मनावन का मूल पाठ
बाबू दयाशंकर उन लोगों में थे जिन्हें उस वक्त तक सोहबत का मजा नहीं मिलता जब तक कि वह प्रेमिका की जबान की तेजी का मजा न उठायें। रूठे हुए को मनाने में उन्हें बड़ा आनन्द मिलता फिरी हुई निगाहें कभी-कभी मुहब्बत के नशे की मतवाली आँखें से भी ज्यादा मोहक जान पड़तीं। आकर्षक लगती। झगड़ों में मिलाप से ज्यादा मजा आता। पानी में हलके-हलके झकोले केसा समाँ दिखा जाते हें। जब तक दरिया में धीमी-धीमी हलचल न हो सेर का लुत्फ नहीं।
अगर बाबू दयाशंकर को इन दिलचस्पियों के कम मोके मिलते थे तो यह उनका कसूर न था। गिरिजा स्वभाव से बहुत नेक ओर गम्भीर थी, तो भी चंकि उनका कसूर न था। गिरिजा स्वभाव से बहुत नेक ओर गम्भीर थी, तो भी चूंकि उसे अपने पति की रुचि का अनुभव हो चुका था इसलिए वह कभी-कभी अपनी तबियत के खिलाफ सिर्फ उनकी खातिर से उनसे रूठ जाती थी मगर यह बे- नींव की दीवार हवा का एक झोंका भी न सम्हाल सकती। उसकी आँखें, उसके होंठ उसका दिल यह बहुरूपिये का खेल
ज्यादा देर तक न चला सकते। आसमान पर घटायें आरती मगर सावन की नहीं, कुआर की। वह डरती, कहीं ऐसा न हो कि हँसी- हँसी से रोना आ जाय। आपस की बदमजगी के ख्याल से उसकी जान निकल जाती थी। मगर इन मौकों पर बाब् साहब को जेसी- जेसी रिझाने वाली बातें सूझतीं वह काश विद्यार्थी जीवन में सूझी होतीं तो वह कई साल तक कानून से सिर मारने के बाद भी मामूली क्लर्क न रहते।
दयाशंकर को कौमी जलसों से बहुत दिलचस्पी थी। इस दिलचस्पी की बुनियाद उसी जमाने में पड़ी जब वह कानून की दरगाह के मुजाविर थे और वह अन्त तक कायम थी। रुपयों की थेली गायब हो गई थी मगर कंधों में दर्द मोजूद था। इस साल कांफ्रेंस का जलसा सतारा में होने वाला था। नियत तारीख से एक रोज पहले बाबू साहब सतारा को रवाना हुए। सफर की तैयारियों में इतने व्यस्त थे कि गिरिजा से बातचीत करने की भी फुर्सत न मिली थी। आनेवाली खुशियों की उम्मीद उस क्षणिक वियोग के खयाल के ऊपर भारी थी।
केसा शहर होगा! बड़ी तारीफ सुनते हैं। दकन सोन्दर्य ओर संपदा की खान है। खूब सेर रहेगी। हजरत तो इन दिल को खुश करनेवाले ख्यालों में मस्त थे ओर गिरिजा आँखों में आँसू भरे अपने दरवाजे पर खड़ी यह केफ़ियत देख रही थी ओर ईश्वर से प्रार्थना कर रही थी कि इन्हें खेरियत से लाना। वह खुद एक हफ्ता केसे काटेगी, यह ख्याल बहुत ही कष्ट देनेवाला था। गिरिजा इन विचारों में व्यस्त थी दयाशंकर सफर की तैयारियों में। यहाँ तक कि सब तैयारियाँ पूरी हो गई। इक्का दरवाजे पर आ गया। बिस्तर ओर ट्रेक उस पर रख दिये और तब विदाई भेंट की बातें होने लगीं। दयाशंकर गिरिजा के सामने आए और मुस्कराकर बोले -- अब जाता हूँ।
गिरिजा के कलेजे में एक बरछी-सी लगी। बरबस जी चाहा कि उनके सीने से लिपटकर रोऊँ। आँसुओं की एक बाढ़-सी आँखें में आती हुई मालूम हुई मगर जब्त करके बोली -- जाने को कैसे कहूँ, क्या वक्त आ गया?
दयाशंकर -- हाँ, बल्कि देर हो रही है।
गिरिजा -- मंगल की शाम को गाड़ी से आओगे न?
