Cover Image for Prem Sutra (प्रेम-सूत्र) by Munshi Premchand - Short Story
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कहानी••39 मिनट

प्रेम-सूत्र

Prem Sutra

प्रेमचंद की कहानी 'प्रेम-सूत्र' दांपत्य प्रेम, ईर्ष्या और बाह्य आकर्षण के बीच के मानसिक द्वंद्व की एक संवेदनशील कहानी है जिसमें प्रभा और पशुपतिनाथ के रिश्ते को रेखांकित किया गया है।

पात्र:पशुपतिनाथ वर्मा, प्रभा, कृष्णा, माया
स्थान:शहर का कोठी और उपवन

प्रेम-सूत्र का मूल पाठ

संसार में कुछ ऐसे मनुष्य भी होते हैं जिन्हें दूसरों के मुख से अपनी स्त्री की सोंदर्य-प्रशंसा सुनकर उतना ही आनन्द होता हे जितनी अपनी कीर्ति की चर्चा सुनकर। पश्चिमी सभ्यता के प्रसार के साथ ऐसे प्राणियों की संख्या बढ़ती जा रही है। पशुपतिनाथ वर्मा इन्हीं लोगों में थे। जब लोग उनकी परम सुन्दरी स्त्री की तारीफ करते हुए कहते -- ओहो! कितनी अनुपम रूप-राशि हे, कितनी अलोकिक सोन्दर्य है, तब वर्माजी मारे खुशी ओर गर्व के फूल उठते थे।

संध्या का समय था। मोटर तैयार खड़ी थी। वर्माजी सैर करने जा रहे थे, किन्तु प्रभा जाने को उत्सुक नहीं मालूम होती थी। वह एक कुर्सी पर बेठी हुई कोई उपन्यास पढ़ रही थी।

वर्मा जी ने कहा -- तुम तो अभी तक बेठी पढ़ रही हो।

'मेरा तो इस समय जाने को जी नहीं चाहता।'

“नहीं प्रिये,हूस समय तुम्हारा न चलना सितम हो जाएगा। में चाहता हूँ कि तुम्हारी इस मधुर छवि को घर से बाहर भी तो लोग देखें। '

'जी नहीं, मुझे यह लालसा नहीं है। मेरे रूप की शोभा केवल तुम्हारे लिए है ओर तुम्हीं को दिखाना चाहती हूँ।'

“हीं, में इतना स्वार्थान्ध नहीं हूँ। जब तुम सैर करने निकलो, में लोगों से यह सुनना चाहता हूँ कि कितनी मनोहर छवि हे! पशुपति कितना भाग्यशाली पुरुष हे!'

'तुम चाहो, में नहीं चाहती। तो इसी बात पर आज में कहीं नहीं जाऊँगी। तुम भी मत जाओ, हम दोनों अपने ही बाग में टहलेंगे। तुम होज के किनारे हरी घास पर लेट जाना, में तुम्हें वीणा बजाकर सुनाऊँगी। तुम्हारे लिए फूलों का हार बनाऊँगी, चांदनी में तुम्हारे साथ आँख-मिचोनी खेलूँगी। '

“नीं-नहीं, प्रभा, आज हमें अवश्य चलना पड़ेगा। तुम कृष्णा से आज मिलने का वादा कर आई हो। वह बेठी हमारा रास्ता देख रही होगी। हमारे न जाने से उसे कितना दुःख होगा!

हाय! वही कृष्णा! बार-बार वही कृष्णा! पति के मुख से नित्य यह नाम चिनगारी की भांति उड़कर प्रभा को जलाकर भस्म्‌ कर देता था।

प्रभा को अब मालूम हुआ कि आज ये बाहर जाने के लिए क्‍यों इतने उत्सुक हें! इसीलिए आज इन्होंने मुझसे केशों को संवारने के लिए इतना आग्रह किया था। वह सारी तैयारी उसी कुलटा कृष्णा से मिलने के लिए थी!

उसने दृढ़ स्वर में कहा -- तुम्हें जाना हो जाओ, में न जाऊँगी।

वर्माजी ने कहा -- अच्छी बात हे, में ही चला जाऊँगा।

पशुपति के जाने के बाद प्रभा को ऐसा जान पड़ा कि वह वाटिका उसे काटने दोड़ रही है। ईर्ष्य की ज्वाला से उसका कोमल शरीर-हृदय भस्म होने लगा। वे वहाँ कृष्णा के साथ बेठे विहार कर रहे होंगे -- उसी नागिन के-से केशवाली कृष्णा के साथ, जिसकी आँखों में घातक विष भरा हुआ हे! मर्दों की बुद्धि क्‍यों इतनी स्थूल होती है? इन्हें कृष्ण की चटक-मटक ने क्‍यों इतना मोहित कर लिया है? उसके मुख से मेरे पेर का तलवा कहीं सुन्दर हे। हाँ, में एक बच्चे की माँ हूँ और वह नव योवना हे! जरा देखना चाहिए, उनमें क्‍या बातें हो रही हें।

यह सोचकर वह अपनी सास के पास आकर बोली -- अम्मा, इस समय अकेले जी घबराता हे, चलिए कहीं घूम आवें।

सास बहू पर प्राण देती थी। चलने पर राजी हो गई। गाड़ी तैयार करा के दोनों घूमने चलीं। प्रभा का श्रृंगार देखकर भ्रम हो सकता था कि वह बहुत प्रसन्न है, किन्तु उसके अन्तस्तल में एक भीषण ज्वाला दहक रही थी, उसे छिपाने के लिए वह मीठे स्वर में एक गीत गाती जा रही थी।

गाड़ी एक सुरम्य उपवन में उड़ी जा रही थी। सड़क के दोनों ओर विशाल वृक्षों की सुखद छाया पड़ रही थी। गाड़ी के कीमती घोड़े गर्व से पूँछ ओर सिर उठाय टप-टप करते जा रहे थे। अहा!वह सामने कृष्णा का बंगला आ गया, जिसके चारों ओर गुलाब की बेल लगी हुई थी। उसके फूल उस समय निर्दय कांटों की भांति प्रभा के हृदय में चुभने लगे। उसने उड़ती हुई निगाह से बंगले की ओर ताका। पशुपति का पता न था, हाँ कृष्णा और उसकी बहन माया बगीचे में विचर रही थीं। गाड़ी बंगले के सामने से निकल ही चुकी थी कि दोनों बहनों ने प्रभा को पुकारा ओर एक क्षण में दोनों बालिकाएँ हिरनियों की भांति उछलती-कूदती फाटक की ओर दोड़ीं। गाड़ी रुक गई।

