धोखे की टट्टी का मूल पाठ
लाल मिर्च देखने में कैसी खूबसूरत होती है, मगर खाने में कैसी कड़वी ' सुरेन्द्र की भी यही कैफियत थी, दखने में बहुत खुशवजा (परम्परा पर दृढ़) ख़ुशलिवास (चारु-वेष), ज़बान का बहुत मीठा, दोस्तों में बहुत हरदिल-अजीज, मगर बला का नफ़्सपरवर (विषय-लोनुप, ऐयाश), बदइख़्लाक, शरीर (उपद्रवी)। मदरसे की एण्ट्रेंस जमात में पढ़ता था। सिन (आयु) सोलह साल से ज़ियादा न था, मगर मिजाज में अभी से आवारगी का दखल हो चला था। शराब की लज्जतों (मजे, लुत्फ) से जवान मानूस (भयमुक्त) हो चुकी थी और घर के सन्दूक खोलकर रुपये चुरा लेना तो एक मामूली बात थी। वाल्देन समझा-बुझाकर हार गये, स्कूल मास्टरों ने मारपीट, जुर्माना, सब-कुछ अजमा देखा, मगर सुरेन्द्र ने जो रविश (चाल-चलन, आचार-व्यवहार) अख़्तियार की थी, उसमें ज़रा भी न मुड़ा। शहर में कहीं बारात आये, कहीं नाच हो, कहीं ऐशो-तरब (भोग-विलास एवं आनन्द) की महफिल सजे, सुरेन्द्र का वहाँ पहुँचना शर्ती अम्र (अनिवार्य कार्य) था। उसे कभी किसी ने किताब पढ़ते न देखा, मगर ताज्जुब यह था कि वह हर साल इम्तिहान में कामयाब हो जाता था। इसका राज़ वजज (अतिरिक्त) उसके ख़ास दोस्तों को और कोई न जानता था। हाँ, इम्तिहान क दिनों में वह हेडमास्टर और दीगर मास्टरों के मुलाजिमों से ज़ियादा रब्तोजब्त (मित्रता) कर लेता । आम वाल्देन उस वक्त तक लड़कों की तरफ से मायूस नहीं होते, जब तक वो एक ही दर्जे में बराबर फेल न हों। सुरेन्द्र ये नौबत नहीं आने देता था और इसलिए उसके वालिद, जो एक बहुत मुत्मइन (बेफिक्र) आदमी थे, उससे जियादा वाजपुर्स (पूछताछ) न करते | सुरेन्द्रू में एक बड़ा वस्फ (गुण) यह धा की उसकी निगाह इंसान के कमजोर हिस्से पर बहुत जल्द जा पहुँचती थी और इस वस्फ से उसका बहुत काम निकलता। कोई स्कूल-मास्टर ऐसा न था, जिसके दाग और धब्बे उस पर रोशन न हों। इस गुर ने उसे एण्ट्रेंस तक निभाहा। यहाँ तक कि एण्ट्रेंस का सालाना इम्तिहान आया, सुरेन्द्र ने इस मौके के लिए बड़े एहतिमाम (प्रबन्ध) किये थे। अब स्कूल-मास्टर उसके ख्लैर-अंदेश (शुभचिन्तक) बन गये थे। कामयाबी की सब सूरतें उसके मुआफिक् (अनुकूल) थीं। मगर ऐन उस वक्त जबकि उसकी दुज़्दीदी निगाहें (चुराई हुई नजरें) दौड़-दौड़कर बरसों का काम लम्हों में पूरा किये देती थीं, एक गरजती हुई आवाज उसके कान में आई, “सुरेन्द्र, कलम रख दो । तुम्हें अब लिखने की इजाजत नहीं है।'
सुरेन्द्र ने माथा पीट लिया। यह हेडमास्टर साहब थे। इश्तहारी मुज़रिम गिरफ्तार हो गया और उसका नाम स्कूल से खारिज कर दिया गया।
2
सुरेन्दू के लिए अब वजज (अतिरिक्त) इसके और कोई चारा न था कि कहीं और तालीम का सिलसिला कायम करे, मगर इस हादिसे ने उसके दिल पर कोई इस्लाहबख्श (सुधारपूर्ण] असर नहीं पैदा किया। इसने तो मुँह माँगी मुराद पाई। उसे अब नई दुनिया देखने का, नई दिलचस्पियों के लुत्फ उठाने का, नये दोस्तों की पोहबत का मौका हाथ आया। किसी दूसरी सूरत में ये आरजुएँ मुश्किल से पूरी होतीं। अब वो खुद-ब-खुद उसके रूबरू दस्तबस्ता (हाथ बाधे हुए) खड़ी थीं। वह जिस वक्त