Cover Image for Hindu-Muslim Prashna (हिन्दू-मुस्लिम प्रश्न) by Munshi Premchand - Non-Fiction
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निबंध•1924•18 मिनट

हिन्दू-मुस्लिम प्रश्न

Hindu-Muslim Prashna

हिन्दू-मुस्लिम समस्या के कारणों और समाधान पर प्रेमचंद का संतुलित व दूरदर्शी निबंध, जिसमें आपसी सहिष्णुता और राष्ट्रीय एकता का संदेश दिया गया है।

Work Details

प्रकार: निबंध
वर्ष: 1924
पठन समय: 18 मिनट (2,694 शब्द)

हिन्दू- मुस्लिम ऐक्य का प्रश्न कितना महत्त्वपूर्ण है, इसके कहने की जरूरत नहीं, हम सभी जानते हैं ओर सभी स्वीकार करते हैं। पूज्य महात्मा गाधी ने सूत्र रूप मे कह दिया है कि हिन्दू-मुस्लिम ऐक्य ही स्वराज्य है, और इस सत्य को व्यक्त करन के लिए इससे उत्तम शब्द नहीं मिल सकते। जैसा ही यह वागववावए्या | महान्‌' सत्य है, वैसा ही ॥्ञा38५थ॥ (महान) यह वाक्य है। अतएत हम सभी प्राणियों का, जिन्हें देश से कुछ अनुराग है, कर्त्तव्य है कि यथाशक्ति कोई एसा काम न करे न कोई ऐसी बात कहें, जिससे ऐक्य में बाधा पड़ने का भय हो। काश, हम उतने स्वार्थ-परायण न होते नो आज यह प्रश्न इतना जगिल, इतना दुर्गम, इतना अमाश्य न होता। किसी को अपने पत्र के ग्राहकों की संख्या बढ़ानी है, किसी को अपने लद़॒क लिए नौकरी तलाश ,करनी है, किसी को नाम ही की धुन ह#, कोई गौरांग प्रभृ॥ की नज़रों में अपना रसख जमाना चाहता है, कोई व्यावसायिक उन्नति के लिए यह हीला निकालता है। सब स्वार्थ ही की माया। हम अपने तुच्छ स्वार्थ के लिए गष्ट्रीय उद्धार के इस महान्‌ यज्ञ में विध्न डाल रहे हैं। जो नामधारी महान्‌ पुरुष जरा जग

सी बात पर, ज्ञरा जग से झगड़े पर अपनी जाति क प्रवर्तक बन जाते हैं, बह यदि शांत चित्त से विचार करेंगे नो उन्हें ज्ञात हो जाएगा कि इस वैेमनस्थ का कितना इल जम उनके सिर है। इससे तो कहीं अच्छा होता कि वह सज्जन थोड़ी दर के लिए जाति

सेवा से मुंह फेर लेते, थोड़ी देर के लिए जाति को जहन्नुम में चले जाने देते, भूल जाते कि हमारी जाति का हास हो रहा है। अगर कोई हिन्दू हिन्दुओं को समशझाता है तो वह जयचन्द और विभीषण कहा जाता है, कोई मुसलमान मुसलमानों को समज्ञात है तो काफिर तर गददार कहा जाता है। चुन-चुनकर चोट करने वाली बातें कह जाती हैं और शाबाशी लूटी जाती है। महात्माजी ने इस विषय में अपने विचारों का जरूरत मे ज्यादा तीक्ष्ण शब्दों में प्रकट किया तो बजाय इसके कि लोग उससे कु उपदश ग्रहण करते, उन्हों पर हमला करने लगे। यहां तक कि एक बूढ़े कवि महारा| ने, जो अनुप्रास का व्यवहार करने में बहुत सिद्धहस्त हैं, उनकी हजो भी कह डाला। किसी ने सोचा कि महात्माडी ने कितना जलकर, कितने मानसिक कप्ट से व्यधित

