Cover Image for Hansi (हँसी) by Munshi Premchand - Non-Fiction
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निबंध•1916•16 मिनट

हँसी

Hansi

मानव-स्वभाव की अनुपम विशेषता 'हंसी' के मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, दार्शनिक और स्वास्थ्यवर्धक पहलुओं पर मुंशी प्रेमचंद का एक अत्यंत रोचक और चिंतनपरक निबंध।

Work Details

प्रकार: निबंध
वर्ष: 1916
पठन समय: 16 मिनट (2,281 शब्द)

एक प्रसिद्ध दार्शनिक का कथन है कि मनुष्य हंसने वाला प्राणी है और यह बिल्कुल ठीक बात है क्योंकि श्रेणियों का विभाजन विशेषताओं पर ही आधारित होता है और हंसी मनुष्य की विशेषता है। यों तो मानव हृदय की भावनाएं अनेक प्रकार की होती हैं मगर आनंद और शोक का स्थान इनमें सबसे प्रधान हैं। अन्य भावनाएं इन्हीं दोनों के अंतर्गत आ जाती हैं। उदाहरण के लिए निराशा, लज्जा, दुख, क्रोध, घृणा ये सब शोक के अंतर्गत आ जायेंगे। उसी प्रकार अहंकार, बीरता, प्रेम आदि आनंद की श्रेणी में। मनुष्य का जीवन इन्हीं दो प्रतिकूल भावनाओं में विभाजित है। आनंद का प्रकट लक्षण हंसी है, शोक का रोना। हंसने और खुश रहने की इच्छा सर्वसामान्य है। रोन और शोक से हर व्यक्ति बचता है। हंसना और रोना मनुष्य के जन्मजात गुण हैं, अर्जित गुण नहीं। बच्चा पैदा होते ही रोता है और उसके थोडे ही दिनों बाद एक खामोश सी मुस्कराहट उसके चेहरे पर दिखाई देने लगती है। अन्य भावनाएं समझ बढ़ने के साथ-साथ पैदा होती जाती हैं।

कुछ विद्वानों ने यह पता लगाने का प्रयत्न किया है कि कुछ जानवर भी हंसने में आदमियों के साझीदार हैं। वे यह तो स्वीकार करते हैं कि जानवरों की हंसी ससस्‍्वर नहीं होती मगर जो प्रेरणाएं मनुष्य के हृदय में हंसी उत्पन्न करती हैं उनमें किसी न किसी हद तक वह भी जरूर शरीक हैं। कुत्ता अपने मालिक को जब कई दिन के बाद देखता है तो दुम हिलाता हुआ उसके पास चला जात' है बल्कि उसके बदन पर चढ़ने की कोशिश करता है और एक किस्म की आवाज उसके मुंह से निकलने लगती है। जिन कुत्तों को गेंद उठा लेने की शिक्षा दी जाती है वे गेंद उठाते समय कभी-कभो खुद भी अपने पैरों से गेंद को और आगे ढकेल देते हैं। जब कई कुत्ते साथ खेलने लगते हैं तो उनकी चुहल और शरारत की काई सीमा नहीं रहती। जिन लोगों ने*इन कुत्तों के चेहरें को ध्यान से देखा है वे कहते हैं कि आंखों में एक शरारत-भरी झलक, गालों का सिकुड़ना और दांतों का बाहर निकल आना, जो हंसी के अनिवार्य लक्षण हैं, वे सभी एक बहुत हल्की-सी शक्ल में कुत्तों के चेहरे पर भी दिखाई देने लगते हैं। कभी-कभी कुत्ते मुगियों को सिफ डराने के लिए दौड़ाया करते हैं। बिल्ली एक बहुत गंभीर जानवर है मगर बह भी चूहों को खिलाते वक्त अपनी जन्मजात हास्यप्रियता का परिचय देती है। और बंदरो के बारे में तो कितनी ही पशु-विज्ञान के विद्वान का विश्वास है कि वे हंसते भी हैं और मज़ाक समझते भी हैं। अगर बंदर को मुंह चिढ़ाओ तो वह कितना झल्लाता है। अगर उमे छेड़ने के लिए उसके साथ दिल्लगी करो तो वह नाराज़ हो जाता है। उसे यह पसंद नहीं कि कोई उसका मज़ाक उड़ाए। कहने का मतलब थह कि कुत्ते, बिल्ली, बंदर को हसी खामोश और बेआवाज़ होती है मगर उसमें हंसी दिललगी की चेतना होती है।