दयाशंकर -- जरूर, किसी तरह नहीं रुक सकता। तुम सिर्फ उसी दिन मेरा इंतजार करना।
गिरिजा -- ऐसा न हो भूल जाओ। सतारा बहुत अच्छा शहर हे।
दयाशंकर -- (हँसकर) वह स्वर्ग ही क्यों न हो, मंगल को यहाँ जरूर आ जाऊँगा। दिल बराबर यहीं रहेगा। तुम जरा भी न घबराना।
यह कहकर गिरिजा को गले लगा लिया ओर मुस्कराते हुए बाहर निकल आए। इक्का रवाना हो गया। गिरिजा पलंग पर बैठ गई ओर खूब रोयी। मगर इस वियोग के दुख, आँसुओं की बाढ़, अकेलेपन के दर्द ओर तरह-तरह के भावों की भीड़ के साथ एक ओर ख्याल दिल में बेठा हुआ था जिसे वह बार-बार हटाने की कोशिश करती थी -- क्या इनके पहलू में दिल नहीं हे!या हे तो उस पर उन्हें पूरा-पूरा अधिकार हे? वह मुस्कराहट जो विदा होते वक्त दयाशंकर के चेहरे र लग रही थी,गिरिजा की समझ में नहीं आती थी।
सतारा में बड़ी धूम थी। दयाशंकर गाड़ी से उतरे तो वर्दीपोश वालंटियरों ने उनका स्वागत किया। एक फिटन उनके लिए तेयार खड़ी थी। उस पर बेठकर वह कांफ्रेंस पंडाल की तरफ
चलें दोनों तरफ झंडियाँ लहरा रही थीं। दरवाजे पर बन्ददवारें लटक रही थी। ओरतें अपने झरोखों से ओर मर्द बरामदों में खड़े हो-होकर खुशी से तालियाँ बजाते थे। इस शान-शोकत के साथ वह पंडाल में पहुँचे ओर एक खूबसूरत खेमे में उतरे। यहाँ सब तरह की सुविधाएँ एकत्र थीं, दस बजे कांफ्रेंस शुरू हुई। वक्ता अपनी-अपनी भाषा के जलवे दिखाने लगे। किसी के हँसी-दिल्लगी से भरे हुए चुटकुलों पर वाह-वाह की धूम मच गई, किसी की आग बरसानेवाले तकरीर ने दिलों में जोश की एक तरह-सी पेछा कर दी। विद्धत्तापूर्ण भाषणों के मुकाबले में हँसी-दिललगी ओर बात कहने की खूबी को लोगों ने ज्यादा पसन्द किया। श्रोताओं को उन भाषणों में थियेटर के गीतों का-सा आनन्द आता था।
कई दिन तक यही हालत रही ओर भाषणों की दृष्टि से कांफ्रेंस को शानदार कामयाबी हासिल हुई। आखिरकार मंगल का दिन आया। बाबू साहब वापसी की तेयारियाँ करने लगे। मगर कुछ ऐसा संयोग हुआ कि आज उन्हें मजबूरन ठहरना पड़ा। बम्बई ओर यूपी. के ड़ेलीगेटों में एक हाकी मेच ठहर गई। बाबू दयाशंकर हाकी के बहुत अच्छे खिलाड़ी थे। वह भी टीम में दाखिल कर लिये गये थे। उन्होंने बहुत कोशिश की कि अपना गला छुड़ा लूँ मगर दोस्तों ने इनकी आनाकानी पर बिलकुल ध्यान न दिया। साहब, जो ज्यादा बेतकल्लुफ थे,बोल -- आखिर
तुम्हें इतनी जल्दी क्यों हे? तुम्हारा दफ्तर अभी हफ्ता भर बन्द है। बीवी साहबा की नाराजगी के सिवा मुझे इस जल्दबाजी का कोई कारण नहीं दिखायी पड़ता। दयाशंकर ने जब देखा कि जल्द ही मुझपर बीवी का गुलाम होने की फबतियाँ कसी जाने वाली हैं, जिससे ज्यादा अपमानजनक बात मर्द की शान में कोई दूसरी नहीं कही जा सकती, तो उन्होंने बचाव की कोई सूरत न देखकर वापसी मुल्तवी कर दी। ओर हाकी में शरीक हो गए। मगर दिल में यह पक्का इरादा कर लिया कि शाम की गाड़ी से जरूर चले जायेंगे, फिर चाहे कोई बीवी का गुलाम नहीं, बीवी के गुलाम का बाप कहे, एक न मानेंगे।