होकर यह अप्रिय सत्य कलम से निकाला है ! महात्माजी हिन्दू हैं, और हिन्दुओं ही को समझाने का उन्हें अधिकार है। उसी भांति अली बिरादरान मुसलमान हैं और मुसलमानों को समझाने का उन्हीं को अधिकार है। पर आज एक तरफ महात्माजी पर बौछारें पड़ रही हैं, और दूसरी तरफ अली-बंधुओं पर। अब वह शौकत अली नहीं रहे जो 'अंजुमन खुददाए काबा' के निर्माता थे। उक्त मौलाना ने बहुत ठीक कहा था कि इन झगड़ों से हम यह साबित कर रहे हैं कि हम गुलाम ही बने रहना चाहते हैं।

इस वैमनस्य के कारण धर्म की कितनी छीछालेदर हो रही है कि उसके खयाल ही से शर्म आती है। वह बुरी साइत थी, जब हिन्दुओं को शुद्धि की धुन सवार हुई। दस-पांच हजार नौ-मुस्लिम संदिग्ध रूप से शुद्ध क्या हुए कि राष्ट्रीयता पर कुठाराघात, बल्कि वज्राघात हो गया। शुद्धि एक घार्मिक कार्य को अधार्मिक रीति से करने का अभिनय था। मुसलमान बराबर हिन्दुओं को शुद्ध करते चले आते हैं, उनकी तबलीग अजिरल रूप से होती चली आती है, पर किसी को खबर भी नहीं होती कि कौन ऊब शुद्ध हो गया। हां, जब दसवें साल जनगणना होती है, तो ज्ञात होता है कि हयारे कितने आदमी काम आए। हिन्दुओं ने दस-पांच हज़ार आदमियों को शुद्ध करने में तूफान बर॒प, कर दिया।' केवल इसलिए कि यह काम करने का न यह तरीका था, न यह मौका। अब हपारे दोनों पक्षों के मनचले सज्जन अपने-अपने शिकार फंसाने में तल्‍लीन हैं, कोई भ्रष्ट मुसलमान किसी हिन्दू स्त्री के पीछे अपना घ॒र्म-त्याग करने पर तैयार हो जाता है, तो उसका जुलूस निकलता है और उसका नाम सत्यत्रत रखा जाता है। हम दो-चार ऐसे महाशयों को जानते हैं जो मुसलमानों को शुद्ध करने के लिए स्त्री का प्रलोभन देने में संकोच नहीं करते, और मुसलमान तो दाइए-इस्लाम का अनुसरण कर हो रहे हैं, विधवाओं पर खूब हाथ साफ किया जा रहा है और यह सब धार्मिक अनुराग से नहीं, बल्कि अपने प्रतिद्वंद्वी को नीचा दिखाने के लिए। और जैसा हमेशा से होता आता है इस मैदान में बाजी मुसलमानों के हथ है। मुसलमानों में हिन्दुओं से कुछ अधिक गुंडापन होता है। इसका कारण तो बाबू भगवानदास जैसा तत्त्तान्वेषी ही निकाल सकता है, पर हमारा जहां तक खयाल रै, हिन्दुओं में बाल- विवाह की प्रथा का आधिक्य और मुसलमानों में अबिवाहित पुरुषों की कसरत ही गुंडापन के कमोबेश होने का मुख्य कारण है। जिस अवस्था में मुसलमान गुंडा होता है, उस अवस्था में हिन्दू तीन बच्चों का बाप हो जाता है, वह बेचारा क्‍या खाके गुंडापन करेगा? फिर हिन्दुस्तान के मुसलमान, विशेषकर वह जो गुंडे होते हैं, नौमुस्लिम हैं और नौमुस्लिम खानदानो मुसलमानों से कहीं ज़्यादा उद्दंड हैं, उसी भांति जैसे

| प्रमचंदजी की तरह और भी कई सज्जनों की यह शिकायत है कि शुद्धि- आंदोलन में बहुत बावेला मचाया गया. काम की तरह काम नहीं किया गया, व्यर्थ का ढोल पाय गया, पर असल बात यह है कि शुद्धि, खासकर इस प्रकार की जैसी कि इस समय हुई, हिन्दू धर्म में एक महान्‌ क्रांति थी, ऐसी क्रांति सैकड़ों वर्षों में नहों हुई थी। अत: इस समय शुद्धि को तबलीग की तरह चुपके-चुपके करना अमंभव था।

