Cover Image for Akbar Ki Shayari Par Ek Nazar (अकबर की शायरी पर एक नज़र) by Munshi Premchand - Non-Fiction
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आलोचना•1909•35 मिनट

अकबर की शायरी पर एक नज़र

Akbar Ki Shayari Par Ek Nazar

अकबर इलाहाबादी की व्यंग्यपरक, सुधारवादी, कौमी एकता और स्वदेशी-समर्थक शायरी की विशेषताओं, शैली और युगीन महत्व पर मुंशी प्रेमचंद का एक उत्कृष्ट और विस्तृत समीक्षात्मक निबंध।

Work Details

प्रकार: आलोचना
वर्ष: 1909
पठन समय: 35 मिनट (5,148 शब्द)

वली और मीर से लेकर अमीर और दाग तक उर्दू जबान ने जो रंग बदले हैं वह एशियाई शायरी के समझने वालों से छिपे नहीं हैं। निस्संदेह शायरी की कल्पनाओं में गालिब को छोड़कर कोई नया ढंग नहीं अपनाया गया। तो भी मुहावरों, बंदिशों और बयान के ढंग में अलग-अलग कवियों में स्पष्ट अंतर पाया जाता है। वली ने जिन विचारों को लिया है वे हैं तो बहुत ऊंचे लेकिन उनकी शैली और इस जमाने की शैली में बड़ा अंतर है। मीर और सौदा और इंशा का रंग भी अलग- अलग है लेकिन भाव एक ही है यानी अधिकतर भाव फारसी से मिलते हुए हैं और ऐसे भाव ही हैं जो फारसी से उद्धृत नहीं कहे जा सकते। सैकड़ों मुहावरे और तरकीबें फारसी से भिन्‍न हैं। उर्दू के तमाम मशहूर उस्तादों ने फारसी और अरबी की किताबें पढ़ी हैं और अरबी में अगर ज्ञान के सागर नहीं हैं तो कम से कम फारसी और सर्फ़-ओ-नह्व (व्याकरण) पढ़ी है क्‍योंकि इस ज्ञान के बिना रुचि का संस्कार नहीं हो सकता और उर्दू के कुछ कवि तो सचमुच बड़े आलिम- फाजिल थे मगर ये सब कल्पनाओं के गठन और अर्थ-सौंदर्य में फारसी कवियों का अनुकरण करते थे और उर्दू के पिछले उस्तादों का सामाजिक रहन-सहन भी पुराना और इस जमाने से बिल्कुल अलग था। और दाग और अमीर ने जिस जमाने में नाम हासिल किया उस ज़माने की तहजीब मीर वगैरह के जमाने से हट गई थी लेकिन वह उससे प्रभावित नहीं हुए और उसका बड़ा कारण यह था कि वह न खुद अंग्रेज थे और न उनकी सरकारें अंग्रेज़ी रुचि रखती थीं। इस वजह से उनकी शायरी का रंग पुराना था। लेकिन जनाब अकबर प्राचीन ज्ञान-विज्ञान के अलावा अंग्रेज़ी भाषा के भी विद्वान हैं और अपने इसी लगाव के कारण जनाब अकबर ने अपनी शायरी में जगह-जगह अंग्रेज़ी भाषा के शब्दों को भी खपाया है और कहीं-कहीं बड़े प्यारे ढंग से खपाया है। हंसी-दिल्लगी के शेरों में यह तरकीबें सोने में सुहागा हो गई हैं लेकिन ज्यादातर ग़ज़लें पुरानी कल्पनाओं की पाबंदी के साथ कही गई हैं। अक्सर शेर मीर और मिर्जा और गालिब के रंग के हैं। कुछ ग़ज़लें जनाब अकबर ने अपने खास रंग में कही हैं जो पाठक आगे चलकर देखेंगे।

आज की उर्दू शायरी एक अजीब कशमकश में गिरफ्तार है। अंग्रेज़ी शिक्षा का विचारों पर ऐसा चुंबक जैसा प्रभाव पड़ा है कि लोग पुरानी बातों से तंग आ गए हैं। उर्दू कविता में यही हालत दिखाई देती है और आज के कवियों की साफ-साफ दो श्रेणियां हो गई हैं। दाग और हाली के असर में उर्दू शायरों के दो परस्पर विरोधी

