Cover Image for Nabi Ka Neeti Nirvah (नबी का नीति-निर्वाह) by Munshi Premchand - Short Story
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कहानी••30 मिनट

नबी का नीति-निर्वाह

Nabi Ka Neeti Nirvah

प्रेमचंद की कहानी 'नबी का नीति-निर्वाह' हज़रत मोहम्मद के उच्च नैतिक आदर्शों, न्यायप्रियता और कर्तव्यपरायणता की एक प्रेरक गाथा है।

पात्र:हज़रत मुहम्मद, ज़ैनब, अबुलआस, ख़दीजा
स्थान:मक्का और मदीना

नबी का नीति-निर्वाह का मूल पाठ

हजरत मुहम्मद को इलहाम हुए थोड़े ही दिन हुए थे, दस-पाँच पड़ोसियों ओर निकट सम्बन्धियों के सिवा अभी ओर कोई उनके दीन पर ईमान न लाया था। यहाँ तक कि उनकी लड़की जैनब ओर दामाद अबुलआस भी, जिनका विवाह इलहाम के पहले ही हो चुका था, अभी तक नये धर्म में दीक्षित न हुए थे। जेनब कई बार अपने मेके गई थी और अपने पिता के ज्ञानोपदेश सुने थे। वह दिल से इसलाम पर श्रद्धा रखती थी, लेकिन अबुलआस के कारण दीक्षा लेने का साहस न कर सकती थी। अबुलआस विचार-स्वातन्त्य का समर्थक था। वह कुशल व्यापारी था। मक्रे से खजूर, मेवे आदि जिन्सें लेकर बन्दरगाहों को चलाना किया करता था। बहुत ही ईमानदार, लेन-देन का खरा, श्रमशील मनुष्य था, जिसे इहलोक से इतनी फुर्सत न थी कि परलोक की चिन्ता करे। जैनब के सामने कठिन समस्या थी, आत्मा धर्म की ओर थी, हृदय पति की ओर,न धर्म को छोड़ सकती थी,न पति को। घर के अन्य प्राणी मूर्तिपूजक थे और इस नये सम्प्रदाय के शत्रु। जेनब अपनी लगन को छुपाती रहती, यहाँ तक कि पति से भी

अपनी व्यथा न कह सकती। वे धार्मिक सहिष्णुता के दिन न

थे। बात-बात पर खून की नदियाँ बहती थी। खानदान के खानदान मिट जाते थे। अरब की अलोकिक वीरता पारस्परिक कलहों में व्यक्त होती थी। राजनेतिक संगठन का नाम न था। खून का बदल खून, धनहानि का बदला खून, अपमान का बदला खून-मानव रक्त ही से सभी झगड़ों का निबटारा होता था। ऐसी अवस्था में अपने धर्मानुराग को प्रकट करना अबुलआस के शक्तिशाली परिवार को मुहम्मद और उनके गिने-गिनाये अनुयायियों से टकराना था। उधर प्रेम का बन्धन पेरों को जकड़े हुए था। नये धर्म में प्रविष्ट होना अपने प्राण-प्रिय पति से सदा के लिए बिछुड़ जाना था। कुरश जाति के लोग ऐसे मिश्रित विवाहों को परिवार के लिए कलंक समझते थे। माया ओर धर्म की दुविधा में पड़ी हुई जेनब कुढ़ती रहती थी।

धर्म का अनुराग एक दुर्लभ वस्तु है, किन्तु जब उसका वेग उठता है तब बड़े प्रचण्ड रूप से उठता है। दोपहर का समय था। धूप इतनी तेज थी कि उसकी ओर ताकते हुए आँखों से चिनगारियाँ

निकलती थीं। हजरत मुहम्मद अपने मकान में चिन्तामग्न बेठे हुए थे। निराशा चारों ओर अंधकार के रूप में दिखाई देती थी। खुदेजा भी पास बेठी हुई एक फटा कुर्ता सी रही थी। धन- सम्पत्ति सब कुछ इस लगन के भेंट हो चुकी थी। विधर्मियों का दुराग्रह दिनोंदिन बढ़ता जाता था। इसलाम के अनुयायियों को भांति-भांति की यातनाएँ दी जा रही थीं। स्वयं हजरत को घर से निकलना मुश्किल था। खोफ होता था कि कहीं लोग उन पर ईंट-पत्थर न फेंकने लगें। खबर आती थी कि आज अमुक मुसलमान का घर लूटा गया, आज फलाँ को लोगों नो आहत किया। हजरत ये खबरें सुन-सुनकर विकल हो जाते थे ओर बार- बार खुदा से धैर्य ओर क्षमा की याचना करते थे।

हजरत ने फरमाया -- मुझे ये लोग अब यहाँ न रहने देंगे। में खुद सब कुछ झेल सकता हूँ पर अपने दोस्तों की तकलीफ नहीं देखी जाती।

