इस लड़ाई ने हमारे कॉलेजों और यूनिवर्सिटियों की कलई खोल दी। हमने आशा की थी कि जैसे अन्य देशों में ऐसी लडाइयों में छात्र वर्ग प्रमुख भाग लिया करते हैं, वैसे यहां भी होगा, पर ऐसा नहीं हुआ। हमारा शिक्षित समुदाय, चाहे वह सरकारी नौकर हो या वकौल, या प्रोफेसर या छात्र, सभी अंग्रेज़ी सरकार को अपना इृष्ट समझते हैं और उसकी हड्डियों पर दौड़ने को तैयार हैं। प्रत्यक्ष देख रहे हैं कि निन््यानवे सैकड़े ग्रेजुएटों के लिए सभी द्वार बन्द हैं; पर निराशा में भी आशा लगाये बैठे हैं कि शायद हमारी ही तकदीर जाग जाय। देख रहे हें कि कांग्रेस के आन्दोलन से ही अब थोड़े-से ऊंचे ओहदे हिन्दुस्तानियों को मिलने लगे हैं, फिर भी राजनीति को हौआ समझे बैठे हुए हैं। या तो उनमें साहस नहीं, या शक्ति नहीं, या
आत्म-गौरव नहीं, या उत्साह नहीं। जिस देश के शिक्षित युवक इतने मन्दोत्साह हों, उसका भविष्य उज्ज्वल नहीं कहा जा सकता। हमारा.बकौल समुदाय तो इस संग्राम से ऐसा भाग रहा है, जैसे आदमी की सूरत देखते ही गीदड भागे। हमारे बडे-से-बड़े नेता-जिनकी जूतियों का तस्मा खोलने के लायक भी ये लोग नहीं-धड़ाधड जेलों में बन्द किये जा रहे हैं; पर यह है कि अपने बिलों में मुंह छिपाये पडे हैं। यहां तक कि स्वदेशी वस्तु-व्यवहार की प्रतिज्ञा पर दस्तखत करते हुए भी उनके हाथ कांपने लगते हैं और कलम हाथ से छूटकर गिर पड़ती है और आज़ादी का नमक देखकर तो उन्हें जूडी-सी चढ़ आती है। हमें यह देखने का अरमान ही रह गया कि कोई वकील किसी जत्थे का नायक होता। नहीं, वह तमाशा देखना भी खतरनाक समझते हैं। बस, मुलला की दौड़ मस्जिद तक। कचहरी गये, और घर आये। उन्हें दीन-दुनिया से कोई मतलब नहीं। इस बगैरती का कोई भी ठिकाना है। अभी किसी सरकारी पार्टी में शरीक होने का नेवता मिल जाय, तो मारे खुशी से पागल हो जाएं। नेवते के कार्ड के लिए बडी-बड़ी चालें चली जाती हैं, नाक रगड़ी जाती है, और वह कार्ड तो साक्षात् कल्प- वृक्ष ही है। गोरी सूरत देखी और माथा ज़मीन पर टेक दिया। ऐसे लोगों के दिन अब गिने हुए हैं। स्वाधीन भारत में ऐसे देख-द्रोहियों के लिए कोई स्थान न होगा। वह जनता, जिसे यूनिवर्सिटियों की हवा नहीं लगी और आन्दोलनों की तरह इस संग्राम में भी आगे-आगे है- हमारे छोटे- छोटे दूकानदार, मज़दूर, पेशेवर ही सैनिकों की अगली मफों में हैं और भविष्य उन्हीं के हाथ में है। लक्षण कह रहे हैं, सूट-बूट वाले अंग्रेजों कं गुलामों की वही हालत होने वाली है, जो रूस में हुई है। यह लोग खुद अपने पांव में कुल्हाड़ी मार रहे हैं। जनता और सब मुआफ कर देती है, पर देश-द्रोह को वह कभी मुआफ नहीं करती। राष्ट्रीय संस्थाओं को देखिये-गुजरात विद्यापीठ, काशी-विद्यापीठ, अभय- आश्रम , गुरुकुल-कांगड़ी , प्रेम-विद्यालय , व॒न्दावन आदि ने अपने-अपने सिपाहियों के जत्थे भेजे और भेज रह हैं। उनक छात्र जान हथेली पर रक््खे मैदान में निकल पड़े हैं, पर यूनिवर्सिटियों ने भी काई जत्था भेजा? हमें तो खबर नहीं। यूनिवर्सिटियों में भी कोई प्रोफेसर आगे बढा? कहां की बात अपने लोग यह राग नहीं पालते आनन्द से भोजन करें, रूसी उपन्यास पढें, ताश खेलें, ग्रामोफोन या रेडियो का आनन्द उठावें, या इस झंझट में पड़ें? जिन्दगी सुख भोगने के लिए है, झींकने क लिए नहीं | काश, ये यूनिवर्सिटियां न खुली होतीं, काश आज उनकी ईट-से-ईट बज जाती, तो हमारे देश में द्रोहियों की इतनी संख्या न होती। ये विद्यालय नहीं हैं. गुलाम पेदा करने के कारखाना हैं। स्वतन्त्र भारत ऐसे विद्यालयों की जड़ खोदकर फेंक देगा।
प्रकाशन इतिहास
[सम्पादकीय। 'हंस', अप्रैल, 1930 में प्रकाशित। 'प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य' खण्ड-2 में संकलित।]
