बातचीत करना उतना आसान नहीं है, जितना हम समझते हैं। यों मामूली सतल जवाब तो सभी कर लेते हैं, अपना दु:ख प्रभी सो लेते हैं, उसी तरह, जैसी सभी थोड़ा- बहुत गाकर अपना मन प्रसन्न कर लेते हैं, लेकिन जिस तरह गाने को कली कुछ और है और उसे सीखने की जरूरत है, उसी तरह बातचीत करने को भी एक कला है, जो कुछ लोगों में तो इंश्वरदत्त होती है और कुछ लोगों को अभ्यास म आती है और जो आज अज्ञात कारणों से लुप्त होती जा रही है। आज दो चार हजार सुशिक्षित आदमियों में एक-दो ही ऐसे निकलेंगे, जो अपने संभाषण से किसी खो
या मंडली का मनोरंजन कर सकते हों, अपनी लियाकत का सिक्का जमा सकते हों या अपने पक्ष का समर्थन कर सकते हों। और विचित्र बात यह है कि पढे-लिखे और विद्वान् लोग इस कला से जितने शूत्य देखे जाते हैं, उतने अशिक्षित और ग्रामीण लोग नहीं।
किसी गाड़ी में दो पढ़े लिखे सज़्जन हजार- दो हजार मील की यात्रा साथ करेंगे पर एक-दूसरे से सलाम-कलाम भी न करेंगे। एक अपना अखबार पढ़ता ग्हेगा, दूसरा अपने उपन्यास में डूबा रहेगा। इससे उल्टे दो ग्रामीण ज्योंही गाडी में बैठे कि उनमें चिलमबाजी शुरू हो जाती है, फिर खेती बारी का जिक्र छिड़ जाता है, फिर मामले - मुकदमे की चर्चा होने लगती है, जमींदार ने कैसे उसे बेदखल किया या साहकार ने कैसे सूद दर सूद लगाकर पचास के दो सौ पचास रुपये कर लिये और उसकी सारी जायदाद नीलाम करा ली। जब तक यात्रा समाप्त न होगी, उनकी जबान बंद न होगी। संभव है, वे गाना शुरू कर दें । चलते-चलते उनमें एक सद्भाव पैदा हो जाता है। यहां हमारे बाबू साहब अपनी जगह पर बैठे अपने मुर्सा'*र भाई को गहरी आलोचना की आंखों से देखकर रह जाते हैं। आप एक ग्रामीण क साथ लंबी -से लंबी यात्रा हराते हुए कर सकते हैं, लेकिन बाबू साहब के साथ आप छोटी यात्रा वरके ऊब भी जाते हैं। उस ग्रामीण क जीवन में कुछ रस हे, कुछ उत्साह है| कुछ आशावादिता है, कुछ बालकों का-सा कुतृहल है, कुछ अपनी व्िपत्ति पर हंसने की सामर्थ्य है, लेकिन मिस्टर या बाबू साहब अपने आप में सिमटकर मानों सारी दुनिया से रूठ गए हैं। ऐसा क्यों हाता हैं, समझ में नहीं आता।
लेकिन ग्रामीणों में भी यह कला तनज्जुल पर है। पुराने जमाने में नाई संभाषण- कला में जन्म ही से निपुण होता था, उसी तरह जैसे धोबी जन्म ही से कविता को कला में सिद्ध होता है। अलिफलेला में नाइयों द्वारा कहीं गईं कई कहानियां हैं और यह विशेषता कुछ ईरानी या अरबी हज्जामों ही में न शी हमारे यहां भी नाई पक्का बातूनी होता था, बड़ा हाजिरजवाब, जिसका दिमाग ला गाक्तयों और चुटकुलों की खान होता था। गांषों में नाऊ ठाकुरों को हजारों कथाएं आज भी प्रचलित हैं, लेकिन नाइयों में भी अब उस कला का लोप होता जा रहा है। अब तो बह मुहर्मी सूरत लिए आता है, चुपचाप बाल बनाता है, ओर पैसे लकर चला जाता है। ु
नाइयों में तो इस कला के मिटने का कारण देशातों को बदहाली और साधारण जनता की गरीबी हो सकती है। जिनके पास पैसे हैं, जे अब अपने हाथों अपनी दादी माफ कर लेते हैं, कहीं छठे महीने उन्हें बाल कटवाने के लिए ॥ई को जरूरत पड़ता है। और देहातों में किसान आप ही दाने को मुहताज है, नाई जा पेट कह से भर जब किसान के बखारों में अनाज और गायें- भैंसों क थनों में दूध भरा होता था, तब नाई ठाकुर मूंछों पर ताव देते थे और भरा हुआ पेट उबलते हुए झरने की तरह किलोलें करता था, आनंद बढ़ाने वाली भावनाएं मन में उठती थीं आर चुटकला के निकलती थीं। जहां किसान बाकी और ब्याज के भंवर में डूबता उतराता हो और उसके बच्चे भूख से बिलबिलाते हों, वहां हंसने हंसाने की किसे सूझती है।