स्कूल कायम हुए जो कई लिहाज से 'दरबारी' और मुल्की' के नाम से पुकारे जा सकते हैं। इन दोनों संप्रदायों में दो ध्रुवों की दूरी है। एक ने पुरानेपण की कसम खा ली है और दूसरे हैं कि नई-नई बातों और आज्ञादी पर मिटे हुए हैं। कविता की दुनिया में इन दोनों विरोधी संप्रदायों के कारण एक तरह का तहलका मचा हुआ है। मुल्क में एक तरफ तो शायरी के दरबार से उनको निकालने की फिक्र हो रही है उन्हें काफिर करार दिया जा रहा है और दूसरी तरफ उनके शायराना अधिकारों पर झगड़ा छिड़ा हुआ है। सामान्य कविता-प्रेमी इन दोनों को जरूरत से ज्यादा जोशीला पाते हैं और खुदा बीच का रास्ता पसंद करते हैं। यही सबको अच्छा भी लगता है। इसमें शक नहीं कि पुराने किस्सों और रूपकों और उपमाओं को सिर्फ दुहराने से आधुनिक युग के लोग मुग्ध तो कया संतुष्ट भी नहीं हो सकते। दिल शायरी से शब्दों के उलटफेर के सिवा कुछ और की भी उम्मीद रखता है। इसके साथ ही अभी बिल्कुल आज़ादी भी ठीक नहीं जो कविता के अनिवार्य बंधनों का भी ध्यान न रक्‍्खा जाए। निरे रूखे-सूखे उपदेश दिल कुबूल नहीं करता। कविता से लोग फायदे की बनिस्बत खुशी की ज्यादा उम्मीद रखते हैं मगर इस पहलू को बिल्कुल भुला देना भी ठीक नहीं। खुशी की बात है कि इन दोनों संप्रदायों के बीच कुछ ऐसे कवि भा हैं। जिन्होंने भाषा और कविता पर पूर्ण अधिकार रखने के साथ-साथ युग की आवश्यकताओं को भी अच्छी तरह अनुभ+ १. या है और उसमें हम जनाब खान बहादुर सैयद अकबर हुसैन साहब जज इलाहाबाद का दर्जा बहुत ऊंचा पाते हैं। आपने युग के विचारों और आवश्यकताओं का सही अंदाजा कर लिया है। उनकी शायरी में दोनों रंग उचित मात्रा में मिलते हैं और इसी वजह से आपकी शायरी खास और आम सबको इतनी ज्यादा पसंद है। आपको दिलचस्पी और दिलफरेबी के लिहाज से पुरानी शायरी का ढंग भी आता है और इसके साथ ही विचारों में उसकी संकीर्ण सीमाओं का बंधन भी स्वीकार नहीं। इसी वजह से आपकी शायरी मौजूदा कसौटी पर खरी उतरती है। उसमें बात कहने के एशियाई ढंग में पश्चिमी विचारों से सुंदरतम नमूने मिलते हैं। आधुनिक जीवन की विभिन्‍न समस्याओं पर भी आपने शिक्षा दी है और सहानुभूति दिखलार्र है। मानव भा तनाओं की भी झलक आपकी शायरी में रहती है और क्‍या अजब है कि कुछ दिनों मे देश थे विभिन्‍न प्रभाव आपकी काव्य-शैली पर स्थायी रूप से छा जायं और इस तरह काव्य-द्षेत्र के वर्तमान विरोधी संप्रदाय मिलकर एक हो जाएं। मगर फिलहाल कशमकश जारी है और इसको जनाब अकबर ने बड़े मज़ेदार ढंग से बयान किया है- कदीम वज़्ञ पे कायम रहूं अगर अकबर तो साफ कहते हैं सैयद यह रंग है मैला जदीद तर्ज अगर इख्तियार करता हू खुद अपनी कोम मचाती है शोर वावेला जो एतदाल की कहिए तो वो इधर न उधर ज्यादा हद से दिये सबने पांव हैं फेला इधर से ज़िद है कि लेमनड भी छू नहीं सकते उधर ये जिद है कि साकी, सुराहिए मै ला

इधर है दफ्तरे ततबीर व मसलहत नापाक उधर है वहिए विलायत की डाक का थैला गरज़ दोगूना अजाबस्त जाने मजनू रा बलाये सोहबते लैला व फुरकते लैला मगर इस मुश्किल को अकबर ने बड़ी खूबसूरती के साथ आसान कर दिखाया है और हर आदमी अपनी रुचि के अनुसार आपकी शायरी में से शेरों का चुनाव कर सकता है। इश्क और मुहब्बत की जिन भावनाओं को आपने कविता में व्यक्त किया है वह बड़ी खूबी से कविता में आए हैं। गजल का रंग ऐसा प्यारा है कि आशिक मिजाज कविता-प्रेमी आपको शायरी पढ़कर बेचेन हो सकता है। कविता में सहजता ही वह चीज है जो दिलों को अपनी तरफ खींचती है। जनाब अकबर के दीवान में अक्मर शेर तीर और नश्तर का काम देने बाले हैं। शेरों का आशय स्पष्ट है और अतिशयोक्ति भी कल्पनातीन नहीं है बल्कि बड़े अच्छे ढंग से आई है। वर तमाम खूबियां जो एक सिद्धहस्त और अच्छे कवि की कविता में होनी चाहिए आपक कुल्लियात में मौजूद हें। आपको कुल्लियात (संपूर्ण रचनाओं का संग्रह) चालीस साल की मेहनत का नतीजा है। ग़ज़लें, रुबाइयां, कते और मसनत्रियां, हंसाने वाले और दूसरे फुटऋर शेर, वह इन सबका एक दिलचस्प संग्रह है। यह जरूर है कि कुल्लियात मे संकलन कौ दृष्टि से ऐसे कुछ दोष हैं कि दूसरे संस्करण में उनका संशोधन कर देना चाहिए। लेकिन इस बात को असल कविता से अधिक प्रयोजन नहीं है। ऋतिता-मर्मज् और आलोचक तो काव्य की खूबियों को देखता है और इस लिहाज से यह कुल्लियात बहुत ही कद्र के काबिल है। इसके प्रकाशन से एशियाई शायरी में आधुनिक युग के अनुसार उचित अभिवृद्धि हुई "है। कुछ चुने हुए डोर सुनिए - ह मेरी हकौकते हस्ती ये मुश्ते खाक नहीं बजा है मुझसे जो पूछे कोर्ड पता मेरा सचमुच यह शेर अपने अर्थ की दृष्टि से बहुत सारगर्भित है। सचमुच इंसान की हस्ती सिर्फ मुट्ठी भर राख ही नहीं। ज्ञानी मुद्ठी भर राख की असलियत को समझ सकता है और इसी वास्ते एक इस्लामी लीडर या पेशवा ने कहा है मन अरफा नफ्सहू, फकद रब्बहू। यानी जिसने अपनी आत्मा को पहचाना उसने अपने परमात्मा को पहचाना। दूसरा मिसरा साफ है और हकीमत के तलबगार तो चाहते हैं कि काश वह उस रहस्य को खोले। एक उर्दू शेर में यह नाजुक खयाल पेदा करना मामूली बात नहीं। इस्लाम के पैग्म्बर की स्तुति में यह शेर खूब कहे हैं- दुरफिशानी ने तेरी कतरों के दरिया कर दिया दिल को रौशन कर दिया आंखों को बीना कर दिया खुद नथ जो राह पर औरों के हादी बन गये क्या नजर थी जिसने मुर्दा को मसीहा कर दिया