क्रॉतिकारक विम्फोट में धडाका होता ही है। -प्रधात सपादकृ

कोई सनातनी हिन्दू आर्य समाज में प्रवेश करते ही एक नए जोश का अनुभव करने लगता है। अगर इसी तरह अपनी संख्या और अपना प्रभुत्व बढ़ाने के लिए नोच- खसोट होती रही, तो फिर भारत का उद्धार हो चुका। मज़ा तो यह है कि शुद्धिबाज़ों के सिर में यह सौदा समाया हुआ है कि हम सारे हिन्दुस्तान के मुसलमानों-और मुसलमान ही नहीं, अन्य सभी धर्मावलम्बियों-को भी शुद्ध कर लेंगे। इस कुबुद्धि का निवारण भगवान्‌ ही कर सकते हैं। इस ट्वेष का परिणाम अगर मुसलमानों के लिए हानिकर है तो हिन्दुओं के लिए घातक हैं। हमारी संख्या अधिक है और स्वराज्य से लाभ भी हमारा ही अधिक होगा, और कुछ न सही तो राजनैतिक बुद्धि का तो आदेश मानना ही पड़ेगा। स्वराज्य का उद्देश्य है अपनी शिक्षा का, अपने धर्म का, अपनी सभ्यता का पुनरुज्जीवन और पुन:संस्कार। इसके अतिरिक्त स्वराज्य और कुछ नहीं है मुसलमानों को सभ्यता की रक्षा करने के लिए मिस्र, टर्की, काबुल मौजूद हैं, हिन्दुओं की सभ्यता की रक्षा करने वाली कोई जाति नहीं। ऐसी दशा में यदि मुसलमान स्वराज्य-प्राप्ति में हिन्दुओं के सहायक हो रहे हैं तो यह भी हिन्दुओं के सौभाग्य की बात है, लेकिन हम उनके विश्वास की ज़्रा भी कद्र न करके अभी से आने वाले स्वराज्य की बानगी दिखने पर आमादा हैं। अगर मुसलमानों को हमदर्दी हमारे हाथों से निकल जाती है तो यह किसका कसूर है? हमारी वर्तमान नीति ने कितनी ही विचारशील मुसलमानों को हमसे सशंक कर दिया और अब वे स्वराज्य के नाम से कांपते हैं। अगर अब भी कुछ मुसलमान सज्जन हमारा साथ दे रहे हैं तो यह महात्मा गांधी के विश्वास पर। सात करोड़ मुसलमान अपने को 23 करोड हिन्दुओं के हाथों में सौंप देते हैं, क्या यह छोटी बात है? वह हिन्दुओं के आधिक्य से भयभीत नहीं होते, इधर हम हैं कि मुसलमानों से चौंकते हैं और यहां तक सोचने लगे हैं कि काबुल या टर्की हिन्दुस्तान पर हमला करेंगे तो मुसलमान उन लोगों के साथ तो जाएंगे। इस आत्मिक दुर्बलता की भी हद है स्वराज के अंतर्गत मुसलमानों की स्थिति किसी चहेते बेटे या लाड़ली बेगम की न रहेगी। अंग्रेज़ों ने सदेव उन्हें हिन्दुओं पर तरजीह दी है। प्रत्येक अवसर पर अंग्रेजों ने मुसलमानों ही को आगे बढाया है। क्या यह देखना कठिन है कि स्वराज्य-संग्राम में हिन्दुओं का साथ देकर मुसलमान आत्म-त्याग कर रहे हैं और हम अपनी दूरदर्शिता से उन्हें अपना शत्रु बनाए लेते हैं?

