Cover Image for Vichitra Holi (विचित्र होली) by Munshi Premchand - Short Story
Cover Image for Vichitra Holi (विचित्र होली) by Munshi Premchand - Short Story
कहानी•1921•18 मिनट

विचित्र होली

Vichitra Holi

प्रेमचंद की 'विचित्र होली' औपनिवेशिक सत्ता, अंग्रेज़परस्ती और राष्ट्रीय चेतना के जागरण पर केंद्रित तीखा राजनीतिक व्यंग्य है। होली के दिन अंग्रेज़ कलेक्टर मिस्टर क्रास शिकार पर गए हुए हैं और उनके भारतीय नौकर उनके बंगले के भोजन-कक्ष में स्वतंत्र होकर होली मनाने लगते हैं। खानसामा शेख नूरअली घोषणा करता है कि अब वह गुलामी नहीं करेगा और सबको शराब, गीत और नृत्य के लिए बुलाता है। अंग्रेज़ों का सहयोगी सेठ उजागरमल यह समझकर इस उत्सव में शामिल हो जाता है कि साहब ने स्वयं इसकी अनुमति दी है। क्रास लौटता है तो नौकर उसे रंग और कालिख से रंग देते हैं और वह उन्हें कोड़े से पीटता है। उजागरमल भी अपमानित होकर भागता है। यह अनुभव उसके भीतर औपनिवेशिक सत्ता के प्रति गहरा मोहभंग पैदा करता है। वह सीधे कांग्रेस की सभा में पहुँचता है, जहाँ हिंदू-मुसलमान और विभिन्न सामाजिक समूह मिलकर होली मना रहे हैं। वहाँ वह सार्वजनिक रूप से अंग्रेज़ी सत्ता के सहयोग से तौबा करता है और अपना तन-मन-धन राष्ट्रीय आंदोलन को समर्पित करने की घोषणा करता है। प्रेमचंद होली के हास्य और उन्मुक्तता को राजनीतिक मुक्ति के रूपक में बदल देते हैं।

पात्र:शेख नूर अली, सेठ उजागरमल, मिस्टर ए. बी. क्रास, घसीटे, साहब के भारतीय नौकर, कांग्रेस समिति के सदस्य
स्थान:उत्तर भारत के एक शहर में ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारी का बंगला और कांग्रेस का जलसा, होली के अवसर पर

विचित्र होली का मूल पाठ

होली का दिन था; मिस्टर ए.बी. क्रास शिकार खेलने गये हुए थे। साईस, अर्दली, मेहतर, भिश्ती, ग्वाला, धोबी सब होली मना रहे थे। सबों ने साहब के जाते ही खूब गहरी भंग चढ़ायी थी और इस समय बगीचे में बैठे हुए होली, फाग गा रहे थे। पर रह-रहकर बँगले के फाटक की तरफ झाँक लेते थे कि साहब आ तो नहीं रहे हैं। इतने में शेख नूरअली आकर सामने खड़े हो गये।

साईस ने पूछा- कहो खानसामाजी, साहब कब आयेंगे?

नूरअली बोला- उसका जब जी चाहे आये, मेरा आज इस्तीफा है। अब इसकी नौकरी न करूँगा।

अर्दली ने कहा- ऐसी नौकरी फिर न पाओगे। चार पैसे ऊपर की आमदनी है। नाहक छोड़ते हो।

नूरअली- अजी, लानत भेजो ! अब मुझसे गुलामी न होगी। यह हमें जूतों से ठुकरायें और हम इनकी गुलामी करें ! आज यहाँ से डेरा कूच है। आओ, तुम लोगों की दावत करूँ। चले आओ कमरे में आराम से मेज पर डट जाओ, वह बोतलें पिलाऊँ कि जिगर ठंडा हो जाय।

साईस- और जो कहीं साहब आ जायँ?

