गत वर्ष चौथी मार्च को महात्मा गांधी जी ने डांडी की ओर प्रस्थान करके स्वराज्य-संग्राम की रण-भेरी बजायी थी। पूरे साल भर के बाद चौथी मार्च को क्षणिक-संधि की घोषणा हुई और कांग्रेस ने पहला मोर्चा जीता। यह सफलता किन साधनों द्वारा प्राप्त हुई है, इसको दुहराने की ज़रूरत नहीं। वह सारे दृश्य अभी तक हमारी आँखों के सामने हैं। जिस काम को हम असाध्य समझ रहे थे, वह इतना सरल था, इसकी हमने कल्पना भी न की थी। हमने लगभग अस्सी हजार स्वयंसेवक जेल भेजे, कांग्रेस के सभी प्रमुख नेताओं को बन्दी बनना पड़ा, पर सच पूछिये तो ऐसे महान उद्देश्य के लिए जितना त्याग किया गया वह कुछ नहीं के बराबर है। कुशल सेनापति वही है, जो थोड़े से थोड़े रक्तपात से बड़ी से बड़ी विजय कर दिखाये। महात्मा गांधी जी उन्हीं कुशल सेनापतियों में हैं। अहिंसा और सत्याग्रह का ऐसा अमोघ अस्त्र उन्होंने देश के हाथ में दिया, कि हम ब्रिटिश सरकार की मशीनगनों और हवाई जहाजों को तुच्छ समझ कर निहत्थे मैदान में निकल पड़े और वह शक्तिशाली साम्राज्य, जिसने संसार पर अपना प्रभुत्व जमाये रखने के लिए पचास लाख आदमियों का बलिदान कर दिया था, हमारा लोहा मान गया। योरोपीय महासमर में भारत ने भी लगभग पन्द्रह लाख सैनिकों का बलिदान किया था और असंख्य धन वारा था, पर उसका क्या फल निकला! वह पशुबल का संग्राम पशुबल से था। यह आत्मबल का संग्राम पशुबल से था और पशुबल को आत्मबल के सामने नीचा देखना पड़ा। हम यह नहीं कहते, कि हमारा अभीष्ट पूरा हो गया और हमें पूर्ण स्वतन्त्रता प्राप्त हो गयी, पर जिस सरकार ने पहले हमारे उद्योग को हेय समझा था और उसकी हँसी उड़ायी थी, उसी सरकार का हमसे सन्धि करने पर विवश होना क्या छोटी बात है? जब विपक्षी ने हमारी शक्ति को स्वीकार कर लिया, तो वह हमसे फिर ताल ठोंकने का साहस नहीं कर सकता। जिस शत्रु के हृदय में आप अपना आतंक जमा सकते हैं, उसकी पीठ में धूल लगा देना उससे कहीं सरल है। मुश्किल होता है, अपनी शक्ति का सिक्का बिठाना। वह अभीष्ट कांग्रेस ने पूरा कर लिया। ब्रिटिश सरकार अब दोबारा भारत की संयुक्त शक्ति का सामना करने का साहस नहीं कर सकती। उसे अब अगर कोई आशा है, तो वह भारत के विभिन्न समुदायों-संप्रदायों का परस्पर वैमनस्य है। अगर कांग्रेस ने इस वैमनस्य को जीत लिया, तो फिर उसकी कोई माँग नहीं जो अंग्रेज सरकार पूरी करने के लिए मजबूर न हो जाय।
