एक समय था, जब भारतवर्ष में नाट्य कला की बड़ी उन्नति थी। यह हम उस समय का बात कह रहे हैं, जब यहां संस्कृत का पूरा प्रचार था, और 'उत्तर रामचरित तथा
'शाकुन्तल' जैसे नाटक खेले जाते थे। अधिकतर इतिहासज्ञ तो यहां तक कहते हैं कि अन्य कलाओं की भांति नाट्य-कला की जन्मभूमि भी यही भारतभूमि है। नाटक के प्रथम आचार्य कोई भरत मुनि को बताता है, कोई लव-कुश को। शंकर, नारद और हनुमान को तो सभी एक स्वर से मानते आए हैं। खेर, इधर कई शताब्दियों से और बातों के अधःपतन के साथ-साथ इस साहित्य का भी अध:पतन होना प्रारंभ हुआ। संस्कृत का तो ज़िक्र ही क्या, हिन्दी तक में-चन्दबरदाई के संबंध में -कोई उल्लेख योग्य नाटक नहीं निकला। मुसलमानी शासन के अंत में और ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के प्रारम्भ में, समुद्र-पार से यह लहर नए रूप में यहां आयी। भारत के दुर्भाग्य से अब तक यहां प्रांतीय भाषाएं चल रही हैं, उन्हीं भाषाओं में नाटक खेले जाने प्रारंभ हुए। महाराष्ट्र तथा बंगाल वालों ने इसमें यथेष्ट उन्नति कौ, पर वह उन्नत कहलाई मराठी रंगमंच और बंगीय रंगमंच ही के रूप में, हिन्दी के रूप में नहों। गुजराती नाटक वालों ने भी अपनी भाषा के नाटकों की भरमार को, फिर किल्न ही अच्छे नाटक निकाले, जिनको अदल बदलकर आजकल के कितने ही हिन्दी नाटककार हिन्दी में ला रहे हैं, और अपने लिए इतना बड़ा परिश्रम करने के कारण महाकवि समझ रहे हैं। बरसों तक बेचारी हिन्दी का, उर्दू की यमुना से मिलकर वह रूपांतर रहा कि यह पहचानना कठिन हो गया कि इस त्रिवेणी में कालिंदी का नाल जल कितना और गंगा का स्वच्छ- रबेत कितना है। घूम-फिरकर व्यवसाय करने वाली कंपनियों के बनाने में पारसी जाति ने इधर उधर भारत की ओर कदम बढाया। उन दिनों इधर न नाटक थे, न नाटककार, गाना की प्रधानता थी, और थी ऊंट -पटांग उर्दू जबान में लिखे हुए इंदर सभा, हवाई मजलिय जैसे इश्किया नाटकों की। हम अगर भूलते नहीं हैं, तो हिंदी नाटकों का श्रीगणेश करने का श्रेय सबसे पहले स्वनामधन्य भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र को प्राप्त हुआ। पर- उनके नाटक ' प्रमैच्योर क्लब' ही तक खिलकर रह गए, किसी व्यवसायी कपनोी के रंगमंच पर नहीं पहुंचे। भला हो मुशी विनायकप्रसाद जी 'तालिब' बनारसी का कि उन्होंने उन दिनों की विख्यात “बालो वाला विक्टोरिया' कंपनी को 'हरिश्चन्द्र, 'रामायण', 'कनकतारा', ' भर्तृहरि' आदि हिन्दी के ड्रामे सबसे पहले लिखकर दिए और खिलवाए। इस खूबी के साथ इन्होंने उन नाटकों में हिन्दी दी थी कि उद्द हिन्दी के सम्मिश्रण में, हिन्दी की चाश का आनंद भी नाटक-प्रेमी जनता की प्राप्त हुआ, और नाटक भी पास हो गए। फिर कोई थोड़े ही वर्षों के बाद बेताबजी का महाभारत' हश्नजी का 'सूरदास' स्टेज पर आ गया। यद्यपि इन नाटकों को भाषा भी उर्दू-हिन्दौ-मिश्रित थी, और इनका कथानक तथा इनके भाव, गुजराती के "सती द्रौपदी! और ढिल्वमंगल' के रूपांतर थे, तथापि इसमें संदेह नहीं कि इन नाटका का बड़ा मान मिला और पारसी कंपनियों के मालिकों का यह अनुभव हुआ कि हिन्दी नाटक निकालने चाहिए। उन दिनों के उर्दू-नाटक 'ज़हरी सांप” और “खूबसूरत बला आदि को जब हम देखते हैं, तो इतना तो नि:ःसंकोच कह सकते हैं, कि प्राय: इस श्रेणी के समस्त नाटकों में गाने हिन्दी-भाषा में ही ज्यादातर लिखे और गाए गए है यह नहीं समझ में आता कि ऐसा क्यों हुआ, या तो गानों के बोल बनाने वालों को