कृष्णा ने हँसकर सास से कहा -- अम्मा जी, आज आप प्रभा को एकाध घण्टे के लिए हमारे पास छोड़ जाइए। आप इधर से लोटें तब इन्हें लेती जाइएगा, यह कहकर दोनों ने प्रभा को गाड़ी से बाहर खींच लिया। सास केसे इन्कार करती। जब गाड़ी चली गई तब दोनों बहनों ने प्रभा को बगीचे में एक बेंच पर जा बिठाया। प्रभा को इन दोनों के साथ बातें करते हुए बड़ी झिझक हो रही थी। वह उनसे हँसकर बोलना चाहती थी, अपने किसी बात से मन का भाव प्रकट नहीं करना चाहती थी, किन्तु हृदय उनसे खिंचा ही रहा।

कृष्णा ने प्रभा की साड़ी पर एक तीब्र दृष्टि डालकर कहा -- बहन, कया यह साड़ी अभी ली है? इसका गुलाबी रंग तो तुम पर नहीं खिलता। कोई ओर रंग क्‍यों नहीं लिया?

प्रभा -- उनकी पसन्द हे, में क्या करती।

दोनों बहनें ठट्टा मारकर हंस पड़ीं। फिर माया ने कहा -- उन महाशय की रूचि का क्‍या कहना, सारी दुनिया से निराली है। अभी इधर से गये हें। सिर पर इससे भी अधिक लाल पगड़ी थी।

सहसा पशुपति भी सेर से निकलता हुआ सामने से निकला। प्रभा को दोनों बहनों के साथ देखकर उसके जी में आया कि मोटर

रोक ले। वह अकेले इन दोनों से मिलना शिष्टाचार के विरूद्ध समझता था। इसीलिए वह प्रभा को अपने साथ लाना चाहता था। जाते समय वह बहुत साहस करने पर भी मोटर से न उतर सका। प्रभा को वहाँ देखकर इस सुअवसर से लाभ उठाने की उसकी बड़ी इच्छा हुई। लेकिन दोनों बहनों की हास्य ध्वनि सुनकर वह संकोचवश न उतरा।

थोड़ी देर तक तीनों रमणियाँ चुपचाप बेठी रहीं। तब कृष्णा बोली -- पशुपति बाबू यहाँ आना चाहते हें पर शर्म के मारे नहीं आये। मेरा विचार है कि संबंधियों को आपस में इतना संकोच न करना चाहिए। समाज का यह नियम कम से कम मुझे तो बुरा मालूम होता है। तुम्हारा कया विचार हे, प्रभा?

प्रभा ने व्यंग्य भाव से कहा -- यह समाज का अन्याय हे?

प्रभा इस समय भूमि की ओर ताक रही थी। पर उसकी आँखों से ऐसा तिरस्कार निकल रहा था जिसने दोनों बहनों के प्रहास को लज्जा-सूचक मोन में परिणत कर दिया। उसकी आँखों से एक चिनगारी-सी निकली, जिसने दोनों युवतियों के आमोद-प्रमोद ओर उस कुवृत्ति को जला डाला जो प्रभा के पति-परायण हृदय को बाणों से वेध रही थी,उस हृदय को जिसमें अपने पति के सिवा ओर किसी को जगह न थी।

माया ने जब देखा कि प्रभा इस वक्त क्रोध से भरी बेठी हे, तब बेंच से उठ खड़ी हुई ओर बोली -- आओ बहन, जरा टहलें, यहाँ बेठे रहने से तो टहलना ही अच्छा हे।

प्रभा ज्यों की त्यों बेठी रही। पर वे दोनों बहने बाग मे टहलने लगीं। उस वक्त प्रभा का ध्यान उन दोनों के वस्त्राभूषण की ओर गया। माया बंगाल की गुलाबी रेशमी की एक महीन साड़ी पहने हुए थी जिसमें न जाने कितने चुन्नटें पड़ी हुई थीं। उसके हाथ में एक रेशमी छतरी थी जिसे उसने सूर्य की अमित किरणों से बचने के लिए खोल लिया था। कृष्णा के वस्त्र भी वेसे ही थे। हाँ, उसकी साड़ी पीले रंग की थी और उसके घूंघर वाले बाल साड़ी के नीचे से निकल कर माथे ओर गालों पर लहरा रहे थे।

प्रभा ने एक ही निगाह से ताड़ लिया कि इन दोनों युवतियों में किसी को उसके पति से प्रेम नहीं है। केवल आमोद लिप्सा के वशीभूत होकर यह स्वयं बदनाम होंगी ओर उसके सरल हृदय पति को भी बदनाम कर देंगी। उसने ठान लिया कि में अपने भ्रमर को इन विषाक्त पुष्पों से बचाऊँगी ओर चाहे जो कुछ हो उसे इनके ऊपर मंडराने न दूँगी, क्योंकि यहाँ केवल रूप और बास है, रस का नाम नहीं।

प्रभा अपने घर लोटते ही उस कमरे में गई, उसकी लड़की शान्ति अपनी दाई की गोद में खेल रही थी। अपनी नन्‍हीं जीती-जागती गुड़िया की सूरत देखते ही प्रभा की आँखें सजल हो गई। उसने मातृस्नेह से विभोर होकर बालिका को गोद में उठा लिया, मानो किसी भयंकर पशु से उसकी रक्षा कर रही है। उस दुस्सह वेदना की दशा में उसके मुँह से यह शब्द निकला गए -- बच्ची, तेरे बाप को लोग तुझसे छीनना चाहते हैं! हाय, तू क्या अनाथ हो जाएगी? नहीं-नहीं, अगर मेरा, बस चलेगा तो में इन निर्बल हाथों से उन्हें बचाऊँगी।

आज से प्रभा विषादमय भावनाओं में मग्न रहने लगी। आने वाली विपत्ति की कल्पना करके कभी-कभी भयातुर होकर चिल्ला पड़ती, उसकी आँखों में उस विपत्ति की तस्वीर खींच जाती जो उसकी ओर कदम बढ़ाये चली आती थी, पर उस बालिका की तोतली बातें और उसकी आँखों की निःशंक ज्योति प्रभा के विकल हृदय को शान्त कर देती। वह लड़की को गोद में उठा लेती ओर वह मधुर हास्य-छवि जो बालिका के पतले-पतले गुलाबी ओठों पर खेलती होती, प्रभा की सारी शंकाओं ओर बाधाओं को छिउ्न-भिन्न कर देती। उन विश्वासमय नेत्रों में आशा का प्रकाश उसे आश्वस्त कर देता।

हाँ! अभागिनी प्रभा, तू क्या जानती है क्‍या होनेवाला हे?

