Cover Image for Dakshin Bharat Mein Hamari Hindi Prachar Yatra (दक्षिण भारत में हमारी हिन्दी प्रचार-यात्रा) by Munshi Premchand - Non-Fiction
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संस्मरण•1935•45 मिनट

दक्षिण भारत में हमारी हिन्दी प्रचार-यात्रा

Dakshin Bharat Mein Hamari Hindi Prachar Yatra

दक्षिण भारत में हिन्दी प्रचार सभा के कार्यों और वहां के लोगों के उत्साह को अपनी आंखों से देखकर प्रेमचंद द्वारा लिखा गया प्रेरक यात्रा-संस्मरण।

Work Details

प्रकार: संस्मरण
वर्ष: 1935
पठन समय: 45 मिनट (6,695 शब्द)

दक्षिण भारत हिन्दी-प्रचार-सभा की कृपा से हमें अबको वहां के हिन्दी के उपासको से मिलने और उनके प्रचार की सफलता को अपनी आंखों से देखने का अवसर मिला। सभा ने इस वर्ष हमें पदवी-दान के अवसर पर दीक्षांत भाषण करने का नेबता दिया और हम 27 दिसंबर को बम्बई के चलकर 28 की शाम को मद्रास जा पहुचे। हमारे साथ हिन्दी ग्रंथ रत्नाकर कार्यालय के मालिक श्री नाधूराम जी प्रेमी और बम्बई

हिन्दी-प्रचार-सभा के प्रमुख कार्यकर्त्ता श्री आर० संकरन्‌ थे। तीसरे दरजे का सफर था, मगर रास्ते में कोई खास तकलीफ नहीं हुई। प्रेमी जी अपने साथ मगदल क लड्डू और पूरियां रख लाये थे। बीमारी के बाद से खाने -पीने के विषय में वे बहुत सतर्क रहते हैं, रास्ते में हमने खुब लड्‌डू रत्राए! पूरियां इधर बहुत कम स्टेशनों पर मिलती हैं। एक -दो स्टेशनों पर मिलती भी हैं, तो बहुत खराब। एक स्टेशन पर हमन पहली बार इदली खाई। यह चावल और उड़द की दाल के भैदे से बनती है। दान मैदों को समाए मात्रा में मिलाकर गुंध लेते हैं, और इस गूंधे हुए आटे को रात भर यों ही पड़ा रहने देते हैं। इससे उसमें कुछ खट्टापन आ जाता है। दूसरे दिन इसक मोटे-मोटे टिक्कड़ बनाकर भाष कर पकाते हैं। इस प्रांत में इदली खाने का बहुत रिवाज है। होटलों में देखिए तो हर एक आदमी इदली और दाल और चटनी खाता हुआ नजर आएगा। मिठाई से यहां क्रिसी को प्रेम नहीं है। हां, अब उत्तर भारत म संसर्ग से मिठाई का कुछ प्रचार हो चला है।

मद्रास पहुंचकर हम रामनाथ जी गोयनका के मेहमान हुए। सौभाग्य से श्री काका कालेलकर जी भी वहां ठहरे हुए थे। उनके दर्शनों का आनंद मिला। आप सेवा की मूर्ति हैं। हिन्दी-प्रचार में आप तो जो निर्माणात्मक कार्य कर रहे हैं, वह बहुत ही आशाजनक है। जब तक किसी बात की उपयोगिता न दिखाई दे, हमारा प्रेम उसके प्रति स्थायी नहीं हो सकता। हिन्दी-ज्ञान को कैसे उपयोगी बनाया जाय “यही प्रश्न आपके सामने हैं। बड़े-बड़े व्यापार तो अंग्रेजों के हाथ में हैं। वहां हिन्दी की दाल नहीं गल सकती। मगर छोटे-छोटे व्यापारों में, जो भारतीयों के हाथों में है, हिन्दी का व्यवहार करने से कुछ सुविधा हो सकती है। इसी हेतु से आप परिस्थितियों का अध्ययन कर रहे हैं। हमारी शुभेच्छाएं आपक साथ हैं। गोयनका जी उन लक्ष्मी पुत्रों में हैं, जो धन कमाना ही नहीं जानते, उसका सदुपयोग करना भी जानते हैं। आपकी जात से कितनी ही सार्वजनिक संस्थाओं को सहायता मिलती रहती है, और हिन्दी- प्रचार के तो आप एक स्तंभ हैं। अभिमान तो आपको छू भी नहीं गया। आप बडे ही हंसमुख, निष्कपट, उद्योगी युवक हैं और सभी के कोपाध्यक्ष हैं। आपके घर में हम लोग पांच दिन रहे, बिल्कुल इस तरह, जैसे अपने ही घर म॑ हो।