यह कमज़ोरी थी या हिन्दी के बोलों पर गाने बनाए जाने में जो मिठास थी, उसी के कारण ज़र्बदस्ती उसे वह पद प्राप्त हो गया। इसके बाद राधेश्याम जी का 'वीर अभिमन्यु' आया। हम समझते हैं कि इससे पहले इतने हिन्दीत्व का कोई नाटक परसी कंपनियों के स्टेज पर नहीं आया। इस नाटक का हास्य वाला भाग (कॉमिक) भी बड़ा शिक्षाप्रद और अश्लीलता से रहित था। यह उस ज़माने में पहली बार स्टेज पर आया जिस ज़माने में, कितने ही उर्दू के नाटककारों ने, ऐसे-ऐसे गंदे कॉमिक स्टेज पर पहुंचाए थे कि माताओं और बहनों को थिएटर में ले जाते हुए भी लज्जा आती थी। माता को स्त्री, और स्त्री को माता कहलाना तो उन दिनों में कुछ उर्दू नाटककारों का मान धर्म हो रहा था। खैर, “वीर अभिमन्यु' को पूर्ण सफलता मिली। महामना मालवीय जी तक ने इसे देखा और प्रशंसा की। इतना ही नहीं, जनता ने भी इसे उतना आदर दिया, जितना आदर इससे पहले के पारसी कंपनियों के किसी जटक को नहीं प्राप्त हुआ था। अर्थात् पंजाब यूनिवर्सिटी ने इसे क्रमश: 'हिन्दी- भूषण' और 'इंटरमीडियट क्लास' कोर्स की पुस्तकों में पढ़ा: जाने के लिए चुना। अब तो हिन्दी को किशोरावस्था इन कंपनियों में प्रारंभ हो गई। उधर बाबू हरिकृष्ण जी जौहर के 'पति-भक्ति', 'वीर भारत' ओर शैदाजी का 'नल-दंमयंती' आदि स्टेज पर पहुंचे। उत्साह यहां तक बढ़ा कि हिन्दौ-नाटकों को प्रधानता का पद देने के लिए पेरठ से एक लिमिटेड कपनी “व्याकुल भारत' के नाम से बन गई। निःसंदेह उस कंपनी का 'बुद्ध देव' बड़ा सुंदर और बड़ा उत्तम नाटक था। खेद है कि व्यवस्था ठीक न होने के कारण यह कंपनी लिक्विडेशन में आ गई, और इसके परम प्रवीण ओर बिट्ठान नाटककार व्याकुल जी का भी अकाल ही देहावसान हो गया। यदि वे आज होते, तो उनसे हिन्दी को बड़ी आशाए थीं। ' व्याकुल भारत' ही में रहकर ' वरमाला ' के प्रसिद्ध लेखक 'पनन्त जी' को नाटक लिखने का शौक हुआ, परन्तु खेद है कि उन्होंने स्टेज का नाटक न लिखकर साहित्य का (पाठय) नाटक लिखा। हमारी उनसे प्रार्थना है कि वह अब स्टेज के लिए नाटक लिखे, उन्हें इसका अनभव भी है, उनसे हमें इसकी बहुत आशाए हैं। इन्हीं दिनों काठियावाड़ से आई हुई 'सूरविजय ' ने अपने संपूर्ण नाटक हिन्दी हो में आकर खेले। राधेश्याम जी ने 'वी२ अभिमन्यु' के बाद जो नाटक ' श्रवणकुमार' लिखा था, वह इसी कंपनी का दिया था। ' श्रवणकुमार' के बाद भी कई नाटक उन्होंने इस कंपनी को दिए थे। खेद है कि आज वह कंपनी भी नहीं रही। इस समय उल्लेख-योग्य ये कंपनियां हैं जिनमें हिन्दी में नाटक खेले जा रहे हैं, और जिनसे