बच्चे को हंसी भी शरू में बेआवाज और किसी कदर जानवरों से मिलती हुई होती है। मगर उप्र के दूसरे महीने में उसमें फैलाव और तीसरे महीने में आवाज

पैदा हो जाती है। तब उसे गुदगुदाओ तो खिलखिलाता है और दूसरों को देखकर हंसता है। गुदगुदाने से हंसी क्‍यों होती है, कुछ विद्वानों ने इसकी भी व्याख्या की है। एक प्रोफेसर का ख्याल है कि जब मनुष्य विकास की आरभिक स्थिति में था उस समय मां बच्चे के शरीर पर से मक्खियां उड़ाने या दूसरे कीड़े को भगाने के लिए ही उसी तरह हाथ फेरती थी जिस तरह आजकल गायें अपने बच्चों को चाटती हैं। इसी तरह हाथ फेरने से बच्चे को बहुत कुछ आराम मिलता है। लिहाज़ा , आजकल भी जब नर्मी से शरीर पर हाथ फेरा जाता है तो उसी तरह इंसान को वही आराम याद आता है और वह हंसने लगता है। यह खयाल सही हो या गलत मगर आदमी की हंसी का विकास उसकी इंसानियत के साथ ही होता है। एक मज़ेदार बात है कि होंठ या शरीर की एक ज़रा-सी हरकत इंसान की घंटों हंसाती है।

वहशी कौमें भावनाओं की प्रौढ़ता की दृष्टि से बहुत कुछ बच्चों से मिलती. हैं। यही कारण है कि उनकी हंसी भी बच्चों की हंसी से मिलती-जुलती होती है। बच्चे कभी-कभी खामखाह हंसते हैं। उनकी हंसी लाज-संकोच की परवाह नहीं करती। वहशियों की भी यही हालत है। सभ्य लोग अपनी हंसी पर बहुत संयम करते हैं लेकिन बर्बरों में यह संयम कहां। वह जब हंसते हैं तो खूब खुलकर। खूब कहकहे लगाते हैं। तालियां बजाते हैं, चूतड़ पीटने लगते हैं और नाचते हैं, यहां तक कि कभी - कभी उनकी आंखों सो #'ग बहने लगते हैं। हंसते-हंसते मर जाना इससे चाहे एक कदम और आगे बढ़ा होता हों। कोई अपरिचित चीज देखकर वह खूब हसते हैं। बोर्नियों द्वीप में एक मिशनरी को पियानो बजाते देखकर वहां के बर्बर निवासी हंसने लगते है। सभ्य लोगों की एक-एक हरकत उन बर्बरों की हंसी का सामान है। उनके कपड़े, उनका मुंह-हाथ धोना, यह सब बातें उन्हैं अजीब मालूम होती हैं और यह अजीब पालूम होना हंसी की मुख्य प्रेरणाओं में से एक है। एक बार एक हब्शी सरदार इंगलिस्तान म॑ पहंचा और एक कारखाने को सैर करने के लिए चला। मैनेजर ने मेहरबानी से उसे कारखाना दिखाना शुरू किया। संयोग से एक जगह मैनेजर का कोट किसी चर्खा की पकड़ में आ गया और बेचारे मैनेजर साहब कोट के साथ दो-तीन चक्कर खा गए। कर्मचारियों ने दौड़फर किसी तरह उनकी जान बचाई मगर हब्शी सरदार हसते- हसते लोट गया। उसने समझा कि मैनेजर साहब ने उसे तमाशा दिखाने के लिए फलाबाजियां खाई और इस घटना के बाद बह जब तक इंगलिस्तान में रहा उसने कई बार मैनेजर साहब से वही दिलचस्प तमाशा दिखाने का तकाजा किया। कुछ असभ्य जातियों में रईसों के दरबार में अब भी मसखरे या विदूषक रक्खे जाते हैं।