शिक्षित लोगों में जो रूबापन और उदासीनता आ गई है, उसका कारण शायद आजकल कौ शिक्षा प्रणाली है। पहले साहित्य ही मुख्य पाठ्य विषय था। हम बड़े-बड़े कवियों की सूक्तियां याद कर लिया करते थे। सुभाषितों का एक खजाना हमारे दिमाग में जमा हो जाता था और कंठस्थ होने के कारण अवसर पड़ने पर हम संभाषण में उसका व्यवहार करते थे। अब बाल्यवस्था में जो किस्से-कहानियां या अन्य पाठ पढ़ाये जाते हैं, उनमें सुभाषितों का नाम भी नहीं होता। और जब ऊंची कक्षाओं में क्लासिक पढ़ने का समय आता है, तो उसके लिए पादयक्रम में इतना कम समय होता है कि केवल उसका अर्थ समझ लेना ही काफी समझा जाता है। रटंत की किसे फुरसत है। अच्छे संभाषण के लिए अच्छी स्मरण -शा जत का होना आवश्यक है, और यह शक्ति आजकल उपेक्षा की दृष्टि से देखी जादी है। बड़े-बड़े विद्वानों से कहिए कि शेक्सपियर की दो-चार सूक्तियां सुनाइए, ना वे केवल मुस्कराकर रह जायंगे। गरीब को कुछ याद हो तब तो सुनाये। एक क्रारण यह भी है कि हमने जनता में मिलना -जुलना तर्क कर दिया है, जहां भावनाएं अपने मौलिक और प्राकृतिक रूप में निवास करती हैं। जब तक आपको हज पांच सौ शेर और कवित्त या दोहे, सौ दो सौ चुटकुले, दो चार सौ सभाषित सूक््तियां याद न हों, आप मनोरंजक संभाषण नहीं कर सकते। किसी को स्पाच सुनने जाइए, अगर वह केवल फिलॉसफी बघार रहा है, या बड़ी ओजसम्विनी झपा में परिस्थितियां पर अपना मत प्रकट कर रहा है, तो आप बहुत जल्द ऊब जार » लेकिन अगर वह बीच-बीच में अपने कथनों को विनोद -भरे चुटकुलों और नव «' से अलंकृत करता जाता है, तो आप अंत तक मुग्ध बैठे रहेंगे। एक लतीएा मे सारे संभाषण में जान-सी पढ़ जाती है। संकड़ों दलीलें एक तरफ और एक पट! सुभाषित एक तरफ। वह प्रतिद्वंद्वी को निरुत्तर कर देता है, उसके जवाब म॑ इच्त ' जबान नहीं खुलती। उसका पक्ष कितना ही प्रबल हो, पर सुभाषितों मे कृछ जादू होता है कि मानों बह एक फंक से दलीलों का उड़ा देता है। मौलाना मुह अली मरहम जिन दिनों अंग्रेजी 'कामरंड' नाम का साप्ताहिक-पत्र लिखा करत « तो उनके लेखों का हरेक पैराग्राफ गालिब के शेगें से अलंकृत होता था और उग्र राजनीति के रूखे विपय में भी रस आ जाता था। उनके इस तरह के लेख लाने « होते थे और बड़ी रुचि में पढ़ जाने थे! मौलाग मुहम्मरअली को गालिब का ;' दोवान' कंठ था और शोरों को बह कुछ इस तरह चिपका दिया करते थ |! मालूम हाता था गालिब ने खह शोर इसो अवसर के लिए कहा हो। स्व अंक! की व्यंगोक्तियां भी दंदाशिकन हैं, इतनी सजीव और चुलबुली कि अगर हम अ" बातचीत में मौके पर उनका व्यवहार कर सके, तो सुनने वालों को फड़का कबीर और तुलसी, रहीम, गिरधर आदि की रचनाएं सभाषितों से भरी पी ' मगर अंग्रेजी स्कूलों में हिन्दी साहित्य एक मौण विषय है, और जिन लोगा न महाकतियों को केवल स्कूलों में पढ़ा है, ले शायद ही उनकी सूक्तियाँ का ही: रख सकते हों। लतीफों की कोई अच्छी पुस्तक हिन्दी में हमारी नजर से नहीं गर। बीरबल, अकबर और खुसरों के नाम से जो लतीफे प्रचलित हैं उनमें अधिकार!