नूरअली- वह अभी नहीं आने का। चले आओ।

साहबों के नौकर प्रायः शराबी होते हैं। जिस दिन से साहब के यहाँ गुलामी लिखायी, उसी दिन से यह बला उनके सिर पड़ जाती है। जब मालिक स्वयं बोतल-की-बोतल उँड़ेल जाता हो, तो भला नौकर क्यों चूकने लगे। यह निमंत्रण पाकर सब-के-सब खिल उठे। भंग का नशा चढ़ा ही हुआ था। ढोल-मंजीरे छोड़-छाड़कर नूरअली के साथ चले और साहब के खाने के कमरे में कुर्सियों पर आ बैठे। नूरअली ने ह्विस्की की बोतल खोलकर ग्लास भरे और चारों ने चढ़ाना शुरू कर दिया। ठर्रा पीनेवालों ने जब यह मजेदार चीजें पायीं तो ग्लास लुढ़काने लगे। खानसामा भी उत्तेजित करता जाता था। जरा देर में सबों के सिर फिर गये। भय जाता रहा। एक ने होली छेड़ी, दूसरे ने सुर मिलाया। गाना होने लगा। नूरअली ने ढोल-मजीरा लाकर रख दिया। वहीं मजलिस जम गयी। गाते-गाते एक उठकर नाचने लगा। दूसरा उठा। यहाँ तक कि सब-के-सब कमरे में चौकड़ियाँ भरने लगे। हू-हक मचने लगा। कबीर, फाग, चौताल, गाली-गलौज, मार-पीट बारी-बारी सबका नम्बर आया। सब ऐसे निडर हो गये थे, मानो अपने घर में हैं। कुर्सियाँ उलट गयीं। दीवारों पर की तसवीरें टूट गयीं। एक ने मेज उलट दी। दूसरे ने रिकाबियों को गेंद बनाकर उछालना शुरू किया।

यहाँ यही हंगामा मचा हुआ था कि शहर के रईस लाला उजागरमल का आगमन हुआ। उन्होंने यह कौतुक देखा तो चकराये। खानसामा से पूछा- यह क्या गोलमाल है शेखजी, साहब देखेंगे तो क्या कहेंगे?

नूरअली- साहब का हुक्म ही ऐसा है तो क्या करें। आज उन्होंने अपने नौकरों की दावत की है, उनसे होली खेलने को भी कहा है। सुनते हैं, लाट साहब के यहाँ से हुक्म आया है कि रिआया के साथ खूब रब्त-जब्त रखो, उनके त्योहारों में शरीक हो। तभी तो यह हुक्म दिया है, नहीं तो इनके मिज़ाज ही न मिलते थे। आइए, तशरीफ रखिए। निकालूँ कोई मजेदार चीज ! अभी हाल में विलायत से पारसल आया है।

सेठ उजागरमल बड़े उदार विचारों के मनुष्य थे। अँग्रेजी दावतों में बेधड़क शरीक होते थे, रहन-सहन भी अंग्रेजी ही था और यूनियन क्लब के तो वह एकमात्र कर्त्ता ही थे, अँग्रेजों से उनकी खूब छनती थी और मिस्टर क्रास तो उनके परम मित्र ही थे। जिलाधीश से, चाहे वह कोई हो, सदैव उनकी घनिष्ठता रहती थी। नूरअली की बातें सुनते ही एक कुर्सी पर बैठ गये और बोले- अच्छा ! यह बात है? हाँ, तो फिर निकालो कोई मजेदार चीज ! कुछ गजल भी हो।

नूरअली- हजूर, आपके लिए सबकुछ हाजिर है।

लाला साहब कुछ तो घर ही से पीकर चले थे, यहाँ कई ग्लास चढ़ाये तो जबान लड़खड़ाते हुए बोले- क्यों नूरअली, आज साहब होली खेलेंगे?

नूरअली- जी हाँ।

उजागर- लेकिन मैं रंग-वंग तो लाया नहीं। भेजो चटपट किसी को मेरी कोठी से रंग-पिचकारी वगैरह लाये। (साईस से) क्यों घसीटे, आज तो बड़ी बहार है।

घसीटे- बड़ी बहार है, बहार है, होली है !

उजागर- (गाते हुए) आज साहब के साथ मेरी होली मचेगी, आज साहब के साथ मेरी होली मचेगी, खूब पिचकारी चलाऊँगा।

घसीटे- खूब अबीर लगाऊँगा।

ग्वाला- खूब गुलाल उड़ाऊँगा।

धोबी- बोतल-पर-बोतल चढ़ाऊँगा।

अरदली- खूब कबीरे सुनाऊँगा।

उजागर- आज साहब के साथ मेरी होली मचेगी।

नूरअली- अच्छा, सब लोग सँभल जाओ। साहब का मोटर आ रहा है। सेठजी, यह लीजिए, मैं दौड़कर रंग-पिचकारी लाया, बस एक चौताल छेड़ दीजिए और जैसे ही साहब कमरे में आयें, उन पर पिचकारी छोड़िए और (दूसरे से) तुम लोग भी उनके मुँह में गुलाल मलो, साहब मारे खुशी के फूल जायेंगे। वह लो, मोटर हाते में आ गया। होशियार!

