हाथी-दांत क्या है?
अवाम का खयाल है कि हाथी-दांत सिर्फ हाथी का दांत है जिसको काटकर इस्तेमाल में लाते हैं। इसमें कोई शक नहीं कि यह खयाल एक हद तक सही है, मगर गलती यह है कि इसका मरकज़ (स्रोत) सिर्फ हाथी का दांत समझा जाता है, हालांकि चन्द और जानवर भी हैं जिनके दांतों से हाथी-दांत निकलता है। बस, यह देखना बहुत आसान है कि यह नाम गलत है और ज़ाहिर करता है कि पहले लोगों को उन जानवरों का इल्म न था जिनके दांतों से हाथी-दांत निकलता है।
जैसे हड्डी में दो जुज़ (हिस्से) होते हैं—एक ऊपर का सख्त खोल और दूसरा अंदर का नरम मग्ज़—वैसे ही दांत में भी दो जुज़ होते हैं, एक तो सफेद चिकना निहायत सख्त खोल होता है और दूसरा इस खोल से ज़्यादा चिकना, मगर उससे किसी क़दर नरम अंदरूनी हिस्सा होता है। बाहरी हिस्से को खोले-दंदाँ और अंदरूनी हिस्से को मग्ज़-दंदाँ कहते हैं। जिस चीज़ का नाम हाथी-दांत है, वह चन्द दांतों का मग्ज़ है। हम आगे चलकर उन जानवरों का मुख्तसर तज़किरा लिखेंगे जिनके दांतों से हाथी-दांत मिलता है।
अगर हम अपने दांतों को गौर से देखें तो मालूम होगा कि बनावट के लिहाज से ये तीन किस्म के हैं। पहले तो सामने वाले कैंचीनुमा दांत हैं जिनसे हम माकूलियात (खाद्य-वस्तुओं) को काटते हैं। इन दांतों के बगल में दाएं-बाएं दो-दो नुकीले तेज दांत हैं जो गोश्त की-सी कड़ी चीजों को चीरने-फाड़ने के लिए बनाए गए हैं। और इन नुकीले दांतों के बगल में दोनों तरफ चंद चपटे, चौड़े, मज़बूत दांत हैं जिनसे हम लुकमे को निगलने के पहले चबाते हैं। किस्म अव्वल के दांतों को इनसाइज़र (Incisor) यानी कैंचीनुमा किस्म, किस्म दोयम को केनाइन (Canine—यानी संगसिफ़्त या कुत्तों के-से दांत) और किस्म सोयम को मोलर (Molar—यानी आसियासिफ़्त या चक्की के-से दांत) कहते हैं। फितरत ने कोई शै बिला मसलहत नहीं बनाई। हर शै से एक-न-एक फायदा, कोई-न-कोई गर्ज़ मद्दे-नज़र है।
ऊंट के चौड़े गद्दीदार चपटे सुम (खुर) इसलिए बनाए गए हैं कि वह रेगिस्तानों में आसानी से चल सके। उसकी गर्दन लंबी इसलिए बनाई कि अपना सिर ज़मीन तक झुका सके। बर्फिस्तानी खित्ते (इलाके) के जानवरों के जिस्म पर घने और लंबे बाल रखे, ताकि सरदी की अज़ीयत (चोट/पीड़ा) से हलाक न हो जायें। बरअक्स इसके गरम मुल्कों के जानवरों की खाल पर बहुत छीटरे और छोटे-छोटे रोएं होते हैं। इसी तरह मुख्तलिफ जानवरों के दांतों की बनावट भी उनकी ज़रूरियात के मुताबिक है। गोश्तखोर जानवरों के दांत लंबे, नुकीले और ज़रा ख़मदार (मुड़े हुए) होते हैं, ताकि वह कच्चे गोश्त को आसानी के साथ चीर-फाड़ सकें। घास खाने वाले जानवरों के सामने के दांत सीधे चाकू की फाल की तरह तेज़ होते हैं, ताकि वे घास को आसानी से काट सकें। उनके चबाने वाले दांत भी चपटे और मज़बूत होते हैं। फितरत का यह एक मुसल्लमा मसला (सर्वमान्य नियम) है कि इस्तेमाल से आजा-ए-जिस्म (शरीर के अंगों) के नश्वो-नुमा (विकास) में तरक्की होती है। बढ़ई की कलाई के रग और पुट्ठे शबोरोज़ (रात-दिन) के इस्तेमाल से