मदरसे से चला, उसका चेहरा कुछ तमतमाया हुआ था, मगर ये गुस्सा बहुत जल्द ठण्डा हो गया। खुश होकर कहा, “मुल्के खुदा तंगनेस्त (ईवर की दृष्टि इतनी संकुचित नहीं है)।” लेक्नि अब कलकत्ता-यूनिवर्सिटी में दाखिला गैर-मुमकिन था और इलाहाबाद-यूनिवर्सिटी ग॑ कोई सूरत न निकली, इसलिए सीधा लाहौर जा पहुँचा और वहाँ एक मदरसे में शरीक हो गया। क्रिकेट का जबरदस्त खिलाड़ी, फुटबॉल में मुशाक (सिद्धहस्त), शक््लो-सूरत का जण्टलमैंन, फ्राखदिल (दिल खोलकर खर्च करने वाला, बुलन्द-हौसला)। ऐसा तालिबे-इल्म (विद्यार्थी) जहाँ जाये, उसे दोस्तों की कमी न रहेगी। लाहौर में बहुत जल्द दोस्तों की काफी तादाद हो गई और फिर वही चहचहे और कहकहे उड़ने लगे, मगर जरा एतिहात के साथ, शर्म का पर्दा रक्खे हुए। सुबह को बागों की सैर, शाम को क्रिकेट और फुटबॉल। रात को रिंदी-ओ-मेनोशी (शराब के दौर), फिर तरन््नुम परवाजियों के मश्गले (वेश्या-नृत्यों में तल्लीनता)। कभी-कभी इन्हीं अगशल (धंधों) में रातें गुजर जातीं, मगर ये सब आजादियाँ और मस्तियाँ चंद वर्जिदा (अभ्यस्त), मोत्तेमद (विश्वासी) अहबाब (मित्रों) तक मरदूद थीं, वरना आमतौर पर ये हज़रत बहुत फिरिश्तासिफ़्त (दैवीय गुण-संपनन), मोहतात (सेंभलकर चलने वाला), हलीम-ओ-सलीम (सहनशील एवं शांतिप्रिय) मशहूर थे। यहाँ तक कि कॉलेज के प्रिंसिपल मि. काटन, जबकि लड़कियों के मदरसे का मुआइना करने जाते तो कभी-कभी सुरेन्द्र को अपनी इम्दाद के लिए साथ ले जाते। मुबारक होता वो दिन जब बंका, सजीला सुरेन्द्र लड़कियों के मदरसे में दाखिल होता, हेड मिस्ट्रेस मिस गुप्ता का मुस्कराकर उससे हाथ मिलाना, आह ! उस कफे-बलोरीन (नर्म हथेलियों) का उसके हाथ में आना आँखों में नशे के एक तूफान का आना था। उसका दिल उमंग से फूल उठता और दिल की फरहत (प्रसन्नता) और शिगुफ़्तगी (ख़िलावट) उसकी सूरते-जेबा (मनोरम आकृति) का रंग और भी चोखा कर देती । फिर ये एक कुदरती बात थी कि मिस गुप्ता को उसकी होने वाली बीवी पर रश्क् आता।
एक दिन सुरेन्द्र कॉलेज से आ रहा था कि कलकत्ता के एक पुराने रफीक् (दोस्त) से आँखें चार हुईं। ये बाबू हरिमोहन थे। उन्हें देखते ही सुरेन्द्र का खून सर्द हो गया। हरिमोहन उसकी नाहमवारियों (अशिटताओं, उजड्डपन) के करिमे अपनी आँखों से देख चुके थे। बहुत घबराया, मगर तपाक से बढ़कर सलाम किया और खैरो-आफियत पूछीं | हरिमोहन ने उसे सिर से पैर तक देखा | ख़ाका वही था, मगर रंग नया। कुछ इधर-उधर की बातें हुई। जब अलेहदा होने लगे तो सुरेन्द्र ने बहुत मिन््नत-आमेज लहजे में कहा, “भाई साहब, जिसे खुदा ने ख़राब बनाया है, वह कभी अच्छा नहीं हो सकता। मैंने बहुत कोशिश की कि नेकबख़्त बन जाऊँ, मगर ना बन सका। हाँ, नेकबख़्ती की शोहरत हासिल कर ली। यहाँ बजज आपके कोई दूसरा मेरे हालात से वाकिफ नहीं है। इसलिए मुझ गरीब पर नजरे-इनायत रखियेगा। आप चाहें तो बात की बात में मेरा रंग फीका कर सकते हैं। में बिल्कुल आपके बस में हूँ, मगर मुझे आप पर भरोसा है। आपको मैं हमेशा अपना बुजुर्ग और खैर-अंदेश समझता रहा हूँ।'
