स्वप्न का मूल पाठ
औरों की तो मैं नहीं जानता, पर मुझे तो जो आनंद और सुख मिलता है वह स्वप्न में; वहीं पहुँचकर मैं दिल खोलकर हँसता हूँ, दिल खोलकर रोता हूँ और दिल खोलकर खेलता हूँ। वहीं मेरा सुनहरा, रलजटित महल है, वहीं मेरी कामनाओं के फूल खिलते हैं, वहीं मेरी जबान अपनी होती है, मेरा कलम अपना होता है, मेरे विचार अपने होते हैं। मेरा वह संसार इस बंधन और कानून के संसार से कहीं ज़्यादा शांतिमय और कहीं ज्यादा प्रत्यक्ष, कहीं ज्यादा स्फूर्तिप्रद है।
वह तनन््मयता, वह अनुराग, वह उत्कर्ष, वह जागृति जिसका में वहाँ अनुभव करता हूँ, यहाँ कहाँ ! रोना यही है कि वैसे स्वप्न बहुत कम दिखाई देते हैं। लोग किसी अच्छे आदमी का मुँह देखकर उठना चाहते हैं। मैं किसी अच्छे आदमी का मुँह देखकर सोना चाहती हूँ। ।
मालूम नहीं कल किस भाग्यवान् का मुँह देखकर सोया था कि लेटते-ही-लेटते अपने स्वप्न-साम्राज्य में जा पहुँचा। क्या देखता हूँ कि मेरा बचपन लौट आया है, एक बार फिर मैं आजादी की हवा में दौड़ता फिरता हूँ। मेरी वह स्नेहमयी माता, वह प्यारी बहन, वह बाल-सखा, वह छोटा-सा घर, वह द्वार पर नीम का वृक्ष-सब कुछ आँखों के सामने आ गया। उस उमंग, उस उत्साह को क्या लिखूं, वह तो वर्णनातीत है, कल्पनातीत है ! मुझे खूब याद था कि अभी थोड़ी देर पहले मैं बूढ़ा था। मुझे स्वयं अपनी काया पलटने पर आश्चर्य हो रहा था। मुझे अपनी प्रौढ़ावस्था की सारी बातें याद थीं-जीवन भर की भूलों, अनुपायों, निराशाओं और विफलताओं की याद ने मेरे बालपन को दुर्लभ बना दिया था। प्रौढ़ता भी थी, औद्धित्य भी, उमंग भी थी, संयम भी, गंभीरता भी थी, च॑ंचलता भी | पेड़ों पर चढ़ता हूँ पर इस तरह कि गिर न पड़े, चीजों के लिए जिद भी करता हूँ पर इस तरह नहीं कि रो-रोकर दुनिया सिर पर उठा लूँ, खेलता हूँ तो इस तरह कि चोट न लगे, स्कूल में झूठे बहाने नहीं करता, चुगली नहीं खाता, काम से जी नहीं चुराता, जिन गलतियों से मेरा जीवन असफल हो गया था उन्हें दुहताकर इस दूसरे जीवन को भी असफल नहीं करना चाहता ।
स्वप्न ही में यह शक्ति है कि वह महीनों, वर्षों और युगों को क्षणों में घटित कर दे और काल का प्रम ज्यों-का-त्यों बना रहे। मैंने देखा कि मैं स्कूल से कॉलेज में जा पहुँचा हूँ। कॉलेज नहीं है, लड़के भी नहीं। लेकिन अब मेरा किसी से देष नहीं। मुझे याद है कि जिन लोगों को मैं तुच्छ समझता था वे मुझसे कहीं आगे निकल गये।
अब मैं किसी की निन््दा नहीं करता था। याद था कि अध्यापकों के लेक्चर देते समय मैं उपन्यास पढ़ा करता था, खेल के समय बाज़ार की सैर किया करता था। वही गलतियाँ क्या फिर कर सकता था ? वह उपन्यास-प्रेम हृदय का शून्य बन गया, वह बाज़ार की सैर पाँव की बेड़ी बन गयी। अब मैं सभी काम अपने वक्त पर करता था। वह फैशन की गुलामी, वह टाई और कॉलर का शौक़ वह नये-नये सूटों का उन्माद, वे हजारों बातें जिनका व्यसन हमारे छात्र जीवन को दूषित कर देता है इनमें से मुझे अब किसी चीज का भी शौक़ न था। एक पूरे जीवन के अनुभव अब मेरी रक्षा कर रहे थे। वही मैं जिनके लिए हॉकी स्टिक नंगी तलवार थी और फुटबाल बम का गोला, अब बड़े उत्साह से इन खेलों में शरीक होने लगा। व्यायाम से उदासीन रहकर मुझे जो पापड़ बेलने पड़े वह खूब याद थे।