निहायत मज़बूत हो जाते हैं। अला हाज़ल क़यास (इसी प्रकार) जिस्म के हर एक उज़्व (अंग) को जुदागाना (अलग-अलग) ताकत पहुंचाने के लिए खास-खास खेल और कसरतें मुकर्रर हैं। बरअक्स इसके अगर किसी उज़्व को बेकार छोड़ दो तो रफ़्ता-रफ़्ता उसकी ताकत ज़ाइल (व्यर्थ/नष्ट) हो जाती है, रगें सुस्त हो जाती हैं और वह अपना फ़र्ज़े-मंसिबी (स्वाभाविक कर्तव्य) अंजाम नहीं दे सकता। ऐसी मिसालें बसा-औकात (कभी-कभी) साधुओं में मिलती हैं जो नफ़्सशिकनी (आत्म-दमन) के एवज़ आज़ाशिकनी (अंग-भंग) कर बैठते हैं। कोई मुंह साध लेता है। इशारों-किनायों से अपने-अपने खयालात का नाकाफी तौर पर इज़हार करता है। आखिर चंद बरसों में जुबान बेकार पड़े रहने से कुव्वते-गोयाई (वाक्-शक्ति) से महरूम हो जाती है। कोई यह खयाल करके कि नफसानी हरकात हाथों ही से सरज़द होते हैं, हाथों के इस्तेमाल से हाथ उठा लेता है। इसका नतीजा भी मालूम है। फितरत का यह मसला और आज़ा (शरीर के अंगों) की तरह दांतों पर भी रास्त आता है। गोश्तखोर जानवरों के केनाइंस और घास खाने वालों के इंसीसर्ज़ और दांतों से ज़्यादा बड़े और मज़बूत होते हैं। हत्ता कि बसा-औकात (कभी-कभी) किस्म अव्वल के जानवरों के इंसीसर्ज़ और किस्म दोयम के जानवरों के केनाइन होते ही नहीं। या तो फितरत ने इनको ये दांत अता ही नहीं किए या पुश्त-हा-पुश्त बेकार पड़े रहने से उनका वजूद ही जाता रहा।
हाथी-दांत कहां से आता है?
यहां हम उन जानवरों का मुख्तसर हाल लिखते हैं जिनके दांतों से हाथी-दांत निकलता है।
1. हाथी, जैसा कि आमतौर पर मालूम है, घास खाने वाले जानवरों में से है। पर इसके इंसीसर्ज़ दूसरे दांतों से ज़्यादा बढ़ते हैं। इन दांतों की हैरत-अंगेज़ बालिदगी (बढ़ोतरी) की एक और वजह यह भी है कि दांतों के नीचे वाली कतार में इस किस्म का कोई दांत नहीं होता कि उनकी बालिदगी में मुखिल (बाधक) हो सके। हाथी दो किस्म के होते हैं—एक अफ्रीका का हाथी और दूसरा एशिया का। अफ्रीका का हाथी तमाम अफ्रीका में पाया जाता है और एशियाई हाथी से कद्दो-कामत (कद) में कुछ निकलता (बड़ा) होता है। चुनांचे उसके दांत भी एशियाई हाथी से बड़े होते हैं। अफ्रीकी हाथी बिलउमूम (सामान्यतः) दनदार (दांत वाले) होते हैं। हत्ता कि हथिनियों में भी बाज़ ऐसी होती हैं जिनके दांत होते हैं। अफ्रीका के वहशियों ने इस जानवर का शिकार करने के लिए मुख्तलिफ तरीके निकाले हैं।
हाथी उमूमन गोल बांधकर चरने के लिए निकला करते हैं। पस जब वह ऐसे मुर्गज़ारों (चरागाहों, जंगलों) में निकलते हैं जहां घास सूखी और लंबी होती है तो शिकारी उन मुर्गज़ारों में आग लगा देते हैं। जब चौतरफ़ा शोला ही शोला नज़र आने लगता है तो हाथियों का गोल कहीं निकलकर जा नहीं सकता और दम घुट जाने से या जल जाने से वह वहीं ढेर हो जाता है। गो इस तरह शिकार करने से सैकड़ों का वारा-न्यारा दम-के-दम में हो जाता है, मगर उसमें अलावा इसके कि वहशियानापन और फसादे-कल्बी (कठोर-दिली) का इज़हार होता है, एक नुक्स यह भी है कि आग की आंच लग जाने से दांत स्याह हो जाते हैं और अक्सर जलकर चूने की तरह भुरभुरे हो जाते हैं।