2

मिस्टर क्रास अपनी बंदूक हाथ में लिये मोटर से उतरे और लगे आदमियों को बुलाने; पर वहाँ तो जोरों से चौताल हो रहा था, सुनता कौन है। चकराये, यह मामला क्या है। क्या सब मेरे बँगले में गा रहे हैं? क्रोध से भरे हुए बँगले में दाखिल हुए तो डाइनिंगरूम (भोजन करने के कमरे में) से गाने की आवाज आ रही थी। अब क्या था? जामे से बाहर हो गये। चेहरा विकृत हो गया। हंटर उतार लिया और डाइनिंगरूम की ओर चले; लेकिन अभी तक एक कदम दरवाजे के बाहर ही था कि सेठ उजागरमल ने पिचकारी छोड़ी। सारे कपड़े तर हो गये। आँखों में भी रंग घुस गया। आँखें पोंछ ही रहे थे कि साईस, ग्वाला सब-के-सब दौड़े और साहब को पकड़कर उनके मुँह में रंग मलने लगे। धोबी ने तेल और कालिख का पाउडर लगा दिया ! साहब के क्रोध की सीमा न रही, हंटर लेकर सबों को अंधाधुंध पीटने लगा। बेचारे सोचे हुए थे कि साहब खुश होकर इनाम देंगे। हंटर पड़े तो नशा हिरन हो गया। कोई इधर भागा, कोई उधर। सेठ उजागरमल ने यह रंग देखा तो ताड़ गये कि नूरअली ने झाँसा दिया। एक कोने में दबक रहे। जब कमरा नौकरों से खाली हो गया, तो साहब उनकी ओर बढ़े। लाला साहब के होश उड़ गये। तेजी से कमरे के बाहर निकले और सिर पर पैर रखकर बेतहाशा भागे। साहब उनके पीछे दौड़े। सेठजी की फिटन फाटक पर खड़ी थी। घोड़े ने धम-धम खटपट सुनी तो चौंका। कनौतियाँ खड़ी कीं और फिटन ले भागा। विचित्र दृश्य था। आगे-आगे फिटन, उसके पीछे सेठ उजागरमल, उनके पीछे हंटरधारी मिस्टर क्रास। तीनों बगटुट दौड़े चले जाते थे। सेठजी एक बार ठोकर खाकर गिरे, पर साहब के पहुँचते-पहुँचते सँभलकर उठे। हाते के बाहर सड़क तक घुड़दौड़ रही। अंत में साहब रुक गये। मुँह में कालिख लगाये अब और आगे जाना हास्यजनक मालूम हुआ। यह विचार भी हुआ कि सेठजी को काफी सजा मिल चुकी। अपने नौकरों की खबर लेना भी जरूरी था। लौट गये। सेठ उजागरमल के जान में जान आयी। बैठकर हाँफने लगे। घोड़ा भी ठिठक गया। कोचवान ने उतरकर उन्हें सँभाला और गोद में उठाकर गाड़ी पर बैठा दिया।