आइए देखें, इस वैमनस्य का कारण क्‍या है। गड़े-मुरदे उखाड़ने की ज़रूरत नहीं। अगर एक तरफ औरंगज़ेब है तो दूसरी तरफ छत्रपति शिवाजी हैं। वर्तमान समस्याओं पर ही दृष्टि को सीमित रखना हमारे लिए उचित होगा। सरकारी नौकरियां, कौंसिलों की मेम्बरी, उर्दू-हिन्दी संगम, गोवध और धार्मिक अपमान, यही मुख्य कारण मालूम होते हैं। कौंसिलों की जो दशा है और उनके द्वारा देश का जो उपकार हो सकता है, वह हम आंखों देख रहे हैं। उसमें स्थान की कमीबेशी इतनी गुरु नहीं है कि उसके पौछे हम राष्ट्रीय उद्धार की संभावना को तुच्छ समझ लें। ठक्ला८ 75 ॥0 एण॥। 0० ८थ70८ वाली कहावत यहां चरितार्थ होती है। लिपि-संग्राम में हम देख रहे हैं कि स्वाभाविक दशाओं ने सरकारी पक्षपात को निर्मूल कर दिया। हिन्दी दफ्तरी ज़बान न होने पर भी उत्तरोत्तर उन्‍नति कर रही है, उर्दू सरकारी आश्रय पाने पर भी गिरती

चली जाती है। यहां तक कि अब हिन्दी से मोर्चा लेने के योग्य भी नहीं रही। गोवध के विषय में भी मुसलमानों का विरोध बहुत-कुछ ठण्डा हो चला था, और अगर बीच में एक तीसरा दल ललकारने वाला न होता तो अब तक शांत हो गया होता। मुसलमानों ने ही साबित किया था कि टीपू सुलतान ने गोवध का निषेध कर दिया था। अकबर के राज्यकाल में गोवध का निषिद्ध होना भी एक मुसलमान विद्वान्‌ की खोज थी। अमीर काबुल ने गोवध की मनाही कर ही दी है, वहां तो इतनी उदारता दिखलाई जा रही है और यहां हिन्दू लोग बोर्डों में अपनी बहुसंख्या के बल पर गोबध बंद करने के लिए कानून व्यवस्थाएं करने लगे। एक मुसलमान ही ने 'अलबकर' नाम का पत्र निकाला था जिसका उद्देश्य ही गोरक्षा था। यहां तक कि मौलवियों ने गो-हत्या के विरुद्ध फतवे देने शुरू कर दिए थे। बहुत संभव था कि अगर हिन्दुओं ने महात्मा जी के दिखाए हुए मार्ग को छोड़ न दिया होता, तो थोड़े दिनों में गोकुशी अपनी मौत मर जाती। मौलाना शौकत अली ने साफ कह दिया था कि अगर अब भी मुसलमान गोवध कर रहे हैं तो इसिलए कि उन्हें इसकी प्रेरणा दी जा रही है ओर जब तक यह प्रेरणा मिलती रहेगी, गो -हत्या बंद नहीं हो सकती। फिर हिन्दू ही गौ-रक्षा के लिए क्या प्रयत्न कर रहे है कि मुसलमान उनकी नेकनीयती के कायल होते? मुसलमान समझते हैं कि हिन्दुओ ने केवल हमें नीचा दिखाने के लिए इस प्रश्न को उठा रखा है और एंसी दशा में स्वभाग्त: वे लोग अपने माने अधिकार का त्याग नहीं करना चाहते, और यही हाल रहा ता शायद गौ-हत्या कभी बंद न होगी। अगर हम कोई काम शुद्ध दइृदय से करें तो अनिवार्यत: उसका असर पड़ता है। जहां राजनैतिक प्रतिद्वंद्विता से कोई काम किया गया, बहीं उस पर लोगों का संदेह हुआ। बहुत कम ऐसे हिन्दू है, विशधकर उन लोगों म॑ जो गौ-हत्या के सबसे बड़े विरोधी हैं, जिन्होंने कभी गाय पाली हो, या गौशाला में चंदा देते हों या कभी किसी गाय को एक रोटी या एक गद्गा चाग खिलाया ह। ऐसे लोग जब गौ हत्या पर बावेला पचाते हैं तो क्‍यों मुसलमानों को संदेह हो? हमें इस विषय में भाव #ी जगह बुद्धि से काम लेना चाहिए। गौ कितनी ही पवित्र हो, लेकिन मनुष्य की तुलना नहीं कर सकती। मुसलमान कितने ही गए-गुजरे हों फिर भी आदमी हैं। क्‍या अंधेर है कि हम अपने खाने के बरतनों में कुत्ते को ग्रास खिलाते हैं, लेकिन किसी मुसलमान को पानी पिलाना हो तो कुल्हड़ तलाश करते हैं ॥ कुत्ते के मुख का स्पर्श मांजने से साफ हो जाता है, लेकिन मुसलमान के मुख का स्पर्श अमिट हैं ! क्‍या ऐसी स्थिति में भी हम आशा कर सकते हैं कि कोई आत्माभिमानी मुसलमान हमसे भाईचारे का बरताव करेगा?

