Cover Image for Maulana Hasrat Mohani (मौलाना हसरत मोहानी) by Munshi Premchand - Non-Fiction
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टिप्पणी•1930•8 मिनट

मौलाना हसरत मोहानी

Maulana Hasrat Mohani

महान स्वतंत्रता सेनानी, क्रांतिकारी राष्ट्रभक्त और शायर मौलाना हसरत मोहानी के व्यक्तित्व व त्याग पर प्रेमचंद की टिप्पणी।

Work Details

प्रकार: टिप्पणी
वर्ष: 1930
पठन समय: 8 मिनट (1,114 शब्द)

अगर तुम्हें क्रान्ति की तस्वीर देखनी हो, जीती-जागती, बोलती-चालती तस्वीर, अपनी सारी विभूति, सारी कला के साथ, तो मौलाना हसरत मोहानी को देखो। तुम्हें ज्ञात होगा कि क्रान्ति के रूप और तत्त्व में कोई सादृश्य नहीं होता। लेकिन क्या था? बिल्कुल साधारण मजदूर, जैसा रूस के किसी गांव में देख सकते हो। चेहरे पर तेज और प्रतिभा और संग्राम का नाम नहीं। गांधी को देखो। इससे ज्यादा गरीब, सरल, देहकानी सूरत और किसकी होगी? बस ऐसा मालूम होता है कि कोई मजदूर अभी काम करके लौटा है! हसरत के चेहरे पर भी वही नम्रता है, वही दीनता है, पर उसके अन्दर क्रान्ति का अथाह समुद्र लहरें मार रहा है। ठिगना कद, स्थूलता की ओर झुकी हुई संगठित देह, सांवला रंग, चेहरे पर चेचक के दाग, खमखमसी दाढ़ी, फैशन और नुमाइश से कोसों दूर, त्याग और निग्रह की मूर्ति, जिसे रुईदार गदले और खद्दर से स्वाभाविक प्रेम है। अलीगढ़ के ठाट-बाट, रंग-ढंग का जादू कभी उन पर नहीं चला। हम निश्चय नहीं कह सकते, पर हमने तो उन्हें हमेशा फैशन के खिलाफ कमर कसे, तलवार खींचे पाया। मुसलमानों में शायद हसरत ही वह बुजुर्ग हैं जिन्होंने आज से पन्द्रह वर्ष पहले भारत की पूरी आजादी की कल्पना की और आज तक उसी पर कायम हैं। पहले-पहल वह स्वर्गीय महात्मा तिलक के अनुयायी हुए। नरम राजनीति में उनकी गर्म तबियत के लिए कोई खिंचाव, कोई रुचि न थी। थोड़े ही दिनों में वह अपने गुरु से भी चार कदम और आगे बढ़ गये और उस समय पूर्ण स्वराज का डंका बजाया, जब कांग्रेस का गर्म से गर्म नेता भी पूर्ण स्वराज का नाम लेते कांपता था। उस जमाने में हसरत का कोई साथी न था, लोग उन्हें झक्की समझते थे, पर वह शेर अपनी धुन का पक्का था। अपने लक्ष्य से उसने कभी मुंह नहीं मोड़ा।

नेहरू-रिपोर्ट ने बहुत से मुसलमानों को कांग्रेस से अलग कर दिया। पूरी आजादी का दीवाना हसरत भी उस रिपोर्ट का दुश्मन हो गया। मौलाना के विचारों में उस वक्त हिन्दुओं से विरोध की झलक आने लगी थी। उनके हिन्दू मित्रों की समझ में उनकी यह नीति न आती थी। वे समझने लगे, इन पर भी नौकरशाही का जादू चल गया, पर अब विदित हुआ कि मौलाना अपने मार्ग से जरा भी विचलित नहीं हुए थे। नेहरू-रिपोर्ट का आदर्श था डोमेनियन स्टेटस। मौलाना खूब जानते हैं कि जब तक भारत की लगाम अंग्रेजों के हाथ में रहेगी, हमारी शासन व्यवस्था कितनी ही निर्दोष क्यों न हो, उसका संचालन इस प्रकार किया जा सकता है, भिन्न-भिन्न जातियों और मजहबों को इस भांति लड़ाया जा सकता है कि नौकरशाही का हमेशा बोलबाला रहे। इसलिए ज्योंही कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव स्वीकार किया, मौलाना हसरत संग्राम में कूद पड़े। उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम समझौते की प्रतीक्षा नहीं की क्योंकि वह जानते हैं कि वर्तमान दशाओं में कोई समझौता होना असम्भव है। यह संग्राम का समय है, समझौते का समय बाद को आयेगा जब कि विजय प्राप्त हो जायगी। कितने ही बने हुए लोग जो कांग्रेस का विरोध इसलिए करते थे कि यह तो डोमीनियन स्टेटस को अपना इष्ट बनाये हुए हैं और हम स्वाधीनता के उपासक हैं, कांग्रेस का क्यों साथ दें, वह लोग आज समझौते का बहाना निकालकर जाति की आंखों में धूल झोंकना और अपनी शान बनाये रखना चाहते हैं, पर कौम उन्हें खूब समझ रही है और अब उनके पंजे में आने वाली नहीं।