खुदेजा -- हमारे चले जाने से तो इन बेचारों को और भी कोई शरण न रहेगी। अभी कम से कम आपके पास आकर रो तो लेते हैं। मुसीबत में रोने का सहारा कम नहीं होता।

हजरत - तो में अकेले थोड़े ही जाना चाहता हूँ। में अपने सब दोस्तों को साथ लेकर जाने का इरादा रखता हूँ। अभी हम लोग

यहाँ बिखरे हुए हैं। कोई किसी की मदद को नहीं पहुँच सकता। हम बस एक ही जगह एक कुटुम्ब की तरह रहेंगे तो किसी को

हमारे ऊपर हमला करने की हिम्मत न होगी। हम अपनी मिली

हुई शक्ति से बालू का ढेर तो हो ही सकते हैं जिस पर चढ़ने का किसी को साहस न होगा।

सहसा जेनब घर में दाखिल हुई। उसके साथ न कोई आदमी था न कोई आदमजाद, ऐसा मालूम होता था कि कहीं से भगी चली आ रही हैं। खुदेजा ने उसे गले लगाकर कहा -- क्‍या हुआ जेनब, खेरियत तो हे?

जेनब ने अपने अन्तर्न्द की कथा सुनाई ओर पिता से दीक्षा की प्रार्थना की। हजरत मुहम्मद आँखों में आँसू भरकर बोले -- जेनब, मेरे लिए इससे ज्यादा खुशी की और कोई बात नहीं हो सकती। लेकिन डरता हूँ कि तुम्हारा क्या हाल होगा।

जैनब -- या हजरत, मैंने खुदा की रूह में सब कुछ त्याग देने का निश्चय किया हैं दुनिया के लिए अपनी आकबत को नहीं खोना चाहती।

हजरत -- जेनब, खुदा की रूह में कांटे हें। जेनब -- लगन को कांटों की परवाह नहीं होती।

हजरत -- ससुराल से नाता टूट जायेगा। जेनब -- खुदा से तो नाता जुड़ जायेगा। हजरत -- और अबुलआस?

जेनब की आँखों में आँसू डबडबा आये। कातर स्वर से बोली -- अब्बाजान, इसी बेड़ी ने इतने दिनों मुझे बांधे रक्खा था, नहीं तो में कब की आपकी शरण में आ चुकी होती। में जानती हूँ, उनसे जुदा होकर जीती न रहूँगी ओर शायद उनको भी मेरा वियोग दुस्सह होगा, पर मुझे विश्वास हे कि एक दिन जरूर आयेगा जब वे खुदा पर ईमान लायेंगे ओर मुझे फिर उनकी सेवा का अवसर मिलेगा।

हजरत -- बेटी, अबुलआस ईमानदार हे, दयाशील हे, सत्यवक्ता हे,

किन्तु उसका अहंकार शायद अन्त तक उसे ईश्वर से विमुख रखे है। वह तकदीर को नहीं मानता, आत्मा को नहीं मानता, स्वर्ग और नरक को नहीं मानता। कहता है -- सृष्टि-संचालन के लिए खुदा की जरूरत ही क्‍या है? हम उससे क्‍यों डरें? विवेक ओर बुद्धि की हिदायत हमारे लिए काफी हे?” ऐसा आदमी खुदा पर ईमान नहीं ला सकता। अधर्म को जीतना आसान है पर जब वह दर्शन का रूप धारण कर लेता है तो अजय हो जाता हे।

जेनब ने निश्चयात्मक भाव से कहा -- हजरत, आत्म का उपकार जिसमें हो मुझे वह चाहिए। में किसी इन्सान को अपने ओर खुदा के बीच न रहने दूँगी।

हजरत -- खुदा तुझ पर दया करे बेटी। तेरी बातों ने दिल खुश कर दिया। यह कहकर उन्होंने जैनब को प्रेम से गले लगा दिया।

दूसरे दिन जेनब को जमा मसजिद में यथा विधि कलमा पढ़ाया गया।

कुरैशियों ने जब यह खबर पाई तब वे जल उठे। गजब खुदा का। इसलाम ने तो बड़े-बड़े घरों पर हाथ साफ करना शुरू किया। अगर यही हाल रहा तो धीरे-धीरे उसकी शक्ति इतनी बढ़ जायेगी कि उसका सामना करना कठिन हो जायगा। लोग अबुलआस के घर पर जमा हुए। अबूसिफियान ने, जो इस्लाम के शत्रुओं से सबसे प्रतिष्ठित व्यक्ति थे (ओर जो बाद को इसलाम पर ईमान लाया), अबुलआस से कहा -- तुम्हें अपनी बीवी को तलाक देना पड़ेगा।

अबुलआस - हर्गिज नहीं।

अबूसिफियान -- तो क्‍या तुम भी मुसलमान हो जाओगे? अबुलआस -- हर्गिज नहीं।

अबूसिफियान -- जो उसे मुहम्मद ही के घर रहना पड़ेगा।

अबुलआस - हर्गिज नहीं, आप मुझे आज्ञा दीजिए कि उसे अपने घर लाऊँ।

अबूसिफियान -- हर्गिज नहीं।

अबुलआस - क्या यह नहीं हो सकता कि मेरे घर में रूह कर वह अपने मतानुसार खुदा की बन्दगी करें?

