Cover Image for Mahatma Ji Ki Vijay Yatra (महात्माजी की विजय-यात्रा) by Munshi Premchand - Non-Fiction
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सम्पादकीय•1931•7 मिनट

महात्माजी की विजय-यात्रा

Mahatma Ji Ki Vijay Yatra

प्रेमचंद का सम्पादकीय जिसमें महात्मा गांधी की लंदन गोलमेज यात्रा के संदर्भ में ब्रिटिश कूटनीति और साम्प्रदायिक एकता की अनिवार्य आवश्यकता का विश्लेषण किया गया है।

Work Details

प्रकार: सम्पादकीय
वर्ष: 1931
पठन समय: 7 मिनट (936 शब्द)

महात्मा गांधी के रवाना होते ही समस्त भारतवर्ष की आँखें लंदन की तरफ फिर गयी हैं। महात्माजी ने दिखा दिया है कि वह राजनीति में भी उतने ही कुशल हैं, जितने संग्राम में। कितने ही लाल बुझक्कड़ों को महात्माजी की राजनैतिक विवेकशीलता में संदेह था। उनका खयाल था, महात्माजी धार्मिक और सामाजिक क्षेत्र के लिए ही बने हैं, वह साधु हैं और राजनीति से उन्हें कोई लगाव नहीं। राजनीति में चालें हैं, तिकड़मबाजी है, आँखों में धूल झोंकना है, कहना कुछ और करना कुछ है। लेकिन महात्माजी ने सिद्ध कर दिया कि वह राजनीति में भी धर्मनीति से जौ-भर भी इधर-उधर नहीं होते। सच तो यह है कि महात्माजी ने राजनीति को उसकी गंदगियों से पाक कर दिया है। उनकी राजनीति और धर्मनीति दोनों एक हैं। यही कारण है कि वह समर में जितने वीर और साहसी हैं, सन्धि में उतने ही दूरदर्शी और दृढ़। ऐसे विरले ही होते हैं, जिनमें यह दोनों गुण समान रूप से मौजूद हों। साधारणतः समर का वीर सेनापति, जो बड़ी-बड़ी सेनाओं का संचालन करता है, राजनीतिज्ञों की मंडली में आकर चकरा जाता है। उसी तरह राजनीति का धुरंधर पंडित युद्ध-क्षेत्र में जाकर अपनी अयोग्यता का प्रदर्शन करता है। महात्माजी की व्यापक बुद्धि दोनों क्षेत्रों में समान रूप से काम करती है।

लेकिन इस समय महात्माजी के सामने जो काम है, वह आसान नहीं है। लंदन में वह गोलमेज के चारों तरफ बैठे हुए ऐसे-ऐसे चतुर खिलाड़ियों के बीच में खड़े होंगे जिन्होंने राज्य-संचालन को जीवन-तत्व बना लिया है। जहाँ अंग्रेजी सेना असफल हो गयी है, वहाँ बहुधा अंग्रेज़ी डिप्लोमेसी ने विजय पायी है। इंग्लैंड में अब मजदूरों का अधिकार नहीं है। लेकिन जब मजदूरों के हाथ में पूरा अधिकार था, तब भी अनुदार साम्राज्यवादियों का इतना जोर था कि मजदूर-सरकार उनकी इच्छा के विरुद्ध कुछ न कर सकती थी, और अब तो सर सैमुअल होर, लॉर्ड रीडिंग, लॉर्ड पील जैसे-जैसे सज्जन कैबिनेट में हैं, जिन्हें भारत से उतनी ही सहानुभूति है, जितनी स्वामी को सेवक से होती है।

ऐसी दशा में महात्माजी का उद्देश्य अगर सफल हो सकता है, तो इसी तरह कि राष्ट्र की पूरी शक्ति महात्माजी के पीछे हो। हमको उतनी शंका अंग्रेज मिनिस्टरों से नहीं, जितनी अपने ही भाइयों से है। अंग्रेज व्यापारी हैं। व्यापार उनके जीवन के लिए अनिवार्य है। वह खेती-बाड़ी करके अपना निर्वाह नहीं कर सकते। उन्हें मालूम हो गया है कि भारत को तलवार के जोर से दबाकर वह व्यापार नहीं कर सकते। केवल राज्य करने का व्यसन उन्हें अपने व्यापार को चौपट करने, जीवन को खतरे में डालने, और अपनी हस्ती मिटा देने पर राजी नहीं कर सकता। बाल्डविन हों या चर्चिल, मैकडोनाल्ड हों या लॉयड जॉर्ज, इस बात को कोई नहीं भूल सकता कि इंग्लैंड का व्यापार ही उसके प्राण हैं और जिस दिन इंग्लैंड का व्यापार न रहेगा, उस दिन इंग्लैंड भी न रहेगा।

