Cover Image for Karbala - 2 (कर्बला-2) by Munshi Premchand - Non-Fiction
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आलोचना•1925•6 मिनट

कर्बला-2

Karbala - 2

अपने ऐतिहासिक नाटक 'कर्बला' में हिन्दू पात्रों के समावेश को लेकर आलोचकों की शंकाओं का प्रेमचंद द्वारा दिया गया तार्किक व साहित्यिक उत्तर।

Work Details

प्रकार: आलोचना
वर्ष: 1925
पठन समय: 6 मिनट (822 शब्द)

मित्रवर श्रीयुत रामचन्द्र टंडन ने मेरे 'कर्बला' नामी ड्रामा की आलोचना करत हु यह शंका प्रकट की है कि वह नाटक में हिन्दू पात्र क्यों लाए गए। उनका क०" है-' हिन्दू पात्रों के समावेश से न हिन्दुओं को प्रसन्‍नता होगी, न मुसलमानों को तृष्टि इसलिए हिन्दू पात्र न लाए जाते तो कोई हानि न होती।' यह ड्रामा ऐतिहासिक रे और इतिहास से यह पता चलता है कि कर्बला के संम्रम में कुछ हिन्दू योद्धाआ ने भी हजरात हुसैन का पक्ष लेकर प्राणोत्सर्ग किए थे, अत: उन पात्रों का बहिष्कार करना किसी भांति युक्तिसंगत न होता। रही यह बात कि उनक समावेश से स्व और मुसलमान, दो में से एक को भी प्रसन्नता न होगी, इसके लिए लेखक अन्‍या कुसूरवार ठहराया जाय? आज हिन्दू और मुसलमान दोनों जातियों में वैमनस्य है, इसलिए संभव है कि ऐसे मिश्रित दृश्य रुचिकर न हों, लेकिन जरा गौर से देखिए, तो उम दुश्य में ऐसी कोई बात नहीं है, जिस पर किसी हिन्दू या मुसलमान को आएंगनि हो। हिन्दू जाति यदि अपने पुरुखाओं को किसी धर्म-संग्राम में आत्मोत्सर्ग करते ह४ देखकर प्रसन्‍न न हो तो सिवाय इसके और क्या कहा जा सकता है कि हममें वीर पूजा को भावना भी नहीं रही, जो किसी जाति के अध:पतन का अंतिम लक्षण

जब तक हम अर्जुन, प्रताप, शिवाजी आदि वीौरों की पूजा और उनकी कीर्ति पर गर्व करते हैं तब तक हमारे पुनरुद्धार की कुछ आशा हो सकती है। जिस दिन में हम इतने जातिगौरव -शूत्य हो जाएंगे कि अपने पूर्वजों की अमरकीर्ति पर आपत्ति कर" लगें, उस दिन हमारे लिए कोई आशा न रहेगी। हम तो उस चित्तवृत्ति कौ कल्पना करने में भी असमर्थ हैं जो हमारे अतीत गौरव की ओर इतनी उदासीन हो। हमार तो अनुमान है कि हिन्दू इच्छा न रहने पर भी इस बात से प्रसन्न होंगे और उमर

पर गर्व करेंगे। हां, मुसलमानों की तुष्टि के विषय में हम निश्चयात्मक रूप से कुछ नहीं कह सकते। लेकिन चूंकि मुसलमान लेखकों ने यह अन्वेषण किया है और उन्हीं के आधार पर हमने हिन्दू पात्रों का समावेश किया है इसलिए इस विषय में शंका करने के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता कि मुसलमान संतुष्ट होंगे। याद मुसलमानों को एक महान्‌ संकट में आयों से सहायता पाने पर गेंद होता तो वह इसका उल्लेख ही क्‍यों करते। आजकल को समुन्नत जातियां भी संकट के अवसर पर दी गई सहायता का एहसान मानने में अपमान नहीं समझतीं। फिर कोई कारण नहीं कि मुसलमान क्यों आर्यों की प्राणपण से दी गई सहायता का अनादर करें। हां, यदि हिन्दू लोग आज उस एहसान के बल पर मुसलमानों के सामने शेख्ब्री बधारने लगें तो संभव है, मुसलमानों के मन में कृतज्ञता को जगह द्वेष का भाव उत्पन्न हों जाय और बे उस घटना को भूल जाने को चेष्टा करन लगें।

समालोचक महोदय को दूसरी शंका यह हुई है कि यदि आरयो का अरब में जाकर बसना मान लिया जाय तो यह क्यों कर हो सकता है कि महाभारत काल से हुसैन के समय तक वे लोग अपन धार्मिक आचार विचार को रक्षा कर सके, कैसे मंदिर बनवा सके, कैसे रियासत बना सके ” अतएवं उनकी बद्धा भुषा तथा भाषा भी अरबों ही से मिलनी चाहिए थी। अरब जैसी मूर्ति विध्वंसक जाति के बं"च में रहकर वे कैसे अपना जातीयता का पालन कर सके?

हमारे मित्र को मालूम होगा कि महाभारत काल में अरब या ईगन आर्यों के लिए कोई अपरिचित स्थान न थे। परस्पर गमनागमन होता रहता था। उस समय मुसलमान धर्म का जन्म न हुआ था और अरब जाति मूर्तिपूजा में रत थो। एक नहीं, अनेक देवता की पूजा होती थी। बहुत संभव है उनकी वेश-भूषा भी आर्यो से मिलती- जुलती रही हो। सिदियन, हण, कुशन आदि जातियां उत्तर-पश्चिम से आकर आर्यों में सम्मिलित हो गईं। इससे प्रकट होता है कि उस समय उनमें और आगयों में विशेष सादृश्य था। कम-से -कम यह अनुमान किया जा सकता है कि महाभारत काल में प्रतिमा -पूजा का प्रसार न हुआ धा और इसका कई प्रमाण नहीं | अजार्यो और अरबों में उतनो विभिन्‍नता न थी जितनी इस समय है। हुसैन के समय तक मुसलमान धर्म का प्रादुर्भाव हुए पचास वर्ष से अधिक न हुए थे। उस वक्‍त ईरान भी पूर्णरीति से मुसलमान सेनाओं के सामने परास्त न हुआ था। जब हम लोग जातते हैं कि अश्वत्थामा के अरब निवासी वंशज मूर्ति पूजक थे तो मुसलमानों को उनसे ख्तामख्वाह लड़ने का क्‍या कारण हो सकता था? ऐसी दशा में यदि वे आर्य अपने आचरण का पालन कर सके तो कोई आइचर्य को बात नहीं। उनका नामकरण हमने नहीं किया। हमने उनके वही नाम लिख दिए हैं, जो हमें इतिहास में मिले। यह इस बात को एक और दलील है कि इतना जमाना गुजरने पर भी जे आर्य वीर अपनी वंश-परंपरा को भूले न थे। जब हम देखते हैं कि पारसी जाति भताब्दियों से भारतवष में रहने पर भी अपने धर्म और आचरण को निभाती चलो जाती है, तो आरयों क विषय में ऐसी शंका करना सर्वथा निर्मूल है।


प्रकाशन इतिहास

[लेख। 'माधुरी', जनवरी, 1925 में प्रकाशित। 'विविध प्रसंग' भाग-2 में संकलित।]

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "कर्बला-2." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1925, https://munshipremchand.com/works/non-fictions/karbala-2. Accessed 22 Sep. 2026.