3

लाला उजागरमल शहर सहयोगी समाज के नेता थे। उन्हें अँग्रेजों की भावी शुभकामनाओं पर पूर्णविश्वास था। अँग्रेजी राज्य की तामीली, माली और मुल्की तरक्की के राग गाते रहते थे। अपनी वक्तृताओं में सहयोगियों को खूब फटकारा करते थे। अँग्रेजों में इधर उनका आदर-सम्मान विशेष रूप से होने लगा था। कई बड़े-बड़े ठेके, जो पहले अँग्रेज ठेकेदारों ही को मिला करते थे उन्हें दिये गये थे। सहयोग ने उनके मान और धन को खूब बढ़ाया था, अतएव मुँह से चाहे वह असहयोग की कितनी ही निन्दा करें, पर मन में उसकी उन्नति चाहते थे। उन्हें यकीन था कि असहयोग एक हवा है, जब तक चलती रहे उसमें अपने गीले कपड़े सुखा लें। वह असहयोगियों के कृत्यों का खूब बढ़ा-बढ़ा कर बयान किया करते थे, और अधिकारियों के कृत्यों को इन गढ़ी हुई बातों पर विश्वास करते देखकर दिल में उन पर खूब हँसते थे। ज्यों-ज्यों सम्मान बढ़ता था, उनका आत्माभिमान भी बढ़ता था। वह अब पहले की भाँति भीरु न थे। गाड़ी पर बैठे और जरा साँस फूलना बंद हुआ, तो इस घटना की विवेचना करने लगे। अवश्य नूरअली ने मुझे धोखा दिया, उसकी असहयोगियों से भी मिलीभगत है। यह लोग होली नहीं खेलते तो इनका इतना क्रोधोन्मत्त होना इसके सिवाय और क्या बतलाता है कि हमें यह लोग कुत्तों से बेहतर नहीं समझते। इनको अपने प्रभुत्व का कितना घमंड है ! यह मेरे पीछे हंटर लेकर दौड़े ! अब विदित हुआ कि यह जो मेरा थोड़ा-बहुत सम्मान करते थे, वह केवल धोखा था। मन में यह हमें अब नीच और कमीना समझते हैं, लाल रंग कोई बाण नहीं था। हम बड़े दिनों में गिरजे जाते हैं, इन्हें डालियाँ देते हैं। वह हमारा त्योहार नहीं है। पर, यह जरा-सा रंग छोड़ देने पर इतना बिगड़ उठा ! हा ! इतना अपमान ! मुझे उसके सामने ताल ठोककर खड़ा हो जाना चाहिए था। भागना कायरता थी। इसी से यह सब शेर हो जाते हैं। कोई संदेह नहीं कि यह सब हमें मिलाकर असहयोगियों को दबाना चाहते हैं। इनकी यह विनयशीलता और सज्जनता केवल अपना मतलब गाँठने के लिए है। इनकी निरंकुशता, इतना गर्व वही है, जरा भी अंतर नहीं।

सेठजी के हृद्गत भावों ने उग्र रूप धारण किया। मेरी यह अधोगति ! अपने अपमान की याद रह-रहकर उनके चित्त को विह्वल कर रही थी। यह मेरे सहयोग का फल है। मैं इसी योग्य हूँ। मैं उनकी सौहार्दपूर्ण बातें सुन-सुन फूला न समाता था। मेरी मंदबुद्धि को इतना भी न सूझता था कि स्वाधीन और पराधीन में कोई मेल नहीं हो सकता। मैं असहयोगियों की उदासीनता पर हँसता था। अब मालूम हुआ कि वे हास्यास्पद नहीं हैं, मैं स्वयं निंदनीय हूँ।

वह अपने घर न जाकर सीधे कांग्रेस कमेटी के कार्यालय की ओर लपके। वहाँ पहुँचे तो एक विराट सभा देखी। कमेटी ने शहर में छूत-अछूत, छोटे-बड़े, सबको होली का आनंद मनाने के लिए निमंत्रित किया। हिंदू-मुसलमान साथ-साथ बैठे हुए प्रेम से होली खेल रहे थे। फल-भोज का भी प्रबंध किया गया था। इस समय व्याख्यान हो रहा था। सेठजी गाड़ी से तो उतरे, पर सभा स्थल में जाते संकोच होता था। ठिठकते हुए धीरे से जाकर एक ओर खड़े हो गये। उन्हें देखकर लोग चौंक पड़े। सब-के-सब विस्मित होकर उनकी ओर ताकने लगे। यह खुशामदियों के आचार्य आज यहाँ कैसे भूल पड़े? इन्हें तो किसी सहयोगी सभा में राज-भक्ति का प्रस्ताव पास करना चाहिए था। शायद भेद लेने आये हैं कि ये लोग क्या कर रहे हैं। उन्हें चिढ़ाने के लिए लोगों ने कहा- कांग्रेस की जय!

उजागरमल ने उच्च स्वर से कहा- असहयोग की जय !

फिर ध्वनि हुई- खुशामदियों की क्षय !

सेठजी ने उच्च स्वर से कहा- जी हुजूरों की क्षय !