खेर, पाँच बजे खेल शुरू हुआ। दोनों तरफ के खिलाड़ी बहुत तेज थे जिन्होंने हाकी खेलने के सिवा जिन्दगी में ओर कोई काम ही नहीं किया। खेल बड़े जोश ओर सरगर्मी से होने लगा। कई हजार तमाशाई जमा थे। उनकी तालियाँ ओर बढ़ावे खिलाड़ियों पर मारूँ बाजे का काम कर रहे थे ओर गेंद किसी अभागे की किस्मत की तरह इधर-उधर ठोकरें खाती फिरती थी। दयाशंकर के हाथों की तेजी ओर सफाई, उनकी पकड़ ओर बेऐब निशानेबाजी पर लोग हेरान थे, यहाँ तक कि जब वक्त खत्म होने में सिफ एक मिनट बाकी रह गया था ओर दोनों तरफ के लोग हिम्मतें हार चुके थे तो दयाशंकर ने गेंद लिया ओर बिजली की
तरह विरोधी पक्ष के गोल पर पहुँच गये। एक पटाखें की आवाज हुई, चारों तरफ से गोल का नारा बुलन्द हुआ! इलाहाबाद की जीत हुई ओर इस जीत का सेहरा दयाशंकर के सिर था -- जिसका नतीजा यह हुआ कि बेचारे दयाशंकर को उस वक्त भी रुकना पड़ा ओर सिर्फ इतना ही नहीं, सतारा अमेचर क्लब की तरफ से इस जीत की बधाई में एक नाटक खेलने का कोई प्रस्ताव हुआ जिसे बुध के रोज भी रवाना होने की कोई उम्मीद बाकी न रही। दयाशंकर ने दिल में बहुत पेचोताब खाया मगर जबान से क्या कहते! बीवी का गुलाम कहलाने का डर जबान बन्द किये हुए था। हालाँकि उनका दिल कह रहा था कि अब की देवी रूठेंगी तो सिर्फ खुशामदों से न मानेंगी।
बाबू दयाशंकर वादे के रोज के तीन दिन बाद मकान पर पहुँचे। सतारा से गिरिजा के लिए कई अनूठे तोहफे लाये थे। मगर उसने इन चीजों को कुछ इस तरह देखा कि जैसे उनसे उसका जी भर गया है। उसका चेहरा उतरा हुआ था ओर होंठ सूखे थे। दो दिन से उसने कुछ नहीं खाया था। अगर चलते वक्त
दयाशंकर की आँख से आँसू की चन्द बूँदें टपक पड़ी होतीं या कम से कम चेहरा कुछ उदास और आवाज कुछ भारी हो गयी होती तो शायद गिरिजा उनसे न रूठती। आँसुओं की चन्द बूँदें उसके दिल में इस खयाल को तरो-ताजा रखती कि उनके न आने का कारण चाहे ओर कुछ हो निष्ठुरता हरगिज नहीं है। शायद हाल पूछने के लिए उसने तार दिया होता और अपने पति को अपने सामने खेरियत से देखकर वह बरबस उनके सीने में जा चिमटती ओर देवताओं की कृतज्ञ होती। मगर आँखों की वह बेमोका कंजूसी ओर चेहरे की वह निष्ठुर मुसकान इस वक्त उसके पहलू में खटक रही थी। दिल में खयाल जम गया था कि में चाहे इनके लिए मर ही मिटूँ मगर इन्हें मेरी परवाह नहीं है। दोस्तों का आग्रह और जिद केवल बहाना है। कोई जबरदस्ती किसी को रोक नहीं सकता। खूब! में तो रात की रात बेठकर काठूँ ओर वहाँ मजे उड़ाये जाएँ।
बाबू दयाशंकर को रूठों के मनाने में विशेष दक्षता थी ओर इस मोके पर उन्होंने कोई बात, कोई कोशिश उठा नहीं रखी। तोहफे तो लाए थे मगर उनका जादू न चला। तब हाथ जोड़कर एक पैर से खड़े हुए, गुदगुदाया, तलुबे सहलाये, कुछ शोखी ओर शरारत की। दस बजे तक इन्हीं सब बातों में लगे रहे। इसके बाद खाने का वक्त आया। आज उन्होंने रूखी रोटियाँ बड़ें शोक से