हाँ, हमारे भाइयों में अब भी एक ऐसा शक्तिशाली समूह है, जो स्वराज्य से डरता है। उसे भय है कि स्वराज्य में हिन्दू बहुमत उसे पीस डालेगा। इस समय हमारी सारी कोशिश अपने मुसलिम भाइयों की सहानुभूति प्राप्त करने, उनके दिलों से शंका और अविश्वास को मिटाने में लगनी चाहिए। यही हमारे राजनीतिक उद्धार की कुंजी है। काँग्रेस ने इस शंका और अविश्वास के लिए कोई स्थान नहीं छोड़ा है, फिर भी वह पिशाच अभी तक छिपा बैठा है और जब अवसर पाता है, कहीं न कहीं अपनी पाशाविक लीला दिखा देता है। मुसलमानों में इस वक्त कोई एक सर्वमान्य नेता नहीं है। जितने नेता हैं, वह एक-एक टुकड़ी के नेता हैं। मौलाना हसरत मोहानी पर अधिकांश मुसलिम जनता को विश्वास है; पर मौलाना इतनी जल्दी-जल्दी पहलू बदलते हैं, कभी पक्के राष्ट्रवादी बन जाते हैं, कभी पक्के मुसलिम लीडर, कि मुसलिम जनता उन्हें पहेली समझती है। ऐसी बिन दूल्हे की बारात किस अवसर पर क्या करेगी, नहीं कहा जा सकता। उन्हें समझावें तो कैसे, उनके साथ शर्त करें तो कैसे। सभी अपनी-अपनी डफली अलग-अलग बजा रहे हैं।

इसे स्वीकार करने में हमें कोई आपत्ति न होनी चाहिए कि मुसलिम भाइयों की यह शंका तथा अविश्वास केवल दुराग्रह के कारण नहीं है। उसका कारण वह भेद-भाव, वह छूत-विचार, वह पृथकता है, जो दुर्भाग्य से अभी तक अपने पूरे जोर के साथ राज कर रही है। जब हिन्दू एक मुसलमान के हाथ का पानी नहीं पी सकता, तो मुसलमान को कैसे उस पर विश्वास हो सकता है, वह कैसे उसे अपना मित्र और हित-चिन्तक समझ सकता है? कुछ पढ़े-लिखे मुसलमान उँगलियों पर गिनने लायक ऐसे मिलेंगे, जो समझते हैं कि यह भेद-भाव केवल मुसलमानों ही के साथ नहीं है, बल्कि हिन्दू अपने भाइयों के साथ भी यही बर्ताव करते हैं, इसलिए कि यह भेद-भाव का भूत उनके सिर पर हजारों बरस से सवार है, जो अपने स्वधर्मियों से भी उतना ही पृथक रक्खे हुए है, जितना अन्य धर्मवालों से। ब्राह्मण को एक कायस्थ के हाथ का भोजन अखाद्य है। नहीं, एक प्रान्त के ब्राह्मण के लिए दूसरे प्रान्त के विप्र जी के हाथ का भोजन वर्जित है। यहाँ तक कि ऐसे-ऐसे कुलीन भी पड़े हुए हैं, जो अपने हाथ के सिवा और किसी के हाथ का पकाया भोजन खा ही नहीं सकते, चाहे भूखों मर जायें। हिन्दू इस भिन्नता को समझता है और उसे इसके सहने की आदत पड़ी हुई है। वह किसी वर्ग का हो, उसे भी किसी न किसी को अछूत समझने का गौरव मिल ही जाता है; लेकिन आम मुसलमान इस फ़िलासफ़ी को नहीं समझ सकता। वह तो यही जानता है कि हिन्दू उसे नीचा समझते हैं और यह कोई भी आत्म-सम्मान रखने वाली जाति नहीं सह सकती। ऐसे विचारों के रखते हुए कोई राष्ट्र नहीं बन सकता और अगर कुछ दिनों के लिए बन भी जाय, तो टिक नहीं सकता।


प्रकाशन इतिहास

[सम्पादकीय। 'हंस', सितम्बर, 1931 में प्रकाशित। 'विविध प्रसंग' भाग-2 में संकलित।]

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "महात्माजी की विजय-यात्रा." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1931, https://munshipremchand.com/works/non-fictions/mahatma-ji-ki-vijay-yatra. Accessed 22 Sep. 2026.