सुरेन्द्र की बारीक निगाहें हरिमोहन के कमजोर हिस्से पर जा पहुँचीं। उनके चेहरे पर हमदर्दाना (सहानुभूतिपूर्ण) मुस्कराहट नजर आई। बोले, “मुझे तुम हमेशा अपना दोस्त समझना ।
3
सुरेन्द्र ने लाहौर में एक बड़ा काम सर-अंजाम किया। उसने एक “यंगमैन यूनियन” कायम कर ली और खुद उसका सेक्रेटरी बन बैठा। इस यूनियन के मकुसद (उद्देश्य) बहुत आला थे, नौजवानों के आदाब-ओ-इख्लाक की तहजीब, इल्मी और अमली तरक्की, इत्तिफाके-बाहमी । (पारस्परिक एकता और मैत्री) की इशाअत (प्रचार-प्रसार) वगैरा । मेम्बरों को कुछ माहवारी चन्दा देना पड़ता और अजरुए-हल्फ (शपथ के अनुसार) इकरार करना पड़ता कि में इस यूनियन के किसी मेम्बर को किसी आफत में देखूँगा। तो हर मुमकिन सूरत से उसकी मदद करूँगा। चन्दा की रकम से चन्द अख़बार आते और जो कुछ बचता वो कारे-खैर (भलाई के कामों) में सर्फ होता। इस काम में सुरेन्द्र को शानदार कामयावी हासिल हुई। एक माह के अन्दर यूनियन में पचास से जियादा मेम्बर हो गये। पच्चीस रुपये माहवार चन्दा आने लगा। पाँच यतीमों और कई बेवाओं की परवरिश होने लगी । इस कामयावी का सेहरा मिस्टर सेक्रेटरी के सिर था, जिसकी शोहरत दिन दूनी और रात चौगुनी हुई जाती थी। प्रिंसिपल कॉटन उसे पहले ही से मानते थे, अब मुरीद (भक्त) हो गये। शहर में यूनियन की चर्चा होने लगा, मगर ये शानदार नाम का यूनियन बजज़ शोहदों की एक जमात के और कुछ नहीं था। मुख़्तलिफ कोलेजों के जितने औबश (लम्पट लोग, शोहदे), आवारामिज़ाज, बदवजा (अशिष्ट शील-स्वभाव), बदकुमाश (दुराचारी), सैलानी तुलबा (विद्यार्थगण) ये सब इसके मेम्बर थे। यूनियन का कमरा उनकी दिलबस्तगियों (मनोरंजन) का अखाड़ा था। यहाँ वो गाते-बजाते और यहाँ ही रिन्दाना मजलिसें आरास्ता होतीं, क्यूँ कि फने-मौसीकी (संगीत-कला) की इशाअत (प्रचार-प्रसार) भी यूनियन के प्रोग्राम में शामिल थी। यूनियन के सारे मेम्बर सुरेन्द्र को अपना रहबर और पेशवा तस्लीम करते थे। उसने हरेक के दिल में यह बात जमा दी थी कि अगर तुम बिला मेहनत और मशक्कत (कष्ट) के इम्तिहान पास करना चाहते हो तो वजज़ इसके कोई इलाज नहीं कि यूनियन के रुकन (सदस्य) बन जाओ सुरेन्द्र इम्तिहानी पर्चों की सुरागसानी में यदेतूला (अत्यधिक कुशल) था और यही उसके असर और दबाव का राज था। कॉलेज में सुरेन्द्र की वही इज्जत थी जो किसी प्रोफेसर की। शहर में उसके आगे अच्छे-अच्छों के सिर झुक जाते, चूँकि कई वार उसे इस माकूला के अमली सबूत देने का मौका मिल चुका था कि इत्तिफाक एक जबरदस्त ताकत है।
यूनियन के मेम्बरों की ज़िन्दगी वाकई काबिले-रश्क् थी। इम्तिहान के दिन सिर पर आ गए थे। आम तुलबा (छात्रों) पर ख़ाबोखोर (गहरी नींद) हराम हो गया था। रात-की-रात और दिन-के-दिन मशक््क॒ते और मुताला (परिश्रम और अध्ययन) के सिवा कोई काम न था। वर्जिश का मैदान, क्लब, लाइब्रेरी सब वीरान पड़े हुए थे। हर उम्मीदवार किसी संन्यासी की तरह मुराकबा (समाधि, अन््तर्लीन) में बैठा हुआ नज़र आता था। जिसे देखिये अपनी कोठरी में समाधि लगाये बैठा है। इस शबानारोज़ (रात-दिन) की दीदारेजी (आँखों पर ज़ोर डालना, बहुत सोच-विचार) और दिमागसोजी (माथा-पच्ची) ने दर्दे-सर, दर्दे-चश्म (आँखों में दर्द), शिकले-हज्म (अपाचनता), बुखार और दीगर अवारिज़ (अन्य बीमारियों) का एक तूफान बरपा कर दिया है। आँखें फोड़े की तरह दुख रही हैं, मगर किताब हाथ में है। मारे दर्द के सिर फटा जाता है, मगर पैंसिल हाथ से नहीं छूटती । बुखार से बदन तवा हो रहा है, मगर जवान दर्द से मसरूफ है। इधर तो ये आफतें थीं, उधर यूनियन के मेम्बर चैन की बाँसुरी बजाते थे। कभी गाना हो रहा है, कभी चाय-पार्टी, कभी पिकनिक, जिसे रखिये बेगम और बेफिक्र गुलछरें उड़ाता नजर आता है। किसी को इम्तिहान की जर्रा-बराबर फिक्र नहीं । यहाँ तक कि इम्तिहान के दिन आए और यूनियन के भग्ग्य जाग उठे। कॉलेज के आम तुलबा बमुश्किल बीस फीसदी कामयाब हुए। यूनियन के सौ मेम्बरों में सिर्फ पच्चीस फेल थे। लोगों को अचम्भा हो गया, मगर असल राज़ किसी की समझ में ना आया। वो सुरेन्द्र, जिसने ख़्वाब में भी किताब की सूरत न देखी, अव्वल दर्जा में पास हुआ।
4
इसी अस्ना (बीच) में मिस गुप्ता का तबादला हुआ और मिस रोहिणी सरकार कलकत्ता से उनकी जगह पर मुकरर होकर आयीं। रोहिणी हुस्नोअदा में मिस गुप्ता की नेमलबदल (पूर्णतः अनुरूप) थीं, उस पर तुर्रा ये कि दोशीज़ा (कुमारी)। सुरेन्द्र ने पहली निगाह से अपने शिकार को ताड़ लिया और रोहिणी भी पहली ही मुलाकात में उसकी मर्दाना वजा (ढंग), शरीफाना बशरा (चेहरा) और दिलफ्रेब बेतकल्लुफी से हद दर्जा मुतासिर (प्रभावित) हुईं। मिस गुप्ता ने उससे सुरेन्द्र की बेइन्तिहा तारीफें की थीं और इस तजकिरा (जिक्र) ने उसके दिल में सुरेन्द्र से एक लगाव-सा पैदा कर दिया था। उसने उसे उन तमाम औसाफ-ओ-कमालात (गुणों, खूबियों) से आरास्ता (विभूषित) पाया, जिनका अपने शौहर में मौजूद रहना वो जरूरी समझती थी। सर्वो नमाकृद (ऊँचा कृद), छरेरा बदन, मुस्कराता हुआ चेहरा, खुश-इख़्लाक, खुशबयान (मधुरभाषी), गो एक या दो मुलाकातें एक ऐसे अहम मामले में तस्फिया (निर्णय) करने के लिए काफी नहीं हो सकतीं, मगर सुरेन्द्र ने इतने दिनों भाड़ नहीं झोंकी थी। जब से होश सँभाला, उसने इसी कूचे की खाक छानी। इसी बहर (ढंग) की ख़्वाही की । उसने देख लिया कि मछली चारा कुतरने लगी, अब फेंसने में देर नहीं है।
रोहिणी दिन भर सुरेन्द्र की तारीफें सुनती । यूनियन के एक सौ मेम्बरों में से हरेक शख्स मौका और महल देखकर सुरेन्द्र का जिक्रे-ब्रैर उससे कर जाता। उनकी बीवियाँ, बहनें आती और उसका बखान करतीं। गर्ज सुबह से शाम तक इस तरह की बातें उसके कान में पड़ती रहतीं। यहाँ तक कि इन अमलीयात ने उस सादा बेलोस लड़की को मुहब्बत से दीवाना बना दिया। ये वशीकरण मन्तर अपना काम कर गया। अब रोहिणी को दर्दे-तन्हाई की कसम महसूस होने लगी। हर वक़्त अकेलेपन का ख़्याल दिल को सताने लगा। मकान और बाग और सैरगाहें सूनी मालूम होने लगीं। गर्ज आँखें आठों पहर सुरेन्द्र के इंतजार में रहने लगीं। एक भोला-भाला दिल नुमाइशात (छल-कपट) के नज़र हो गया।