ओर मामूली से कुछ ज्यादा खायीं -- गिरिजा के हाथ से आज हफ्ते भर बाद रोटियाँ नसीब हुई हैं, सतारे में रोटियों को तरस गयें पूडियाँ खाते-खाते आँतों में बायगोले पड़ गये। यकीन मानो गिरिजन, वहाँ कोई आराम न था,न कोई सेर,न कोई लुत्फ। सेर ओर लुत्फ तो महज अपने दिल की केफियत पर मुनहसर हे। बेफिक्री हो तो चटियल मैदान में बाग का मजा आता है ओर तबियत को कोई फिक्र हो तो बाग वीराने से भी ज्यादा उजाड़ मालूम होता है। कमबख्त दिल तो हरदम यहीं धरा रहता था, वहाँ मजा क्या खाक आता। तुम चाहे इन बातों को केवल बनावट समझ लो, क्योंकि में तुम्हारे सामने दोषी हूँ ओर तुम्हें अधिकार हे कि मुझे झूठा, मक्कार, दगाबाज, बेवफा, बात बनानेवाला जो चाहे समझ लो, मगर सच्चाई यही हे जो में कह रहा हूँ। में जो अपना वादा पूरा नहीं कर सका, उसका कारण दोस्तों की जिद थी।
दयाशंकर ने रोटियों की खूब तारीफ की क्योंकि पहले कई बार यह तरकीब फायदेमन्द साबित हुई थी, मगर आज यह मन्त्र भी कारगर न हुआ। गिरिजा के तेवर बदले ही रहे।
तीसरे पहर दयाशंकर गिरिजा के कमरे में गये ओर पंखा झलने लगे; यहाँ तक कि गिरिजा झुँझलाकर बोल उठी -- अपनी नाजबरदारियाँ अपने ही पास रखिये। मेंने हुजूर से भर पाया। में
तुम्हें पहचान गयी, अब धोखा नही खाने की। मुझे न मालूम था कि मुझसे आप यों दगा करेंगे। गरज जिन शब्दों में बेवफाइयों ओर निष्ठुरताओं की शिकायतें हुआ करती हैं वह सब इस वक्त गिरिजा ने खर्च कर डाले।
शाम हुई। शहर की गलियों में मोतिये ओर बेले की लपटें आने लगीं। सड़कों पर छिड़काव होने लगा ओर मिट्टी की सोंधी खुशबू उड़ने लगी। गिरिजा खाना पकाने जा रही थी कि इतने में उसके दरवाजे पर इक्का आकर रुका ओर उसमें से एक औरत उतर पड़ी। उसके साथ एक महरी थी उसने ऊपर आकर गिरिजा से कहा -- बहू जी, आपकी सखी आ रही हें।
यह सखी पड़ोस में रहनेवाली अहलमद साहब की बीवी थीं। अहलमद साहब बूढ़े आदमी थे। उनकी पहली शादी उस वक्त हुई थी,जब दूध के दाँत न टूटे थे। दूसरी शादी संयोग से उस जमाने में हुई जब मुँह में एक दाँत भी बाकी न था। लोगों ने बहुत समझाया कि अब आप बूढ़े हुए, शादी न कीजिए, ईश्वर ने लड़के दिये हें, बहुएँ हैं, आपको किसी बात की तकलीफ नहीं हो
सकती। मगर अहलमद साहब खुद बुड़े ओर दुनिया देखे हुए आदमी थे, इन शुभचितकों की सलाहों का जवाब व्यावहारिक उदाहरणों से दिया करते थे -- क्यों, क्या मौत को बूढ़ों से कोई दुश्मनी हे? बढ़े गरीब उसका क्या बिगाड़ते हैं? हम बाग में जाते हैं तो मुझझाये हुए फूल नहीं तोड़ते, हमारी आँखें तरो-ताजा, हरे-भरे खूबसूरत फूलों पर पड़ती हैं। कभी-कभी गजरे वगेरह बनाने के लिए कलियाँ भी तोड़ ली जाती हैं। यही हालत मौत की हे। क्या यमराज को इतनी समझ भी नहीं है। में दावे के साथ कह सकता हूँ कि जवान ओर बच्चे बूढ़ों से ज्यादा मरते हैं। में अभी ज्यों का त्यों हूँ, मेरे तीन जवान भाई, पाँच बहनें, बहनों के पति, तीनों भावजें, चार बेटे, पाँच बेटियाँ, कई भतीजे, सब मेरी आँखों के सामने इस दुनिया से चल बसे। मोत सबको निगल गई मगर मेरा बाल बाँका न कर सकी। यह गलत, बिलकुल गलत हे कि बूढ़े आदमी जल्द मर जाते हैं। ओर असल बात तो यह हे कि जबान बीवी की जरूरत बुढ़ापे में ही होती है। बहुएँ मेरे सामने निकलना चाहें ओर न निकल सकती हें, भावजें खुद बूढ़ी हुईं, छोटे भाई की बीवी मेरी परछाईं भी नही देख सकती हे, बहनें अपने- अपने घर हें, लड़के सीधे मुँह बात नहीं करते। में ठहरा बूढ़ा, बीमार पडूँ तो पास कोन फटके, एक लोटा पानी कोन दे, देखूँ किसकी आँख से, जी केसे बहलाऊँ? कया आत्महत्या कर लूँ। या
