास ने 'कुछ उत्तर न दिया। खिन्‍न होकर वहाँ से उठ गये। अब बाबू हरिबिलास ने श्रीबिलास से पूछा, तुम तो इम्तहान की तैयारी कर रहे हो।

श्रीबिलास-जब आप कह रहे हैं कि दौलतवालों की आजकल कोई कदर नहीं है तो फिर ऐसी शिक्षा से क्या फायदा, जिसका उद्देश्य केवल धन कमाना है। मेरा भी नाम कटवा दीजिए। मैं आपकी सेवा में रहना चाहता हूँ। मेरा इरादा खेती करने का है। अंजनी भी मेरी मदद करेगी। अखिर आप देहात में चलकर कुछ-न-कुछ खेती जरूर ही करायेंगे। मुझको इस काम के लिए तैयार कर दीजिए।

हरिबिलास के मुखमंडल पर आत्माभिमान की लाली दिखाई दी। सुमित्रा से बोले, लो श्रीबिलास ने तुम्हारी चिन्ताओं का अन्त कर दिया। तुम सोच रही थीं कि कैसे क्‍या होगा। चलकर आराम से गाँव में रहो । यह खेती करेगा, तुम आराम की नींद सोओ और राम का नाम लो।


8

इसके तीसरे ही दिन बाबू हरिबिलास अपने गाँव में आ गये। मकान बे-मरम्मत पड़ा हुआ था, आगे-पीछे घास जम गयी थी; गाँव वालों ने द्वार पर खाद और कूड़े के ढेर लगा दिये थे। इधर वे कई साल से घर न आये थे। साफ बंगलों में रहने के आदी हो गये थे । उनके देखते यह घर झोपड़े से भी बदतर था। शिवबिलास ने असबाब उतारा और झाड़ू लेकर सफाई करने लगा। अंजनी भी घर में झाड़ू देने लगी। श्रीबिलास कुछ देर तक तो खड़ा देखता रहा, फिर टोकरी ले कर कूड़ा फेंकने लगा। गाँव में यह खबर फैल गयी कि हरिबिलास ने गाँधी महात्मा के हुक्म से इस्तीफा दे दिया। लोग इधर-उधर से आने लगे। कोई उनको सत्यवादी कहता था, कोई कहता था रिश्वत ली है, बर्खास्त हो गये हैं तो यह बहाना कर रहे हैं। हरबिलास एक टूटी खाट पर उदास बैठे हुए थे, सुमित्रा भीतर खड़ी सोच रही थी कि यह कूड़े का पहाड़ क्यों कर हटेगा। पहले यह लोग जब घर आते थे तो गाँव के लोग संकोचवश इनके समीप न आते थे। इनके ठाटबाट की सामग्रियों को कौतूहल की दृष्टि से देखते थे, पर कुछ बोलने की हिम्मत न पड़ती थी। किन्तु अबकी वे विस्मयकारी वस्तुएँ न थीं, न लड़कों में वह शेखी थी, न हरिबिलास और समित्रा में वह बड़प्पन की ऐंठ। अतएव सब-के-सब उनसे सहानुभूति करने लगे। स्त्रियाँ अंजनी के साथ घर की सफाई करने लगीं, कई आदमियों ने शिवबिलास के हाथ से झाडू छीन लिया और कूड़ा फेंकने लगे।

रामभरोसे पंडित ने कहा, भैया भला कियो, इस्तीफा दे दिहेब, देश-विदेश मारे-मारे फिरत रह्यो। घर माटी में मिला जात रहा।

शेख ईद बोले, चाकरी चाहे छोटी हो या बड़ी, मुदा चाकरी ही है। अल्लाह ने घर में सब कुछ दिया है तो काहे कोऊ की बन्दगी उठाई जाय।

गोबर चौकीदार बोला, मुदा भैया हुद्वा बड़ा भारू रहै। कई जिला भरे माँ अस पबड़वार हुद्दे कोऊ नहीं पायेस।