दोस्त दिल मेरा जिससे बहलता कोई ऐसा न मिला बुत के बंदे मिले अल्लाह का बंदा न मिला प्रेम की बेसुधी वाह क्‍या राह दिखाई है हमें मुर्शिद ने कर दिया काबे को गुम और कलीसा न मिला इसी जमीन में दो हास्यरस के शेर हैं- रंग चेहरे का तो कालिज ने भी रक्‍्ख़ा कायम रंगे बातिन में मगर बाप से बेटा न मिला सैयद उद्दे जो गजट लेकर तो लाखों लाये शेख कुरआन दिखाते फिरे पैसा न मिला अगर यह शेर गजल से अलग किसी नज्म में शामिल किए जाते तो दिलचस्पी बढ़ जाती मगर जनाब अकबर की बेतकल्लुफ तबीयत ने इसका रबयाल नहीं किया। आशिकाना रंग में यह शेर तारीफ के काबिल हैं और खूबी यह है कि इनमें तसव्वुफ की झलऊ ॥ भौजूद है- गुन्चये दिल को नसीमे इश्क ने वा कर दिया में मरीजे होश था मस्ती ने अच्छा कर दिया दीन से इतनी अलग हद्दे फना से यूं करीब इस कदर दिलचस्प क्यूं फिर रंगे दुनिया कर दिया सबके सब बाहर हुए वहमो खिरद होशोतमीज खानये दिल में तुम आओ हमने परदा कर दिया ईश्वर एक है तसव्वुर उसका जब बंधा तो फिर नजर # क्‍या रहा न बहसे ईनो आं रही न शोरे मासेवा रहा आज़ादी जो मिल गया वो खाना दाता का नाम जपना इसके सिवा बताऊं क्‍या तुमसे काम अपना आशिकाना अक्ल को कुछ न मिला इल्म में हैरत के सिवा दिल को भाया न कोई रंग मुहब्बत के सिवा बढ़ने तो जरा दो असरे जजबये दिल को कायम नहीं रहने का ये इनकार तुम्हारा बाइसे तसकीं न था बागे जहां का कोई रंग जिस रविश पर मैं चला आखिर परीशां हो गया ज़नाब अकबर ने यह शेर खूब कहा है और गोया गालिब के मजमून को दूसरे

ढंग से नज्म में बांधा है- बूये गुल नालये दिल दूदे चिरागे महफिल जो तेरी बज्म से निकला सो परीशां निकला बुढ़ापे की शिकायत बस यही दौलत मुझे दी तूने ऐ उम्रे अजीज सीना इक गंजीनए दागे अजीजां हो गया है गजब जलवा तेरे देरे फानी का पूछना क्‍या है उसके बानी का होश भी बार है तबीयत पर क्या कहूं हाल नातवानी का

मआरिफत ( ब्रह्मज्ञान नसीम मस्ताना चल रही है चमन में फिर रुत बदल रही है सदा ये दिल से निकल रही है वही है यह गुल रिबलाने वाला वेराग्य खुदी गुम कर चुका हूं अब खुशी व गम से क्‍या मतलब ताललुक होश से छोड़ा तो फिर आलम से क्‍या मतलब जिसे मरना न हो वह हस्न तक की फिक्र में उलझे बदलती है अगर दुनिया तो बदले हमसे क्‍या मतलब मेरी फितरत में मस्ती है हकीकत में है दिल मेरा मुझे साकी की क्या हाज़त है ज्ञामे जम से क्या मतलब दिल हो वफा-पसंद नज़र हो हया -पसंद जिस हुस्न में यह वस्फ हो वह है खुदा-पसंद तोड़ों “प तेरे झूमने लगती है शाखे गुल बेहद है तेरा नाच मुझे ऐ सबा पसंद उर्दू के सिलसिले में कुछ फारसी ग़ज़लें भी दर्ज कर दी गई हैं और इंसाफ यह है कि जनाब अकबर फारसी में भी एक फारसीदां की हैसियत से कहते हें। दो-एक शेर मुलाहिजा हों- बक्‍ते बहारे गुल दिलम अज्ञ होश दूर बूद मोंजे नसीम दुश्मने शमये शऊर बूद यक जलवा गरदद सूरते परवाना सोख्तम आरी हमी इलाज दिले नासुबूर बूद खुश बूद आं जमा खुदी आज खुद खबर न दाश्त हाशम ब ख्वाब बूद दिलम अज हुजूर बूद उर्दू मौकृफ: कुछ नहीं है फकत मैपरस्त पर जाहिद को भी है वज्द तेरी चश्मे मस्त पर