दूसरा तरीका यह है कि हाथियों के चरागाहों में बड़े-बड़े गड्ढे खोदते हैं और उन पर पतली-पतली लकड़ियां बिछाकर घास-फूस, पत्ते वगैरा से ढक देते हैं। जब हाथियों का गोल खतरे से बेखबर चरता हुआ आ निकलता है तो इन गड्ढों में गिर पड़ता है और किसी तरह नहीं निकल सकता। शिकारी उनको हफ्तों तक भूखा पड़ा रहने देते हैं। आखिर जब वे गिज़ा के न मिलने से नक़ाहत (कमज़ोरी) से बेदम हो जाते हैं तो उनको एक-एक करके निकाल लेते हैं। ज़िंदा निकालना उसी सूरत में होता है जब कि शिकारियों को गोश्त की ज़रूरत होती है। अगर सिर्फ दांत लेना चाहते हैं तो बेचारे हाथियों को गड्ढों में भूखों मार डालते हैं।
अफ्रीकी हाथी का हाथी-दांत निहायत कीमती होता है। इसका वजन 80 पौण्ड से 100 पौण्ड तक होता है। मगर बाज़-औकात ऐसे दांत भी पाए जाते हैं जिनका वजन 400 पौण्ड होता है और लंबाई 10 फुट। इस किस्म के एक जोड़ी दांत की कीमत एक हब्शी को पांच हजार पौण्ड तक मिल जाती है।
एशियाई हाथी, जैसा हम पहले कह चुके हैं, अफ्रीकी हाथी से डील-डौल में कुछ दबता होता है और बर्मा, स्याम, लंका, गुजरात व चंद दीगर जंगली मुकामों में पाया जाता है। इस किस्म में सिर्फ हाथियों के दांत होते हैं, हथिनियां अमूमन बिला दांत के होती हैं।
2. दूसरा जानवर, जिसके दांत से हाथी-दांत निकलता है, दरियाई घोड़ा (हिप्पोपोटेमस) है। यह जानवर सुअरों की किस्म से है मगर हिन्दुस्तानी सुअरों से कहीं जसीम (बड़े शरीर वाला) होता है। ऊंचा तो भैंस से ज़्यादा नहीं होता, मगर लंबाई में भैंस का ड्यौढ़ा है। इसका वतन अफ्रीका है। चूंकि वहां की आबो-हवा निहायत गरम होती है और यह जानवर गर्मी को बर्दाश्त नहीं कर सकता, अमूमन दरिया के किनारे सायेदार मुकामों में रहता है और सारा दिन पानी में डूबा रहता है। गो इसकी खुराक घास, नबातात (छोटे-छोटे पौधे) हैं और कायदे के मुताबिक इसके इंसीसर्ज़ बढ़ने चाहिए, मगर चूंकि हिफ़ाज़त (बचाव) के लिए दूसरे जानवरों से लड़ना और उनको ज़ख्मी करना पड़ता है—इस काम के लिए कैनाइन ज़्यादा मौज़ूं होते हैं और ये ही दांत दूसरे दांतों से ज़्यादा बढ़ते और हाथी-दांत के काम में आते हैं। यह हाथी-दांत निहायत सख्त, सफेद होता है और जल्दी खराब नहीं होता। मगर इतना बड़ा नहीं होता कि इससे चारपाई के पाए या शमादान या इस किस्म की आराइश (सजावट) की कोई दूसरी चीज़ें बन सकें। इससे सिर्फ शतरंज के मोहरे, चौपड़ के पासे, बिलियर्ड खेलने की गेंद और नकली दांत बनाते हैं।
इस जानवर का शिकार करने का वहशियों ने यह तरीका निकाला है कि लोहे के लंबे-लंबे नोकदार भाले बनवाते हैं और किश्तियों में बैठकर शिकार को निकलते हैं क्योंकि दरियाई घोड़ा ज़्यादातर पानी में ही रहता है। मगर चूंकि तबअन (स्वभावतः) वह खुश्की का जानवर है, पानी में दो-तीन मिनट से ज़्यादा नहीं ठहर सकता, पस (इसीलिए) ज्यों ही हवा में सांस लेने के लिए वह सिर को बाहर निकालता है, त्यों ही शिकारी, जो ताक में रहते