ग्रीष्मकाल की चांदनी रात थी। सप्तमी का चांद प्रकृति पर अपना मनन्‍्द शीतल प्रकाश डाल रहा था। पशुपति मोलसिरी की एक डाली हाथ से पकड़े ओर तने से चिपटा हुआ माया के कमरे की ओर टकटकी लगाये ताक रहा था कमरे का द्वार खुला हुआ था ओर शान्त निशा में रेशमी साड़ियों की सरसराहट के साथ दो रमणियों की मधुर हास्य-ध्वनि मिलकर पशुपति के कानों तक पहुँचते-पहुँचते आकाश में विलीन हो जाती थी। एकाएक दोनों बहनें कमरे से निकलीं और उसी ओर चर्ली जहां पशुपति खड़ा था। जब दोनों उस वृक्ष के पास पहुंची तब पशुपति की परछाईं देखकर कृष्णा चॉंक पड़ी और बोली -- है बहन! यह क्‍या हे? पशुपति वृक्ष के नीचे से आकर सामने खड़ा हो गया। कृष्णा उन्हें पहचान गई ओर कठोर स्वर में बोली -- आप यहाँ क्‍या करते हें? बतलाइए, यहाँ आपका क्‍या काम हे? बोलिए, जल्दी । पशुपति की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। इस अवसर के लिए उसने जो प्रेम-वाक्य रटे थे वे सब विस्मृत हो गये। सशंक होकर बोला -- कुंछ नहीं प्रिय, आज सन्ध्या समय जब में आपके मकान के

सामने से आ रहा था तब मैंने आपको अपनी बहन से कहते सुना कि आज रात को आप इस वृक्ष के नीचे बेठकर चांदनी का आनन्द उठाएँगी। में भी आपसे कुछ कहने के लिए....आपके चरणों पर अपना.समर्पित करने के लिए...

यह सुनते ही कृष्णा की आँखों से चंचल ज्वाला-सी निकली और उसके ओठों पर व्यंग्यपूर्ण हास्य की झलक दिखाई दी। बोली -- महाशय, आप तो आज एक विचित्र अभिनय करने लगे, कृपा करके पेरों पर से उठिए ओर जो कुछ कहना चाहते हों, जल्द कह डालिए ओर जितने आँसू गिराने हों एक सेकेण्ड में गिरा दीजिए, में रूक-रझककर ओर घिघिया-घिघधियाकर बातें करनेवालों को पसन्द नहीं करती। हाँ, ओर जरा बातें ओर रोना साथ-साथ न हों। कहिए क्‍या कहना चाहते हें....आप न कहेंगे? लीजिए समय बीत गया, में जाती हूँ।

कृष्णा वहाँ से चल दी। माया भी उसके साथ ही चली गई। पशुपति एक क्षण तक वहाँ खड़ा रहा फिर वह भी उनके पीछे- पीछे चला। मानो वह सुई है जो चुम्बक के आकर्षण से आप ही आप खिंचा चला जाता हे।

सहसा कृष्णा रुक गई और बोली -- सुनिए पशुपति बाबू, आज संध्या समय प्रभा की बातों से मालूम हो गया कि उन्हें आपका ओर मेरा मिलना-जुलना बिल्कुल नहीं भाता...

पशुपति -- प्रभा की तो आप चर्चा ही छोड़ दीजिए।

कृष्णा -- क्यों छोड़ दूँ? क्या वह आपकी स्त्री नहीं है? आप इस समय उसे घर में अकेली छोड़कर मुझसे कया कहने के लिए आये हैं? यही कि उसकी चर्चा न करूँ?

पशुपति -- जी नहीं, यह कहने के लिए कि अब वह विरहाग्नि नहीं सही जाती।

कृष्णा ने ठठ॒टा मारकर कहा -- आप तो इस कला में बहुत निपुण जान पड़ते हैं। प्रेम! समर्पण! विरहाग्नि! यह शब्द आपने कहाँ सीखे!

पशुपति -- कृष्णा, मुझे तुमसे इतना प्रेम हे कि में पागल हो गया हूँ।

कृष्णा - तुम्हें प्रभा से क्‍यों प्रेम नहीं हे?

पशुपति - में तो तुम्हारा उपासक हूँ।

कृष्णा -- लेकिन यह क्‍यों भूल जाते हो कि तुम प्रभा के स्वामी हो?

पशुपति -- तुम्हारा तो दास हूँ। कृष्णा -- में ऐसी बातें नहीं सुनना चाहती।

पशुपति - तुम्हें मेरी एक-एक बात सुननी पड़ेगी। तुम जो चाहो वह करने को में तैयार हूँ।

कृष्णा -- अगर यह बातें कहीं वह सुन लें तो?

पशुपति -- सुन ले तो सुन ले। में हर बात के लिए तेयार हूँ। में फिर कहता हूँ,कि अगर तुम्हारी मुझ पर कृपादृष्टि न हुई तो में मर जाऊँगा।

कृष्णा -- तुम्हें यह बात करते समय अपनी पत्नी का ध्यान नहीं आता?