भोजू कुरमी बोले, हुद्दा तो भारू रहै मुदा कितने गरीबन के गला रेतै का परत रहा। सैकरन के जेहल पठै दिये होई हैं। ई लड़ाई मा गरीबन का मार-मार केतना करजा दियाबै के परा होई। दौड़ा करै जात रहे होई हैं तो कितना बेगार लेका परत रहा होई। हज्जारन किसान का बेदखली, कुड़की अखराज इनके हाथन भवा होई। अब घर मां रहि हैं तो ई पापन से गला छूट जाई।

गोबर-रुआब केतना रहै, हुकूमत केतनी रहै।

भोजू-रुआब हुद्दा से नहीं होत है, रुआब भलमनसी से होत है, विद्या से होत है। रामभरोसे पंडित का देख के काहे सब कोउ खटिया से उठके पैलगी करत है। थानेदार आवत हैं तो उनकी खातिर सेर भर आटा देत सब का केतना अखरत है, नाहीं तो सासतरी जी जे के घर अपने चार-छः चेलन सहित जाय परत हैं आपन भाग सराहत है। जिला में एक-से-एक हाकिम परे हैं। महात्मा जी के बरोबर है कोऊ का रुआब? आज हुकुम दें तो मनई आग माँ कूदे का तैयार हैं !

रामभरोसे-सन्तबिलास बाबू नाहीं देख परत हैं।

हरिबिलास-कालेज में वकालत पढ़ रहे हैं।

रामभरोसे-ई विद्या तो भैया उनका नाहक पढ़ावत हौ। बड़ा-बड़ा कुकरम करै का परत है। ओकिलन का मारा जिला तबाह होइगवा, सब मारेन लड़ाय-लड़ाय के देश का खोख कै दिहेन।

ईदू-बाबू, तुम अब आपन जमीन छोड़ाय लेव और मजे से खेती करो । चाकरी बहुत दिन किह्यो, अब कुछ दिन गृहस्थी का मजा लेव। उतना सुख तो न पैहो पर चोला आनन्द रही। परदेसवाँ जौन मात रहे होइहो तौन सब कपड़ा लत्ता, कुरसी-मेज, मेवा-मिठाई माँ उड़ जाता रहा होई। पच्चीस-तीस रुपये का तो दूध पी जात रहा होई हो, तीस-चालीस रुपये से कम घर का किराया न परत रहा होई। तुम्हार कुल खेत छूट जाय तो मजे से चार हर की खेती होय लागे।

हरिबिलास ने संकोच से मुस्कराकर कहा, रुपये कहाँ से लाऊँ ? सब आदमियों ने उनकी ओर संदिग्ध भाव से देखा, मानो वह कोई अनोखी बात कर रहे हैं। अन्त में भोजू बोला, का कहता हौ भैया, कौन बहुत रुपैया है ? तीन-चार हजार तो तुम्हारे सन्दूक के एक कोने में धरा होई। इतनी बड़ी तलब पावत रह्यो, नजर-नियाज लेते रहे होई हो, इतना सब कहाँ उड़ायौ ?

हरि.-मैंने रिश्वत कभी नहीं ली। मासिक वेतन में खर्च ही कठिनता से चलता था, बचत कहाँ से होती ?

भोजू-बेटा, तब तो तुम्हारी चाकरी गुनाह बेलज्जत है। नाही अस खक्ख का होइ हो, दस बीस हजार तो होबै करी।

हरि.-नहीं चचा, सच मानो, मैं बिलकुल खाली हाथ हूँ।

भोजू-तब गुजर बसर कसस होई ?