अब रहा धार्मिक अपमान | हमको शिकायत है कि मुसलमान हमारे धर्म की तौहोन करते हैं, मुसलमान यही आक्षेप हिन्दुओं पर ग्गाते हैं। किसी धर्म का अपमान करना, चाहे हिन्दु धर्म का या इस्लाम का, नीच और घृणित कार्य है। कोई समझदार आदमी किसी धर्म की निंदा न करेगा। इसमें कौन-सो शान घट जाती है, अगर हम बाजे बजाते हुए किसी बड़ी मस्जिद के सामने से गुज्तरें तो एक क्षण के लिए बाजा बंद कर दें, अगर मुसलमान बाजे बजाते हुए मंदिरों के सामने से आते हैं तो जाने

दो। आपकी सहृदयता उन्हें स्वयं लज्जित करके आपके धर्म का आदर करने को बाध्य करेगी।'

इन सब कारणों में कोई भी ऐसा बलवान कारण नहीं है, जिसके लिए हम आपस में लड़ मरें। मगर यहां तो सभी छोटे-बड़े नेता बनना चाहते हैं। मतविरोध को भड़काना जातीय हीरो (प्र/०) बनने का सबसे सहज नुस्खा है, कितु यह धर्म की रक्षा नहीं है। जैसा मौ० मुहम्मद अली ने कहा है, इस मामले में समाचार-पत्रों के संपादकों पर सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है। वह राष्ट्रीय सेना के नायक हैं, कौम को पार लगाना या डुबा देना दोनों की उनके हाथ में हैं। शांत विचार से काम लेने की कभी इतनी ज़रूरत न थी, जितनी कि आज है। उन्हें कलम से एक-एक शब्द निकालते हुए यह सोचना चाहिए कि इससे परस्पर विरोध तो न बढेगा। आवेश, उद्गार, उफान से यों डरिए, जैसे सांप से। केवल बुद्धि, गंभीर बुद्धि से काम लीजिए। छिठद्रान्वेषण की स्पिरिट का त्याग देना हमारे विरोध को बहुत-कुछ मिटा देगा। हमारे एक प्रौद विचार के मित्र, जो बराबर मुसलमानों के हमदर्द रहे, मौलाना मुहम्मद अली के मुख से वह ऐतिहासिक वाक्य सुनकर, जिसका महात्मा गांधी ने स्वयं समर्थन किया, मुसलमानों के कट्टर विरोधी हो गए। मौलाना के शब्दों का आशय क्या था, इसके पहले वह कितने अवसरों पर केसे विचार प्रकट कर चुके थे, उनकी $9॥ग क्‍या थी, इसको ज़रा भी विचार न किया, बस लेना-लेना करके दौड़ पड़े कि मौलाना ने महात्मा का घोर अपमान किया। राष्ट्रीयता के लिए सहिष्णुता लाज्षमी चीज़ है। बात का बतंगड़ भी हो सकता है और बतुक्का भो। बतंगड़ न बनाइए। शुद्धि और संघटन और महाबीर दल और बल की खाल निकालने से समस्या दिनों-दिन जटिल होती जाएगी। यह राष्ट्र-निर्माण का मार्ग नहीं है। यह पतन का»मार्ग है। जब द्वेष की आग दिलों में दहक रही हो तो प्रेम कहां से आए? यह हमारे इतिहास में वह नाजुक समय आ गया है, जब 'ज़रा-सी गलती, ज़रा-सी चूक, ज़रा सा आंखों का झपक जाना हमें सदियों पीछे धकेल ले जाएगा। यह शांत, अविर्चालत रहने का समय है। शिक्षा |९क्षा।का। धोखे को ट्ट्री है , जो अंग्रेजों ने हिन्दुओं को भडकाने के लिए. खड़ी की है। इसके सिवा उसका और कोई अस्तित्व नहीं है। इन चकमों में न आइए बस, सो बात की एक बात है कि सहृदयता की सहदयता उत्पन्न कर सकती हैं! हिन्दू तबलीग की आग को भड़काकर भी पेश नहीं पा सकते, क्योंकि हिन्दू औरतों को भगा ले जाने, जबरदस्ती निकाह पढा लेने और ऐसे ही दूसरे हथकडों में वे कुशल नहीं हैं। अभी बहुत दिन बाकी हैं, जब हमारा समाज-संघटन इन घटनाओं को संभावना का अंत कर टेगा। ईश्वर न करे कि हमें अपने धर्म- प्रचार के लिए गुंडेपन को शरण लेनी पड़े। वह दिन 'आर्य-धर्म' के मातम का दिन होगा। मुसलमानों में भी बहुत