जब ये मंजिल दुश्वार तय हो गयी तो मँगनी और ब्याह में क्या देर लगती ? ये दोनों मरासम (रस्में) बहुत सादगी और मतानत (संजीदगी) के साथ अदा किये गये। जिस वक्त आचार्य रस्ते-निकाह (विवाह-संस्कार) अदा कर रहे थे, सुरेन्द्र ऐसा मुताइयन (संजीदा) और मरऊब (दबा हुआ) नजर आता था, गोया वो इस नयी जिन्दगी की जिम्मेदारियों के ख्याल से दबा जाता है। जब दुआ-निकाह ख़त्म हुई तो सारे मजमा (भीड़, सभा) ने “आमीन” (तथास्तु) कहा। सिर्फ हरिमोहन की जबान से ये दुआ न निकली। यूनियन के मेम्बरों ने शादी की खुशी में एक जबर्दस्त और पुरशोर महफिल सजाई। रात भर हूँहक हुआ की । शराब के खुम के खुम (मटके पर मटके) खाली हो गये। खुशकिस्मती से सुरेन्द्र इसी साल बी. ए. में कामयाब हो गया। यूनियन की हैरतअंगेज कामयाबी ने सबको हैरत में डाल दिया। एक मेम्बर भी फेल न हुआ।
5
शादी हो गयी। दोस्तों ने खूब दिल खोलकर मुबारकबाद दी। बिलखुसूस (मुख्यतः) मिस गुप्ता तो फूली न समायीं। वो देहली से इस तक्रीब (विवाह) में शामिल होने के लिए आयीं। हफ़्ता भर तक जश्न हीते रहे। इसके बाद मियाँ-बीवी शिमला की सैर को रवाना हुए। यूनियन के मेम्बर, गर्ल्स स्कूल का स्टाफ और दीगर अहबाब रुख़सत करने के लिए स्टेशन तक आये। इसमें बाबू हरिमोहन भी थे। जब सब लोग रुखसत हो गये और इंजन ने चीख़कर गाड़ी खींची तो हरिमोहन ने भी बिदाई-मसाफा किया। उनकी आँखों में ऑसू और दिल में अफ्सोसनाक ख़्यालात भरे हुए थे। वो वहाँ खामोश गाड़ी की तरफ् टकटकी लगाये देर तक खड़े रहे। यहाँ तक कि वो नजरों से ओझल हो गयी। उनका दिल कहता था कि ये मुसर्रत का सफ्र नहीं, रंजोगम का सफ्र है। हे
महीना भर तक रोहिणी और सुरेन्द्र शिमला में रहे और इस महीने भर में उन्हें एक-दूसरे की खू-बू का पूरा तजुर्बा हो गया। शुरू में रोहिणी ने मिस गुप्ता को जो ख़तूत लिखे, वो इश्को-मुहब्बत के जज़्बात से भरे हुए थे। मिस गुप्ता इन ख़तूत को बार- बार पढ़तीं और सैर (सन्तुष्ट) ना होतीं, मगर रफ़्ता-रफ़्ता इन ख़तूत का रंग अंदो-वो-हसरत (क्लेह और निराशा) की तरफ माइल होने लगा। यहाँ तक कि आखिरी ख़त, जिसमें लिखा था, “आज हम लोग यहाँ से लाहौर रवाना हो रहे हैं”, बहुत दिलशिकन (हृदयद्रावक) था। उसमें आखिरी अल्फाज ये थे, “प्यारी बहन, मुझे ऐसा खौफ होता है कि इस ख़्वाबे-मुसर्रत (आनन्द के स्वप्न) से बहुत जल्द बेदार होना (जागना) पड़ेगा। जिस चीज को मैंने खालिस सोना समझा, वो महज चमकता हुआ पीतल निकला। अफसोस, मैंने अपनी मुहब्बत की दीवार बालू पर खड़ी की थी। खुदा करे, मेरे शुब्हे गलत हों। खुदा न करे, मेरे ये बशोसे (निराशापूर्ण शक) सही हों, मगर प्यारी वहन, मेरा दिल बार-बार कहता है कि और कुराइन (हालात) उसकी तस्दीक् (प्रमाणित) करता हैं कि हस्ती (अस्तित्व) का सर्माया खत्म हो गया। अब बक॒इया जिन्दगी रोने में कटेगी।'