कहीं डूब मरूँ? इन दलीलों के मुकाबिले में किसी की जबान न खुलती थी।
गरज इस नयी अहलमदिन ओर गिरिजा में कुछ बहनापा सा हो गया था, कभी-कभी उससे मिलने आ जाया करती थी। अपने भाग्य पर सन््तोष करने वाली स्त्री थी, कभी शिकायत या रंज की एक बात जबान से न निकालती। एक बार गिरिजा ने मजाक में कहा था कि बूढ़े और जवान का मेल अच्छा नहीं होता। इस पर वह नाराज हो गयी ओर कई दिन तक न आयी। गिरिजा महरी को देखते ही फोरन आँगन में निकल आयी और गो उस इस वक्त मेहमान का आना नागवारा गुजरा मगर महरी से बोली -- बहन, अच्छी आयी, दो घड़ी दिल बहलेगा।
जरा देर में अहलमदिन साहब गहने से लदी हुई, घूंघट निकाले, छमछम करती हुई आँगन मे आकर खड़ी हो गईं। गिरिजा ने करीब आकर कहा -- वाह सखी, आज तो तुम दुलहिन बनी हो। मुझसे पर्दा करने लगी हो क्या? यह कहकर उसने घूंघट हटा दिया और सखी का मुँह देखते ही चॉककर एक कदम पीछे हट गई। दयाशंकर ने जोर से कहकहा लगाया ओर गिरिजा को सीने से लिपटा लिया ओर विनती के स्वर में बोले -- गिरिजन, अब मान जाओ, ऐसी खता फिर कभी न होगी। मगर गिरिजन अलग
हट गई ओर रुखाई से बोली -- तुम्हारा बहुरूप बहुत देख चुकी, अब तुम्हारा असली रूप देखना चाहती हूँ।
दयाशंकर प्रेम-नदी की हलकी-हलकी लहरों का आनन्द तो जरूर उठाना चाहते थे मगर तूफान से उनकी तबियत भी उतना ही घबराती थी जितना गिरिजा की, बल्कि शायद उससे भी ज्यादा। हृदय-परिवर्तन के जितने मंत्र उन्हें याद थे वह सब उन्होंने पढ़े ओर उन्हें कारगर न होते देखकर आखिर उनकी तबियत को भी उलझन होने लगी। यह वे मानते थे कि बेशक मुझसे खता हुई है मगर खता उनके खयाल में ऐसी दिल जलानेवाली सजाओं के काबिल न थी। मनाने की कला में वह जरूर सिद्धहस्त थे मगर इस मोके पर उनकी अक़्ल ने कुछ काम न दिया। उन्हें ऐसा कोई जादू नजर नहीं आता था जो उठती हुई काली घटाओं और जोर पकड़ते हुए झोंकों को रोक दे। कुछ देर तक वह उन्हीं ख्यालों में खामोश खड़े रहे ओर फिर बोले -- आखिर गिरिजन, अब तुम क्या चाहती हो।
गिरिजा ने अत्यन्त सहानुभूति शून्य बेपरवाही से मुँह फेरकर कहा
- कुछ नहीं।
दयाशंकर -- नहीं, कुछ तो जरूर चाहती हो वर्ना चार दिन तक बिना दाना-पानी के रहने का क्या मतलब! क्या मुझ पर जान देने की ठानी है? अगर यही फैसला है तो बेहतर है तुम यों जान दो ओर में कत्ल के जुर्म में फाँसी पाऊँ, किस्सा तमाम हो जाये। अच्छा होगा, बहुत अच्छा होगा, दुनिया की परेशानियों से छुटकारा हो जाएगा।
यह मन््तर बिलकुल बेअसर न रहा। गिरिजा आँखों में आँसू भरकर बोली -- तुम खामखाह मुझसे झगड़ना चाहते हो ओर मुझे झगड़े से नफरत है। में तुमसे न बोलती हूँ और न चाहती हूँ कि तुम मुझसे बोलने की तकलीफ गवारा करो। क्या आज शहर में कहीं नाच नहीं होता, कहीं हाकी मैच नहीं है, कहीं शतरंज नहीं बिछी हुई है। वहीं तुम्हारी तबियत जमती है, आप वहीं जाइए, मुझे अपने हाल पर रहने दीजिए में बहुत अच्छी तरह हूँ।
दयाशंकर करुण स्वर में बोले -- कया तुमने मुझे ऐसा बेवफा समझ लिया हे?