यह कहकर वह समस्त उपस्थित जनों को विस्मय में डालते हुए मंच पर जा पहुँचे और गम्भीर भाव से बोले- सज्जनो, मित्रो ! मैंने अब तक आपसे असहयोग किया था उसे क्षमा कीजिए। सच्चे दिल से आपसे क्षमा माँगता हूँ। मुझे घर का भेदी, जासूस या विभीषण न समझिए। आज मेरी आँखों के सामने से परदा हट गया। आज इस पवित्र प्रेममयी होली के दिन मैं आपसे प्रेमालिंगन करने आया हूँ। अपनी विशाल उदारता का आचरण कीजिए। आपसे द्रोह करने का आज मुझे दंड मिल गया। जिलाधीश ने आज मेरा घोर अपमान किया। मैं वहाँ से हंटरों की मार खाकर आपकी शरण आया हूँ। मैं देश का द्रोही था, जाति का शत्रु था। मैंने अपने स्वार्थ के वश, अपने अविश्वास के वश देश का बड़ा अहित किया, खूब काँटे बोये। उनका स्मरण करके ऐसा जी चाहता है कि हृदय के टुकड़े-टुकड़े कर दूँ। ख् एक आवाज- हाँ, अवश्य कर दीजिये, आपसे न बने तो मैं तैयार हूँ (प्रधान की आवाज)- यह कटु वाक्यों का अवसर नहीं है। , नहीं, आपको यह कष्ट उठाने की जरूरत नहीं, मैं स्वयं यह काम भली-भाँति कर सकता हूँ; पर अभी मुझे बहुत कुछ प्रायश्चित्त करना है, जाने कितने पापों की पूर्ति करनी है। आशा करता हूँ कि जीवन के बचे हुए दिन इसी प्रायश्चित्त करने में, यही मुँह की कालिमा धोने में काटूँ। आपसे केवल इतनी ही प्रार्थना है कि मुझे आत्मसुधार का अवसर दीजिए। मुझ पर विश्वास कीजिए और मुझे अपना दीन सेवक समझिए। मैं आज से अपना तन, मन, धन सब आप पर अर्पण करता हूँ।


विचित्र होली का सारांश

'विचित्र होली' औपनिवेशिक सत्ता, अंग्रेज़परस्ती (जी-हुज़ूरी) और भारतीय रईसों के राष्ट्रीय चेतना के जागरण पर केंद्रित प्रेमचंद की एक तीखी राजनीतिक व्यंग्य-कथा है। कहानी की शुरुआत होली के दिन होती है, जब ब्रिटिश कलेक्टर मिस्टर ए.बी. क्रास शिकार पर गए हुए हैं। उनकी अनुपस्थिति में उनके भारतीय नौकर (खानसामा नूरअली, साईस घसीटे, अर्दली, मेहतर, ग्वाला और धोबी) बंगले में भाँग पीकर होली मनाते हैं। खानसामा नूरअली गुलामी से तंग आकर घोषणा करता है कि अब वह साहब की चाकरी नहीं करेगा और सबको साहब के भोजन-कक्ष (डाइनिंग रूम) में ले जाकर विलायती शराब पिलाने लगता है। शराब और भाँग के नशे में नौकरों का डर खत्म हो जाता है और वे कमरे में नाचते-गाते हुए कुर्सियाँ उलट देते हैं और तस्वीरें तोड़ डालते हैं।

इसी बीच शहर के बड़े रईस और अंग्रेज़ों के वफादार सेठ उजागरमल बंगले में आते हैं। उजागरमल को नूरअली यह कहकर झाँसा देता है कि लाट साहब के हुक्म से साहब ने स्वयं नौकरों और रिआया के साथ होली खेलने की दावत दी है। उजागरमल बिना सोचे-समझे इस बात पर विश्वास कर लेते हैं और शराब पीकर महफिल में शामिल हो जाते हैं। वे अपनी कोठी से रंग और पिचकारी मँगाते हैं और यह गाते हुए मस्त हो जाते हैं कि "आज साहब के साथ मेरी होली मचेगी"।

तभी मिस्टर क्रास मोटर से लौटते हैं और अपने बंगले का भोजन-कक्ष नशे में डूबे नौकरों और हंगामे की जगह बना देखकर आग-बबूला हो जाते हैं। क्रास हंटर (कोड़ा) निकालकर जैसे ही कमरे में आते हैं, सेठ उजागरमल उन पर पिचकारी से रंग छोड़ देते हैं और नौकर उनके चेहरे पर रंग, तेल व कालिख मल देते हैं। इससे क्रोधित होकर क्रास अपना हंटर निकालकर सभी नौकरों को अंधाधुंध पीटने लगते हैं। नशा हिरन होते ही नौकर भाग खड़े होते हैं। उजागरमल छिपने का प्रयास करते हैं, परंतु क्रास को उनकी ओर बढ़ता देख वे भी जान बचाकर भागते हैं। सड़क पर आगे-आगे उजागरमल की फिटन, उसके पीछे भागते उजागरमल और हंटर लिए उनका पीछा करते हुए क्रास का एक हास्यास्पद दृश्य बनता है।