उस बावफा हो हस्न का दिन होगा रोजे वस्ल कायम रहा जो दह में अहदे अलस्त पर नई तरकीब और दिल्लगी के रंग में यह शेर मुलाहिजा हो- मैले नजर है जुल्फे मिसे कज कुलाह पर सोना चढ़ा रहा हूं मैं तारे निगाह पर आशिकी और उम्मीद तबा करती है तरे इश्क की ताईद हनोज इन जफाओं पे भी टूटी नहीं उम्मीद हनोज दूसरा शेर अक्सर हिन्दुस्तानियों के हाल के मुताबिक है- न खुशी होती है दिल को न तबीयत को उभार फिर भी सालाना किये जाते हैं हम ईद हनोज विरह की रात का दुश्य विरह की रात का काल्पनिक चित्र कवियों ने अलग-अलग ढंग से उतारा है। गालिब ने इस खयाल को यूं नज्ष्म किया है- दागे फिराके सोहबते शब की ज़ली हुई ५७ शंमृअ रह गई है सो वह भी खमोश है ज़नाब अकबर ने भी इस खयाल को बड़े पुरअसर अंदाज्ञ से बिठाया है- नहीं कोई शबे तारे फिराक में दिलसोज खमोश शम्‌अ है खुद जल रहे हैं शाम से हम निगाहें पीरे मुगां कहती है मुरीदों से रहे सलूक में वाकिफ हैं हर मुकाम से हम ज़नाब अकबर का यह शोर हाफिज शीराज्ी के इस शेर से मिलता-जुलता

ब मय सज्जादा रंगीं कुन गरत पीरे मुग्य गोयद के सालिक बेखबर न बुवद जे राहो रस्मे मंजिलहा जमाने का इंकलाब फलक के दौर में हारे हैं बाजीए इकबाल अगरचे शाह थे बदतर हैं अब गुलाम से हम नाजुक खयाली मेरी बेताबियां भी जुज्व हैं इस मेरी हस्तोी की ये जाहिर है कि मौजें खारिज अज दरिया नहीं होतीं दिल की उदासी हुआ हूं इस कदर अफ्सूुर्दा रंगे बा+ हस्ती से हवाएं फस्ले गुल को भी निशात-अफजा नहीं होतीं कजा के सामने बेकार होते हैं हवास अकबर खुली होती हैं गो आंखें मगर बीना नहीं होतीं

आज़ादी के लाले इतनी आज़ादी भी गनीमत है सांस लेता हूं बात करता हूं सच्चाई के रास्ते में कठिनाइयां मआरिफत खालिक की आलम में बहुत दुश्वार है शहरेतन में जब कि खुद अपना पता मिलता नहीं दोस्तों की याद जिंदगानी का मजा मिलता है जिनकी बज्म में उनकी कब्रों का भी अब मुझको पता मिलता नहीं परदेश की बेकसी बेकसी भेरी न पूछ ऐ जादए राहे तलब कारवां केसा कि कोई नक्शे पा मिलता नहीं यूं कहो मिल आऊं उनसे लेकिन अकबर सच ये है दिल , नहीं मिलता तो मिलने का मजा मिलता नहीं आशिकाना जिंदगी दिल जीस्त से बेजार है मालूम नही क्यूं सीने पै नफ्स बार है मालूम नहीं क्यूं जिससे दिले रंजूर को पहुंची है अजीयत फिर उसका तलबगार है मालूम नहीं क्यूं अंदाज तो उश्शाक के पाये नहीं जाते अकबर जिगर अफगार है मालूम नहीं क्यूं नीचे लिखी हुई तरड़ में आपने एक लंबी लिखी है गज़ल और खूब-खूब शेर निकाले हैं। गालिबन यह गज़ल मुशायरे में कही है। यह सारी गज़ल बहुत सजी हुई है। दो-तीन शेर मुलाहिजा हों- हिज्ञ की रात यूं हूं में हसरते कद्देयार में जैसे लहद में हो कोई हस्र के इंतजार में रंगे जहां कि शाद काश मेरी भी यूं ही हो बसर जैसे गुलो नसीम कौ निभ गई चाह प्यार में आंख को नातवानियां हुस्न की लनतरानियां फिर भी हैं जाफिशनियां कूचए इंतजार में सदाचार को शिक्षा आइना ग्ख दे बहारे गफलत अफजा हो चुकी दिल संवार अपना जवाना भी खुद-आरा हो चुकी खानए तन को खराबी पर भी लाज़िम है नज़र जौनते आराइशे कस्ने मुअल्ला हो चुकी बेखुदी को देख लज्जत करके तर्के आरजू हो चुकी हद्दें हवस मश्के तमन्ना हो चुकी