पुराने जमाने में दरबारी विदूषकों का रिवाज हिन्दुस्तान और योरप में प्रचलित था। यहां तक कि वे दरबार का आभूषण समझे जाते थे। उनके बगैर दरबार सूना रहता था। इस सभ्यता के युग में भी वही रिवाज एक दूसरी शक्ल में मौजूद हे जिस थियेटरों में देख सकते हैं। एस्किमो एक जंगली कौग है। उनके यहां रिवा" है कि जब किसी मुकदमे का फैसला होने लगता है तो दोना विरोधी पक्ष के लोग एक दूसरे को गंदी-गंदी गालियां सुनाना शुरू करते हैं। कभी -कभी पद्चय-बद्ध गालियां दो जायी हैं। हाकिम इजलास और दूसरे तमाशाई इन तुकबंदियों पर खूब हसते हैं

और आखिरकार उसी पक्ष की विजय होती है जो गालियों की गंदगी और बेशर्मी के लिहाज से तमाशाइयों को ज़्यादा खुश कर दे। न्याय की अच्छी कसौटी निकाली है। ऐसे देश में गालियां बकना निरचय ही कानूनदानी से अच्छा और फायदेमंद धंधा है और काश हमारे देश के कुंजड़े और भटियारे वहां पहुंच जाएं तो यकीन है कि उन्हैं किसी अदालत में हार न हो। अभी पशु-विज्ञान के किसी पंडित ने छान-बीन नहीं की लेकिन हंसी और निर्लज्जता में कोई कार्य-कारण संबंध अवश्य है। हिन्दुस्तान में शादी-ब्याह में, दावतों में गंदी ओर शर्मनाक गालियां गाने का रिवाज कितना बुरा मगर सब तरफ कितना प्रचलित और लोकप्रिय है। यहां तक कि कितने ही लोगों को गालियों के बगैर ब्याह का मज़ा ही नहीं आता और जब तक कानों में गंदी- गंदी गालियों की पुकारें नहीं आतीं खाने की तरफ तबियत नहीं झुकती।

हर एक देश या जाति का साहित्य उस देश की सर्वोत्तम भावनाओं और विचारों का संग्रह होता है और हालांकि किसी जाति के साहित्य में हंसी-दिललगी को वह स्थान नहीं दिया जायगा जिसका उसे सर्वसाधारण में अपने प्रचलन की दृष्टि से अधिकार है और प्रेम की भावनाओं को उससे ऊंचा स्थान दिया जाता है जो एक सीमाबंद्ध भावना है और जिसका प्रभाव मानव जीवन के लिए एक विशेष अंग तक सीमित है, तब भी यह विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि उनका प्रभाव हर एक साहित्य पर स्पष्ट है और चूंकि हंसने-हंसाने की इच्छा हर दिल में रहती है, हास्य-कृतियां पसंद भी की जाती हैं। अंग्रेज़ी में शोक्सपियर का मसखरा फॉल्स्टाफ, स्पेनी लिटरेचर का डॉन कुइक्ज़ोट और उर्दू लिटरेचर का खोजी कैसे गम भुला देने वाले हैं। कितने रंज और गम के सताए हुए दिल उनके एहसानमंद हैं। यह कहने में कोई अत्युक्ति नहीं कि गद्य हो या पद्य, हंसी-दिललगी उसकी आत्मा हे और उसके बगैर वह रूखी - सूखी, ओर बेमज़ा रहती है।

हंसी के अनेक उद्दीपक हैं। संस्कृत में हंसी के प्रकारों, उनकी व्याख्या और उनके उद्दीपकों आदि को बड़े विशद्‌ और विस्तृत ढंग से बयान किया गया है। अंग्रेज़ी में ऐसी विशद सैद्धान्तिक चर्चा इस विषय पर नहीं है। इन उद्दौपकों में विशेष ये हैं।