हरि.-ईश्वर मालिक है।

भोजू-दूनों लड़कन अब को बहुत सुशील देख परत हैं। पहले तो कोऊ से बातें न करत रहे।

यही बातें हो रही थीं कि गाँव के जमींदार ठाकुर करनसिंह अपने दो मुसाहिबों के साथ हाथी पर आते दिखाई दिये। लोग तुरन्त चारपाइयों से उठ बैठे । हरिबिलास के सामने ऐसे कितने ही जमींदार नित्य सलाम करने आया करते थे। पर करनसिंह को देखकर वह भी खड़े हो गये। हाथी रुका । करनसिंह उतर पड़े और हरिबिलास का हाथ पकड़ कर उन्हें चारपाई' पर बैठाकर आप भी बैठ गये।

हरिबिलास ने कुशल समाचार पूछा। ठाकुर ने श्रद्धापूर्ण भाव से कहा, यह भूमि आपके चरणों से पवित्र हो गयी। अब यहाँ सब कुशल है। कल प्रातःकाल पत्र खोला तो आप ही के आनन्द समाचार पर नजर पड़ी । आपके साहस और पुरुषार्थ को धन्य है। मुझे महीनों से ज्वर आता था, पर सच मानिए यह शुभ समाचार देखते ही मैं चंगा हो गया। महीनों से दवाइयाँ खा रहा था। यह आपके पदार्पण का शुभ फल है। परमात्मा ने हम लोगों का उद्धार करने के लिए आपके हृदय में यह प्रेरणा की | हमने इधर कुछ दिनों से पंचायत स्थापित की है। उसका कोई ऐसा सरपंच नहीं मिलता था जिस पर जनता का विश्वास हो । आपको परमात्मा ने उसका बेड़ा पार करने के लिए भेजा है। उसके प्रधान का आसन ग्रहण करके हमें उपकृत कीजिए। जूही के राजा साहब बयटा के खाँ साहब और राय दुनीचन्द्र उसके सदस्य हैं। मैं उनकी ओर से यह निमन्त्रण लेकर आपकी सेवा में आया हूँ।

हरबिलास ने सकृचाते हुए कहा, आप मुझे इस योग्य समझते हैं यह आपकी कृपा है। पर मैं इस सम्मान का अधिकारी नहीं हूँ। जिस पंचायत के सदस्य ऐसे-ऐसे माननीय लोग हों उसका प्रधान बनने का साहस मैं नहीं कर सकता।

करनसिह-बाबू साहब, आप अपने मुँह से ऐसा न कहिए। आप पहले एक परगने के हाकिम थे। आज सहस्नों हृदयों पर आपका अधिकार है। क्‍या छोटे क्‍या बड़े सब आपको पूज्य समझते हैं। आपको मेरी यह प्रार्थना स्वीकार करनी पड़ेगी।

हरिबिलास इस सम्मान-पद के भार से सिर न उठा सके। करनसिंह ने उठकर फलों का हार उनके गले में डाल दिया।

इसके बाद करनसिह एक क्षण तक किसी विचार में डूबे रहे। जान पड़ता था कुछ कहना चाहते हैं, पर संकोच के मारे जबान नहीं खुलती। अन्त में लजाते हुए बोले, बाबू जी मेरी एक प्रार्थना तो आपने मान ली, अब मुझे एक दूसरी प्रार्थना करने का साहस हो रहा है। आज्ञा हो तो कहूँ।

हरिबिलास-शौक से कहिए, मैं सहर्ष आपकी सेवा करूँगा। करनसिंह ने जेब से एक बन्द लिफाफा निकाला और बोले, मैं इसे आपके चरणों पर समर्पण करने की आज्ञा चाहता हूँ। हरिबिलास ने दबी हुई आँखों से लिफाफे की तरफ देखा। लिखा था-

'रेहननामा रामबिलास महतो, मौजा बिदोखर |

उनकी आँखों में एहसान के आँसू भर आये। कुछ कहना चाहते थे किन्तु करनसिंह ने उन्हें बोलने का अवसर न दिया। उसी दम लिफाफे को फाड़ कर फेंक दिया। और लोग चकित हो रहे थे कि क्‍या माजरा है ! हरिबिलास ने उनकी ओर देखकर कहा-आप लोगों को मालूम हुआ यह कैसा लिफाफा था ? यही दादा का लिखा हुआ रेहननामा था। यह कहते-कहते उनका कंठ रुक गया।