मिस गुप्ता इस पुरदर्द ख़त को पढ़कर बहुत रोई | लाहौर में जब मालूम हुआ कि ये लोग वापस आ रहे हैं जो लोगों को ताज्जुब हुआ। दो महीने का सामान करके चले थे और कियास (अनुमान) रो +८० था कि वहाँ की दिलफ्रेबियों से इतनी जल्दी तबीयत आसूदा (सन्तुष्ट) न हो, मगर इसके बरअक्स (प्रतिकूल) ये लोग एक ही माह में उकता गये। जरूर कोई-न-कोई बात है। आखिर मुऊर्रा वक्त आया। अहबाब उनका खैर-मकृदम करने के लिए स्टेशन पर पहुँचे। गाड़ी आयी ओर मियॉ-बीवी उसमें से उतर पड़े। न कपड़ों का बक्स था, न ट्रंक, न बिस्तर | सुरेन्द्र की आँखें शराब से सुर्ख़ हो रहो थीं और रोहिणी, आह! वो नाशुगुफ़्ता (नया खिला) फूल अब मुर्मा कर जर्द (पीला) हो गया था। चेहरा ऐसा पसमुर्दा और अफ्सुर्दा (निचुड़ा हुआ) था, गोया (अतृप्ति और निराशा) की तस्वीर थी। बाद को मालूम हुआ कि सारा असबाब शराब की नज़र हुआ और जेवर जुए के। कान के आवेजे (बुंदे) तक न बचे।
6
लाहौर में आकर रोहिणी तो अपने दर्सोतालीम (शिक्षा देने में) मसरूफ् हुई और सुरेन्द्र मएकसी (शराब पीने में) में । यूनियन का शीराज़ा (संगठन) अब बिखर गया था, इसलिए बजज शराब के दिलबस्तगी (मनोरंजन) का और कोई जरिया बाकी न रहा। अगर कभी रोहिणी समझाने की कोशिश करती तो सुरेन्द्र के तेवर बदल जाते। प्रिंसिपल कॉटन ने ये समझकर कि बेकारी ने उसकी ये गत बना रक््खी है, उसे अकाउण्टेण्ट के दफ्तर में एक बहुत माकूल जगह दिला दी, मगर जिस शख्स की तहसील का जमाना (हासिल करने का समय) ख़रमस्तियों (गधे की तरह मस्तियों) में गुजरा हो, वो (बह से शाम तक दफ्तर में खुष्क कागजों और रूहफर्सा एदाद (आत्मा को तंग करने वाले हिसाब) के साथ क्यों कर
सर मारता ? एक रोज हेड क्लर्क ने उसे चन्द एदाद (गिनतियों) का मिजान मरत्तब (तैयार) करने का हुक्म दिया। मिजान लाखों तक पहुँचता था। सुरेन्द्र् एंदाद की लामिन्तनाही (अन्तहीन) कृतारों को देखकर ऐसा घबराया कि दफ्तर से बेतहाशा भागा कि घर पर आकर दम लिया। इसके बाद कई माह तक वो मुख़्तलिफ दफातर (दफ़्तरों) की खाक छानता रहा, मगर तलून और वहात (अनिच्छा और मूर्खता) ने कहीं कृदम न जमने दिया। यहाँ तक कि प्रिंसिपल साहब मायूस हो गये और जुमला दफातर (सभी दफ्तरों) के दरवाजे उसके लिए बन्द हो गये।
गरीब, बेकस रोहिणी अब अपने किये पर पछताती थी, मगर दिल पर जो गुज़रता, ख़ामोशी के साथ झेलती। कभी हफें-शिकायत जबान पर ना लाती। जब उसने देखा कि सुरेन्द्र को समझाने-बुझाने की कोशिश हमेशा सख्त कुलामियों (कठोर शब्दों) का बाइस होती है तो किस्मत पर शाकिर (ईवर को धन्यवाद देकर) होकर बैठ रही। किस्मत मायूसों की आड़ और बदनसीबों का सहारा है। अरराज़ात (खर्चो) के बाइस मुलाजिमों को जवाब देना पड़ा। बेचारी बेजबान औरत दिन भर लड़कियों को पढ़ाती और गिरिस्ती का सारा काम करती। इन मुसीबतों ने उसकी सूरत को यहाँ तक मंसख (बिगाड़) कर दिया था कि बाबू हरिमोहन जब मद्रास से साल भर के बाद लौटे, तो उसे मुश्किल से पहचान सके। इसके बाद मालूम नहीं उन बदनसीबों पर क्या गुजरी। प्रिंसिपल कॉटन ने आये दिन की हज्जत-ओ तकरार से तंग आकर रोहिणी से इस्तीफा ले लिया और खुदा जाने किस-किस देश की ख़ाक छानते हुए बाला आख़िर वो काश्मीर पहुँची। वहाँ से रोहिणी ने मिस गुप्ता को जो ख़त लिखा वो निहायत दर्दनाक और जिगरदोज था, “बहन, मेरा हाल क्या पूछती हो ? अब जिन्दगी से जी भर गया। मुझे अपनी कुछ फिक्र नहीं, मगर तुम्हारे बहनोई साहब की हालत निहायत खराब है। खुदा गवाह है, मैं अब भी उनकी परस्तिश (पूजा) करती हूँ। मैंने अपना सब कुछ उन पर निछावर कर दिया, मगर हाय ! शशब तेरा सत्यानाश हो, हाय ! जुआ तेरा बुरा हो। ये दो मर्ज उनकी जान के गाहक हो रहे हैं। बस और ज़्यादा न कहँगी ।