मौलाना हसरत का समस्त जीवन ही व्रत है। औरों की तरह उन्होंने कानून पढ़कर धन कमाने की इच्छा नहीं की, सरकारी नौकरी के लिए कभी सरकार की चौखट पर नाक नहीं रगड़ी। डिग्री लेने के बाद ही उन्होंने 'उर्दू-मुअल्ला' नामक साहित्यिक पत्रिका अलीगढ़ से निकाली और एक मुद्दत तक उसे चलाते रहे। जब वह जेल चले गए तो पत्रिका बन्द हो गई। कुछ दिनों से आपने 'मुस्तकिल' नाम का दैनिक पत्र निकाला है और उसी को चला रहे हैं। 'उर्दू-मुअल्ला' के दो आश्रय थे—साहित्य और राजनीति। उसके साहित्यिक भाग में जितनी सुरुचि और मौलिकता होती थी, उसके राजनैतिक भाग में उतनी ही निर्भीकता और उदारता। उर्दू-साहित्य के उत्थान में मौलाना ने जो काम किया है वह चिरस्थायी रहेगा।

मौलाना हसरत उर्दू के खास कवि हैं और उर्दू कवियों में उनका स्थान सबसे ऊंचा नहीं, तो किसी से कम भी नहीं। जागृति के भाव तो आपके कलाम में जितने मिलेंगे, उर्दू के किसी कवि के कलाम में नहीं मिल सकते। उर्दू कविता के पुराने रंग को निभाते हुए उन्होंने नयी उमंगों और उद्गारों को उसमें ऐसा भरा है कि उनका कलाम अपने रंग में निराला है। प्रेम के रहस्य जितनी खूबी से आपने दिखाये हैं, जितनी मार्मिकता से उसका चित्रण किया है, हम दावे से कह सकते हैं कि उर्दू के किसी कवि ने भी नहीं किया और शब्द-योजना तो आपका हिस्सा है। उसमें कोई आपका सानी नहीं। आपके शेरों में कितने ऐसे शेर हैं, जिनमें दोहरे अर्थ निकलते हैं। साधारण तौर पर देखिए, तो वह मामूली श्रृंगार का शेर है, लेकिन जरा गौर से पढ़िए तो आपको उसमें एक दूसरा ही समां दिखाई देगा—उसमें आजादी के दीवाने की तड़प है, नाला है, फरियाद है। उर्दू के प्राचीन साहित्य की इतनी खोज भी किसी ने कम ही की होगी। आज उर्दू के पुराने कवियों से जो उर्दू की जनता को इतनी दिलचस्पी है, इसका सेहरा हसरत ही के सिर है।

1921 के असहयोग आन्दोलन में कानपुर में स्वदेशी कपड़ों की एक दूकान 'खिलाफत स्टोर' के नाम से खुली थी। हसरत उसके मैनेजर थे। उसी दूकान से मिला हुआ स्वदेशी वस्त्रों का भण्डार था। भण्डार में बिजली की रोशनी और पंखे थे, मगर 'खिलाफत स्टोर' में इन तकल्लुफात का गुजर न था। राष्ट्र का यह सेवक ताड़ की एक पंखियां लिए बैठा रहता और जब गर्मी बहुत सताती तो उसे झल लेता था। यह उनकी सादगी पसन्द या मुश्किल पसन्द प्रकृति की एक छोटी-सी मिसाल है। अमीरी के चोचलों से उन्हें घृणा है। जिस दिल में आजादी की लगन समाई हुई हो उसे टीमटाम से क्या मतलब। आजादी पहले दिल से शुरू होती है और दिल की आजादी यही त्याग यही निग्रह है। जो अपनी जरूरतों का गुलाम नहीं वह हमेशा आजाद है। जो लोग दिखावे और ठाट के गुलाम होकर आजादी की रट लगाते हैं, वे आजादी को बदनाम करते हैं।

एक बार कानपुर के डी० ए० वी० कालेज में इस प्रस्ताव पर बहस हुई—स्वराज छोटी-छोटी किस्तों में लिया जाना चाहिए। डिबेट अंग्रेजी में थी। डा० दीवानचन्द्र प्रधान थे। हसरत भी मौजूद थे। शायद आपको अंग्रेजी बोलने का अभ्यास नहीं है। कांग्रेस के कितने ही अन्य लीडरों की भांति अंग्रेजी में बात करना आप अपने लिए शान की बात नहीं समझते। आप मंच पर गए और दो-चार वाक्य बोलकर चले आए, पर उन थोड़े से शब्दों में आप एक पूरा व्याख्यान दे आए।

किसी अगले अंक में हम मौलाना हसरत की काव्य-कला की चर्चा करेंगे।


प्रकाशन इतिहास

[सम्पादकीय। 'हंस', मई, 1930 में प्रकाशित। 'विविध प्रसंग' भाग-3 में संकलित।]

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "मौलाना हसरत मोहानी." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1930, https://munshipremchand.com/works/non-fictions/maulana-hasrat-mohani. Accessed 22 Sep. 2026.