अबूसिफियान -- हर्गिज नहीं।

अबुलआस - मेरी कोम मेरे साथ इतनी भी सहानुभूति न करेगी? अबूसिफियान -- हर्गिज नहीं।

अबुलआस -- तो फिर आप लोग मुझे अपने समाज से पतित कर दीजिए। मुझे पतित होना मंजूर है, आप लोग चाहें जो सजा दें, वह सब मंजूर है। पर में अपनी बीवी को तलाक नहीं दे सकता। में किसी की धार्मिक स्वाधीनता का अपहरण नहीं करना चाहता, वह

भी अपनी बीवी की।

अबूसिफियान -- कुरैश में क्या और लड़कियाँ नहीं हें? अबुलआस - जेनब की-सी कोई नहीं।

अबूसिफियान -- हम ऐसी लड़कियाँ बता सकते हैं जो चांद को लज्जित कर दें।

अबुलआस - में सोन्दर्य का उपासक नहीं।

अबूसिफियान -- ऐसी लड़कियाँ दे सकता हूँ जो गृह-प्रबन्ध में निपुण हों, बातें ऐसी करें जो मुँह से फूल झरें, भोजन ऐसा बनाये कि बीमार को भी रुचि हो, ओर सीने-पिरोने में इतनी कुशल कि पुराने कपड़े को नया कर दें।

अबुलआस - में इन गुणों में किसी का भी उपासक नहीं। में प्रेम ओर केवल प्रेम का भक्त हूँ और मुझे विश्वास है, कि जैनब का-सा प्रेम मुझे सारी दुनिया में नहीं मिल सकता।

अबूसिफियान - प्रेम होता तो तुम्हें छोड़कर दगा न करती। अबुलआस - में नहीं चाहता कि प्रेम के लिए कोई अपने आत्मस्वतान्त्र्य का त्याग करे।

अबूसिफियान -- इसका मतलब यह हे कि तुम समाज के विरोधी बनकर रहना चाहते हो। अपनी आँखों की कसम, समाज अपने

ऊपर यह अत्याचार न होने देगा, में समझाये जाता हूँ, न मानोगे तो रोओगे।

अबूसिफियान और उनकी टोली के लोग तो धमकियाँ देकर उधर गये इधर अबुलआस ने लकड़ी सम्हाली और ससुराल जा पहुँचे। शाम हो गई थी। हजरत अपने मुरीदों के साथ मगरिब की नमाज पढ़ रहे थे। अबुलआस ने उन्हें सलाम किया ओर जब तक नमाज होती रही, गौर से देखते रहे। आदमियों की कतारों का एक साथ उठना-बेठना और सिजदे करना देखकर उनके दिल पर गहरा प्रभाव पड़ रहा था। वह अज्ञात भाव से संगत के साथ बेठते, झुकते ओर खड़े हो जाते थे। वहाँ का एक-एक परमाणु इस समय ईश्वरमय हो रहा था। एक क्षण के लिए अबुलआस भी उसी भक्ति-प्रवाह में आ गये।

जब नमाज खत्म हो गई तब अबुलआस ने हजरत से कहा - में जेनब को विदा करने आया हूँ।

हजरत ने विस्मित होकर कहा -- तुम्हें मालूम नहीं कि वह खुदा ओर रसूल पर ईमान ला चुकी हे?

अबुलआस - जी हाँ, मालूम हे। हजरत -- इस्लाम ऐसे सम्बन्धों का निषेध करता हे।

अबुलआस - क्या इसका मतलब हे कि जैनब ने मुझे तलाक दे दिया?

हजरत -- अगर यही मतलब हो तो?

अबुलआस - तो कुछ नहीं, जेनब को खुदा और रसूल की

बन्दगी मुबारक हो। में एक बार उससे मिलकर घर चला जाऊँगा ओर फिर कभी आपको अपनी सूरत न दिखाऊँगा। लेकिन उस दशा में अगर कुरैश जाति आपसे लड़ने के लिए तैयार हो जाय तो इसका इलजाम मुझ पर न होगा। हाँ, अगर जैनब मेरे साथ जायगी तो कुरैश के क्रोध का भाजन में हूँगा। आप ओर आपके मुरीदों पर कोई आफत न आयेगी।

हजरत -- तुम दबाव में आकर जैनब को खुदा की तरफ से फेरने का तो यत्ञ न करोगी?

अबुलआस - मैं किसी के धर्म में विध्न डालना लज्जाजनक समझता हूँ।

हजरत - तुम्हें लोग जेनब को तलाक देने पर तो मजबूर न करेंगे?