. किसी चीज़ का अनोखापन जैसे बंदर का कोट-पतलून पहनना।

  1. किसी अच्छी चीज़ का फौरन किसी बुरी सूरत में जाहिर होना जैसे मुंह चिढाना।

  2. कोई शारीरिक दोष जैसे कानापन या लंगड़ाकर चलना।

  3. मानव विशेषताओं में कोई असाधारण बात जैसे शेखी मारना या भोलापन।

  4. किसी चोज़् का अपने साधारण रूप से अलग हटना जैसे मुंह में कालिख लगना।

  5. अशिष्टता।

  6. छोटी-मोटी दुर्घटनाएं जैसे किसी का लड़खड़ाकर गिर पड़ना।

  7. निर्लज्ज शब्दों का प्रयोग।

  8. हर तरह को अतिशयोक्ति या हद से आगे बढ़ जाना जैसे भारी-भरकम पेट या बहुत ऊंचा कद।

  9. गुप-चुप बातें।

]। चीज़ों को तरह आवाज्ञ में भी अजनबीपन, अनोखापन जैसे बेसुरा गीत।

[2. दूसरों को नकल करना।

  1. कोई द्वयर्थक वाक्य।

उपरोक्त वर्गीकरण को ध्यान से देखने पर स्पष्ट हो जाता है कि हंसी का उद्दीपन विशेषत: किन्‍्हीं दो वस्तुओं के विरोध पर आधारित है। एक लडका अपने बाप का ढीला-ढाला कोट पहन लेता है और उसे देखते ही फौरन हंसी आती है। अफीमचियों की कहानियां हंसी का एक न चुकने वाला खज़ाना है। अकबर और बीरबल के चुटकुले भी दिलों को गरमाने के लिए आज़माए हुए नुस्खे हैं और ख्वाजा बदीउज़्ज़मां उर्फ खोजी (खुदा की उन पर रहमत हो |) को तो उर्दू लिटरेचर का सबसे बड़ा शोकसंहारक कहना चाहिए। हाजी बगलोल भी उन्हीं के मुरीदों में शामिल हैं। शायरी के दोषों और त्रुटियों को सरशार ने हंसी-दिल्लगी का कैसा फड़कता हुआ लिबास पहनाया है। ख्वाजा साहब की गंवई बातचीत, उनका शेर पढ़ना, डींग मारना, ये सब हंसने के अक्सीर नुस्खे हैं। छंद-शास्त्र की भूलें, स्त्रीलिंग और पुल्लिंग की गर्लातयां जो शायरी में ऐब समझी जाती हैं वे पढे-लिखे आदमियों के लिए हंसी का सामान हैं। उर्दू कबियों को सौंदर्य की अतिशयोक्ति भी मज़ाक की हृद तक जा पहुंचती है। नाभी की गहराई को अगर बरेली का कुआं कहैं तो खामखाह हंसी आएगी।

विद्वानों ने हंसी को छः: श्रेणियों में विभाजित किया है-

| होंठो ही होंठों में मुस्कराना। 2 खुलकर मुस्कराना। 3 खिल-खिलाना। 4 ज़ोर से हसना। 5 कहकहे लगाना। 6 हंसते हंसते पेट में बल पड़ जाना और आंखों से आंसू बहने लगना।

इनमें पहली और दूसरी किस्मों का स्थान सबसे ऊंचा है, तीसरी और चौथी का मध्यम और पांचवीं और छठी किसमें सबसे निकृष्ट समझी जाती हैं और उनकी गिनती अशिष्टता में होती है। जिस समय गालों पर हल्की-सी शिकन पड़तो है, नीचे के होंठ फैल जाते हैं, दांत नहीं दिखाई देते हैं, आंखें चमकने लगती हैं, उसे होंठों ही होंठों में मुस्कराना कहते हैं। जिस हंसी में मुंह, गाल और आंखें फूली हुई नज़र आती हैं ओर दांतों की लड़ियां किसी कदर दिखाई देने लगती हैं उसे खुलकर मुस्कराना कहते हैं। खिलखिलाने को व्याख्या करने की ज़रूरत नहीं। इसमें आंख कुछ सिकुड़ जाती है। कहकहा लगाना अशिष्टता है, खासतौर पर बड़े-बूढों के सामने ज़ोर से हंसना बुरी बात है। डाक्टरी दृष्टि से कहकहा तंदुरुस्ती के लिए बहुत अच्छा माना गया है। इससे सीने और फेफड़ों को ताकत पहुंचती है और तबीयत खिल उठती है। मनोविज्ञान क पंडितों का विचार है कि हंसी खुली हुई तबीयत की पहचान है और जिस आदमी के इरादे नेक न हों और जिसके हृदय को शांति और इत्मीनान हासिल न हो वह कभो खुलकर नहीं हंस सकता।