फिर क्या देखता हूँ कि मेरे विवाह की तैयारियाँ हो रही हैं। अब तक तो मैंने जो बातें देखी 4 उन्गे जीवन का सुधार होने की ही आशा थी, किसी चिंता या भय की बात न थी। लेकिन विवाह जैसी महान घटना ने मेरी चेतना को मानो धक्के देकर जगा दिया। बालपन या यौवन अगर लौट आया है तो भी क॒छ गाँठ से तो नहीं जाता। लेकिन कहीं विवाह हो गया तो एक की जगह दो-दो पत्नियाँ हो जायेंगी ! सोचिये, कितनी भीषण समस्या थीं। मैं बड़े धर्म-संकट में पड़ा हुआ हूँ कि विवाह करूँ या न करूँ। इस विवाह संवाद ने मेरी पूर्व-स्मृतियों को कुछ और जागृत कर दिया था। सोचता था कि भला यहाँ किसी को यह विश्वास आयेगा ! मैं तो पहले ही से इस वैतरणी में पड़ा हुआ हूँ और वह भी सिर पर आधी दर्जन छोटी-बड़ी गठरियाँ लिये हुए। मुझे खुद भी तो पूरा-पूरा निश्चय नहीं है कि मैं वास्तव में क्या हँ-बूढ़ा या जवान * मैं तो इस दुविः” में पड़ा हुआ हूँ और उधर घरवाले विवाह के सब सामान जुटाने पर तुले हुए हैं। अम्मा है ४ उनके पाँव जमीन पर नहीं पड़ते, मानो संसार की जब से सृष्टि हुई है, उनके बेटे के सिवाय और किसी को यह सौभाग्य प्राप्त ही नहीं हुआ। दादा भी जिन्हें बाज़ार से नफ़रत है, जो बाजार को पैसे का परनाला कहते हैं और जिन्हें आभूषणों के नाम से चिढ़ है। इस विषय में अम्माजी से हजारों ही बार उनकी ठन चुकी है, अम्माजी के अकबरी हमलों के सामने भी वह राणा प्रताप की भाँति बराबर डटे रहे। आज खुश-खुश सर्राफों की दूकानों की हवा खा रहे हैं। बार-बार बाजार आते-जाते थे, पर माथे पर बल का नाम भी न था। और मैं इस सोच में हूँ कि यह जवानी कहीं धोखा न हो। स्मृति के किसी गुप्त भाग में यह बात छिपी हुई मालूम होती है कि मेरे बाल-बच्चे हैं, स्त्री है, साले हैं, ससुर है। मुझे चिन्ता हो दा थी कि जब मैं यह नयी बहू लिये घर जाऊँगा तो लोग मुझे क्थ, कहेंगे। जवान बेटे हैं जो वृद्ध-विवाह को जीवन का सबसे बड़ा पाप समझते हैं; जिसके साथ जीवन के तीस साल बीते हैं वह स्त्री है। उन सबों के सामने मैं कौन मुँह लेकर जाऊँगा। यह न पूछिये कि नववधू के साथ मैं अपने माँ-बाप के घर के बदले अपने घर क्यों लौटता ? मेरा तो घर-बार ही नहीं। लेकिन यहाँ तो पूर्व-स्मृतियाँ बनी हुई थीं। उनके कुछ मिटे-मिटे निशान साफ़ नजर आ रहे थे। फिर स्वप्न न्याय और श्रृंखला और घटनाक्रम का अनुक्षरग भी तो नहीं करता। सोचता था मित्र वर्ग कितना मज़ाक उड़ायेंगे-वाह महाशय ! आप तो अनमेल विवाहों के बड़े
विरोधी थे। यह आपको क्या सनक सवार हो गयी !
प्राण संकट में पड़े थे। सोचता था अम्मा को कैसे समझाऊँ ? कहीं लोग हँसने न लगें कि यह दीवाना हो गया है।
इतने में बाजे बजने लगे। अम्मा ने आकर मुझसे कहा, तुम्हारी भी विचित्र बात है, ऐसा मुँह लटकाये बैठे हो याने कोई चिंता-फ़िकर सवार हो। सारे घर में मंगल-गान हो रहा है और तुम रोनी सूरत बनाये बैठे हो। अभी तो हम जीते हैं, तुम्हें क्या चिंता ? जब हम मर जाये, तब चिंता करना ! उठो, बारात जा रही है। जल्दी से कपड़े पहन लो !