लेस्च, भाषण , संस्मरण : 77

चल बसे याराने हमदम उठ गए प्यारे अजीज आखरिरत की अब कर अकबर फि क्रे दुनिया हो चुकी णएयादत को आये शिफा हो गई अलालत हमारी दवा हो गई पढी यादे रुख में जो मेंने नमाज अजब हुस्न के साथ अदा हो गई बुतों ने भुलाया जो दिल से मुझे मेरे साथ यादे ख्थुदा हो गई मरीजे मुहब्बत तेरा मर गया खुदा की तरफ से दवा हो गई न था मंजिले आफियत का पता कनाअत मेरी रहनुमा हो गई इशारा किया बैठने का मुझे इनायत की आज इंतहा हो गई दबा क्‍या कि बवकक्‍ते दुआ भी नहीं तैरों हालत अकबर ये क्‍या हो गई दुनिया की हकीकत दो आलम की बिना क्‍या जाने क्‍या है निशाने मासेवा क्‍या जाने क्‍या है ईश्वर एक है मेरी नजरों में है अल्लाह ही अल्लाह दलीले मासेवा क्‍या जाने क्‍या हे जुनूने इश्क में हम काश मुबतिला होते खुदा ने अकल जो दी थी तो बारखूुदा होते जबान को लुत्फ ये खाकसार भी कुछ अर्ज हाल कर लेता हुजूर अगर मुतवज्जो इधर जरा होते ये उनकी बेखबरी ज़ुल्म से भी अफजूं है अब आरजू है कि वो मायले जफा होते संसार की असारता दो ही दिन में रुखे गुल ज़र्द हुआ जाता है चमने दह से दिल सर्द हुआ जाता है प्रेम से होड़ मेरे हवास इश्क में क्‍या कम हैं मुंतशर मज़नूं का नाम हो गया किस्मत की बात है

हुस्त ओ इश्क के ताललुक सौ रंगे तसव्युर में हम ऐ जान दर आए हर रंग में तुम आफते ईमा नजर आए आशिकाना दम लबों पर था दिलेज़्ार के चबराने से आ गई जान में जाना आप के आ जाने से जमाने का इंकलाब और एकता का लोप कल तक मुहब्बतों के चमन थे खिले हुए दो दिल भी आज मिल नहीं सकते मिले हुए तुम्हीं से हुई मुझको उल्फत कुछ ऐसी न थी वरना मेरी तबीयत कुछ ऐसी गिरे मेरी नजरों से खूबाने आलम पसंद आ गई तेरी सूरत कुछ ऐसी नीचे के गज़ल में काफिया और रदीफ किस कदर चुस्त है। नाजुक खयाली के साथ तगज्जुल की शान भी देखने काबिल है- ये दर्द दिल भी न था सोजिशे जिगर भी न थी इन आफतों की तो उल्फत में कुछ खबर भी न थी जमानासाजी है अब यह कि मुंतजिर था मैं हमारे आने की तुमको तो कुछ खबर भो न थी लिपट गये वो गले से मेरे तो हैरत क्‍या वह संगदिल भी न थे आह बेअसर भी न थी शहीदे जलल्‍्वये मस्ताना हो गया शबे वस्ल खुशी नसीब में आशिक के रात भर भी न थी यहां तक जो कुछ चुना गया वह गज़ल के पुराने रंग को लिए हुए हैं। अकबर ने हुस्तो-इश्क, माशूक की शोखी और जिद सब चीजों पर खूब-खूब लिखा है मगर हम उस प्रसंग में लेख के लंबे हो जाने के डर से अब इतना उद्धरण देना काफी समझते हैं और अब आपकी शायरी की उस विशेषता की और ध्यान देते हैं जिसने आपको आज के शायरों का सरदार बना दिया है और जिसने आपकी शायरी को एक निराली और बहुत प्यारी शान दे दी है। हमारा मतलब आपकी हसी-दिल्लगी के रंग कौ शायरी से है जो आपकी तमाम रचनाओं में पाई जाती है और जिसने आपकी नसीहतें बहुत सुहानी और पुरअसर और आपकी लताड़ दिल में बहुत घर करने वाली और कामयाब होती है। संयोग कहिए या भगवान को इच्छा कहिए आपका जन्म दश के बौद्धिक उत्थान की दृष्टि से भारतीय इतिहास के एक नाजुक जमाने में हुआ है जिसमें दो शानदार ताकतबर तहजीबों की कशमकश हो रही है। एक तरफ पश्चिमी सभ्यता का सिक्का फिर रहा है दूसरी तरफ पूर्वी या दिलों पर आधिपत्य जमाए हुए है। बिचारों और सामाजिक रहन सहन, गरज कि जिंदगी के हर पहलू म॑ उलट-पुलट जमाना है। अभी तक किसी हालत पर