*तुमसे कहते शर्म आती है, और शर्म की तो इतनी परवाह नहीं, क्यूँ कि मुद्दत हुई उसे रुख़सत कर चुकी, मगर तुम्हें सुनकर रंज होगा । बस यही समझ लो कि तुम्हारी भोली-भाली रोहिणी अब अपने किये पर पछताती और खून के आँसू रोती है।”
[प्रथम प्रकाशन उर्दू में। 'अदीब” (उर्दू मासिक पत्रिका), नवम्बर, 9]2 में प्रकाशित। हिन्दी रूप इसी शीर्षक से 'प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य” खण्ड-1 में संकलित ।]
धोखे की टट्टी का सारांश
'धोखे की टट्टी' बाह्य आकर्षण, सामाजिक पाखंड और दुर्व्यसनों के कारण होने वाले चारित्रिक व पारिवारिक विनाश की एक अत्यंत मार्मिक कहानी है। कहानी का मुख्य पात्र सुरेन्द्र बाहर से बेहद सजीला, सुंदर, शिष्ट, मीठी बोली बोलने वाला और खुशमिजाज युवक दिखाई देता है; परंतु भीतर से वह परम ऐयाश, मद्यपी, जुआरी और धूर्त प्रवृत्ति का व्यक्ति है। कलकत्ता के एक स्कूल में पढ़ते समय वह पढ़ाई से कोसों दूर रहता था और अध्यापकों व स्कूल के कर्मचारियों की कमजोरियों का फायदा उठाकर व नकल के सहारे कक्षाएँ पास करता था। अंततः एंट्रेंस की अंतिम परीक्षा में नकल करते समय हेडमास्टर द्वारा रंगे हाथों पकड़े जाने पर उसे स्कूल से निकाल दिया जाता है।
कलकत्ता से निष्कासित होने के बाद सुरेन्द्र लाहौर पहुँचता है और वहाँ के एक कॉलेज में दाखिला ले लेता है। खेलों (क्रिकेट और फुटबॉल) में निपुणता और अपने आकर्षक, सभ्य दिखावे के कारण वह वहाँ भी बहुत जल्दी लोकप्रिय हो जाता है। कॉलेज के प्रिंसिपल मिस्टर कॉटन और स्थानीय कन्या विद्यालय की हेडमिस्ट्रेस मिस गुप्ता उसके आकर्षण और शिष्टाचार से अत्यंत प्रभावित हो जाते हैं। लाहौर में अपनी प्रतिष्ठा को संगठित रूप देने के लिए सुरेन्द्र 'यंगमैन्स यूनियन' नामक एक संस्था की स्थापना करता है और खुद उसका सेक्रेटरी बन बैठता है। बाहर से इस संस्था का उद्देश्य युवाओं का नैतिक सुधार, विधवाओं और अनाथों की सहायता बताया जाता है; परंतु वास्तव में यह लंपटों और आवारों का गुप्त अड्डा था जहाँ शराब और नाच-गाने की महफिलें सजती थीं। सुरेन्द्र परीक्षा के प्रश्नपत्र चुराने और नकल कराने का एक सुरक्षित तंत्र चलाता है, जिसके दम पर यूनियन के सारे सदस्य बिना परिश्रम किए प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होते हैं और सुरेन्द्र खुद बी.ए. की परीक्षा पास कर लेता है। कलकत्ता का उसका पुराना परिचित बाबू हरिमोहन जब लाहौर आता है, तो सुरेन्द्र चालाकी और खुशामद से उसका मुँह बंद करवा देता है।
इसी बीच मिस गुप्ता के स्थानांतरण के बाद कलकत्ता से मिस रोहिणी सरकार नामक एक अत्यंत रूपवती, सुशील और आदर्शवादी युवती कन्या विद्यालय की नई हेडमिस्ट्रेस बनकर आती है। सुरेन्द्र उसे अपना शिकार बनाने का निश्चय करता है। यूनियन के सदस्य और उनकी महिलाएँ रोहिणी के सामने दिन-रात सुरेन्द्र की झूठी सज्जनता और समाज-सेवा के कसीदे पढ़ते हैं। अपने भोलेपन में रोहिणी सुरेन्द्र के इस प्रचारित जाल और सजीले रूप पर मुग्ध होकर उससे प्रेम करने लगती है। शीघ्र ही दोनों का विवाह हो जाता है; इस विवाह की हकीकत केवल हरिमोहन जानता है, जो बिदाई के समय रोहिणी के दुर्भाग्य पर मौन आँसू बहाता है।