[प्रथम प्रकाशन उर्दू में। उर्दू मासिक “जमाना” जुलाई, 1912 में प्रकाशित। “ख्वाबोखयाल' में संकलित । हिन्दी रूप 'लाल फीता” शीर्षक से 'प्रेम चतुर्थी” में संकलित ।]


लाल फीता या मजिस्ट्रेट का इस्तीफा का सारांश

'लाल फीता या मजिस्ट्रेट का इस्तीफा' औपनिवेशिक शासन की दमनकारी व्यवस्था के विरुद्ध एक कर्तव्यनिष्ठ भारतीय अधिकारी की अंतरात्मा और देशभक्ति के जागरण की अत्यंत भावपूर्ण कहानी है। बाबू हरिबिलास एक साधारण कुर्मी किसान रामबिलास महतो के सुपुत्र हैं। उनके पिता ने अपनी संपूर्ण पैतृक भूमि रेहन (बंधक) रखकर पेट काटकर हरिबिलास को उच्च शिक्षा दिलाई। विश्वविद्यालय में एम.ए. की परीक्षा में सर्वोच्च स्थान प्राप्त कर हरिबिलास ब्रिटिश हुकूमत में डिप्टी मजिस्ट्रेट के पद पर नियुक्त हुए। वे अत्यंत ईमानदार, निर्भीक और न्यायप्रिय अधिकारी थे। उन्होंने कभी किसी रईस या उच्चाधिकारी के अनुचित दबाव में आकर निर्दोष किसानों या कमजोर वर्गों पर अन्याय नहीं होने दिया, जिसके कारण उन्हें कई बार स्थानांतरण और अवनति का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद उनका विश्वास था कि अंग्रेजी राज मूलतः सत्य और न्याय पर आधारित है, और इसी निष्ठा के कारण उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान सरकार के लिए चंदा और रंगरूट जुटाकर 'राय बहादुर' का खिताब पाया।

कहानी का केंद्रीय मोड़ तब आता है जब एक देहाती दौरे के दौरान उनके पास डाक में लाल फीते से बंधा एक गोपनीय सरकारी आदेश ('कम्युनिक') पहुँचता है। उस आदेश में मजिस्ट्रेटों को निर्देश दिया गया था कि वे राष्ट्रीय विद्यालयों, खादी व चरखा चलाने वालों, देहाती पंचायतों और शराबबंदी का प्रचार करने वाले समाज-सुधारकों को राजद्रोही मानकर उनका दमन करें। यह पत्र पढ़ते ही हरिबिलास के मन का भ्रम टूट जाता है। उन्हें स्पष्ट हो जाता है कि विदेशी शासन न्याय का नहीं बल्कि अपने स्वार्थ और भारतीयों को अज्ञान में जकड़े रखने का पक्षधर है। उनके भीतर पद और अंतरात्मा के बीच भीषण द्वंद्व छिड़ जाता है। जब दारोगा पुलिस बल के साथ शराबबंदी की किसान पंचायत को कुचलने के लिए उनके पास आता है, तो हरिबिलास का स्वाभिमान जाग उठता है। वे दारोगा को कड़ी फटकार लगाते हैं और तत्काल प्रभाव से ब्रिटिश सरकार को अपना त्यागपत्र (इस्तीफा) भेज देते हैं, जिसमें वे शासन के अमानवीय और प्रजाघाती स्वरूप की कठोर भर्त्सना करते हैं।

इस्तीफा स्वीकार होते ही हरिबिलास का परिवार गंभीर आर्थिक संकट में घिर जाता है। सरकारी बँगले का किराया, नौकरों का वेतन और पुराने खर्च चुकाने में उनकी सारी बचत खत्म हो जाती है और टमटम व घोड़े तक नीलाम करने पड़ते हैं। किंतु उनकी पत्नी सुमित्रा उन्हें ढांढस बंधाती हैं। उनका बड़ा बेटा शिवबिलास मेडिकल कॉलेज छोड़कर देशसेवा के लिए समाचार-पत्र निकालने का फैसला करता है, जबकि छोटा बेटा श्रीबिलास स्कूल छोड़कर गाँव में स्वावलंबन और खेती की राह चुनता है।