ठहराव की सूरत पैदा नहीं हो रही हैं और इसलिए तरह-तरह कौ बुराइयां दिखाई दे रही हैं और देशवासियों के विचारों और बातों, ज्ञान और आचार, धर्म और सामाजिकता, भावनाओं और संवेदनाओं में अजब विरोध और जल्दी-जल्दी होने वाले परिवर्तन और तरह-तरह की एक-दूसरे की विरोधी चीज़ें दिखाई दे रही हैं। ऐसी हालत में एक प्यार से नसीहत करने वाला आदमी दिल्‍ललगी और मजाक से जो काम ले सकता है वह नीति और उपदेश के वाक्यों से संभव नहीं है और यही जनाब अकबर की हंसी-दिललगी का असल कारण है। इस रंग में उनकी शायरी ने जो कमाल हासिल किया है वह उर्दू में आज तक किसी को नसीब ही नहीं हुआ। एक लफ्ज़्, एक फिकरे में आप वह बात पैदा कर देते है जो दूसरों से पन्ने के पन्‍ने रंग डालने पर भी मुमकिन नहीं। कुछ शेर तो बिल्कुल केसर की क्यारियां हैं। पोलीटिकल वाकयात का भी आपने मजाक उड़ाया है- कर्जज ओ किचनर की हालत पर जो कल वह सनम तशरीह का तालिब हुआ कह दिया मैंने कि है यह साफ बात देख लो तुम जन पे नर गालिब हुआ वक्त को मुनासिबत शेख साहब यह तो अपने अपने मौके की है बात आप किब्ला बन गए में एस्क्‍्वायर हो गया इस जमाने के नौजवानों के हाल पर ये शेर भी खूब रहा है- परी के जुल्फ में उलझा न रीशे वाइज में दिले गरीब हुआ लुकमा इसम्तहानों का वह हाफिजा जो मुनासिब था एशिया के लिए खजाना बन गया योरप की दास्तानों का आसाइशे उप्र के लिए काफी हे बीबी राजी हों और कलक्टर साहब पर्दा और हिन्दुस्तानी परदे में जरूर है तबालत बेहद इंसाफ-पसंद को नहीं चाहिए हट तशबीह बुरी नहीं अगर में यह कहूं बेगम साहब पेचवां लेडी सिगरेट

हर रंग की बातों का मेरे दिल में है झुरमुट अजमेर में कुचला हूं अलोगढ़ में हूं बिस्‍्कु

मसलन्‌ जब लार्ड कर्जन ने कलकत्ता यूनिवर्सिटी में आम एशियाई कौमों और खासकर हिन्दुस्तानियों पार झूठ बोलने का अभियोग लगाया तो आपने “'ज़माना' में क्या खूब लिखा था कि- बेदब ये झूठ सच की छिड़ी हिन्द में बहस झूठे हैं हम तो आप हैं घूठों के बादशाह

80 : प्रेमचंद रचनायली-7

पाबंद किसी मशरब ओ मिल्लत का नहीं हूं घोड़ा मेरी आज़ादी का अब आता है बगदुट

बी शेखानी भी हैं बहुत जीहोश कहती हैं शेख से बजोशो खरीश ख्वाह लुंगी हो ख्वाह हो तहमत दर अमलकोश हरचे ख्वाही पोश

शमा से तशबीह या सकते हैं यह ऐयाश अमीर रात भर पिघला करें दिन भर रहें बालाए ताक मेरे मनन्‍्सूबे तरक्की के हुए सब पायेमाल बीज़ मगरिब ने जो बोया वह उगा और फल गया बूट डासन ने बनाया मैंने एक मजमूं लिखा मुल्क में मजमूं नफेला और जूता चल गया

कोठी में जम हे न डिपाजिट. है बेंक्स में कुल्लाश कर दिया मुझे दो चार अथीैंक्स में पाइनियर के सफे अव्वल में जिसका नाम हो में बली समझूं जो उसको आकबत की फिक्र हो

ज़ाले दुनिया से बेखबर हैं आप

गो तकहुस मआब बेशक हैं

शेख जी पर यह कौल सादिक है

चाहे जमजम के आप मेंढक हैं

माशा अल्लाह वह डिनर खाते हैं बंगाली भाई उनका सर खाते हैं बस हम हें ख़ुदा के नेक बंदे अकबर उनकी गाते हैं अपने घर खाते हें

मुवक्किल छुटे उनके पंज़े से सब

तो बस कौमे मरहूम के सर हुए

पपीहे पुकारा किये पी कहां

मगर वह पिलीडर से लीडर हुए शू मेकरी शुरू जो की एक अज़ीज़ ने जो स्लिसिला मिलाते थे बहराम गोर से पूछा कि भाई तुम तो थे तलवार के धनी मूरिस तुम्हारे आये थे गजनी व गोर से कहने लगे हैं इसमें भी एक बार नोक की रोटी अब हम कमाते हैं जूती के जोर से

अपने भाई के मुकाबिल किन्नर से तन जाइए गैर का जब सामना हो बस कुली बन जाइए चंदे की मजलिस में पढ़िए रो के कुरआने मजीद मतहबी महफिल में लेकिन मिस्‍्ले दुश्मन जाइए आपकी अंजुमन की है क्‍या बात आह छूपती है वाह छपती है अपनी गरह से कुछ न मुझे आप दीजिए अखबार में तो नाम मेरा छाप दीजिए मुहताज और वकौल ओ मुख्तार हैं आप सारे अमलां के नाज़बरदार हैं आप अवारा ओ मुंतशर हैं मानिन्दे गुबार मालूम हुआ मुझे जमीन्दार हैं आप पाठक देखें कि अकबर ने हंसी-मजाक में भी केसी खूबियां पैदा की हैं और सचमुच आधुनिक सभ्यता और समाज-व्यवस्था का खाका ख्वींच दिया है। इस रंग में सैकड़ों शोर लिखे हैं। हंसी-दिललगी के इस नये रंग में आपको बड़ी मेहनत करनी पड़ी होगी इसलिए कि 5ह हंसी-दिल्लगी का रंग बिल्कुल नया है। ऊपर के उद्धरणों से पाठकों को मालूम हो गया होगा कि हज़रत अकबर राजनीति की बारीकियों में भी केसी खूबी के साथ मजाक के ढंग में अपनी बात कहते हैं। आपके विचार बिल्कुल स्वतंत्र हैं। राष्ट्रीय मामलों में अनुचित जोश को बुरा समझते हैं। इसके साथ हो साथ खुशामद और चापलूसी की पॉलिसी भी पंसद नहीं करते। कहते हैं- मेरे नजदोक यह पंजाब का बलवा भी बुरा साथ ही इसके अलीगढ़ का ये हलवा भी बुरा आप इजहारे वफा कीजिए तमकोीन के साथ लेट जाना भी बुरा नाज का जलवा भी बुरा न निरे ऊंच हो न हो बुलडाग न तो मिट्टी ही हो न हो तुम आग चाल है एतदाल की अच्छी साजे हिकमत का जोड़ा है यह राग मगर नरम रास्ते पर चलने का मतलब यह नहीं कि आज को जमाने की असांलियत को सही तौर पर महसूस न किया जाए या उससे आंख बंद कर ली जाए। आपने क्या खूब कहा है- यह बात गलत दारुस्सलाम हे रिनन्‍्द यह झूठ कि मुल्के लछ्मन ओ राम है हिन्द हम सब हैं मुतीअ व खेरख्वाहे इंगलिश योरप के लिए बस एक गोदाम है हिन्द दिल उस बुते फिरंग से मिलने की शकल क्‍या