अबुलआस - मैं जेनब को तलाक देने के पहले जिन्दगी को तलाक दे दूँगा।

हजरत को अबुलआस की बातों से इतमीनान हो यगा। आस को हरम में जेनब से मिलने का अवसर मिला। आस ने पूछा -- जैनब, में तुम्हें साथ ले चलने आया हूँ। धर्म के बदलने से कहीं तुम्हारा मन तो नहीं बदल गया?

जैनब रोती हुई पति के पैरों पर गिर पड़ी और बोली -- स्वामी, धर्म बार-बार मिलता है, हृदय केवल एक बार। में आपकी हूँ। चाहे यहाँ रहूँ, चाहे वहाँ। लेकिन समाज मुझे आपकी सेवा में रहने देगा?

अबुलआस -- यदि समाज न रहने देगा तो में समाज ही से निकल जाऊँगा। दुनिया में रहने के लिए बहुत स्थान है। रहा में, तुम खूब जानती हो कि किसी के धर्म में विध्न डालना मेरे सिद्धान्त के प्रतिकूल है।

जैनब चली तो खुदेजा ने उसे बदख्शां के लालों का एक बहुमूल्य हार विदाई में दिया।

इसलाम पर विधर्मियों के अत्याचार दिन-दिन बढ़ने लगे। अवहेलना की दशा में निकलकर उसने भय के क्षेत्र में प्रेवश किया। शत्रुओं ने उसे समूल नाश करने की आयोजना करना शुरू की। दूर-दूर के कबीलों से मदद माँगी गई। इसलाम में इतनी शक्ति न थी कि शस्त्रबल से शत्रुओं को दबा सके। हजरत मुहम्मद ने अन्त को मक्का छोड़कर मदीने की रूह ली। उनके कितने ही भक्तों ने उनके साथ हिजरत की। मदीने में पहुँचकर मुसलमानों में एक नई शक्ति, एक नई स्फूर्ति का उदय हुआ। वे निःशंक होकर धर्म का पालन करने लगे। अब पड़ोसियों से दबने ओर छिपने की जरूरत न थी। आत्मविश्वास बढ़ा। इधर भी विधर्मियों का सामना करने की तैयारियाँ होने लगी।

एक दिन अबुलआस ने आकर स्त्री से कहा -- जैनब, हमारे नेताओं ने इसलाम पर जेहाद करने की घोषणा कर दी।

जेनब ने घबराकर कहा -- अब तो वे लोग यहाँ से चले गये फिर जेहाद की क्‍या जरूरत?

अबुलआस - मक्का से चले गये, अरब से तो नहीं चले गये, उनकी ज्यादतियाँ बढ़ती जा रही हैं। जिहाद के सिवा और कोई उपाय नहीं। मेरा उस जिहाद में शरीक होना बहुत जरूरी हे।

जेनब -- अगर तुम्हारा दिल तुम्हें मजबूर कर रहा है तो शौक से जाओ लेकिन मुझे भी साथ लेते चलो।

अबुलआस - अपने साथ?

जेनब -- हाँ, में वहाँ आहत मुसलमानों की सेवा-सुश्रुषा करूँगी।

अबुलआस -- शौक से चलो।

घोर संग्राम हुआ। दोनों दलों ने खूब दिल के अरमान निकाले। भाई भाई से, मित्र मित्र से, बाप बेटे से लड़ा। सिद्ध हो गया कि धर्म का बन्धन रक्त और वीर्य के बन्धन से सुदृढ़ हे।

दोनों दल वाले वीर थे। अंतर यह था कि मुसलमानों में नया धर्मानुराग था, मृत्यु के पश्चात्‌ स्वर्ग की आशा थी, दिलों में आत्मविश्वास था जो नवजात सम्प्रदायों का लक्षण है। विधर्मियों में बलिदान का यह भाव लुप्त था।

कई दिन तक लड़ाई होती रही। मुसलमानों की संख्या बहुत कम थी, पर अन्त में उनके धर्मोत्साह ने मेदान मार लिया। विधर्मियों में अधिकांश काम आये, कुछ घायल हुए ओर कुछ केद कर लिये गये। अबुलआस भी इन्हीं केदियों में थे।

