वेशाख से हमारे नये वर्ष का आरम्भ होता है। हम नये उत्साह, नयी आकांक्षाओं तथा नये होसलों से इसका स्वागत करते हैं। गत वर्ष हमारी तपस्याओं का समय था उसने हमें परीक्षाग्नि में भलीभांति तपाया हमारी दुढ़ता को, ब्रत को, आदर्श को खूब आजमाया, और हम उन परीक्षाओं में सफल निकले। हमने अपने अहिंसा-ब्रत से, अपने आत्म-बल से अपनी अदम्य नैतिक्रःशक्ति से दुनिया के सामने आत्मोड्ध:र का एक महान उज्ज्वल आदर्श रख दिया, हमब्े दिखा दिया कि इस ग़द्वी-बीती दशा में भी हम सत्य ओर धर्म पर कितने आरूढ हो सकते हैं। संसार में और कौन-सा देश है, जहां बालक, जवान और बूढे सभी समान उत्साह से जेल की कठिन से कठिन यंत्रणाएं सहने के लिए तैयार हो जाय? खेलकद
पर जान देने वाले बच्चे पुलिस के डंडों का वोरों की तरह सामना करें? गर्म खून वाले युवक जो नाक पर मक्खी को नहीं बेठने देते गालियों ओर गोलियों की वर्षा में अचल और अटल खडे रहे ! और अपने शान्ति-भवन में बेठने वाले बूढ़े हंसते और जय-ध्वनि करते हुए जेल चले? संसार ने हमारे इस त्याग को देखा और विस्मित हो गया-अगर ऐसे प्राणी हैं जिन्हें इस त्याग और तपस्या की ओट में अराजकता ओर रक्त और अशान्ति छिपी हुई मालूम होती है तो वह या तो हृदय-शून्य ऐंग्लोइंडियन हैं या हमारे लिबरल मित्र।
नौकरशाही को पहले हमारे व्रत पर विश्वास न था। वह इसे कौन्सिल की वकक््तृताओं की भांति निरर्थक, अप्राकृतिक और सामर्थ्यहीन समझती थी, पर जब शनै :-शनै : उसे संग्राम की सात्विकता का अनुभव हुआ तो उसके हाथ-पांव फूल गये, उसने इस सत्याग्रह का प्रतिकार करने के लिए पशुबल का आश्रय लिया और इतनी क्रूरता से आघात करने शुरू किये कि चन्द महीनों ही में सत्याग्रहियों का बड़ा भाग--जो इस आन्दोलन का प्राण था-जेलखानों में डाल दिया गया। इस आत्मसमर्पण ने इतना सवेग प्रवाह धारण किया कि शंका होने लगी कि इस आवेग में वह किनारे के गांवों, खेतों ओर व॒क्षों को न बहा ले जाय- आन्दोलन का निर्माण कारक विभाग निर्जीव न हो जाये। अतएवं हमारे कुशल महारथी ने हमारी गति को मन्द कर दिया। इसी स्थिति में वर्ष का अन्त हो रहा है।
संसार के विस्तृत क्षेत्र में भी कुछ ऐसी ही स्थिति हो रही है, अंतर केवल यह है कि वहां स्वार्थ का स्वार्थ से, द्वेष का द्वेष से, कूटनीति का कूटनीति से, संग्राम हो रहा है। गत वर्ष संसार में शान्ति की व्यवस्था करने के लिए सम्मेलनों का तांता बंधा रहा। मंत्रि-दल आये और गये, पत्रों में खूब चहल-पहल रही, संसार के कोने-कोने में शान्ति की खोज की गयी पर उसका निशान न मिला-हृदयस्थल में ढूंढने की किसी को न सूझी। इस समय जेनेवा में बडे समारोह से सम्मेलन हो रहा है। इससे बडी-बड़ी आशाएं की गयी थीं, वह रूस में, निकट- पूर्व में शान्ति का उद्भव करने वाला था; पर अन्य सम्मेलनों की भाँति यह उद्योग भी निष्फल होता दिखायी देता है। फ्रांस का विजयमद , इंगलेण्ड की स्वार्थनीति और यूनान की निरंकशता उसका सर्वनाश किये डालती है।