गिरिजा -- जी हाँ, मेरा तो यही तजुर्बा हे।
दयाशंकर -- तो तुम सख्त गलती पर हो। अगर तुम्हारा यही ख्याल है तो में कह सकता हूँ कि ओरतों की अन्तर्दृष्टि के बारे में जितनी बातें सुनी हें वह सब गलत हें। गिरजा, मेरे भी दिल
गिरिजा ने बात काटकर कहा -- सच, आपके भी दिल है यह आज नयी बात मालूम हुईं।
दयाशंकर कुछ झेंपकर बोले -- खेर जेसा तुम समझों। मेरे दिल न सही, मेर जिगर न सही, दिमाग तो साफ जाहिर है कि ईश्वर ने मुझे नहीं दिया वर्ना वकालत में फेल क्यों होता? गोया मेरे शरीर में सिर्फ पेट हे, में सिफ खाना जानता हूँ और सचमुच हे भी ऐसा ही, तुमने मुझ कभी फाका करते नहीं देखा। तुमने कई बार दिन-दिन भर कुछ नहीं खाया हे, में पेट भरने से कभी बाज नहीं आया। लेकिन कई बार ऐसा भी हुआ है कि दिल और जिगर जिस कोशिश में असफल रहे वह इसी पेट ने पूरी कर दिखाई या यों कहों कि कई बार इसी पेट ने दिल ओर दिमाग ओर जिगर का काम कर दिखाया है और मुझे अपने इस अजीब पेट पर कुछ गर्व होने लगा था मगर अब मालूम हुआ कि मेरे पेट की अजीब पेट पर कुछ गर्व होने लगा था मगर अब मालूम हुआ कि मेरे पेट की बेहयाइयाँ लोगों को बुरी मालूम होती हे...इस वक्त मेरा खाना न बने। में कुछ न खाऊँगा।
गिरिजा ने पति की तरफ देखा, चेहरे पर हलकी-सी मुस्कराहट थी, वह यह कर रही थी कि यह आखिरी बात तुम्हें ज्यादा सम्हलकर कहनी चाहिए थी। गिरिजा और ओरतों की तरह यह भूल जाती थी कि मर्दों की आत्मा को भी कष्ट हो सकता हे। उसके खयाल में कष्ट का मतलब शारीरिक कष्ट था। उसने दयाशंकर के साथ और चाहे जो रियायत की हो, खिलाने-पिलाने में उसने कभी भी रियायत नहीं की और जब तक खाने की देनिक मात्रा उनके पेट में पहुँचती जाय उसे उनकी तरफ से ज्यादा अन्देशा नहीं होता था। हजम करना दयाशंकर का काम था। सच पूछिये तो गिरिजा ही की सख्यितों ने उन्हें हाकी का शोक दिलाया वर्ना अपने ओर सेकड़ों भाइयों की तरह उन्हें दफ्तर से आकर हुक्के ओर शतरंज से ज्यादा मनोरंजन होता था। गिरिजा ने यह धमकी सुनी तो त्योरियाँ चढ़ाकर बोली -- अच्छी बात हे, न बनेगा।
दयाशंकर दिल में कुछ झेंप-से गये। उन्हें इस बेरहम जवाब की उम्मीद न थी। अपने कमरे मे जाकर अखबार पढ़ने लगे। इधर गिरिजा हमेशा की तरह खाना पकाने में लग गई। दयाशंकर का दिल इतना टूट गया था कि उन्हें खयाल भी न था कि गिरिजा खाना पका रही होगी। इसलिए जब नो बजे के करीब उसने आकर कहा कि चलो खाना खा लो तो वह ताज्जुब से चोंक पड़े
मगर यह यकीन आ गया कि मैंने बाजी मार ली। जी हरा हुआ, फिर भी ऊपर से रुखाई से कहा -- मैंने तो तुमसे कह दिया था कि आज कुछ न खाऊँगा।
गिरिजा -- चलो थोड़ा-सा खा लो।
दयाशंकर -- मुझे जरा भी भूख नहीं है।
गिरिजा -- क्यों? आज भूख नहीं लगी?