हैं, अपने-अपने भाले उस पर सर करते हैं और आखिर मुतवातिर वारों से घबराकर वह पानी में डूब जाता है, मगर तनफ़्फ़ुस (सांस) की ज़रूरत चंद मिनटों में फिर सिर को बाहर निकालने पर मजबूर करती है और फिर पहले की तरह भालों की बौछारें पड़ने लगती हैं। यहां तक कि यह जानवर खून के ज़ाया हो जाने पर या कारी (घातक) ज़ख्मों के लगने से मर जाता है और कई घंटों के बाद इसकी लाश पानी में तैरती दिखाई देती है। बाज़-औकात तो वह इतना बरहम (क्रोधित) हो जाता है कि अपने हमला करने वालों की किश्ती को उलट देता है और शिकारियों का शिकार कर डालता है। मगर खिलक़तन (स्वभावतः) किसी कदर डरपोक होता है और ज्यों ही शिकारियों की बू इसकी नाक में पहुंचती है, वह भाग जाने की कोशिश करता है, यहां तक कि बाज़-बाज़ एक रात में सैकड़ों मील तय करते हुए पाए गए हैं।
आज से चालीस-पचास बरस पहले इस जानवर का वजूद योरोपी दुनिया में मुतलक़ (पूर्णतः) मालूम न था। मगर अब तो वह योरप के अजायबखानों में आमतौर पर देखा जाता है। इसकी खाल एक इंच से ज़्यादा मोटी होती है। बंदूक की गोली अगर सिर में न लगे तो उसे मार नहीं सकती। अफ्रीका के वहशी इसका गोश्त बड़े चाव से खाते हैं, और एक अंग्रेज सैयाह (पर्यटक) का कौल है कि इसका गोश्त दुबले हिरन के गोश्त से ज़्यादा लज़ीज़ होता है।
3. तीसरा जानवर, जिसके दांत से हाथी-दांत निकलता है, वालरस (Walrus) या दरियाई शेर है। यह जानवर योरप के शुमाली समंदर में पाया जाता है। ये खित्ते (इलाके) साल के बड़े हिस्से में बर्फ से ढके रहते हैं। वालरस गोश्तखोर जानवरों की किस्म से है। बस इसके दो केनाइन बहुत ज़्यादा बढ़ते हैं। मगर इसका हाथी-दांत बहुत कीमती नहीं होता क्योंकि इसकी रंगत ज़र्द-माइल (पीलापन लिए) होती है और बहुत जल्द खराब हो जाता है।
कहते हैं कि इस जानवर में अक़्ले-इंसानी का जितना हिस्सा है उतना शाज़ (शायद ही) किसी दूसरे जानवर में न होगा। यह चश्मदीद रिवायत है कि एक बार किसी शिकारी ने एक वालरस पर बंदूक चलाई। वह इस गोली से हलाक न हुआ और फौरन पानी में डूब गया। दस-पंद्रह मिनट के बाद बहुत से दरियाई शेर किश्ती के आस-पास तैरते दिखाई दिए और किश्ती को अपनी पुश्त से उलट देने की कोशिश शुरू की। पहले तो शिकारी बहुत खाइफ़ (भयभीत) हुए, मगर कोई चारा न देखकर बंदूकों की मुतवातिर बाढ़ें सर करनी शुरू कीं। तब कहीं जा के यह बला सिर से टली।
4. आज से कई हज़ार बरस पहले साइबेरिया में एक खास किस्म का हाथी पाया जाता था जो मौजूदा हाथियों से कद-व-कामत (लंबाई) में कहीं बड़ा होता था और जिसके जिस्म पर बड़े-बड़े रोएं हुआ करते थे। अब यह जानवर सफ़्हा-ए-ज़मीन पर कहीं भी नहीं रहा। इसको उल्मा-ए-इल्मे-हैवानात ने इंगलिश में Mammoth (मैमथ) कहा है। साइबेरिया दुनिया के निहायत सर्द हिस्सों में है और वहां बरफबारी की यह हालत है कि एक-एक रात में ज़मीन पर कई-कई फुट बरफ जम जाती है। अगर कोई ज़ीरूह (प्राणी/जीव) किस्मत का मारा इन बरफ के तौदों (टीलों) के तले दब गया तो फिर उसको उठना नसीब न