जेनब को ज्योंही यह मालूम हुआ उसने हजरत मुहम्मद की सेवा में अबुलआस का फदिया (मुक्तिधन) भैजा। यह वही बहुमूल्य हार था, जो खुदेजा ने उसे दिया था। वह अपने पिता को उस धर्म- संकट में नहीं डालना चाहती थी जो मुक्तिधन के अभाव की दशा में उन पर पड़ता। हजरत ने यह हार देखा तो खुदेजा की याद ताजी हो गई। मधुर स्मृतियों से चित्त चंचल हो उठा। अगर खुदेजा जीवित होती तो उसकी सिफारिश का असर उन पर इससे ज्यादा न होता जितना इस हार से हुआ, मानो स्वयं खुदेजा इस हार के रूप में आई थी। अबुलआस के प्रति हृदय कोमल हो गया। उसे सजा दी गई, यह हार ले लिया गया तो खुदेजा की आत्मा को कितना दुख होगा। उन्होंने केदियों की फेसला करने के लिए एक पंचायत नियुक्त कर दी थी। यद्पि पंचों में सभी हजरत के इष्ट-मित्र थे, पर इस्लाम की शिक्षा उनके दिलों में पुरानी आदतें, पुरानी चेष्टाएँ न मिटा सकी थीं। उनमें अधिकांश ऐसे थे जिनको अबुलआस से पारिवारिक द्वेष था,जो उनसे किसी पुराने खून का बदला लेना चाहते थे। इसलाम ने उन में क्षमा

ओर अहिंसा के भावों को अंकुरित न किया हो, पर साम्यवाद को उनके रोम-रोम में प्रतिष्ठ कर दिया था। वे धर्म के विषय में किसी के साथ रू-रियायत न कर सकते थे, चाहे वह हजरत का निकट सम्बन्धी ही क्‍यों न हो। अबुलआस सिर झुकाये पंचों के सामने खड़े थे ओर केदी पेश होते थे। उनके मुक्तिधन का मुलाहिजा होता था ओर वे छोड़ दिये जाते थे। अबुलआस को कोई पूछता ही न था, यद्रपि वह हार एक तश्तरी में पंचों के सम्मुख रक्खा हुआ था। हजरत के मन में बार-बार प्रबल इच्छा होती थी कि सहाबियों से कहें यह हार कितना बहुमूल्य है। पर धर्म का बन्धन, जिसे उन्होंने स्वयं प्रतिष्ठित किया था, मुँह से एक शब्द भी न निकलने देता था। यहाँ तक कि समस्त बन्दीजन मुक्त हो गये, अनुलआस अकेला सिर झुकाये खड़ा रहा -- हजरत मुहम्मद के दामाद के साथ इतना लिहाज भी न किया गया कि बेठने की आज्ञा तो दे दी जाती। सहसा जेद ने अबुलआस की ओर कटाक्ष करके कहा -- देखा, खुदा इसलाम की कितनी हिमायत करता है। तुम्हारे पास हमसे पंचगुनी सेना थी,पर खुदा ने तुम्हारा मुँह काला किया। देखा या अब भी आँखें नहीं खुर्लीं?

अबुलआस ने विरक्त भाव से उत्तर दिया -- जब आप लोग यह मानते हैं कि खुदा सबका मालिक है तब वह अपने एक बन्दे को दूसरे की गर्दन काटने में मदद न देगा। मुसलमानों ने इसलिए

विजय पायी कि गलत या सही उन्हें अटल विश्वास हे कि मृत्यु के बाद हम स्वर्ग में जायेंगे। खुदा को आप नाहक बदनाम करते हें।

जेद -- तुम्हारा मुक्ति-धन काफी नहीं हे।

अबुलआस - मैं इस हार को अपनी जान से ज्यादा कीमती समझता हूँ। मेरे घर में इससे बहुमूल्य ओर कोई वस्तु नहीं हे।

जेद -- तुम्हारे घर में जेनब हैं जिन पर ऐसे सेकड़ों हार कुर्बान किये जा सकते हें।

अबुलआस -- तो आपकी मंशा है कि मेरी बीवी मेरा फदिया हो। इससे तो यह कहीं बेहतर है कि में कत्ल कर दिया जाता। अच्छा, अगर में वह फदिया न दूँ तो?

जेद -- तो तुम्हें आजीवन यहाँ गुलामों की तरह रहना पड़ेगा। तुम हमारे रसूल के दामाद हो, इस रिश्ते से हम तुम्हारा लिहाज करेंगे, पर तुम गुलाम ही समझे जाओंगे।

हजरत मुहम्मद निकट बेठे हुए ये बातें सुन रहे थे। वे जानते थे कि जेनब और आस एक-दूसरे पर जान देते हैं। उनका वियोग दोनों ही के लिए घातक होगा। दोनों घुल-घुलकर मर जायूँगे। सहाबियों को एक बार पंच चुन लेने के बाद उनके फैसले में

दखल देना नीति-विरुद्ध था। इससे इसलाम की मर्यादा भंग होती थी। कठिन आत्मवेदना हुई। यहाँ बेठे न रह सके। उठकर अन्दर चले गये। उन्हें ऐसा मालूम हो रहा था कि जेनब की गर्दन पर तलवार फेरी जा रही हैं। जेनब की दीन, करुणापूर्ण मूर्ति आँखों के सामने खड़ी मालूम होती थी। पर मर्यादा, निर्दय, निष्ठुर मर्यादा का बलिदान माँग रही थी।

अबुलआस के सामने भी विषम समस्या थी। इधर गुलामों का अपमान था, उधर वियोग की दारुण वेदना थी।