पदवी-दान का जलसा गोखले हॉल में हुआ था। मेरा ख्याल था कि बहुत बड़ा जमघ८ हागा, लेकिन मालूम हुआ कि छूड्रियों के कारण बहुत से हिन्दी-प्रेमी बाहर चले गए हैं। यहां के रेलवे विभाग ने सस्त टिकट जारी करके और भी कितने लोगों को मद्रास से बाहर पहुंचा दिया था, मगर तमाशाड़यों की तादाद चाहे कम हो, वहां जितने लोग थे, प्राय: सभी हिन्दी-प्रचार से संबंध रखते थे और हिन्दी प्रचारकों क इस मिशनरी दल को देखकर मन में आशा और गर्व की गुदगुदी होने लगती थी। कुछ लोग तो कई- कई सौ मील तय करके आये थे और उसमें देवियों की भी खासी तादाद थी। इस आंदोलन की बुनियाद कंत्रल सांस्कृतिक नहीं, उससे कहीं अधिक राजनैतिक हैं, जो संपूर्ण देश को एक राष्ट्रभाषा के सूत्र में बंधा देखना चाहता है। इसलिए, इसे प्रांत के प्रतिष्ठित नेताओं का सह ४« भी प्राप्त है >7 त्याग- भावना से भरे कार्यकर्ताओं का भी। श्री राजगोणलाचाय, जिस सभा के डा रक्टर ओर श्री के० नाणेश्वर राव जिसके वाइम-प्रेसीडेट हों और ऊंबल नाम के लिए नहीं, बल्कि उसके हरेक काम में दिलचस्पों रखते हों, उस सभा का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है, तो क्या आरचर्य है। [930 में प्रार्थाम० , माध्यम और राष्ट्रभाषा तीनों परीक्षाओं में बैठने वालों की तादाद एक हजार सात सौ थी, 9%5 में नौ हजार साठ हो गई, मगर ]934 में यह संख्या घटकर चार एजार छ. सौ इकतालीस हो १ईं। इससे शंका होती है, कहीं हिन्दी का शौक घट तो नहीं रहा है। आगर ऐसा है, तो यह हि को बात होगी। हमारा कर्त्तव्य है कि इस अवर्नात के कारणों को खाजें और उन्हें दूर करने की चेष्टा करें।

मद्रास में देखने के लायक केवल दो चोजें हैं। एक तो समुद्र का तट जा सात मोल तक चला गया है, दूसरा अधार जो धियोसोफिकल सोसाइटी का कद मा रमणीक जल-तट भारतवर्ष में है और कही नहीं। मीलों तक समुद्र के किनारे ठंडी- ठंडी हवा का आनंद उठाते चले जाइये। अधार मद्रास से आठ मील पर समुद्र के