इस भयंकर अपमान से उजागरमल की आँखें खुल जाती हैं। वे सोचने लगते हैं कि उन्होंने जीवन भर अंग्रेज़ों की चाटुकारिता की, उनके लिए रैलियाँ कीं और असहयोग आंदोलन का विरोध किया; फिर भी एक मामूली होली के रंग पर साहब ने उन्हें कुत्ते की तरह हंटर लेकर दौड़ाया। उजागरमल को बोध होता है कि स्वाधीन और पराधीन मनुष्य के बीच कभी बराबरी या सच्चा मित्र-भाव नहीं हो सकता। अंग्रेज़ों का सम्मान केवल स्वाँग और स्वार्थ पर टिका है। आत्म-ग्लानि और पश्चाताप से भरकर वे अपने घर जाने के बजाय सीधे कांग्रेस कमेटी के दफ़्तर पहुँचते हैं, जहाँ सभी जातियों और धर्मों (हिंदू-मुसलमान) के लोग एक साथ मिलकर होली मना रहे थे। वहाँ उजागरमल मंच पर खड़े होकर अपने अतीत के राष्ट्र-द्रोह और जी-हुज़ूरी के लिए सार्वजनिक रूप से क्षमा माँगते हैं और अपना तन, मन, धन राष्ट्र और असहयोग आंदोलन को समर्पित करने की घोषणा करते हैं।


प्रकाशन इतिहास

प्रकाशन इतिहास अद्यतन किया जा रहा है, बने रहें।


महत्त्व और विषय-विमर्श

  • औपनिवेशिक चाटुकारिता और पराधीनता का बोध: कहानी सेठ उजागरमल के माध्यम से भारतीय अभिजात वर्ग की उस मानसिकता पर करारा प्रहार करती है जो औपनिवेशिक शासकों की झूठी प्रशंसा और वफादारी करके स्वयं को सम्मानित समझती है। क्रास के हंटर की मार से उजागरमल का यह भ्रम टूटता है कि पराधीन भारतीय कभी शासक वर्ग के बराबर हो सकता है।
  • उत्सव के रूप में पदानुक्रम का उलटफेर: होली के अवसर पर नौकरों द्वारा साहब के डाइनिंग रूम पर कब्ज़ा करना, शराब पीना और अंततः कलेक्टर के चेहरे पर कालिख व रंग पोतना औपनिवेशिक व्यवस्था और पदानुक्रम के सामयिक और प्रतीकात्मक उलटफेर (subversion) को दर्शाता है।
  • असहयोग आंदोलन और राजनीतिक चेतना: 1921 के असहयोग आंदोलन की पृष्ठभूमि में लिखी गई यह कहानी यह संदेश देती है कि जब तक भारतीय वर्ग अपने स्वार्थ और गुलामी की मानसिकता को नहीं त्यागता, तब तक वास्तविक स्वतंत्रता संभव नहीं है। उजागरमल का कांग्रेस सभा में जाना इसी चेतना का प्रतीक है।
  • हास्य और व्यंग्य का राजनीतिक उपयोग: प्रेमचंद ने हास्यप्रद प्रसंगों—जैसे हंटर लेकर भागते क्रास और उनके आगे दौड़ते रईस सेठ—के माध्यम से गंभीर राजनीतिक और सामाजिक यथार्थ को अत्यंत रोचक और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है।
  • कहानी का व्यापक महत्त्व: 'विचित्र होली' केवल एक त्योहार की कथा नहीं है, बल्कि यह औपनिवेशिक भारत के सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ का एक जीवंत आलेख है। यह कहानी सिखाती है कि सच्चा स्वाभिमान सत्ता की जी-हुज़ूरी में नहीं, बल्कि अपनी जाति और राष्ट्र की एकता व सेवा में निहित है।

इस रचना को उद्धृत करें

शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "विचित्र होली." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1921, https://munshipremchand.com/works/short-stories/vichitra-holi. Accessed 22 Sep. 2026.