पशुपति -- में उसका पति नहीं होना चाहता। में तो तुम्हारा दास होने के लिए बनाया गया हूँ। वह सुगन्ध जो इस समय तुम्हारी गुलाबी साड़ी से निकल रही है, मेरी जान हे। तुम्हारे ये छोटे- छोटे पाँव मेरे प्राण हें। तुम्हारी हंसी, तुम्हारी छवि, तुम्हारा एक- एक अंग मेरे प्राण हें। में केवल तुम्हारे लिए पेदा हुआ हूँ। कृष्णा -- भई, अब तो सुनते-सुनते कान भर गए। यह व्याख्यान ओर यह गद्य-काव्य सुनने के लिए मेरे पास समय नहीं है। आओ माया, मुझे तो सदी लग रही है। चलकर अन्दर बेठे।

यह निष्ठुर शब्द सुनकर पशुपति की आँखों के सामने अंधेरा छा गया। मगर अब भी उसका मन यही चाहता था कि कृष्णा के पेरों पर गिर पड़े ओर इससे भी करुण शब्दों में अपने प्रेम-कथा सुनाए। किन्तु दोनों बहनें इतनी देर में अपने कमरे में पहुँच चुकी थीं ओर द्वार बन्द कर लिया था। पशुपति के लिए निराश घर लोट आने के सिवा कोई चारा न रह गया।

कृष्णा अपने कमरे में जाकर थकी हुई-सी एक कुर्सी पर बैठ गई और सोचने लगी -- कहीं प्रभा सुन ले तो बात का बतंगड़ हो जाय, सारे शहर में इसकी चर्चा होने लगे ओर हमें कहीं मुँह दिखाने को जगह न रहे। ओर यह सब एक जरा-सी दिल्‍लगी के कारण पर पशुपति का प्रम सच्चा हें, इसमें सन्देह नहीं। वह जो कुछ कहता हे, अन्तःकरण से कहता है। अगर में इस वक्त जरा- सा संकेत कर दूँ तो वह प्रभा को भी छोड़ देगा। अपने आपे में नहीं हे। जो कुछ कहूँ वह करने को तैयार है। लेकिन नहीं, प्रभा डरो मत, मे। तुम्हारा सर्वगाश न करूँगी। तुम मुझसे बहुत नीचे हों यह मेरे अनुपम सोन्दर्य के लिए गोरव की बात नहीं कि तुम जैसी रूप-विहीना से बाजी मार ले जाऊँ। अभागे पशुपति, तुम्हारे भाग्य में जो कुछ लिखा था वह हो चुका। तुम्हारे ऊपर मुझे दया आती है, पर क्‍या किया जाय।

एक खत पहले हाथ पड़ चुका था। यह दूसरा पत्र था, जो प्रभा को पतिदेव के कोट की जेब में मिला। केसा पत्र था आह इसे पढ़ते ही प्रभा की देह में एक ज्वाला-सी उठने लगी। तो यों कहिए कि ये अब कृष्णा के दो चुके अब इसमें कोई सन्देह नहीं रहा। अब मेरे जीने को धिक्कार हे जब जीवन में कोई सुख ही नहीं रहा, तो क्यों न इस बोझ को उतार कर फेंक दूँ। वही पशुपति, जिसे कबिता से लेशमात्र भी रुचि न थी, अब कबि हो गया था ओर कृष्णा को छन्दों में पत्र लिखता था। प्रभा ने अपने स्वामी को उधर से हटाने के लिए वह सब कुछ किया जो उससे हो सकता था, पर प्रेम का प्रवाह उसके रोके न रूका ओर आज उस प्रवाह तके उसके जीवन की नोका निराधार वही चली जा रही है।

इसमें सन्देह नहीं कि प्रभा को अपने पति से सच्चा प्रेम था, लेकिन आत्मसमर्पण की तुष्टि आत्मसमर्पण से ही होती है। वह उपेक्षा और निष्ठुरता को सहन नही कर सकता। प्रभा के मन के विद्रोह का भाव जाग्रत होने लगा। उसके आत्माभिमान जाता रहा। उसके मन मे न जाने कितने भीषण संकल्प होते, किन्तु

अपनी असमर्थता और दीनता पर आप ही आप रोने लगती। आह! उसका सर्वस्व उससे छीन लिया गया ओर अब संसार मे उसका कोई मित्र नहीं, कोई साथी नही!

पशुपति आजकल नित्य बनाव-सवार मे मग्न रहता, नित्य नये-नये सूट बदलता। उसे आइने के सामने अपने बालों को सँवारते देखकर प्रभा की आँखों से आँसू बहने लगते। सह सारी तैयारी उसी दुष्ट के लिए हो रही है। यह चिन्ता जहरीले साँप की भांति उसे डस लेती थी;वह अब अपने पति को प्रत्येक बात प्रत्येक गति को सूक्ष्म दृष्टि से देखती। कितनी ही बातें जिन पर वह पहले ध्यान भी न देती थी, अब रहस्य से भरी हुई जान पड़ती। वह रात का न सोती, कभी पशुपति की जेब टटोलती, कभी उसकी मेज पर रकखें हुए पत्रों को पढ़ती! इसी टोह मे वह रात-दिन पड़ी रहती।

वह सोचने लगी -- मे क्‍या प्रेम-वंचिता बनी बेठी रहूँ? क्या मे प्राणेश्ववी नही बन सकती? कया इसे परित्यक्ता बनकर ही काटना होगा! आह निर्देयी तूने मुझे धोखा दिया। मुझसे आँखें फेर ली। पर सबसे बड़ा अनर्थ यह किया कि मुझे जीवन का कलुषित मार्ग दिखा दिया। मे भी विश्वासघात करके तुझे धोखा देकर क्‍या कलुषित प्रेम का आन्नद नही उठा सकती? अश्रुधारा से सींचकर ही सही, पर क्‍या अपने लिए कोई वाटिका नही लगा सकती? वह

सामने के मकान मे घुँघराले बालोंबाला युवक रहता है और जब मोका पाता हे, मेरी ओर सचेष्ट नेत्रों से देखता। क्या केवल एक प्रेम-कटाक्ष से मे उसके हृदय पर अधिकार नहीं प्राप्त कर सकती? अगर मे इस भांति निष्ठुरता का बदला लूँ तो कया अनुचित होगा? आखिर मेने अपना जीवन अपने पति को किस लिए सोंपा था? इसीलिए तो कि सुख से जीवन व्यतीत करूँ। चाहूँ ओर चाही जाऊँ ओर इस प्रेम-साम्राज्य की अधीश्वर बनी रहूँ। मगह आह! वे सारी अभिलाषाएँ धूल मे मिल गई। अब मेरे लिए क्‍या रह गया है? आज यदि मै मर जाऊँ तो कोन रोयेगा? नहीं, घी के चिराग जलाए जाएँगें। कृष्णा हँसकर कहेगी -- अब बस हम है ओर तुम। हमारे बीच मे कोई बाधा, कोई कंटक नहीं है।