हिन्दी-प्रेमियों को और भी अच्छे नाटकों की आशा है-कलककत्ते को करिन्थियन, जिनके मालिक चरखारी महाराज हैं और जिसके नाटककार आगा हश्न है। मदन थिएटर की पारसी एल्फ्रेड, जिसके पहले स्वर्गीय कावस जी मालिक थे, ओर जिसमें इस समय जौहर जी, शैदा जी नाटककार हैं। सुना है कि बेताब जी भी फिर इस कंपनी के लिए कोई हिन्दी नाटक दे रहे हैं। तीसरी कंपनी है 'न्यू एल्फ्रेंड, जो 35 वर्ष से चल रही है, और जिसके भारत-प्रसिद्ध और डाइरेक्टर मि० सोराब जी ओग्रा हैं। यद्यपि अब वह रिटायर्ड हो गए हैं, तथापि वह इस कंपनी का गौरव इतना बढ़ा गए हैं कि आज भी इसका नाम जनता में बड़े आदर के साथ लिया
जाता है। इस कंपनी के मालिक हैं मि० मेहरवान जी, मि० पणिक शाह और मि० फ्रामरोज। एक चौथी कंपनी भी है और वह हश्न जी की कहलाती है। कुछ दिन पहले उसका नाम 'ग्रेट शेक्सपियर कंपनी ' था, परंतु अब कई मास से ' ग्रेट एल्फ्रेड' रकखा गया है। भगवान् ही जाने कि यह 'एल्फ्रेड' नाम तीन- तीन कंपनियों के साथ क्यों है। स्वर्गीय मि० अल्फ्रेड की आत्मा को तो इससे हर्ष होता ही होगा, और चाहे किसी को हो या न हो।
हां, तो न्यू एल्फ्रेड' कंपनी के हमने कितने ही नाटक स्वयं देखे हैं। हमारी राय है कि इस समय हिन्दी नाटकों की दृष्टि ही से नहीं, स्टेज की दृष्टि से भी यह कंपनी आदर्श है। श्रीयुत राधेश्याम जी, जिनके नाटक इस कंपनी में खेल जाते हैं, और मि० सोराब जी ओग्रा के रिटायर हो जाने के बाद, जो स्वयं ही इसमें अपने नाटक स्टेज कर रहे हैं, निःसंदेह सफलता प्राप्त कर रहे हैं। 'बीर अभिमन्यु 'का जिक्क तो ऊपर आ ही चुका हे, उसके अतिरिक्त रधेश्याम जी के ' प्रह्माद ', परिवर्तन, ' मंशरिक। हूर' आदि सब वर्क एक से एक उत्तम हैं। इन नाटकों में आदर्श है, शिक्षा है, पविप्रत है, ओर है ओज, जितका विशेष परिचय हम फिर कभी देंगे। आज तो राधेश्गप जी के “श्री कृष्णवतार' और दूसरे भाग 'रुक्मिणी-मंगल' का जिक्र करते हैं।
' श्रीकृष्णावतार ' का प्रारभ नाटककार ने इस प्रकार किया हैं कि कंस के अत्याचार से जब पृथ्वी कांप रही थी, संसार त्राहि -त्राहि कर रहा था, तब देवर्षि नारद, क्षीर सागर में भगवान् विष्णु को इसके लिए मजबूर कर देते हैं कि वह ' धर्म संस्थापनार्थाद ' अवतार लें। नारद का भगवान् विष्णु से वार्तालाप बड़ा ही ओजपूर्ण, प्रभावशाली और दिल को हिला देने वाला है। उधर तो नारद भगवान को अवतार लेने के लिए मजबूर करते है, और इधर इस विचार से कि- अत्याचार जितनी जल्दी सीमा पर पह-य जायगा, उतनी ही जल्दों भगवान् मृत्युलोक में अवटीर्ण होंगे!" कंस के जुल्म ऋ बढ़ाते हैं। तीसरी ओर कंस के जुल्म जब मथुरावासी उत्तेजित होते हैं, तो उर्हं गांि का पाठ पढ़ाते हैं। एक ही चरित्र में यह तीन तरह का चित्रण बड़ा ही सुंदर < ओर बड़ा ही अनूठा है, या नारद का पार्ट करने वाले महाशय भी अपने पार्ट का खूब ही अदा करते हैं। नारद के बाद योगमाया का पार्ट है। योगमाया के पार्ट म॑ लेखक ने उन सब बातों को लाकर रख दिया है, जिनका