गंदे और कुरुचिपूर्ण हैं के अगर कोई सज्जन लतीफों को संग्रह कर सकें, तो साहित्य का उपकार करें। समाज में वार्ता-कुशल व्यक्ति का कितना सम्मान और प्रभाव होता है, यह लिखने की जरूरत नहीं। ऐसा आदमी किसी मंदली में पहुंच जाता है, तो तुंर सबका ध्यान अपनी ओर खींच लेता है और मंडली पर मानो उसका आधिपत्य हो जाता है। हां, मौका देखकर ही जबान खोलना चाहिए और उसी विषय में बोलने का साहस करना चाहिए जिसका हमें कुछ अनुभव या ज्ञात है। मौन की बड़ी प्रशंसा की गई है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि हम मौका आने पर भी मुंह बंद किए बैठे रहें। हां, अगर हमारे पास कहने को कुछ नहीं है, तो मौन रहना ही उचित है। मौन से कम-से-कम हमारी मूर्खता का परदा तो ढका रहता है। हम तो कहते हैं, हमारे थोथेपन के लिए बड़ी हद तक हमारी अयोग्यता हो जिम्मेदार है। अगर हमारे स्टॉक में लोकोक्तियों और लतीफों का अभाव न हो, तो हम थोथे बैठे ही नहीं रह सकते। जिसे नाचना आता है, वह अवसर पड़ने पर बिना नाचे रह हो नहीं सकता। अगर उसे नाचने का अवसर + मिले, तो वह मन में बहुत दुःखी होगा और भाव-भंगियों से अपना असंतोष प्रकट करेगा। जो अच्छे वक्ता हैं, वे किसी सम्मेलन में चुप नहों बैठ सकते। उनको जीभ खुजलाने लगती है। और वे बार-बार स्लिप लिख-लिखकर सभापति से बोलने की अनुमति लेकर ही रहते हैं। जिन गरीबों को बोलने को शक्ति या अभ्यास नहीं है, वे तो बार-बार कहने पर भी मंच पर नहीं आते, मनाते रहते हैं कि यह बला मेरे सिर न आ जाय'
लगभग एक महीना हुआ हमारों मुलाकात एक ऐसे सज्जन से हुई, जिनकी गचालता देखकर हम दंग रह गए। लतीफों और सुभाषितों का एक सोता था, जो उबलता चला आता था। ऐसा कोई विषय न था जिस पर उनको अपनी एक स्वतंत्र ग़य न हो और जिसका समर्थन वह कायल कर देने वाले ढंग से न +7 सकें। कई बार यह जानते हुए भी कि उनका कथन भ्रममूलक है, उनकी वाचालता + लाजवाब हो गये। अपने पक्ष में एक मार्मिक लतीफा कहकर वह कहकहा मारते थे और इसके साथ मैदान मार लेते थे। वह जानते थे, इस फैसले के खिलाफ मै कुछ नहीं कह सकता। उन्होंने कितने लतीफे कहे, इस वक्त सब तो याद नहीं आते, लेकिन दो- चर याद हैं, उन्हें मैं पाठकों के मनोरंजन के लिए यहां देता हूं और उनसे अनुरोध करता हूं कि वह अपने दिमाग को ऐसे लतोफों से जितना सशस्त्र कः सकें, कर लें। इससे वे अपने हो दुःखों पर नहीं, दूसरे के दुःखों पर भी प्रहार कर सकेंगे और अपने श्रद्धालुओं का दायरा फैला सकेंगे- |
(]) दक्षिणी अफ्रीका में एक बार सरकारी कर्मचारी जन-गणना के सिर 'सिले में एक झोपड़ी के सामने पहुंचा, जहां कई बच्चे ख रहे थे। उसने आवाज दौ, तो उसके जवाब में एक हबशिन बाहर निकल आईं कागजों की खानापूरी करने के लिए कर्मचारी ने पूछा-तुम्हारा शौहर क्या काम करता है? पं
हबशिन ने जवाब दिया--वह क्या करेगा। उसे मरे तो बीस साल हो चुके हें।
'तो यह बच्चे किसके हैं?'