आखिर प्रभा इन कलुषित भावनाओं के प्रवाह मे बह चली। उसके हृदय में रातों को, निद्रा ओर आशाविहीन रातों को बड़े प्रबल वेग से यह तूफान उठने लगा। प्रेम तो अब किसी अन्य पुरुष के साथ कर सकती थी, यह व्यापार तो जीवन में केवल एक ही बार होता है। लेकिन वह प्राणेश्वरी अवश्य बन सकती थी ओर उसके लिए एक मधुर मुस्कान, एक बाँकी निगाह काफी थी। ओर जब वह किसी की प्रेमिका हो जायेगी तो यह विचार कि मेने पति से उसकी बेवफाई का बदला ले लिया कितना

आनन्दप्रद होगा! तब वह उसके मुख की ओर कितने गर्व, कितने संतोष, कितने उल्लास से देखेगी।

सन्ध्या का समय था। पशुपति सेर करने गया था। प्रभा कोठे पर चढ गई ओर सामने वाले मकान की ओर देखा। घुंघराले बालों वाला युवक उसके कोठे की ओर ताक रहा था। प्रभा ने आज पहली बार उस युवक की ओर मुस्करा कर देखा। युवक भी मुस्कराया ओर अपनी गर्दन झुकाकर मानों यह संकेत किया कि आपकी प्रेम दृष्टि का भिखारी हूँ। प्रभा ने गर्व से भरी हुई दृष्टि इधर-उधर दोड़ाई, मानों वह पशुपति से कहना चाहती थी -- तुम उस कुलटा के पेरो पड़ते हो और समझते हो कि मेरे हृदय को चोट नही लगती। लो तुम भी देखो ओर अपने हृदय पर चोट न लगने दो, तुम उसे प्यार करो, मे भी इससे हँसू-बोलू। क्‍यों? यह अच्छा नही लगता? इस दृश्य को शान्त चित से नही देख सकते? क्यों रक्त खोलने लगता है? मे वही तो कह रही हूँ जो तुम कर रहे हो!

आह! यदि पशुपति को ज्ञात हो जाता कि मेरी निष्ठुरता ने इस सती के हृदय की कितनी कायापलट कर दी हे तो क्‍या उसे अपने कृत्य पर पश्चात्ताप न होता, क्या वह अपने किये पर लज्जित न होता!

प्रभा ने उस युवक से इशारे मे कहा -- आज हम और तुम पूर्व वाले मैदान में मिलेंगे ओर कोठे के नीचे उतर आई।

प्रभा के हृदय मे इस समय एक वही उत्सुकता थी जिसमें प्रतिकार का आनन्द मिश्रित था। वह अपने कमरे मे जाकर अपने चुने हुए आभूषण पहनने लगी। एक क्षण मे वह एक फालसई रंग की रेशमी साड़ी पहने कमरे से निकली ओर बाहर जाना ही चाहती थी कि शान्ता ने पुकारा -- अम्मा जी, आप कहाँ जा रहा है, में भी आपके साथ चलूँगी।

प्रभा ने झट बालिका को गोद मे उठा लिया ओर उसे छाती से लगाते ही उसके विचारों ने पलटा खाया। उन बाल नेत्रों मे उसके प्रति कितना असीम विश्वास, कितना सरल स्नेह, कितना पवित्र प्रेम झलक रहा था। उसे उस समय माता का कर्त्तव्य याद आया। क्‍या उसकी प्रेमाकांक्षा उसके वात्सल्य भाव को कुचल देगी? कया वह प्रतिकार की प्रबल इच्छा पर अपने मातृ- कर्त्तव्य को बलिदान कर देगी? क्या वह अपने क्षणिक सुख के लिए उस बालिका का भविष्य, उसका जीवन धूल में मिला देगी? प्रभा की आँखों से आँसू की दो बूँदें गिर पड़ी। उसने कहा -- नही, कदापि नहीं, मै अपनी प्यारी बच्ची के लिए सब कुछ सह सकती हूँ।

एक महीना गुजर गया। प्रभा अपनी चिन्ताओं को भूल जाने की चेष्टा करती रहती थी, पर पशुपति नित्य किसी न किसी बहने से कृष्णा की चर्चा किया करता। कभी-कभी हँसकर कहता -- प्रभा, अगर तुम्हारी अनुमति हो तो मै कृष्णा से विवाह कर लूँ। प्रभा इसके जवाब मे रोने के सिवा ओर क्‍या कर सकती थी?

आखिर एक दिन पशुपति ने उसे विनयपूर्ण शब्दों में कहा -- कहा कहूँ प्रभा,उस रमणी की छवि मेरी आँखों से नही उतरती। उसने मुझे कहीं का नही रक्खा। यह कहकर उसने कई बार अपना माथा ठोका। प्रभा का हृदय करूणा से द्रवित हो गया। उसकी दशा उस रोगी की-सी थी जो यह जानता हो कि मोत उसके सिर पर खेल रही हें, फिर भी उसकी जीवन-लालसा दिन- दिन बढती जाती हो। प्रभा इन सारी बातों पर भी अपने पति से प्रेम करती थी ओर स्त्री-सुलभ स्वभाव के अनुसार कोई बहाना खोजती थी कि उसके अपराधों को भूल जाय ओर उसे क्षमाकर दे।

एक दिन पशुपति बड़ी रात गये घर आया ओर रात-भर नींद मे "कृष्णा! कृष्णा/ कहकर बर्राता रहा। प्रभा ने अपने प्रियतम का यह आर्तनाद सुना ओर सारी रात चुपके-चुपके रोया की-बस रोया की!