दयाशंकर -- तुम्हें तीन दिन से भूख क्यों नहीं लगी?
गिरिजा -- मुझे तो इस वजह से नहीं लगी कि तुमने मेरे दिल को चोट पहुँचाई थी।
दयाशंकर -- मुझे भी इस वजह से नहीं लगी कि तुमने मुझे तकलीफ दी हे।
दयाशंकर ने रुखाई के साथ यह बातें कहीं ओर अब गिरिजा उन्हें मनाने लगी। फोरन पाँसा पलट गया। अभी एक ही क्षण पहले वह उसकी खुशामदें कर रहे थे, मुजरिम की तरह उसके सामने हाथ बाँधे खड़े, गिड़गिड़ा रहे थे, मिन्नतें करते थे ओर अब बाजी पलटी हुई थी, मुजरिम इन्साफ की मसनद पर बेठा हुआ था। मुहब्बत की रहें मकड़ी के जालों से भी पेचीदा हें।
दयाशंकर ने दिन में प्रतिज्ञा की थी कि में भी इसे इतना ही हैरान करूँगा जितना इसने मुझे किया है ओर थोड़ी देर तक वह योगियों की तरह स्थिरता के साथ बेठे रहे। गिरिजा न उन्हें गुदगुदाया, तलुवे खुजलाये, उनके बालो में कंघधी की, कितनी ही लुभाने वाली अदाएँ खर्च कीं मगर असर न हुआ। तब उसने अपनी दोनों बाँहें उनकी गर्दन में डाल दीं और याचना ओर प्रेम से भरी हुई आँखें उठाकर बोली -- चलो, मेरी कसम, खा लो।
फूस की बाँध बह गई। दयाशंकर ने गिरिजा को गले से लगा लिया। उसके भोलेपन ओर भावों की सरलता ने उनके दिल पर एक अजीब दर्दनाक असर पेदा किया। उनकी आँखें भी गीली हो गयीं। आह, में केसा जालिम हूँ, मेरी बेवफाइयों ने इसे कितना रुलाया है, तीन दिन तक उसके आँसू नहीं थमे, आँखें नहीं झपकीं, तीन दिन तक इसने दाने की सूरत नहीं देखी मगर मेरे एक जरा- से इनकार ने, झूठे नकली इनकार ने, चमत्कार कर दिखाया। केसा कोमल हृदय हे! गुलाब की पंखुड़ी की तरह, जो मुरझा जाती है मगर मैली नहीं होती। कहाँ मेरा ओछापन, खुदगर्जी ओर कहाँ यह बेखुदी, यह त्याग, यह साहस।
दयाशंकर के सीने से लिपटी हुई गिरिजा उस वक्त अपने प्रबल आकर्षण से उनके दिल को खींचे लेती थी। उसने जीती हुई बाजी हारकर आज अपने पति के दिल पर कब्जा पा लिया।
इतनी जबर्दस्त जीत उसे कभी न हुई थी। आज दयाशंकर को मुहब्बत और भोलेपन की इस मूरत पर जितना गर्व था उसका अनुमान लगाना कठिन है। जरा देर में वह उठ खड़े हुए और बोले -- एक शर्त पर चलूँगा।
गिरिजा -- क्या?