। लेखक महाशय के इस सिद्धांत की सत्यता का अनुभव करते हुए भी हम यह कह देना चाहत॑ हैं कि पारस्परिक व्यवहार में परपक्ष रूप सिद्धांत को प्रथम पक्ष की कायरता समझेगा, अर्थात्‌ प्रस्तुत परिम्थिति में हिन्दुओं की उदारता निर्बलता समझी जाकर उससे अनुचित लाभ उठाने की कोशिश की जायगी। “प्रधान संपादक

कम ज़िम्मेदार आदमी ऐसे होंगे, जिन्होंने मौलाना हसन निज्ञामी का तिरस्कार न किया हो। गुण्डे बड़े काम की चीज़ हैं। इनका अपनी ही घर ढाने में दुरुपयोग न कीजिए, लेकिन अगर ऐसा अवसर आ पड़े कि हमारी महिलाओं की बेआबरूई हो रही हो तो उस वक्‍त प्राणपण से उनकी रक्षा करनी चाहिए। साहस भी सहृदयता का अंग है। कायर कभी सहृदय हो ही नहीं सकता। चोरों से रक्षा करने के लिए अपने घर को सुरक्षित रखने की जरूरत है। हमको विश्वास है कि मुसलमानों में ऐसे भाव के आदमी मौजूद हैं जिन्हें इन दुष्कृत्यों से उतनी हो घृणा हो सकती है, जितनी कि किसी हिन्दू को। ऐसे दुष्टाघातों स अपनी रक्षा के लिए हम जो करेंगे उसमें समझदार मुसलमान हमारा साथ देंगे। लर्डातयों क अखाड़ों से हमारी रक्षा नहीं होगी। हमारी रक्षा होगी अपनी मनोर्वृत्तियों को स्वार्थ स॑ हटाकर मर्यादा -रक्षा के प्रवत्त करने से। हम धन के दास हो गए है। धन के आगे हमारी दृष्टि में बहू-बेटियों की लाज का भी कोई मूल्य नहीं। इसी धन लिप्सा ने हमें कायर भीरु, अकर्मण्य बना रख्ब्रा है। जब तक हमारे चित्त की यह उत्ति रहेगी, एक क्‍या, सौ महावीर दल भी हमें दुष्टों से नहीं बचा सकते।


प्रकाशन इतिहास

[लेख। हिन्दी साप्ताहिक 'प्रताप', कानपुर कृष्णाष्टमी, संवत् 1981 (सितंबर, 1924) में प्रकाशित। 'प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य' खण्ड-2 में संकलित।]

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "हिन्दू-मुस्लिम प्रश्न." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1924, https://munshipremchand.com/works/non-fictions/hindu-muslim-prashna. Accessed 22 Sep. 2026.