विवाह के तुरंत बाद शिमला में हनीमून के दौरान सुरेन्द्र का पाखंडी मुखौटा उतर जाता है। वह रोहिणी को छोड़कर दिन-रात शराब और जुए के अड्डों पर रहने लगता है। एक महीने के भीतर ही वह अपने सारे कपड़े और रोहिणी के सोने के आभूषण तक जुए में हार जाता है। वे फटेहाल होकर लाहौर लौटते हैं। रोहिणी घर की गृहस्थी और अध्यापन का सारा बोझ अकेले उठाती है, जबकि सुरेन्द्र का पतन दिन-ब-दिन गहराता जाता है। प्रिंसिपल कॉटन द्वारा दी गई दफ्तरी नौकरी भी वह काम से भागकर छोड़ देता है। घर में आए दिन की कलह और तंगहाली से परेशान होकर प्रिंसिपल कॉटन रोहिणी से इस्तीफा ले लेते हैं। ठोकरें खाते हुए दोनों अंततः कश्मीर पहुँचते हैं, जहाँ से रोहिणी अपनी सहेली मिस गुप्ता को एक विदारक पत्र लिखती है कि जिस व्यक्ति को उसने खरा सोना समझा था, वह महज चमकता हुआ पीतल निकला; और शराब व जुए ने उनके पूरे जीवन को स्वाहा कर दिया है।
प्रकाशन इतिहास
यह कहानी सर्वप्रथम उर्दू में उर्दू मासिक पत्रिका अदीब के नवम्बर, 1912 के अंक में प्रकाशित हुई थी। बाद में इसका हिन्दी रूपांतर इसी शीर्षक से प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य (खण्ड-1) में संकलित किया गया।
महत्त्व और विषय-विमर्श
- बाह्य दिखावे और आंतरिक पतन का यथार्थ (धोखे की टट्टी): कहानी का केंद्रीय विषय यह दिखाना है कि आकर्षक वेशभूषा, मीठी वाणी और बाह्य शिष्टाचार अक्सर घोर अनैतिकता और चरित्रहीनता का पर्दा (धोखे की टट्टी) होते हैं। केवल बाह्य आवरण पर रीझना जीवन की सबसे बड़ी भूल सिद्ध होता है।
- शिक्षा प्रणाली और संस्थागत पाखंड पर व्यंग्य: 'यंगमैन्स यूनियन' के माध्यम से समाज-सुधार और चरित्र-निर्माण के नाम पर नकल कराने, पर्चे चुराने और फर्जी सफलता बाँटने की प्रवृत्ति तत्कालीन शिक्षण व्यवस्था और संस्थागत भ्रष्टाचार पर करारा व्यंग्य है।
- सरल हृदय नारी की त्रासदी: रोहिणी का चरित्र उस आदर्शवादी, निष्कपट नारी का प्रतिनिधित्व करता है जो समाज के झूठे विज्ञापनों और प्रचार की शिकार बन जाती है। विवाह के बाद पति की बर्बादी को चुपचाप सहते हुए भी अपना सर्वस्व लुटा देना भारतीय स्त्री की मार्मिक विवशता को दर्शाता है।
- व्यसनों (शराब और जुआ) की सर्वनाशी प्रकृति: कहानी यह स्पष्ट रूप से चित्रित करती है कि किस प्रकार मद्यपान और द्यूत-क्रीड़ा व्यक्ति के धन, मान-प्रतिष्ठा, पारिवारिक सुख और अंततः उसके जीवन को तबाह कर देते हैं।
- कहानी का व्यापक महत्त्व: 'धोखे की टट्टी' समाज में व्याप्त पाखंड, दिखावे और चारित्रिक पतन पर प्रेमचंद की एक तीखी और विचारोत्तेजक रचना है। यह कहानी पाठक को किसी भी व्यक्ति की बाह्य चमक-दमक के पीछे छिपे यथार्थ को परखने की गहरी नैतिक दृष्टि प्रदान करती है।