होगा। गालिबन हाथियों का भी यही हाल हुआ, क्योंकि आजकल जब बरफ मामूल से ज़्यादा पिघल जाती है तो कभी-कभी हड्डी और दांत के ढेर मिलते हैं। वाज़ेह रहे कि बर्फिस्तानी मुकामों में सरदी के बाइस चीज़ें नहीं सड़तीं। और ये दांत बावजूद हज़ारों बरस से पड़े रहने के अब तक सही-व-सालिम पाए जाते हैं। हां, बाज़-बाज़ हालातों में वह चूने की तरह भुरभुरे हो जाते हैं। इन दांतों और हड्डियों के अंबार-के-अंबार का मिलना यह साबित करता है कि Mammoth गोल बांधकर रहा करता था और वक़्तन-फ़वक़्तन गोल-का-गोल इन्हीं बरफ़ानियों का शिकार हुआ करता था। इन दांतों से निकला हुआ हाथी-दांत अदना दर्जे का होता है, क्योंकि मुद्दत तक पड़े रहने से इसकी खूबी में कुछ-न-कुछ फर्क आ जाता है। अलावा इसके ज्यों ही वह बरफ से निकलता है, इसमें ज़माने का असर होने लगता है।
हाथी-दांत की खासियतें
हाथी-दांत हड्डी से बहुत मुशाबेह (समान/एकरूप) होता है। हत्ता कि (यहां तक कि) दोनों में तमीज़ (पहचान) करना आसान काम नहीं। हड्डी भी सख्त व सफेद होती है और हाथी-दांत भी। मगर यह ज़्यादा वजनी, ज़्यादा चिकना होता है और इसके अज्ज़ा (अंग/घटक) आपस में खूब जुटे होते हैं। सबसे नुमायां और बारीक-सा फर्क यह है कि हाथी-दांत में पतली-पतली स्याही-माइल धारियां होती हैं जैसी संगमरमर और अक्सर लकड़ियों में हुआ करती हैं। ऐसी धारियां हड्डियों में मुतलक़ (बिल्कुल) नहीं होतीं। जब बाज़ार में हाथी-दांत की कोई चीज़ खरीदने जाओ तो पहले इसे खूब गौर से देखो। अगर इसमें धारियां नज़र आएं तो इसके हाथी-दांत होने में कोई कलाम (संदेह) नहीं, वरना समझ लो कि हड्डी है।
हाथी-दांत के इस्तेमाल
हाथी-दांत ऐसी खूबसूरत, देरपा (स्थायी) शै है कि इससे रोज़ाना ज़रूरियात व तकल्लुफ़ात (दैनिक और विलासिता) की हज़ारों चीज़ें बनाई जाती हैं, जैसे चाकू के दस्ते, छाते और छड़ियों की मूठें, बटन, सतही पैमाने, अंगरेज़ी कलम के होल्डर, फिटरन वगैरा निहायत आम चीज़ें हैं। इसके नकली दांत भी बनते हैं जो बड़े दामों पर फरोख्त होते हैं। जापान और चीन में हाथी-दांत पर इस खूबी व सफाई से नक्काशी करते हैं कि ये दोनों मुल्क इस सनअत (शिल्प) के लिए मशहूर हैं। यूनान की पुरानी खानकाहों (मठों/आश्रमों) में हाथी-दांत की तराशी हुई मूरतें पाई जाती हैं, जो बावजूद दौरे-अय्याम के अभी तक ज़माने के हाथों से बची हुई हैं। मारवाड़ में इसकी चूड़ियां आमतौर पर इस्तेमाल की जाती हैं। अमृतसर में इसके रेशेनुमा तार को तराश कर खूबसूरत मोर्चल बना लेते हैं जो बिल्कुल बाल के मालूम होते हैं। आबनूस की लकड़ी जो कि बहुत स्याह होती है, इसलिए इस पर हाथी-दांत की कलियां, खूबसूरत फूल वगैरा निहायत ज़ेब (सुंदर) दिखाई देते हैं। मैसूर में हाथी-दांत का काम अभी तक अच्छा बनता है।