संबंध गुप्त संसार से हैं यह पार्ट भी स्वाभाविक होता है, और इस पार्ट में जो गाने रक्खे गए हैं, वे तो एक नई जान नाटक में पैदा कर देते हैं। उन्हें गाया भी अच्छे ढंग से जाता है। इसक उपगंत पहला अंक भगवान् श्रीकृष्ण के जन्म पर समाप्त होता है। दूसरे अंक में बालव श्रीकृष्ण स्टेज पर आते हैं, और क्रमश: अंक समाप्ति तक गौचारण, कलिय-मदन गोवर्द्धभध-धारण और रासमंडल आदि लीलाओं का दिग्दर्शन कराया जाता है। बालक प्रीकृषण्ण की इन बाल-लीलाओं का क्या उद्देश्य हैँ, किस लीला में क्या मर्म है, इसे लेखक ने बड़ी अच्छी तरह दिखलाया है। इस अंक में कोई तीस छोटे छोटे बालक काम करते हैं, जिनमें श्रीकृष्ण, मनसुखा और श्रीदामा के पार्ट सराहनीय हैं। राधा वा पार्ट करने वाला बालक तो अपने नाम का जवाब हीं रखता। राधा और कृष्ण की प्रेम-संबंध कितना पवित्र है, यह बढ़ी अच्छी तरह इसमें दिखुलाया गया है करा भी नाममात्र को भी अश्लीलता और बुरी भावना दर्शकों के हृदय में नहीं आने पाती, बल्कि उस परम-प्रेम का बड़ा ही पावन रूप सामने आकर खड़ा हो जाता है। कदंब के नीचे गोप-गोपियों साथ खड़ी हुई युगल छवि के दृश्य का अवलोकन कौजिए। यह दूसरे अंक का दुसरा सीन हमारी राय में इस नाटक का सर्वोत्तम सीन है। तीसरे अंक में कंस-वध है। पहला अंक राजनीति से पूर्ण है, दूसरा भक्तों की नस-नस में भक्ति का स्रोत बहा देने वाला है और तीसरा वीरता का सजीव चित्र सामने लाकर रख देता है, जैसा कि 'कंस-वध' के चित्र को देखकर आप कल्पना कर सकेंगे। उस चित्र में आए हुए नट बसुदेव, बलराम, देवकी और उग्रसेन सभी अपने-अपने पार्ट खूब अदा करते हैं, सीन-सीनरी तो इतनी अच्छी दिखाई जाती है कि देखने वालों का कहना है कि अब तक ऐसी नहीं देखी। यहां पर कंपनी के पेंटर मि० बासुदेव दिनकर को प्रशंसा किए बिना नहीं रहा जाता। नि:संदेह छोटी-सी उम्र ही में आपने इस आर्ट में कमाल हासिल कर लिया है। नाच भी अपने-अपने स्थान पर अच्छे हैं, जिन्हें तैयार करने में कंपनी के नाच-मास्टर श्रीयुत नर्मदा शंकः ने यथार्थ में परिश्रम किया है। पोशाकें भी ठीक हैं। सब मिलाकर स्टेज इतना सजा हुआ रहता है कि दर्शक बारंबार देख-देखकर भी नहीं अघाते। हमने स्वयं इस विषय का इससे अच्छा क्रहीं नहीं देखा।
' श्रीकृष्णावतार' ने जब समस्त पंजाब और संयुक्त प्रांत में अपनी धूम मचा दी, तो राधेश्याम जी ने 'रुक्मिणी-मंगल' के नाम से इस पावन चरित्र का दूसरा भाग स्टेज किया। निःसंदेह यह दूसरा भाग पहले भाग से बहुत बढा-चढा है। भाषा की दृष्टि से, भावों की दृष्टि से, चरित्र-चित्रण की दृष्टि से, नाच और गानों कौ दृष्टि से इसने पहले भाग को भुला दिया है। हमारी सम्मति है कि जिन्होंने यह नाटक नहीं देखे हैं, वे पहली बार दूसरा भाग न देखकर पहला भाग देखें। पहला भाग देखकर वे जब आरचर्यान्वित रह जाएंगे, तब दूसरा भाग उन्हें वह आनंद देगा कि जो पहले भाग के आनंद को भुला देने वाला होगा। इस दूसर भाग मे जरासंध * युद्ध, कालयवन का भस्म होना, रुक्मिणी का