मैं कुछ जवाब न दे सका। माँ से कैसे कहूँ कि मेरा तो विवाह एक बार तुम्हीं कर चुकी हो। चुपचाप जाकर कपड़े पहने। स्त्रियों ने गीत गाये। नाई, धोबी आदि ने न््योछावर पाये और मैं दूल्हा बना हुआ घर से निकलकर पालकी पर बैठा। कहारों ने पालकी उठाई फिर मैंने देखा कि मैं वधू के द्वार पर पहुँच गया। जनवासे में वही शोरगुल, चिल्ल-पौं मचा हुआ था जैसा दस्तूर है। जरा देर में मुझसे कहा गया कि पाणिग्रहण का मुहूर्त आ गया, चलो। अब मेरे लिए कठिन परीक्षा का समय था। जिस तरह अब तक बिना कान-पूँछ हिलाये सब कुछ करता आया हूँ अगर उसी तरह इस वक्त भी चुपके से चला गया तो अनर्थ हो जायेगा। पाँव में बेड़ी पड़ जायेगी और मैं कहीं का न रहूँगा। अगर यह जवानी मरीचिका ही निकली तो शेष जीवन कलंकित ही नहीं, दुःखमय हो जायेगा। कहीं का न रहूँगा। क्या कहकर जान बचाऊँ ? कौन-सा बहाना, करूँ ? लोग मेरी बातों पर हँसेंगे और मुझे पागल समझेंगे। लेकिन यह जवानी बर्फ़ की तरह पिघल गयी तो इस युवती के साथ कितनी छीछालेदर होगी !
मैं उठकर भागा, जामा जोड़ा मौर पहने लप़ड़-सपड़ करता भागा। मेरे पीछे लोग दौड़े। मैं इस तरह जान छोड़कर भागा जा रहा था मानो कोई भयंकर जंतु मेरे पीछे पड़ा हुआ हो, यहाँ तक कि सामने एक नदी आ गयी और मैं उसमें कूद पड़ा ।
बस, नींद खुल गयी। देखता हूँ तो चारपाई पर पड़ा हूँ, मगर साँस फूल रही है।
[हिन्दी कहानी। हिन्दी मासिक पत्रिका “'वीणा', जुलाई, 1930 में प्रकाशित। 'दिल्ली', फरवरी, 1977 में पुनर्प्रकाशित। 'सोलह अप्राप्य कहानियां' तथा प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य” खण्ड-1 में संकलित। यह कहानी केवल हिन्दी में प्रकाशित हुई।]
स्वप्न का सारांश
'स्वप्न' मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित एक अनूठी, मनोवैज्ञानिक और हास्य-व्यंग्यपूर्ण कहानी है। कथावाचक स्वप्नलोक को वास्तविक संसार के बंधनों और कानूनों से परे एक ऐसा मुक्त और शांतिपूर्ण संसार मानते हैं, जहाँ वे पूरी स्वतंत्रता से अपने मनोभाव व्यक्त कर सकते हैं। एक रात वे स्वप्न में देखते हैं कि उनका बचपन पुनः लौट आया है। उनका पुराना पैतृक घर, स्नेहमयी माता, प्यारी बहन, बाल-सखा और दरवाजे का नीम का पेड़ सब साकार हो उठते हैं। यद्यपि वे बालक बन चुके हैं, किंतु उन्हें अपने वास्तविक वृद्ध जीवन के सारे अनुभव, भूलें, कमजोरियाँ और असफलताएँ भलीभाँति याद हैं। इस परिपक्व ज्ञान के सहारे वे अपने बचपन और छात्र-जीवन को एक नए और संयमित ढंग से जीते हैं—खेलों में सावधानी बरतते हैं, शिक्षकों के सामने बहानेबाजी से बचते हैं, और कॉलेज पहुँचकर उपन्यास पढ़ने या बाज़ार में समय गँवाने के बजाय एकाग्रता से अध्ययन और व्यायाम करते हैं।