अन्त में उन्होंने निश्चय किया, यह वेदना सहूँगा, अपमान न सहूँगा। प्रेम को गौरव पर समर्पित कर दूँगा। बोले -- मुझे आपका फेसला मंजूर है। जेनब मेरा फदिया होगी।

निश्चय किया गया कि जेद अबुलआस के साथ जाय और आबादी से बाहर ठहरे। आस घर जाकर तुरन्त जेनब को वहाँ भेज दें। आस पर इतना विश्वास था कि वे अपना वचन पूरा करेंगे।

अबुलआस घर पहुँचे तो जेनब उनसे गले मिलने दोड़ी। आस हट गये ओर कातर स्वर से बोले -- नहीं जेनब, में तुमसे गले न मिलूँगा। में तुम्हें अपने फदिये के रूप में दे आया। अब मेरा तुमसे कोई सम्बन्ध नहीं हे। यह तुम्हारा हार है, ले लो, और फौरन यहाँ से चलने की तेयारी करो। जेद तुम्हें लेने को आये हैं।

जेनब पर वज्-सा गिर पड़ा। पेर बंध गये, वहीं चित्र की भांति खड़ी रह गयी। वज्र ने रक्त को जला दिया, आँसुओं को सुखा दिया, चेतना ही न रही, रोती ओर बिलखती क्‍या। एक क्षण के बाद उसने एक बार माथा ठोका-निर्दय तकदीर के सामने सिर झुका दिया। चलने को तैयार हो गयी। घोर नेराश्य इतना दुखदायी नहीं होता जितना हम समझते हें। उसमें एक रसहीन शान्ति होती है। जहां सुख की आशा नहीं वहाँ दुख का कष्ट कहाँ।

मदीने में रसूल की बेटी की जितनी इज्जत होनी चाहिए उतनी होती थी। वह पितागृह की स्वामिनी थी। धन था, मान था, गौरव था, धर्म था, प्रेम न था। आँख में सब कुछ था, केवल पुतली न थी। पति के वियोग में रोया करती थी। जिन्दा थी, मगर जिन्दा दरागोर। तीन साल तीन युगों की भांति बीते। घण्टे,दिन और

वर्ष साधारण व्यवहारों के लिए हे प्रेम के यहाँ समय का माप कुछ ओर ही हे।

उधर अबुलआस द्विगुण उत्साह के साथ धनोपार्जन में लीन हुआ, महीनों घर न आता, हँसना-बोलना सब भूल गया। धन ही उसके जीवन का एक मात्र आधार था; उसके प्रणय-बंचित हृदय को किसी विस्मृतिकारक वस्तु की चाह थी। नेराश्य ओर चिन्ता बहुधा शराब से शान्त होती हे, प्रेम उन्‍्माद से। अबुलआस को धनोम्माद हो गया। धन के आवरण में छिपा हुआ वियोग-दुख था, माया के पर्दे में छिपा हुआ प्रेम-वेराग्य ।

जाड़ों के दिन थे। नाड़ियों में रूघिर जमा जाता था। अबुलआस मक्का से माल लादकर एक काफिले के साथ चला। रकफों का एक दल भी साथ था। कुरेशियों ने मुसलमानों के कई काफिले लूट लिये थे। अबुलआस को संशय था कि मुसलमानों के कई काफिले लूट लिये थे। अबुलआस को संशय था कि मुसलमानों का आक्रमण होगा, इसलिए उन्होंने मदीने की राह छोड़ एक दूसरा रास्ता अख्तियार किया। पर दुदेव, मुसलमानों को टोह मिल ही गयी। जेद ने सत्तर चुने हुए आदमियों के साथ काफिले पर धावा कर दिया। धन के भक्त धर्म के सेवकों से कया बाजी ले जाते। सत्तर के सात सो को मार भगाया। कुछ मरे, अधिकांश

भागे, कुछ केद हो गये। मुसलमानों को अतुल धन हाथ लगा। केदी घाते में मिले। अबुलआस फिर केद हो गया।

केदियों के भाग्य-निर्णय के लिए नीति के अनुसार पंचायत चुनी गयी। जेनब को यह खबर मिली तो आशाएँ जाग उठीं; आशा मरती नहीं केवल सो जाती है। पिंजरे में बन्द पक्षी की भांति तड़फड़ाने लगी, पर क्‍या करे, किससे कहे, अबकी तो फदिये का भी कोई ठिकाना न था। या खुदा क्‍या होगा?