हम ऊपर लिख आये हैं कि संस्कृत साहित्य में हंसी -दिल्लगी के बारे में बड़ी गहरी छार बीन के साथ विचार किया गया है। उपरोक्त विचार बड़ी हद तक उसी के हैं। अब हम कुछ हास्य-रस के संस्कृत इलोकों का अनुवाद लिखकर इस लेख

को समाप्त करेंगे। उर्दू हास्य को शैली से हम परिचित हें, संस्कृत साहित्य के भी कुछ उदाहरण देखिए-

. यह देखिए कुक्कुट पिश्र आए। आपने अपने गुरु से कुल पांच दिन शिक्षा पाई। सारा वेदांत तीन दिन में पढ़ा है और न्याय को तो फूल की तरह सूंध डाला है।

  1. विष्णु शर्मा नामक किसी दुश्चरित्र विद्वान की बुराई यों की गई है-विष्णु शर्मा हाय हाय करके रोते ओर कहते थे कि मेरे जिस मस्तक पर मंत्रों से पवित्र किया गया पानी छिड़का गया था उसी पर प्रेमिका के पवित्र हाथों ने तड़ातड़ चपत लगाई।

  2. एक कोमल भावनाओं से अपरिचित ब्राह्मण अपनी प्रेमिका से कहता है-ऐ देवी, मेरे यह होंठ सामवेद गाते-गाते बहुत पवित्र हो गये हैं। इन्हैं तुम जूठा मत करो। अगर तुमसे किसी तरह नहीं रहा जाता तो मेरे बायें कान को ही मुंह में लेकर चुबलाओ।

  3. ज़बान कट नहीं जाती, सर फट नहीं जाता, तब फिर जो कुछ मुंह में आये कह डालने में हर्ज ही क्‍या है। निर्लज्ज व्यक्ति विद्वान बनने में आगा-पीछा क्‍यों करे।

5 दो औरतों वाले मर्द की हालत उस चूहे की सी होती है जिसके बिल में सांप है और बिल के बाहर बिल्ली।

  1. दामाद दसवां ग्रह है। वह हमेशा टेढ़ा और तीखा रहता हे, हरदम पूजा को मांग किया करता है और हमेशा कन्याराशि पर चढा रहता है।

  2. जैनियों का मज़ाक उड़ाते हुए एक लेखक कहता है कि ये लोग एकांत में भी सुंदगी के लाल-लाल होंठों से बचते रहते हैं क्योंकि होंठ में दांत लगने से उन्हैं मांसाहर का आरोप लगने का भय है। हि

  3. एक ज़िंदादिल बुड़ा कहता है-क्या करें सिर के बाल सफेद हो गये हैं, गालों पर झुर्रियां पड़ गई हैं दांत टूट गये हैं पर इन सब बातों का मुझे कुछ दुख नहीं। हां जब रास्ते में मृगनयनी सुंदरियां मुझे देखकर पूछती हैं, '' बाबा किधर चले? '' तो उनका यह पूछना मेरे दिल पर बिजलियां गिरा देता है।


प्रकाशन इतिहास

[उर्दू लेख। उर्दू मासिक पत्रिका 'ज़माना', फरवरी, 1916 में प्रकाशित। हिन्दी रूप विविध प्रसंग भाग-1 में संकलित।]

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "हँसी." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1916, https://munshipremchand.com/works/non-fictions/hansi. Accessed 22 Sep. 2026.