कहानी में तीव्र हास्यप्रद और नाटकीय मोड़ तब आता है जब स्वप्न में अचानक उनके विवाह की तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं। माता-पिता विवाह के उत्साह में मग्न हैं; यहाँ तक कि धन के अपव्यय और आभूषणों के घोर विरोधी पिता भी सहर्ष बाज़ार में गहनों की खरीदारी करते फिरते हैं। किंतु कथावाचक भीषण धर्म-संकट में फँस जाते हैं। उन्हें अपनी पूर्व-स्मृतियों से याद आता है कि वे तो पहले से ही विवाहित हैं, उनका तीस वर्ष पुराना दांपत्य जीवन है और उनके जवान बाल-बच्चे हैं। यदि वे पुनः विवाह करते हैं, तो अनमेल विवाह और वृद्ध-विवाह के विरोधी रहे कथावाचक पर उनके अपने बच्चे और मित्र हँसेंगे। इसके अलावा उन्हें भय सताता है कि यदि यह जवानी केवल एक मृगतृष्णा निकली और जागने पर समाप्त हो गई, तो उस नववधू का जीवन नष्ट हो जाएगा।
माता के स्नेहपूर्ण दबाव के आगे लाचार होकर वे दूल्हा बनते हैं और पालकी में सवार होकर बारात के साथ वधू के द्वार तक पहुँचते हैं। किंतु ज्यों ही पाणिग्रहण का लग्न-मुहूर्त आता है, उनका आत्मसम्मान और विवेक उन्हें रोक देता है। इस भीषण संकट से बचने के लिए वे सेहरा, मौर और शादी का जामा-जोड़ा पहने ही मंडप से भाग खड़े होते हैं। बारात के लोग उनके पीछे दौड़ते हैं और कथावाचक जान बचाकर सामने बहती नदी में छलांग लगा देते हैं। नदी में कूदते ही उनकी आँख खुल जाती है और वे खुद को अपनी चारपाई पर सुरक्षित लेकिन बुरी तरह हाँफता हुआ पाते हैं।
प्रकाशन इतिहास
यह कहानी सर्वप्रथम हिंदी मासिक पत्रिका वीणा के जुलाई 1930 के अंक में प्रकाशित हुई थी। बाद में यह फरवरी 1977 में दिल्ली पत्रिका में पुनर्प्रकाशित हुई तथा सोलह अप्राप्य कहानियाँ और प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य (खण्ड-1) में संकलित की गई। यह कहानी केवल हिंदी में प्रकाशित हुई।
महत्त्व और विषय-विमर्श
- अतीत सुधारने की मानवीय फैंटेसी: कहानी मानव मन की उस सार्वभौमिक इच्छा को छूती है जिसमें व्यक्ति जीवन भर के अनुभवों और पछतावों के साथ अपने बीते हुए कल को सुधारने की कल्पना करता है। प्रेमचंद ने स्वप्न के माध्यम से इस दार्शनिक भाव को रोचक रूप दिया है।
- स्वप्न और यथार्थ का मनोवैज्ञानिक अंतर्द्वंद्व: कथावाचक की चेतना एक ओर नए यौवन का आनंद लेना चाहती है, वहीं दूसरी ओर उसकी पूर्व-स्मृतियाँ और सामाजिक उत्तरदायित्व उसे अनैतिक कार्य करने से रोकते हैं। यह अंतर्द्वंद्व अत्यंत मनोवैज्ञानिक है।
- वृद्ध-विवाह और सामाजिक नैतिकता पर व्यंग्य: विवाह के प्रसंग में कथावाचक का यह भय कि समाज और उनके अपने बच्चे उन्हें अनमेल विवाह के लिए धिक्कारेंगे, तत्कालीन समाज में वृद्ध-विवाह के विरुद्ध नैतिक चेतना को रेखांकित करता है।
- हास्य और व्यंग्य का संतुलित शिल्प: गंभीर जीवन-दर्शन और विद्यार्थी-जीवन की कमियों के विश्लेषण को प्रेमचंद ने विवाह के प्रहसन और मंडप से दूल्हे के भागने के अत्यंत मनोरंजक प्रसंग के साथ प्रस्तुत किया है।
- कहानी का व्यापक महत्त्व: 'स्वप्न' प्रेमचंद की कथा-परंपरा में एक अभिनव प्रयोग है। यह कहानी यथार्थवादी सामाजिक चिंताओं को स्वप्न-कथा और मनोवैज्ञानिक अंतर्दृष्टि के माध्यम से प्रस्तुत करते हुए मनुष्य के नैतिक विवेक, स्मृतियों के दबाव और पश्चाताप की भावना को उजागर करती है।