पंचों ने अबकी हजरत मुहम्मद ही को अपना प्रधान बनाया। हजरत ने इनकार किया, पर अन्त में उनके आग्रह से विवश हो गये।

अबुलआस सिर झुकाये बेठे हुए थे। हजरत ने एक बार उन पर करुणा-सूचक दृष्टि डाली,फिर सिर झुका लिया।

पंचायत शुरू हुई। अन्य केदियों के घरों से मुक्तिधन आ गया था। वे मुक्त किये गये। अबुलआस के घर से मुक्तिधन न आया था। हजरत ने हुक्म दिया -- इनका सारा माल और असबाब

जब्त कर लिया जाय ओर ये उस वक्त तक बन्दी रहें जब तक इन्हें कोई छुड़ाने न आये। उनके अंतिम शब्द ये थे -- अबुलआस, इसलाम की रणनीति के अनुसार तुम गुलाम हो। तुम्हें बाजार में बेचकर रुपया मुसलमानों में तकसीम होना चाहिए था। पर तुम ईमानदार आदमी हो, इसलिए तुम्हारे साथ इतनी रिआयत की गयी।

जेनब दरवाजे के पास आड़ में बेठी हुई थी। हजरत का यह फैसला सुनकर रो पड़ी, तब घर से बाहर निकल आयी ओर अबुलआस का हाथ पकड़कर बोली -- अगर मेरा शोहर गुलाम है तो में उसकी लोंडी हूँ। हम दोनों साथ बिकेंगे या साथ केद होंगे।

हजरत -- जैनब, मुझे लज्जित मत करो, में वही कर रहा हूँ जो मेरा कर्त्तव्य है; न्याय पर बेठने वाले मनुष्य को प्रेम और द्वेष दोनों ही से मुक्त होना चाहिए। यद्यपि इस नीति का संस्कार मेंने ही किया है, पर अब में उसका स्वामी नहीं, दास हूँ। अबुलआस से मुझे जितना प्रेम है यह खुदा के सिवा ओर कोई नहीं जान सकता। यह हुक्म देते हुए मुझे जितना मानसिक और आत्मिक कष्ट हो रहा है उसका अनुमान हर एक पिता कर सकता हे। पर खुदा का रसूल न्याय और नीति को अपने व्यक्तिगत भावों से कलंकित नहीं कर सकता।

सहाबियों ने हजरत की न्याय-व्याख्या सुनी तो मुग्ध हो गये। अबू जफर ने अर्ज की -- हजरत, आपने अपना फैसला सुना दिया, लेकिन हम सब इस विषय में सहमत हैं कि अबुलआस जेसे प्रतिष्ठित व्यक्ति के यह दण्ड न्‍्यायोचित होते हुए भी अति कठोर है ओर हम सर्वसम्मति से उसे मुक्त करते हें ओर उसका लूटा हुआ धन लोटा देने की आज्ञा माँगते हें।

अबुलआस हजरत मुहम्मद की न्‍्यायपरायणता पर चकित हो गये। न्याय का इतना ऊँचा आदर्श! मर्यादा का इतना महत्व! आह, नीति पर अपना सन्‍्तान-प्रेम तक न्‍योछावर कर दिया! महात्मा, तुम धन्य हो। ऐसे ही ममता-हीन सत्पुरुषों से संसार का कल्याण होता है। ऐसे ही नीतिपालकों के हाथों जातियाँ बनती हें, सभ्यताएँ परिष्कृत होती हें।

मक्के आकर अबुलआस ने अपना हिसाब-किताब साफ किया, लोगों के माल लोटाये, ऋण चुकाये, ओर धन-बार त्यागकर हजरत मुहम्मद की सेवा में पहुँच गये।

जैनब की मुराद पूरी हुई।


नबी का नीति-निर्वाह का सारांश

'नबी का नीति-निर्वाह' हज़रत मुहम्मद के सर्वोच्च नैतिक आदर्शों, अटूट न्यायप्रियता, निष्पक्षता और कर्तव्यबोध पर आधारित एक अत्यंत प्रेरक कहानी है।

कहानी मक्का और मदीना की पृष्ठभूमि पर रचित है। हज़रत मुहम्मद की पुत्री ज़ैनब का विवाह इलहाम (ईश्वरीय संदेश) से पूर्व मक्का के एक ईमानदार और विचार-स्वातंत्र्य के समर्थक व्यापारी अबुलआस से हुआ था। जब हज़रत मुहम्मद ने इस्लाम का प्रचार शुरू किया, तो ज़ैनब ने सहर्ष इस्लाम स्वीकार कर लिया। परंतु अबुलआस अपने पूर्वजों के धर्म पर ही टिका रहा। इसके बावजूद वह अपनी पत्नी के धार्मिक अधिकारों का सम्मान करता है और कुरैश के नेताओं (जैसे अबू सुफियान) के दबाव के बाद भी ज़ैनब को तलाक देने से स्पष्ट इनकार कर देता है।