श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम और अंत में रुक्मणी-हरण तथा प्रदयम्त का शम्बरासुर को मारकर द्वारका में आना दिखाया जाया है। राधा-कृष्ण का वास्तविक नाता क्या है, यह अंतिम सीन के एक उठोली वाले दृश्य में बड़ी ही योग्यता से अंकित किया गया है। ' श्रीकृष्णावतार' में जैसे नारद-चरित्र लेखनी की दृष्टि से बड़ा योग्यतापूर्ण है, उसी प्रकार इसमें रुक्मिणी को भाभी, रुक््म को स्त्री सुलेखा, का चरित्र बड़ा ही प्रभावशाली है, और वह सब कवि को कल्पना, कवि को प्रतिभा और कवि की अपनी उपज है। इस 'रुक्मिणी-मंगल' में तो सुलेखा हो का चरित्र क्या, जिस चरित्र को भी लेखक ने लिखा है, खूब ही लिखा है। इसमें सबसे अच्छा पार्ट रुक्म का, श्रीकृष्ण का, रुक्निगी का, सुलेखा का और रुक्मिणी की माता प्रभा का होता है। नारद, योगमाया और राधा का पार्ट करने वाले वही नट इसमें भी पार्ट करते हैं, जो ' श्रीकृष्णावतार' में करते हैं। इस दूसरे भाग में हम सबसे अच्छे कई दृश्य देखते हैं, एक तो राधा-उद्धव के संबंध का, दूसरा भीष्म के दरबार का, तीसरा रुक्मिणी-रुक्मी और प्रभा के संवाद वाला, चौथा शिशुपाल के दूल्हा-
वेश वाला, पांचवां रुक्मिणी-हरण वाला दृश्य दिखाया गया है। इस दूसरे भाग की सीनरी भी बड़ी उत्तम है, इसमें ड्रेसें भी बड़ी अच्छी और उपयुक्त हैं। नाच भी अच्छे हैं। सबसे अच्छा नाच, नाटक के संसार में पहली बार स्टेज पर आने वाला, संस्कृत बोलों का नाच है। इस नाच में 24 लड़के काम करते हैं। अब तक संस्कृत बोलों का नाच किसी कंपनी में नहीं निकला। आगे इस दूसरे भाग के गाने पहले भाग से बहुत आगे बढ़े हुए हैं, और उनकी ते भी बड़ी ही अच्छी हैं। हमारी राय में ऐसे गाने किसी कंपनी में और किसी नाटक में अब तक नहीं आए।
पं> राधेश्याम जी स्वयं भी एक बडे अच्छे नट हैं, कारण कि उन्होंने अपनी सारी उम्र कथाओं के कहने में बिताई है। अतएवं यदि वह स्टेज पर स्वयं पार्ट कर्न लगें, तब तो संयुक्त प्रांत को भी इस बात का गर्व हो जाय कि हमारे यहां भी एक गिरीश, शिशिर बाबू या दानी बाबू जैसा नट है। पं० राधेश्याम जी गाने में और तज बनाने में तो कुशल हैं ही, उर्दू का 'मशरिकी ' हृद लिखकर आपने उर्दू नाट्य जगत् में भी एक क्रांति पैदा की है। हमने पंडितजी का चित्र भी इस लेख में, बड़ी श्रद्धा के साथ दिया है।
पं» राधेश्याम जी का विचार क्रमशः: संपूर्ण श्रीकृष्ण-चरित्र को स्टेज कर देन का है। भगवान् श्रीकृष्ण उन्हें सफल-प्रयास करें। यह भी सुना है कि तीन-चार वर्ष से वह 'सती पार्वती' नाम का भी एक नाटक इसी कंपनी के लिए लिख रहे है जो आधे से ज़्यादा लिखा जा चुका है, और जिसकी बाबत यह सुनने में आया हैं कि ऐसा नाटक आज तक न कहीं लिखा गया है और न स्टेज ही हुआ है।
प्रकाशन इतिहास
[लेख। हिन्दी मासिक 'माधुरी', वर्ष 8, खण्ड-1, संख्या 6, दिसंबर, 1929, 'नाटक प्रेमी' के नाम से प्रकाशित। 'प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य' खण्ड-2 में संकलित।]