मेरे हें।'
“लेकिन तुम तो कहती हो कि तुम्हारे शौहर को मरे बीस साल हो गए?'
'हां, वह मर गया है, लेकिन मैं तो अभी जिंदा हूं।'
(2) एक तेली ने अपने बैल के गले में घंटी बांध रक्क्खी थी। एक सज्जन ने पूछा-' क्यों साहजी, बैल की गर्दन में घंटी क्यों बांध रक्खी है?'
तेली ने जवाब दिया-'इसलिए कि बैल चलता रहता है, तो घंटी बजती रहती है। में कोई दूसरा काम भी करता रहता हूं, तो मुझे मालूम रहता है कि बैल चल रहा है, खड़ा नहीं हो गया।'
'लेकिन अगर बैल खड़ा होकर सिर हिलाता रहे?'
'सहाशय, मेरा बैल इतना समझदार नहीं है?'
(३3) एक हिसाबदा ने दरिया को गहराई का अनुपात निकालकर घर वानो प्व कहा-पानी थोड़ा है, कोई डर नहीं, हम इसे पार कर लेंगे, लेकिन जब घर के या लोग मध्य धारा में पहुंचते ही उसको आंखों के सामने डूब गये, तो वह फिर किनदर पर पहुंचे और फिर अनुपात निकाला। वही जवाब निकाला जो पहले था, तो बोले- अभी ज्यों का त्यों, कुवां डूबा क्यों?
(42 एक अफीमची पिनक में राह में पड़ा हुआ था। एक फक्कड़ ने उसक सिर की पगड़ी उत्तार ली और उसकी जगह थोड़ी सी रुई रख दी। अफीमची #थ पिनक से जागा, तो पगड़ी संभालने के लिए सिर की तरफ हाथ बढाया। पगर का जगह रुई उसके हाथ आयी तो बोला-कम्बख्त, धुनकी गयी, काती गयी, बुनी एयी पगड़ी बनों। इतना सब कुछ हो चुकने के बाद फिर रुई की रई।
(६) एक बार मि> हर्बर्ट स्पेंसर कहीं सेर करने ज्ञा रहे थे। आप इंग्लेंट + बहुत बड़े फिलॉसफर हो गुजरे हैं। रास्ते में आपको एक सौ साल की बुढिया ०० पड़ी। हर्बर्ट स्पेंसर को मजाक की सूझी, बोले -मैडम, दुनिया में तुम्हारा काई सम भी है? बुढिया ने छूटते ही जवाब दिया-बेटा, मेरे प्रेमी तो सब स्वर्ग सिधार, बसे एक तुम जीते बचे हो। फिलॉसफर साहब ऐसे झेंपे कि भागते ही बना।
(6) तुर्की के प्रसिद्ध प्रधानमंत्री असमत पाशा जब लोजान की काफ़्स मे सेबरी की संधि को बदलवाने के लिए आये, तो आपका सामना लाड्ड कजन से हुआ। लार्ड कर्जनज को अकड़ तो मशहूर है। आपने इस घमंड में कि यह दुल्य के सबसे शक्ति-संपन्न साम्राज्य के प्रतिनिधि हैं, तुर्की प्रतिनिधियों पर रोब जमाने के लिए राष्ट्रवादी तुर्कों पर खूब हमले किये। लार्ड कर्जन का यह ढग (दखकर असमत पाशा ने ऐसा मुंह बना लिया, मानो लार्ड कर्जन बोल ही नहीं रह है| जब लार्ड कर्जन डेढ़-दो घंटे तक डोंगें मार कर बैठ गये, तो गाजी असमत पाशां चौंककर उठ खड़े हुए और कान पर हाथ रखकर बोले-क्या आप तुर्को के विषय में कुछ कह रहे हैं। मैंने तो कुछ सुना ही नहीं। दूसरे विचाएं में डूबा हुआ था! लार्ड कर्जन पर घड़ों पानी पड़ गया।
प्रकाशन इतिहास
[लेख। 'हंस', दिसंबर, 1934 में प्रकाशित। 'विविध प्रसंग' भाग-3 में संकलित।]