हरिबिलास सपरिवार अपने पैतृक गाँव लौटते हैं। टूटे-फूटे मकान और अभावों के बीच गाँव वाले उनका हार्दिक स्वागत करते हैं और उनके त्याग की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं। इसी बीच क्षेत्र के बड़े जमींदार ठाकुर करनसिंह हाथी पर सवार होकर वहाँ पहुँचते हैं। वे हरिबिलास के महान त्याग और नैतिक साहस से अभिभूत होकर उन्हें नव-स्थापित जन-पंचायत का सर्वमान्य प्रधान बनने का प्रस्ताव देते हैं। इसके साथ ही, ठाकुर करनसिंह अपनी जेब से हरिबिलास के पिता द्वारा वर्षों पहले लिखा गया जमीन का रेहननामा निकालकर सबके सामने फाड़ डालते हैं और उनकी सारी पैतृक भूमि उन्हें लौटा देते हैं। सत्य, त्याग और राष्ट्र-निष्ठा के मार्ग पर चलने का यह सर्वोच्च सम्मान पाकर हरिबिलास की आँखें कृतज्ञता के आँसुओं से छलछला उठती हैं।


प्रकाशन इतिहास

यह कहानी सर्वप्रथम उर्दू में ज़माना पत्रिका के जुलाई 1912 अंक में प्रकाशित हुई थी और ख़्वाबो-ख़याल में संकलित हुई। बाद में इसका हिंदी रूप लाल फीता शीर्षक से प्रेम चतुर्थी में संकलित हुआ।


महत्त्व और विषय-विमर्श

  • अंतरात्मा की आवाज बनाम सत्ता की गुलामी: कहानी स्पष्ट करती है कि व्यक्ति का वास्तविक सम्मान और धर्म किसी ऊँचे सरकारी ओहदे या पदवियों में नहीं, बल्कि अपनी अंतरात्मा और राष्ट्र के प्रति वफादार रहने में है। अन्यायपूर्ण व्यवस्था का साथ देने से पद-त्याग करना कहीं अधिक गौरवशाली है।
  • औपनिवेशिक लाल फीताशाही और दमनकारी नीतियों की पोल: 'लाल फीता' उस कठोर, संवेदनहीन और शोषक नौकरशाही व्यवस्था का प्रतीक है, जो जनकल्याण, नशामुक्ति, खादी और शिक्षा जैसे लोकहितकारी कार्यों को भी हुकूमत के लिए खतरा समझकर दबा देना चाहती थी।
  • असहयोग आंदोलन और स्वदेशी चेतना का उभार: कहानी में राष्ट्रीय आंदोलन के उस दौर का सजीव चित्रण है जब लोग विदेशी उपाधियों, सरकारी नौकरियों और विलासिता को छोड़कर सादगी, खादी, स्वावलंबन और पंचायतों के माध्यम से आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहे थे।
  • त्याग और नैतिक साहस का प्रतिदान: हरिबिलास द्वारा स्वार्थ छोड़कर सत्य की राह चुनने पर न केवल उन्हें समाज का असीम आदर मिलता है, बल्कि ठाकुर करनसिंह द्वारा रेहननामा फाड़कर उनकी पैतृक जमीन लौटाना यह सिद्ध करता है कि निःस्वार्थ त्याग कभी व्यर्थ नहीं जाता।
  • कहानी का व्यापक महत्त्व: 'लाल फीता या मजिस्ट्रेट का इस्तीफा' भारतीय स्वाधीनता संग्राम, प्रशासनिक नैतिकता और मानवीय आत्म-सम्मान की एक अत्यंत प्रभावशाली कहानी है। यह सरकारी तंत्र की संकीर्ण सीमाओं के परे लोक-कल्याण और सत्यनिष्ठा की विजय का उद्घोष करती है।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "लाल फीता या मजिस्ट्रेट का इस्तीफा." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1912, https://munshipremchand.com/works/short-stories/laal-feeta-ya-magistrate-ka-istifa. Accessed 22 Sep. 2026.