यों तो भारतीय नारी सदैव कुलदेवी समझी गई है और उसे समाज में पुरुषों से ऊंचा पद प्राप्त है किन्तु अन्यान्य कारणों से, जिनकी विवेचना करने का यह अवसर नहीं है, उसका स्थान गौण हो गया था। वह मन्दबुद्धिता जिसने एक ओर पराधीनता की बेड़ी पांव में डाली, दूसरी ओर नारी जाति पर मनमाने अत्याचार करती गई। ऊंच-नीच का ऐसा संक्रामक रोग फैला, कि उसने समाज को ही छिन्न-भिन्न कर दिया, बल्कि स्त्री-पुरुष में भी भेद डाल दिया। पुरुषों ने नारी जाति के स्वत्वों का अपहरण करना शुरू किया, लेकिन राष्ट्रीयता और सद्बुद्धि की जो लहर इस समय आई हुई है, वह इन तमाम भेदों को मिटा देगी और एक बार फिर हमारी माताएं उसी ऊंचे पद पर आरूढ़ होंगी जो उनका हक है।
भारत अपनी माताओं का सदैव भक्त रहा है। मातृ-पूजा उसके धर्म का एक मुख्य अंग है। क्या आज अपनी माताओं द्वारा विजयी होकर वह नारी-जाति के स्वत्वों को स्वीकार न करेगा? भारत के पतन-काल में जब पुरुषों को अपने ही ऊपर विश्वास न था वह स्त्रियों पर क्या विश्वास करते, पर इस एक वर्ष के सत्याग्रह-संग्राम ने सिद्ध कर दिया कि भारत की देवियां अब भी धर्म और कर्त्तव्य की वेदी पर अपने को होम कर सकती हैं। यदि पुरुषों को अब भी उन पर शासन करने का उन्माद हो तो उसे शीघ्र से शीघ्र दूर कर देना चाहिए, क्योंकि वह चाहे दें या न दें देवियां अपने स्वत्वों को लेकर ही रहेंगी। उन्हें हर एक विषय में पुरुषों के समान अधिकार होना चाहिए और इसका निर्णय देवियों ही पर छोड़ देना चाहिए कि वे अपने हितार्थ जो स्वत्व चाहें ले लें। हमारे विचार में निम्नलिखित विषयों पर नारियों को असंतोष है और इस असंतोष को देवियों की इच्छानुसार ही शमन करना पड़ेगा—
- एक विवाह का नियम स्त्री-पुरुषों दोनों ही के लिए समान रूप से लागू हो। कोई पुरुष पत्नी के जीवन-काल में दूसरा विवाह न कर सके।
- पुरुष की सम्पत्ति पर पत्नी का पूरा अधिकार हो। वह उसे रेहन-बय जो कुछ चाहे कर सके।
- पिता की सम्पत्ति पर पुत्रों और पुत्रियों का समान अधिकार हो।
- तलाक का कानून जारी किया जाय और वह स्त्री-पुरुष दोनों ही के लिए समान हो।
- तलाक के समय स्त्री पुरुष की आधी सम्पत्ति पाए और यदि मौरूसी जायदाद हो, तो उसका एक अंश।
प्रकाशन इतिहास
[सम्पादकीय। 'हंस', फ़रवरी 1931 में प्रकाशित। 'विविध प्रसंग' भाग-3 में संकलित।]