प्रात: काल वह पशुपति के लिए दूध का प्याला लिये खड़ी थी कि वह उसके पैरा पर गिर पड़ा और बोला - प्रभा, मेरी तुमसे एक विनय हे, तुम्हीं मेरी रक्षा कर सकती हो, नहीं मे मर जाऊँगा। मे जनता हूँ कि यह सुनकर तुम्हें बहुत कष्ट होगा, लेकिन मुझ पर दया करों। मे तुम्हारी इस कृपा को कभी न भूलूँगा। मुझ पर दया करो।

प्रभा काँपने लगी। पशुपति क्‍या कहना चाहता है, यह उसका दिल साफ बता रहा था। फिर भी वह भयभीत होकर पीछे हट गई ओर दूध का प्याला मेज पर रखकर अपने पीले मुख को काँपते हुए हाथों से छिपा लिया। पशुपति ने फिर भी सब कुछ ही कह डाला। लालसाग्नि अब अन्दर न रूह सकती थी, उसकी ज्वाला बाहर निकल ही पड़ी। तात्पर्य यह था कि पशुपति ने कृष्णा के साथ विवाह करना निश्चय कर लिया था। वह से दूसरे घर मे रखेगा ओर प्रभा के यहाँ दो रात ओर एक रात उसके यहाँ रहेगा।

ये बातें सुनकर प्रभा रोई नहीं, वरन स्तम्भित होकर खड़ी रूह गई। उसे ऐसा मालूम हुआ कि उसके गले मे कोई चीज अटकी हुई हे ओर वह सांस नही ले सकती।

पशुपति ने फिर कहा -- प्रभा, तुम नही जानती कि जितना प्रेम तुमसे मुझे आज है उतना पहले कभी नही था। मै तुमसे अलग नही हो सकता। मै जीवन-पर्यन्त तुम्हें इसी भांति प्यार करता रहूँगा। पर कृष्णा मुझे मार डालेगी। केवल तुम्हीं मेरी रक्षा कर सकती हो। मुझे उसके हाथ मत छोड़ों, प्रिये!

अभागिनी प्रभा! तुझसे पूछ-पूछ कर तेरी गर्दन पर छुरी चलाई जा रही हे! तू गर्दन झुका देगी या आत्मगोरव से सिर उठाकर कहेगी -- में यह नीच प्रस्ताव नही सुन सकती।

प्रभा ने इन बातों मे एक भी न की। वह अचेत होकर भूमि पर गिर पड़ी। जब होश आया, कहने लगी -- बहुत अच्छा, जेसी तुम्हारी इच्छा! लेकिन मुझे छोड़ दो, मे अपनी माँ के घर जाऊँगी, मेरी शान्ता मुझे दे दों।

यह कहकर वह रोती हुई वहाँ से शांता को लेने चली गई ओर उसे गोद में लेकर कमरे से बाहर निकली। पशुपति लज्जा ओर ग्लानि से सिर झुकायें उसके पीछे-पीछे आता रहा और कहता रहा - जैसी तुम्हारी इच्छा हो प्रभा, वह करो, और मे क्‍या कहूँ,

किंतु मेरी प्यारी प्रभा, वादा करों कि तुम मुझे क्षमा कर दोगी। किन्तु प्रभा ने उसको कुछ जवाब न दिया ओर बराबर द्वार की ओर चलती रही। तब पशुपति ने आगे बढ़कर उसे पकड़ लिया ओर उसके मुरझाये हुए पर अश्र-सिंचित कपोलों को चूम-चूमकर कहने लगा -- प्रिये, मुझे भूल न जाना, तुम्हारी याद मेरे हृदय मे सदेव बनी रहेगी। अपनी अंगूठी मुझे देती जाओ, मे उसे तुम्हारी निशानी समझ कर रक्खूँगा ओर उसे हृदय से लगाकर इस दाह को शीतल करूँगा। ईश्वर के लिए प्रभा, मुझे छोड़ना मत, मुझसे नाराज न होना-एक सप्ताह के लिए अपनी माता के पास जाकर रहो। फिर मे तुम्हें जाकर लाऊँगा।

प्रभा ने पशुपति के कर-पाश से अपने को छुड़ा लिया ओर अपनी लड़की का हाथ पकड़े हुए गाड़ी की ओर चली। उसने पशुपति को न कोई उत्तर दिया और न यह सुना कि वह क्‍या कर रहा

हे।

अम्माँ, आप क्‍यों हँस रही हे? 'कुछ तो नहीं बेटी।!

“वह पीले-पीले पुराने कागज तुम्हारे हाथ में क्‍या हें? ये उस ऋण के पुर्जे हैं जो वापस नही मिला।'

ये तो पुराने खत मालूम होते हे?'

“नही बेटी। !

बात यह थी कि प्रभा अपनी चोदह वर्ष की युवती पुत्री के सामने सत्य का पर्दा नही खोलना चाहती थी। हाँ, वे कागज वास्तव मे एक ऐसे कर्ज के पूुर्ज थे जो वापस नही मिला। ये वही पुराने पत्र थे जो आज एक किताब मे रकक्‍खें हुए मिले थे ओर ऐसे फूल की पंखड़ियों की भांति दिखाई देते थे जिनका रंग और गंध किताब मे रकक्‍खें-रक्खें उड़ गई हो, तथापि वे सुख के दिनों को याद दिला रहे थे ओर इस कारण प्रभा की दृष्टि मे वे बहुमूल्य थे।

शांता समझ गई कि अम्मा कोई ऐसा काम कर रही है जिसकी खबर मुझे नही करना चाहती ओर इस बात से प्रसन्न होकर कि मेरी दुखी माता आज अपना शोक भूल गई है और जितनी देर तक वह इस आनन्द मे मग्न रहे उतना ही अच्छा हे, एक बहाने से बाहर चली गई। प्रभा जब कमरे मे अकेली रूह गई तब उसने पत्रों का फिर पढ़ना शुरू किया।

आह! इन चोदह वर्षो मे क्‍या कुछ नही हो गया! इस समय उस विरहणी के हृदय मे कितनी ही पूर्व स्मृतियाँ जाग्रत हो गई, जिन्होंने हर्ष ओर शोक के स्रोत एक साथ ही खोल दिए।