मेरी जबान और है उसकी जबान और बंगाली हाथ में कलम ले तो क्या मुस्लिम जो मिसाले बज्मे जम ले तो क्या हिन्दी की नजात है निहायत मुश्किल सौमर्तता मरके वो जन्म लेतो क्‍या या स्टेशन के बदले दूध चा और खांड ले या एजीटेशन के बदले तू चला जा मांडले

बहसे मुल्की में तो पड़ना है तेरी दीवानगी पॉलिसी उनकी रहे कायम हमारी दिल्लगी

दिलचस्प हवायें सूए गुलशन पहुंचीं जुल्फें शिमले से ता-ब-दामन पहुचों दुर्गावाई से राजा की जब र्ठे सदके होने को बी नसीबन पहुंचीं आप हिन्दू-मुसलिम एकता की सख्त जरूरत को महसूस करते हैं और उस पर बड़े मज़ेदार और असर करने वाले ढंग से जगह-जगह जोर देते हैं और अफसोस करते हैं कि- वह लुत्फ अब हिन्दू व मुसलमां में कहां अगियार उन पर गुजरते हैं खंदाजना झगड़ा कभी गाय का जबां की कभी बहस है सख्त मुजिर यह नुसखये गाओजबां फिर कहते हैं कि- हिन्दू व मुस्लिम एक हैं दोनों यानी ये दोनों एशियाई हैं हम-वतन हम - जवां व हम-किस्मत क्यों न कह दूं कि भाई भाई हैं समय को आवश्यकता को समझने वाले एक विचारक की हैसियत से आप आपसी झगड़ों और दोनों की कमजोरियों को समझते हैं। आप जानते हैं कि आए दिन की आपस को होड़ और कनबतियां दिलों को एक-दूसरे से फेर रही हैं। दोनों- चुगलियां एक दूसरे की वक्त पर जडते भी हैं नागहां गुस्सा जो आ जाता है लड़ पड़ते भी हैं हिन्दू व मुस्लिम हैं फिर भी एक और कहते हैं सच है नजर आपस में हम मिलते भी हैं लडते भी हैं कहता हूं मैं हिन्दू व मुसलमां से यही अपनी अपनी रविश पे तुम नेक रहो लाठी है हवा-ए-दहर पानी बन जाओ मौजों की तरह लड़ो मगर एक रहो

आप एक जगह मजाक के ढंग में यहां तक कहते हैं कि एक को अपनी हजल छोड़ कर दूसरे के जटल तक में शरीक हो जाना चाहिए। इसमें यह जरूर होगा कि 'न लाट साहब खिताब देंगे न राजा जी से मिलेगा हाथी' लेकिन 'यह तो कोई न कह सकेगा तुम्हारे दुश्मन कहां, बगल में।' आप समझते हैं और किस खूबी से इस बात को कहते हैं कि कौम अपनी ही बाजुओं की ताकत से उभर सकती है क्योंकि- दुनिया में जरूरत जोर की है और आप में मुतलक जोर नहीं यह सूरते हाल रही कायम तो अम्न की जा जुज गोर नहीं ऐ. भाइयो बाबू साहब से खिंचने का नहीं है कोई महल गो नसले अलाउद्दीन में हो मसकन तो तुम्हारा गोर नहीं एक दूसरे राजनीतिक मसले को केसे कविता के रूपक में बांधा है- ऊंट ने गावों कौ जिद पर शेर को साझी किया फिर तो मेंढक से भी बदतर सबने पाया ऊंट को जिसपे रक्‍्खा चाहते हो बाकी अपनी दस्तरस मुंह में हाथी के सभी ऐ भाई वह गन्ना न दो देश की उन्नति के राब अच्छे आंदोलनों के साथ आपको पूरी सहानुभूति है। आपकी शायरी में ऐसे शेर अक्सर मिलते हैं जो देश का काम करने वालों के लिए मशाल बन सकते हैं। मजाक उड़ाने के काबिल बातों का खाका उड़ाने के साथ- साथ अच्छे आंदोलनों के समर्थन में आप दिल भी किस तरह बढ़ाते हैं। स्वदेशी के आंदोलन पर क्‍या खूब कहा है- दाखिल मेरी दानिस्त में यह काम है पुन में पहुचायेगा क़ूवते-शजरे मुल्क के बुन (जड़) में तहरीक-ए-स्वदेशी पे मुझे वज्द है अकबर क्या खूब ये नगमा है छिड़ा देस की धुन में आधुनिक सभ्यता के मजाक के काबिल पहलुओं पर हम हज़रत अकबर के खयाल ज़ाहिर कर चुके हैं। इस वक्त चंदों की भरमार और अमली और असली काम को कमी इस नई सभ्यता की एक निराली शान है जिस पर हंसी आती है। रुपये का जोर, रुपये का वक्त-बेवक्त जिक्र, इसके वसूल करने की भांति-भांति की युक्तियां-गरज इन सब बातों पर आपने खूब ले-दे की है। आप अलीगढ़ कालेज के संस्थापक के मित्रों में हैं मगर किसी के पिछलग्गू नहीं बल्कि बिल्कुल स्वतंत्र विचार के आदमी हैं और जिसमें जो कमजोरी देखते हैं इस तरह कह देते हैं कि किसी को बुरा भी न लगे और सबके कान भी खुल जाएं। अलीगढ़ कालेज के नामी संस्थापक की आपने अक्सर मौकों पर बड़े जोर से तारीफ की है मगर पकड़ की बातों पर मजाक भी खूब उड़ाया है। यहां पर हम सिर्फ कुछ बातों पर आपके हंसा देने वाले रिमार्क और फब्तियां पाठकों के मनोरंजन के लिए पेश करते हैं-