गोलमेज़-परिषद् में सभी वर्गों ने डोमीनियन स्टेटस का समर्थन करके अंग्रेज सरकार को चकित कर दिया था। प्रतिनिधियों का चुनाव जिस रीति से किया गया था, उससे सरकार ने यह आशा बाँध ली थी, कि यह एक स्वर होकर कुछ कह ही न सकेंगे। जितने मुँह होंगे, उतनी ही बातें होंगी। ऐसी परिषद् को बच्चों का खेल सिद्ध कर देना कुछ मुश्किल न था, लेकिन परिषद् ने एक स्वर होकर डोमीनियन स्टेटस की सदा बुलन्द की। हाँ, ब्रिटिश सरकार की इतनी चाल चल गयी कि परिषद् ने संरक्षणों को स्वीकार कर लिया जिसने परिषद् को अपंग कर दिया। जो कुछ कसर रही, वह सांप्रदायिक स्वत्वों के बंटवारे के झमेले में पूरी हो गयी। महात्मा गांधी जी ने देखा कि अब समझौते का अवसर आ गया है और जब समझौते से कार्य सिद्ध हो तो बलिदानों की ज़रूरत क्या। आपने कहा है, कि "बलिदानों की एक सीमा तक तो आवश्यकता होती है; लेकिन उस सीमा के निकल जाने पर कष्टों का आवाहन करना मूर्खता की पराकाष्ठा है।" हमारा राष्ट्रीय आंदोलन महात्मा जी का चलाया हुआ है। वही इसके प्रवर्तक और संचालक हैं। जब उन्हें विश्वास है कि अब वह अवसर आ गया है, जब समझौते से ज्यादा सफलता की आशा है, तो कौन कह सकता है कि उन्होंने संधि करके भूल की। अब तो हमारी जीत इसी में है, कि भारत जो कुछ माँगे, एक स्वर होकर माँगे, फिर अंग्रेज सरकार को वह माँग पूरी करने के सिवा और कोई मार्ग न रहेगा। गोलमेज़-परिषद् में स्वत्वों पर जो नोच-खसोट हुई, उसका कारण यही था कि उसके प्रतिनिधि राष्ट्रभक्त न थे, पंथ-भक्त थे। अब वह अविश्वास का वातावरण बदल गया है, और हमें पूरा विश्वास है, कि साम्प्रदायिक विरोध की बाधा हमारे मार्ग में न खड़ी होगी। मुसलिम नौजवानों की मनोवृत्ति साम्प्रदायिक नहीं, इसका परिचय पहले ही मिल चुका है। हमारे मुसलिम नौजवान विशेष अधिकारों के उपासक नहीं, न वह सरकार का रक्षा का हाथ अपने सिर पर रहना आवश्यक समझते हैं। उनमें पुरुषार्थ है, उत्साह है, आत्मविश्वास है और वह राष्ट्र के हित के लिए पंथगत स्वत्वों को छोड़ना जानते हैं। जिस जाति में व्यापक भ्रातृ-भाव का आदर्श है, जहाँ कोई छोटा है न बड़ा है, सब बराबर हैं, वह जाति अगर विशेष अधिकारों और छोटी-छोटी नौकरियों के लिए राष्ट्रहित में बाधक हो, तो वह अपने ऊँचे आदर्श से गिर जायगी।
जब नारी-जाति में इतना आत्मबल आ गया है कि वह देश के लिए कठिन से कठिन यातना सहने के लिए तैयार है तो क्या हमारे मुसलिम नौजवान इस अवसर पर अपने पुरुषार्थ का परिचय न देंगे? भारत की वीर देवियों ने इस कठिन अवसर पर जिस वीरता का परिचय दिया है, वह संसार के इतिहास में अद्वितीय है। वह कोमलांगी रमणियाँ, जो परदे में रहना ही अपना गौरव समझती थीं, जिस वीरता से मैदान में आ खड़ी हुईं, उसने संसार को चकित कर दिया! हम तो यह कहना भी अतिशयोक्ति नहीं समझते, कि इस संग्राम में विजय का सेहरा नारी-जाति ही के सिर है। माताओं ने सदैव अपनी सन्तान के लिए अपना बलिदान किया है और आज उसी मातृत्व ने भारत का उद्धार किया है।
प्रकाशन इतिहास
[सम्पादकीय। 'हंस', फ़रवरी 1931 में प्रकाशित। 'विविध प्रसंग' भाग-2 में संकलित।]