दयाशंकर -- अब कभी मत रूठना।
गिरिजा -- यह तो टेढ़ी शर्त है मगर...मंजूर हे।
दो-तीन कदम चलने के बाद गिरिजा ने उनका हाथ पकड़ लिया ओर बोली - तुम्हें भी मेरी एक शर्त माननी पड़ेगी।
दयाशंकर -- में समझ गया। तुमसे सच कहता हूँ, अब ऐसा न
होगा।
दयाशंकर ने आज गिरिजा को भी अपने साथ खिलाया। वह बहुत लजायी, बहुत हीले किये, कोई सुनेगा तो कया कहेगा, यह तुम्हें कया हो गया हे। मगर दयाशंकर ने एक न मानी ओर कई कोर गिरिजा को अपने हाथ से खिलाये ओर हर बार अपनी मुहब्बत का बेदर्दी के साथ मुआवजा लिया।
खाते-खाते उन्होंने हँसकर गिरिजा से कहा -- मुझे न मालूम था कि तुम्हें मनाना इतना आसान हे।
गिरिजा ने नीची निगाहों से देखा ओर मुस्करायी, मगर मुँह से कुछ न बोली।
मनावन का सारांश
'मनावन' दांपत्य जीवन की सरसता, रूठने-मनाने के आनंद और पति-पत्नी के परस्पर अगाध प्रेम पर आधारित एक अत्यंत जीवंत और मनोरंजक कहानी है। बाबू दयाशंकर को अपनी प्रिय पत्नी गिरिजा के रूठने और फिर तरह-तरह के यत्नों से उसे मनाने में अनूठा सुख मिलता था। सतारा (महाराष्ट्र) में आयोजित राजनीतिक सम्मेलन (कांफ्रेंस) में जाने के लिए दयाशंकर घर से विदा होते हैं। वे मंगलवार की शाम तक लौटने का वचन देते हैं, परंतु विदाई के समय उनकी हल्की मुस्कान और विरह के आँसू न झलकने से गिरिजा के मन में ठेस पहुँचती है।
सतारा में सम्मेलन की समाप्ति के बाद मंगलवार को दयाशंकर लौटने वाले थे, परंतु सहयोगियों के आग्रह पर वे बॉम्बे बनाम यू.पी. के मध्य आयोजित हॉकी मैच में भाग लेने के लिए रुक जाते हैं। दयाशंकर की शानदार खेल-कुशलता से उनकी टीम मैच जीत जाती है। इस विजय के उपलक्ष्य में अमैच्योर क्लब की ओर से नाटक के आयोजन तथा मित्रों के 'बीवी का गुलाम' कहे जाने के डर से वे वापसी तीन दिन के लिए टाल देते हैं।
जब दयाशंकर तीन दिन विलंब से घर लौटते हैं, तो गिरिजा अत्यंत आहत और रूठी हुई मिलती है; उसने दो दिन से अन्न-जल का त्याग कर रखा था। दयाशंकर उसे मनाने के लिए सतारा के उपहार लाते हैं, पैर सहलाते हैं, यहाँ तक कि पड़ोसी अहलमद साहब की नई बीवी का भेष धरकर (सखी बनकर) बहरूपिया स्वांग रचते हैं, परंतु गिरिजा का मान भंग नहीं होता। अंततः दयाशंकर स्वयं भोजन न करने का ढोंग करते हैं। पति के भूखे रहने की बात सुनते ही गिरिजा का कोमल हृदय पिघल जाता है। वह स्वयं पति को मनाने लगती है, उनके बालों में कंधी करती है और गले में बांहें डालकर खाना खाने का आग्रह करती है। दयाशंकर समझ जाते हैं कि गिरिजा के निश्छल प्रेम और समर्पण के सामने उनकी पराजय ही सबसे बड़ी विजय है। दोनों एक-दूसरे को प्रेम से भोजन कराते हैं और भविष्य में कभी न रूठने की शर्त मानकर आनंदित होते हैं।
प्रकाशन इतिहास
प्रकाशन इतिहास अद्यतन किया जा रहा है, बने रहें।
महत्त्व और विषय-विमर्श
- दांपत्य प्रेम में रूठने-मनाने का सौंदर्य: कहानी पति-पत्नी के रिश्ते की मिठास और उस नोक-झोंक को चित्रित करती है जहाँ रूठना विरोध नहीं बल्कि अपने प्रिय से प्रेम और ध्यान पाने की सहज लालसा है।
- मर्दाना दंभ बनाम सामाजिक दबाव: बाबू दयाशंकर का मित्रों के ताने ('बीवी का गुलाम') के डर से वापसी टालना पुरुष-समाज के झूठे दंभ और सामाजिक दबाव को व्यंग्यात्मक ढंग से उजागर करता है।
- स्त्री-हृदय का निश्छल समर्पण: गिरिजा का चरित्र पति के अनादर या विरह से दुखी तो होता है, परंतु पति के कष्ट या अनशन की बात सुनते ही उसका सारा क्रोध छूमंतर हो जाता है, जो भारतीय नारी के अपार स्नेह को दर्शाता है।
- हास्य और बहरूपिया विनोद: कहानी में दयाशंकर द्वारा पत्नी को रिझाने के अनूठे प्रयास और अहलमद साहब की कथा तथा भेष-बदलने का प्रसंग हास्य और आत्मीयता का वातावरण निर्मित करता है।
- कहानी का व्यापक महत्त्व: 'मनावन' पारिवारिक जीवन की सरसता और समझ का संदेश देती है। प्रेमचंद यह प्रतिपादित करते हैं कि दांपत्य जीवन में अधिकार और अहंकार से ज्यादा समर्पण और मनुहार ही संबंधों को गहरा बनाते हैं।