84 : प्रेमचंद रयनावली-7

कीजिए साबित खुश अखलाकी से अपनी खूबियां यह नमूदे जुब्बा ओ दस्तार रहने दीजिए जालिमाना मशविरों में मैं नहीं होऊंगा शरीक गम ही को महरमे असरार रहने दीजिए खुल गया मुझ पर बहुत हैं आप मेरे खैरख्वाह खैर चन्दा लीजिए तूमार रहने दीजिए असीरे दामे जुल्फे पालिसी मुद्दत से बंदा है फसाहत नज़े लेक्चर है रियासत नज़े चंदा है जजिये को सिधारे हुए मुद्दत हुई अकबर अलबत्ता अलीगढ़ की लगी एक यह पख है अब कहां तक बुतकदे में सफे ईमां कीजिए ता कुजा इश्के बुताने सुस्त पैमां कीजिए है यही बेहतर अलीगढ़ जाके सैयद से कहूं मुझसे चंदा लीजिए मुझको मुसलमां कीजिए जेब खाली फिरा किया बंदा ले गये अहबाब इस कदर चंदा ईमान बेचने पे हैं अब सब तुले हुए लेकिन खरीद हो जो अलीगढ़ के भाव से शेख साहब चल बसे कालिज के लोग उभरे हैं अब ऊंट रुखसत हो गये पोलो के घोड़े रह गये गरज कहां तक चुनिए, उस युग-कवि ने जिंदगी के हर पहलू पर बड़ी गहरी नजर डाली है और मजाक-मजाक में सब कुछ दिल में बैठा दिया है। निजी बातों की भी कहीं-कहीं झलक मिल जातों है। हजरत अकबर ने अपने कुल्लियात से जीवन चरित का काम नहीं लिया है तो भी कहीं-कहीं पर दिल के भावों के साथ एक-आध निजी विचार भी शामिल हो गए हैं। कई साल से आपको आंखों की सख्त शिकायत है-- कॉसिल से हर तरह का कानून आ रहा है मतबा (प्रेस) से हर तरह का मजमून आ रहा है लेकिन पढूं मैं क्योंकर आंखों की है यह हालत अश्क आ रहे थे पहले अब खून आ रहा है बिसारत ने कमी की इन्हिताते-उम्र में अकबर . _बसीरत है तो आंखें मुझसे अब आंखें चुराती हैं एक लंबे अरसे तक आपके साहबजादे लंदन में और आप यहां, निश्चित अवधि से अधिक रहे गो जल्द वापसी के लिए बेचैन थे। अक्सर जगहों पर यह बेचैनी जाहिर गई है- हिन्द में मैं हूं मेरा नूरे-नज़र लंदन में है सीना पुरगम है यहां लख़्ते-जिगर लंदन में है

दफ्तरे तदबीर तो खोला गया है हिन्द में फैसला किस्मत है ऐ अकबर मगर लंदन में है अब हम इस लेख को समाप्त करते हैं। आपकी शायरी बहुत-सी खूबियों का खजाना है और जे की उस कसौटी पर, जो आपने खुद अपने यहां कायम की है, पूरी उतरती है।


प्रकाशन इतिहास

[उर्दू लेख। 'कलामे अकबर पर एक नजर' शीर्षक से उर्दू मासिक पत्रिका 'ज़माना', जनवरी, 1909 में प्रकाशित। 'मज़ामीन-ए-प्रेमचंद' में संकलित। हिन्दी रूप 'विविध प्रसंग' भाग-1 में संकलित।]

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "अकबर की शायरी पर एक नज़र." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1909, https://munshipremchand.com/works/non-fictions/akbar-ki-shayari-par-ek-nazar. Accessed 22 Sep. 2026.