प्रभा के चले जाने के बाद पशुपति ने बहुत चाहा कि कृष्णा से उसका विवाह हो जाय पर वह राजी न हुई। इसी नेराश्य और क्रोध की दशा मे पशुपति एक कम्पनी का एजेन्ट होकर योरोप चला गया। तब फिर उसे प्रभा की याद आई। कुछ दिनों तक उसके पास से क्षमाप्रार्थना-पूर्ण पत्र आते रहे, जिनमें वह बहुत जल्द घर आकर प्रभासे मिलने के वादे करता रहा ओ प्रेम के इस नये प्रवाह में पुरानी कटुताओ कों जलमग्न कर देने के आशामय स्वप्न देखता रहा। पति-परायणा प्रभा के संतप्त हृदय मे फिर आशा की हरियाली लहराने लगी, मुरअझाई हुई आशा-लताएँ फिर पल्‍लवित होने लगी! किन्तु यह भी भाग्य की एक कीड़ा ही थी। थोड़े ही दिनों मे रसिक पशुपति एक नये प्रेम-जाल मे फंस गया ओर तब से उसके पत्र आने बन्द हो गये। इस वक्त प्रभा के हाथ मे वही पत्र थे जो उसके पति ने योरोप से उस समय भेजे थे जब नेराश्य का घाव हरा था। कितनी चिकनी-चुपडी बातें थी। केसे-केसे दिल खुश करने वाले वादे थे!इसके बाद ही मालूम हुआ कि पशुपति ने एक अंग्रेज लड़की से विवाह कर लिया है। प्रभा पर वज्र-सा गिर पड़ा -- उसके हृदय के टुकड़े हो

गये -- सारी आशाओं पर पानी फिर गय। उसका निर्बल शरीर इस आधात का सहन न कर सका। उसे ज्वर आने लगा। ओर किसी को उसके जीवन की आशा न रही। वह स्वयं मृत्यु की अभिलाषिणी थी ओर मालूम भी होता था कि मौत किसी सरूप की भांति उसकी देह से लिपट गई है। लेकिन बुलाने से मोत भी नही आती। ज्वर शान्त हो गया ओर प्रभा फिर वही आशाविहीन जीवन व्यतीत करने लगी।

एक दिन प्रभा ने सुना कि पशुपति योरोप से लोट आया है ओर वह योरोपीय स्त्री उसके साथ नही है। बल्कि उसके लोटने क कारण वही स्त्री हुई है। वह औरत बारह साल तक उसकी सहयोगिनी रही पर एक दिन एक अंग्रेज युवक के साथ भाग गई। इस भीषण ओर अत्यन्त कठोर आघात ने पशुपति की कमर तोड़ दी। वह नोकरी छोड़कर घर चला आया। अब उसकी सूरत इतनी बदल गई थी उसके मित्र लोग उससे बाजार मे मिलते तो उसे पहचान न सकते थे -- मालूम होता था, कोई

बूढ़ा कमर झुकाये चला जाता है। उसके बाल तक सफेद हो गये।

घर आकर पशुपति ने एक दिन शान्ता को बुला भेजा। इस तरह शांता उसके घर आने-जाने लगी। वह अपने पिता की दशा देखकर मन ही मन कुढ़ती थी।

इसी बीच मे शान्ता के विवाह के सन्देश आने लगे, लेकिन प्रभा को अपने वेबवाहिक जीवन मे जो अनुभव हुआ था वह उसे इन सन्देशों को लोटने पर मजबूर करता था। वह सोचती, कहीं इस लड़की की भी वही गति न हो जो मेरी हुई हैं। उसे ऐसा मालूम होता था कि यदि शान्त का विवाह हो गया तो इस अन्तिम अवस्था मे भी मुझे चेन न मिलेगा ओर मरने के बाद भी मे पुत्री का शोक लेकर जाऊँगी। लेकिन अन्त मे एक ऐसे अच्छे घराने से सन्देश आया कि प्रभा उसे ना ही न कर सकी। घर बहुत ही सम्पन्न था, वर भी बहुत ही सुयोग्य। प्रभा को स्वीकार ही करना पड़ेगा। लेकिन पिता की अनुमति भी आवश्यक थी। प्रभा ने इस विषय में पशुपति को एक पत्र लिखा ओर शान्ता के ही हाथ भेज दिया। जब शान्ता पत्र लेकर चली गई तब प्रभा भोजन बनाने चली गई। भाति-भांति की अमंगल कल्पनाएँ उसके मन मे आने लगी और चूल्हे से निकलते धुएँ मे उसे एक चित्र-सा दिखाई दिया कि शान्ता के पतले-पतले होंठ सूखे हुए हे ओर वह काँप

रही हे ओर जिस तरह प्रभा पतिगृह से आकर माता की गोद मे गिर गई थी उसी तर शान्ता भी आकर माता की गोद मे गिर पड़ी है।

पशुपति ने प्रभा का पत्र पढ़ा तो उसे चुप-सी लग गई। उसने अपना सिगरेट जलाया ओर जोर-जोर कश खींचने लगा।

फिर वह उठ खड़ा हुआ और कमरे मे टहलने लगा। कभी मूँछों को दांतों से काटता की खिचड़ी दाढ़ी को नीचे की ओर खींचता।

सहसा वह शान्ता के पास आकर खड़ा हो गया ओर काँपते हुए स्वर मे बोला -- बेटी जिस घर को तेरी माँ स्वीकार करती हो उसे मै कैसे नाही कर सकता हूँ। उन्होने बहुत सोच-समझकर हामी भरी होगी। ईश्वर करे तुम सदा सोभाग्यवती रहो। मुझे दुख है तो इतना ही कि जब तू अपने घर चली जायेगी तब तेरी माता अकेली रह जायगी। कोई उसके आँसू पोंछने वाला न रहेगा। कोई ऐसा उपाय सोच कि तेरी माता का क्लेश दूर हो ओर में भी इस तरह मारा-मारा न फिरूँ। ऐसा उपाय तू ही निकाल सकती है। सम्भव है लज्जा ओर संकोच के कारण मे

अपने हृदय की बात तुझसे कभी न कह सकता, लेकिन अब तू जा रही है ओर मुझे संकोच का त्याग करने के सिवा कोई उपाय नही है। तेरी माँ तुझे प्यार करती है और तेरा अनुरोध कभी न टालेगी। मेरी दशा जो तू अपनी आँखों से देश रही हे यही उनसे कह देना। जा, तेरा सोभाग्य अमर हो।