जब मक्का में मुसलमानों पर अत्याचार बढ़ते हैं, तो हज़रत मुहम्मद मदीना हिजरत (प्रस्थान) कर जाते हैं। बाद में मुसलमानों और मक्का के विधर्मियों के बीच युद्ध होता है। अबुलआस अपनी जाति की ओर से युद्ध में शामिल होता है और मुसलमानों द्वारा बंदी बना लिया जाता है। ज़ैनब अपने पति की मुक्ति (फदिया) के लिए अपनी मृत माता ख़दीजा का दिया बहुमूल्य लाल (माणिक) का हार भेजती है। हज़रत मुहम्मद अपनी पत्नी की निशानी देखकर भावुक हो उठते हैं, परंतु न्याय के लिए गठित पंचायत के निर्णय में हस्तक्षेप नहीं करते। अबुलआस स्वाभिमान की खातिर ज़ैनब को मदीना भेजने की शर्त स्वीकार करके मुक्त होता है। दोनों पति-पत्नी वियोग का भयंकर दुख सहते हैं।

तीन वर्ष बाद, अबुलआस के व्यापारिक काफ़िले पर मुसलमान फिर हमला करते हैं और अबुलआस दोबारा बंदी बना लिया जाता है। इस बार बंदियों का न्याय करने के लिए हज़रत मुहम्मद को पंचायत का प्रधान बनाया जाता है। अबुलआस के पास इस बार मुक्तिधन देने के लिए कुछ नहीं था। हज़रत मुहम्मद अपने दामाद के प्रति व्यक्तिगत प्रेम और ज़ैनब के दुख को जानते हुए भी कानून और न्याय के नियमों से रत्ती भर नहीं डिगते। वे निष्पक्ष होकर आदेश देते हैं कि अबुलआस की संपत्ति जब्त की जाए और उसे बंदी बनाकर रखा जाए।

जब ज़ैनब रोती हुई अपने पिता के फैसले के सामने आकर अपने पति के साथ बांदी बनने को तैयार होती है, तो हज़रत मुहम्मद कहते हैं—"न्याय के पद पर बैठने वाले मनुष्य को प्रेम और द्वेष दोनों से मुक्त होना चाहिए। मैं नीति का स्वामी नहीं, दास हूँ। एक पिता के रूप में मुझे भयंकर कष्ट हो रहा है, पर खुदा का रसूल न्याय को अपने व्यक्तिगत भावों से कलंकित नहीं कर सकता।"

हज़रत मुहम्मद के इस उच्च नैतिक आदर्श और न्याय-निष्ठा से प्रभावित होकर सहाबी (साथी) सर्वसम्मति से अबुलआस को मुक्त करने और उसका धन लौटाने का निर्णय लेते हैं। हज़रत मुहम्मद के इस अनुपम त्याग और न्यायपरायणता से अबुलआस का हृदय परिवर्तित हो जाता है। वह मक्का जाकर अपना पूरा हिसाब-किताब चुकता करके, धन त्यागकर मदीना आता है और सहर्ष इस्लाम स्वीकार कर लेता है। इस प्रकार ज़ैनब की मनोकामना पूर्ण होती है।


प्रकाशन इतिहास

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महत्त्व और विषय-विमर्श

  • निष्पक्ष न्याय और नीति-पालन: कहानी हज़रत मुहम्मद के चरित्र के माध्यम से यह संदेश देती है कि सच्चा न्यायधीश वह है जो न्याय के पद पर बैठकर अपने व्यक्तिगत संबंधों, पुत्र-मोह या दामाद-प्रेम से ऊपर उठकर निष्पक्ष न्याय करे।
  • धार्मिक सहिष्णुता और विचार-स्वातंत्र्य: अबुलआस का चरित्र यह दर्शाता है कि भिन्न धार्मिक विचारों के बावजूद दाम्पत्य जीवन में एक-दूसरे के विचारों का सम्मान करना और धार्मिक स्वतंत्रता देना सच्चे मानवीय गुणों की पहचान है।
  • पति-पत्नी का निस्वार्थ प्रेम और त्याग: ज़ैनब और अबुलआस का प्रेम केवल शारीरिक आकर्षण या सांसारिक सुख तक सीमित नहीं है। दोनों एक-दूसरे के स्वाभिमान, धर्म और आदर्शों की रक्षा के लिए वियोग का दारुण दुख सहने को तैयार रहते हैं।
  • हृदय-परिवर्तन का आध्यात्मिक प्रभाव: अबुलआस का परिवर्तन किसी डर या दबाव से नहीं, बल्कि हज़रत मुहम्मद की उच्च न्याय-निष्ठा और नैतिक चरित्र से प्रभावित होकर स्वतःस्फूर्त रूप से होता है।
  • कहानी का व्यापक महत्त्व: 'नबी का नीति-निर्वाह' प्रेमचंद की सर्वधर्म समभाव और नैतिक मूल्यों पर आधारित महान कहानियों में से एक है। यह रचना स्पष्ट करती है कि धर्म का वास्तविक अर्थ कर्म की पवित्रता, न्याय की निष्पक्षता और कर्तव्य के प्रति पूर्ण समर्पण में निहित है।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "नबी का नीति-निर्वाह." *Munshi Premchand Digital Archive*, https://munshipremchand.com/works/short-stories/nabi-ka-neeti-nirvah. Accessed 22 Sep. 2026.