नया वर्ष हमारे लिए कर्त्तव्यों का गुरुतर भार साथ लाया है। वह संगठन | संगठन ! की ध्वनि करता हुआ आ रहा है। गत वर्ष हमने बहुत कुछ तपस्या की। हजारो वीरों की भेंट चढायी , किन्तु उचित संगठन न होने के कारण हम अपने अहिसा-ब्रत का समुचित रीति पर पालन न कर सके। हमारी समग्र शक्तियां केवल एक ही धारा में प्रवाहित होती रहीं। इस वक्त हमें अपनी बिखरी हुई शक्तियों को समेट कर उनका सदुपयोग करना है। खद्दर बुनना और उसका प्रचार करना, कांग्रेस क॑ मेम्बर बनाना और धन एकत्र करना, कपास की खेती को प्रोत्साहन देना, राष्ट्रीय शिक्षालयों को सुव्यवस्थित करना और उनके संचालन के लिए कोष जमा करना, समस्त भारत को स्वराज के घोर नाद से गुंजा देना-यह हमारे कार्यक्रम का संक्षिप्त स्वरूप है।
हमें इस विस्तृत कर्म-क्षेत्र में उत्साह से उतरना चाहिए। हमने संसार के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य से लड़ाई ठानी है। इस संग्राम में हमें अनेक कुर्बानियां करनी पड़ेंगी, न जाने कितनी बार परास्त होना पड़ेगा। हे भारत-संतान, अविरल उद्योग और कर्मपरायणता से अपने लक्ष्य की ओर बढ़ो। यह काम कठिन है पर असाध्य नहीं है। याद रखिये, हमें अंग्रेज जाति से स्वराज्य नहीं लेना है, हमें अपने ही भाइयों से, अपने ही देश-बन्धुओं से स्वराज्य लेना है, हमें अपनी शक्तियां नौकरशाही से सत्याग्रह करने में नहीं, अपने भाइयों से सत्याग्रह करने में लगानी चाहिए। जन-सम्मति को अपनी ओर फेर लेना स्वराज्य-प्राप्ति का मुख्य साधन है। नहीं, बल्कि स्वयं स्वराज्य है। हम इस लक्ष्य के जितना ही निकट होते जाएंगे उतना ही स्वराज्य के निकट होते जाएंगे। नया वर्ष हमारे लिए यही संदेशा लाया है।
अब कुछ अपने प्रति। ' मर्यादा' को ज्ञानमंडल के चार्ज में आये छ : मास हो गये। हमने 'मर्यादा' का सर्वांग सुन्दर बनाने में कोई कसर नहीं उठा रक्खी और निरन्तर हानि उठाकर भी अपने कर्त्तव्य का पालन किया। हम आगामी वर्ष से इसे ओर भी सुन्दर बनाने का प्रयत्न करेंगे। हमारा इरादा है कि इसमें चित्रों की संख्या अधिक की जाय। पाठ्य सामग्री में भी हम कुछ परिवर्तन करना चाहते हैं। विद्वानों के लेखों के अतिरिक्त हम प्रतिमास “विज्ञान ज्योति' के नाम से वेज्ञानिक आविष्कारों का उल्लेख किया करेंगे, तथा ' हास्य और विनोद ' के नाम से पाठकों के मनोरंजन की सामग्री भी जुटाएंगे। हमारा यह भी संकल्प है कि संसार के कुछ अन्य प्रतिष्ठित पत्रिकाओं के लेखों का सारांश भी दिया जाय। इस माला का नाम होगा 'सामयिक प्रसंग । पत्रिका को अधिक उपयोगी बनाने के लिए यदि पाठक-व॒न्द हमें अपने सत्परामर्श से सू चित +२गे तो हम यथासाध्य उस पर भी विचार करेंगे। मगर हम जहां पाठकों के लिए इतनी जिम्मेदारियां सिर पर लेने का निश्चय कर चुके हैं, वहां हम यह भी आशा करते हैं कि पाठक-गण भी पत्रिका को अपनाकर, इसे अपनी चीज समझ कर हमें प्रोत्साहित करेंगे। हम पाठकों को विश्वास दिलाते हैं कि इस वक्त तक ग्राहकों की संख्या इतनी निराशा-जनक रही है कि यदि पत्रिका के वर्तमान संचालक महोदय इतने उदार न होते तो इसका जीवित रहना कठिन हो जाता। हम पत्रिका से लाभ उठाने की आकांक्षा नहीं रखते। हम केवल पाठकों की सेवा करना चाहते हैं, और हमारी उनसे यही विनय है कि वह हमें अपनी गुणग्राहकता का परिचय देकर बाधित करें।
प्रकाशन इतिहास
[सम्पादकीय। 'मर्यादा', वैशाख, विक्रमी संवत् 1979 (अप्रैल, 1922) में प्रकाशित। 'विविध प्रसंग' भाग-2 में संकलित।]