शान्ता रोती हुई पिता की छाती से लिपट गई ओर यह समय से पहले बूढ़ा हो जाने वाला मनुष्य अपनी दुर्वासनाओं का दण्ड भोगने के बाद पश्चात्ताप ओर ग्लानि के आँसू बहा-बहाकर शान्ता के केशराशि को भिगोने लगा।

पतिपरायणा प्रभा कया शान्‍्ता का अनुरोध टाल सकती थी? इस प्रेम-सूत्र ने दोनों भग्न-हृदय को सदेव के लिए मिला दिया।


प्रेम-सूत्र का सारांश

'प्रेम-सूत्र' पशुपतिनाथ वर्मा, उनकी पतिव्रता पत्नी प्रभा, और कृष्णा नामक आधुनिक स्त्री के इर्द-गिर्द घूमती दांपत्य जीवन, ईर्ष्या, चंचलता और नैतिक पश्चात्ताप की एक अत्यंत मार्मिक कहानी है। पशुपतिनाथ पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव में अपनी परम सुंदरी पत्नी प्रभा के रूप की दूसरों से प्रशंसा सुनने के शौकीन हैं। जब वे प्रभा को बाहर ले जाना चाहते हैं और कृष्णा से मिलने का बहाना बनाते हैं, तो प्रभा के मन में ईर्ष्या की ज्वाला भड़क उठती है। पशुपतिनाथ कृष्णा के रूप और चटक-मटक पर मोहित हो जाते हैं और आधी रात को कृष्णा से प्रेम-निवेदन करने उसके बंगले के बगीचे में पहुँच जाते हैं। परंतु कृष्णा उनका उपहास उड़ाती है और उनके छलावे को स्वीकार नहीं करती।

इधर प्रभा अपने पति के विमुख होने और कृष्णा को प्रेम-पत्र लिखने से टूट जाती है। एक बार वह बदला लेने के लिए सामने वाले युवक की तरफ देखकर मुस्कराती है और मिलने का संकेत देती है, लेकिन अपनी नन्हीं बेटी शांता का निर्दोष चेहरा देखते ही उसका वात्सल्य और मातृ-कर्तव्य जाग उठता है और वह कुमार्ग पर जाने से रुक जाती है। पशुपतिनाथ की कामुकता इस हद तक बढ़ जाती है कि वे प्रभा से कृष्णा से दूसरा विवाह करने और दो रात प्रभा व एक रात कृष्णा के साथ रहने की अनैतिक अनुमति माँगते हैं। प्रभा आहत होकर अपनी बेटी शांता को लेकर अपने मायके चली जाती है। इसके बाद पशुपतिनाथ निराशा में यूरोप चले जाते हैं, जहाँ वे एक अंग्रेज़ महिला से विवाह कर लेते हैं। लेकिन 12 साल बाद वह अंग्रेज़ महिला उन्हें धोखा देकर किसी अन्य अंग्रेज़ युवक के साथ भाग जाती है। इस आघात से पशुपतिनाथ समय से पहले बूढ़े और जर्जर हो जाते हैं।

इधर चौदह वर्ष बीत जाने पर शांता बड़ी हो जाती है। जब शांता के लिए एक सुयोग्य वर का रिश्ता आता है, तो प्रभा पशुपतिनाथ को पत्र लिखकर उनकी सम्मति माँगती है। पशुपतिनाथ पश्चात्ताप से भरे हुए हैं। वे अपनी बेटी शांता के सामने रो पड़ते हैं और उससे अपनी माँ (प्रभा) से क्षमा कराने और पुनर्मिलन की गुहार लगाते हैं। शांता अपनी माँ से पिता के पश्चात्ताप और दयनीय दशा का वर्णन करती है। पतिपरायणा प्रभा अपनी बेटी के इस अनुरोध को न टाल सकी और इस प्रकार शांता का यह 'प्रेम-सूत्र' दोनों टूटे हुए हृदयों को सदैव के लिए फिर से मिला देता है।


प्रकाशन इतिहास

प्रकाशन इतिहास अद्यतन किया जा रहा है, बने रहें।


महत्त्व और विषय-विमर्श

  • बाह्य आकर्षण बनाम सच्चा दांपत्य प्रेम: कहानी यह दर्शाती है कि क्षणिक रूप-सौंदर्य और बाह्य आकर्षण (कृष्णा/अंग्रेज़ महिला) इंसान को भटका सकते हैं, लेकिन सच्चा सुख और आत्मिक शांति केवल निष्ठावान दांपत्य प्रेम (प्रभा) में ही निहित है।
  • पाश्चात्य प्रभाव और नैतिक भटकाव: पशुपतिनाथ का चरित्र पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण, प्रदर्शन प्रियता और अनैतिक कामुकता के दुष्परिणामों को उजागर करता है।
  • मातृ-कर्तव्य और स्त्री का आत्म-नियंत्रण: प्रभा का चरित्र भारतीय नारी के त्याग, संयम और वात्सल्य की प्रतिमूर्ति है, जो पति के विश्वासघात से आहत होकर भी अपनी संतान के भविष्य के लिए अपने भटकाव पर विजय पाती है।
  • पाप का प्रायश्चित्त और पुनर्मिलन: पशुपतिनाथ को अपने दुष्कृत्यों का फल यूरोप में धोखा खाकर भोगना पड़ता है। उनका सच्चा पश्चात्ताप और पुत्री शांता का 'प्रेम-सूत्र' बिखरे हुए परिवार को पुनः जोड़ता है।
  • कहानी का व्यापक महत्त्व: 'प्रेम-सूत्र' दांपत्य जीवन की मर्यादा, पारिवारिक निष्ठा और पश्चात्ताप की शक्ति को रेखांकित करने वाली एक कालजयी कहानी है। प्रेमचंद ने दिखाया है कि सच्चा प्रेम क्षमा और समर्पण पर टिका होता है, जो बड़े से बड़े घाव को भी भर सकता है।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "प्रेम-सूत्र." *Munshi Premchand Digital Archive*, https://munshipremchand.com/works/short-stories/prem-sutra. Accessed 22 Sep. 2026.