Cover Image for Dehaton Mein Propaganda Ki Zaroorat (देहातों में प्रोपेगैंडा की ज़रूरत) by Munshi Premchand - Non-Fiction
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सम्पादकीय•1930•2 मिनट

देहातों में प्रोपेगैंडा की ज़रूरत

Dehaton Mein Propaganda Ki Zaroorat

नमक सत्याग्रह के दौरान स्वतंत्रता आंदोलन और राजनीतिक चेतना को शहरों से आगे देश के गांवों तक पहुंचाने की आवश्यकता पर प्रेमचंद का सम्पादकीय।

Work Details

प्रकार: सम्पादकीय
वर्ष: 1930
पठन समय: 2 मिनट (210 शब्द)

अब तक हमारे आन्दोलन शहरों तक ही महदुद रहे हैं, लकिन नमक-कर- भए देहातों में भो जा पहुंचा ह। सत्याग्रही दलों का दहातां से पेदल तिकलना एसा प्रोपेगेण्डा है ,! जसक॑ महत्त्व का अनुमान नहीं किया जा सकता। नोकरशाही का आतंक देहातों पर शहरों से कहीं ज्यादा छाया हुआ है। वहां सब-इंस्पेक्टर का दर्जा ईएवर से कुछ ही कम होता है और कांस्टेबुल तो खुदमुख्तार बादशाह ही है। कोई आन्दोलन, जिससे पुलिस क॑ गरोब दाब में फर्क पड़े, उसको हवा भी वहां नहीं पहुंचने पाती। मगर अब समय आ गया है कि हमारे स्वयंसेवक बड़ी संख्या में देहातों में पहुंचे और जलसों और जुलूसों से लोगों में राजनैतिक भाव भरें और उन्हें आने वाले महामंग्राम के लिए तैयार करें। अगर दहातों में यह आग लग गई, तो फिर किसी के बुझाए न बुझेगी। हम यह मानते हैं कि देहातों में नौकरशाही दमन के कडर- से -कठोर शस्त्रों का प्रहार करेगी, जमींदारों को भड़काएगी, तरह-तरह की गलतफहमियां फेलाएगी, पर हमें इन कठिनाइयों का सामना करना है। हमें यह समझा देना ८ कि इस राज्य में सबसे ज्यादा

हमारे देहात ही सताये जाते हैं, और स्वराज्य में सबसे ज्यादा हित देहात वालों ही का सिद्ध होगा।


प्रकाशन इतिहास

[सम्पादकीय। 'हंस', अप्रैल, 1930 में प्रकाशित। 'प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य' खण्ड-2 में संकलित।]

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "देहातों में प्रोपेगैंडा की ज़रूरत." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1930, https://munshipremchand.com/works/non-fictions/dehaton-mein-propaganda-ki-zaroorat. Accessed 22 Sep. 2026.