अभी हाल में महाराजा साहब बहादुर बनारस के पास चंद आबरंग चीज़ें थीं जो उन्होंने लार्ड कर्ज़न की नज़र कर दीं। हिन्दुस्तान में मुश्किल से कोई पुराना कदीमी घराना होगा, जहां हाथी-दांत की दो-एक नादिर (नायाब) अशिया (चीज़ें) न पाई जाएं। ऐसी नायाब चीज़ें गो अब तकरीबन मादूम (लुप्त) हैं और न उनका कोई पुर्सां-हाल है, मगर कदीमी सनअतों को देखकर हम कह सकते हैं कि हिन्दुस्तान में हाथी-दांत की नक़्शकारी आला दरजे पर पहुंची हुई थी। अहमदाबाद और मद्रास की नुमाइशगाहों में, जो नेशनल कांग्रेस के ज़माने में मुनअक़िद (आयोजित) हुई थीं, हाथी-दांत की अजीबोगरीब चीज़ें पेश की गईं। उनको देखने से मालूम हुआ कि हिन्दुस्तान अब भी अहले-फ़नकारों से खाली नहीं है, मगर ज़माने की नाक़द्री ने इनको दिलशिकस्ता बना दिया है।
हाथी-दांत की तिजारत
योरप तमाम ज़माने की तिजारत का मरकज़ हो रहा है। चुनांचे हाथी-दांत की खरीदो-फरोख्त का बाज़ार भी वहीं लगता है। कुल योरप में दो शहर बिलखुसूस इसकी तिजारत के लिए मशहूर हैं—लंदन और लिवरपूल, इंग्लिस्तान में और एंटवर्प, बेल्जियम में। अंगरेज़ी मक़बूज़ात (आधिपत्य) में जहां कहीं हाथी-दांत पाया जाता है (मसलन हिन्दुस्तान, बर्मा, लंका, मशरिक़ी अफ्रीका, जनूबी अफ्रीका) वहां से लंदन या लिवरपूल को भेजा जाता है, क्योंकि मुल्की ताल्लुकात से तिजारती ताल्लुकात बढ़ते हैं। कांगो की खुदमुख्तार सल्तनत जो वस्ती (मध्य) अफ्रीका में है, हाथी-दांत का सबसे ज़रखेज़ अंबारखाना है, क्योंकि वहां हाथी और दरियाई घोड़ा बरकत से पाए जाते हैं, और चूंकि हाथी-दांत वहां तिजारत की कीमती चीज़ समझा जाता है, इन जानवरों की कानूनन मुहाफ़ज़त (हिफ़ाज़त) की जाती है। इस सल्तनत का मुल्की ताल्लुक बेल्जियम से है, क्योंकि पहले-पहल डच/बेल्जियम लोगों ने इस खित्ते को नौ-आबाद किया था। बस यहां का हाथी-दांत एंटवर्प को जाता है जो बेल्जियम का तिजारती मुकाम है। हिन्दुस्तान में इसको खास तिजारती चीज़ नहीं समझते, बस ताजिरों (व्यापारियों) का खयाल भी इसकी जानिब कम रागिब (आकृष्ट) है।
हाथी-दांत के मुतअल्लिक़ चंद मुतफ़र्रिक़ मालूमात
लकड़ी की तरह हाथी-दांत में बाज़-औकात बदनुमा धब्बे और दाग पड़ जाया करते हैं जिससे इसकी वक़अत (मूल्य) में फर्क आ जाता है। बाज़-औकात सीधे बढ़ने के बजाय निस्फ (अर्द्ध) दायरानुमा शक्ल में बढ़ते हैं, जिससे उसका हाथी-दांत भी टेढ़ा हो जाता है। जैसे गीली लकड़ियों की बनी हुई चीज़ों में सूखने पर इस क़दर ख़म (टेढ़ापन) आ जाता है, उसी तरह ताज़ा हाथी-दांत की चीज़ों में भी।
बस, क़ब्ल इसके कि इससे चीज़ें बनाई जाएं, इसको धूप में अच्छी तरह खुश्क कर लेते हैं। कम उम्र का हाथी-दांत ऐसा ठोस नहीं आता जैसा पुराने हाथी का। अमूमन मग्ज़दंदाँ दांतों के सिरे की तरफ होता है। जड़ खोखली हुआ करती है। हाथी-दांत को बाज़-औकात तराशकर किताबों के-से पतले-पतले औराक़ (पन्ने) बना लेते हैं और केमिस्ट्री हमको उन मुरक्कबात (यौगिकों) का पता बतलाती है जिससे हम इन औराक़ पर हुरूफ कुंदा (अक्षर उत्कीर्ण) कर सकते हैं।
प्रकाशन इतिहास
[उर्दू लेख। 'उर्दू-ए-मुअल्ला' उर्दू मासिक पत्रिका, अक्टूबर, 1904 में प्रकाशित। हिन्दी रूप 'प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य' खण्ड-2 में संकलित।]