किनारे एक कालोनी के रूप में है। उसका क्षेत्रफल दो मील से कम न होगा। बहन ही साफ-सुथरी, फूल-पत्तों से सजी हुई जगह है। पुस्तकालय है, प्रकाशन-विभाग है, मंदिर है, भोजनालय है, कर्मचारियों और अन्य थियोसोफिस्ट सज्जनों के निबास स्थान हैं। बीच में एक विशाल वट-वृक्ष है, जो अपनी बूढ़ी गोद में लगभग दो हजार दर्शकों को शरण दे सकता है। कहते हैं स्व० मिसेज एनीबेसेन्ट कभी-कभो वृक्ष क नीचे बैठकर धर्म के पिपासुओं को अपना उपदेशामृत पिलाया करती थीं। यह तपोभूमि दर्शनीय है। इन दिनों इस संस्था का वार्षिकोत्सव हो रहा है। दूर देशों से प्रतिनिधि आये हुए हैं।

मुझे दो बैठकों में प्रांत के प्रमुख प्रचारकों से बातचीत करने का सुअवसर मला। तोन सज्जन तो उत्तर भारत के हैं, जिन्होंने दक्षिण ही को अपना घर बना लिया है। सभी महानुभावों के दिलों में हिन्दी-प्रचार की लगन मालूम होती थी। सभी में उत्पार दीख पड़ा। सभी इसी काम को पेशा समझ कर नहीं, दिलचस्पी के साथ कर रह हैं। उन्हें साहित्य से भी प्रेम है और साहित्यिक-विषय की चर्चा सुनने के लिए बढ उत्सुक पाये गये। महाशय देवदत्त जी विद्यार्थी ने जो केरल प्रांत के संचालक है #प बिहार प्रांत के निवासी हैं, गद्य-काव्य के दो संग्रह सभी प्रकाशित कराए हैं, और एक ड्रामा भी लिख रहे हैं। इन संग्रहों को पढ़ने से विदति होता है कि आपकी अनुभूनिग कितनी कोमल और आपकी भावनाएं कितनी मार्मिक हैं। उसके साथ हो भाषा ८ भी आपका पूरा अधिकार है।

एक रात को हमें प्रचारकों का अभिनय-कौशल देखने का अवसर मिला! साल हुए कुछ लोगों ने एक नाटक परिषद बना ली थी और प्रचार के लिए सा में दो एक नाटक खेल लिया करते थे। मतभेद के कारण इस वर्ष परिषद न को. नाटक नहीं खेला। मेरा उन सज्जनों से अनुरोध है कि वे अपने महान उद्देश्य व। ध्यान में रखकर वैयक्तिक मतभेदों को भूल जाय॑ और प्रचार के इस अंग के शाधल न होने दें। मैंने दुर्गदास नाटक के जो दो-तीन दृश्य देखे और उनसे इस नतीजे पर पहुंचा कि थोड़े से संयम के साथ यहां के अभिनेता बहुत सफल हो सकते है। एक सीन में चाणक्य का पार्ट दिखाया गया था। मुझे बह पार्ट बहुत पसंद आया। चाणक्य के शब्दों में दर्द था, चोट थी, और विद्रोह था-वह विद्रोह जो ईश्वर की सत्ता सं भी इनकार करता है, जिसे संसार छल, कपट, अन्याय और अत्याचार का रंगस्थल सा नजर आता है।

मद्रास में दो अजायबघर हैं। एक पशु-पक्षियों का और दूसरा जल जीवों का। जू तो बहुत साधारण है, पर मछली भवन बड़ा ही सुंदर है। मछलियों का ऐसा विभिन्‍न, विचित्र और अदभूत संग्रह भारतवर्ष में दूसरा नहीं है। शीशे के! पानी से भरे कंस में रंग-बिरंगी मछलियों की क्रौड़ा, बड़ा हो मनांहर दृश्य है।

सभा ने दो मकान कियये पर ले रखे हैं। एक में तो उसका दफ्तर, पुस्तकालथ, परीक्षा-विभाग आदि हैं, दूसरे में प्रेस है। दोनों का किराया तीन सौ पचास रुपये देना पड़ता है। मंत्रो जी ऐसे मकान की तलाश में हैं, जहां दोनों ही काम हो सक। एंसा मकान मिल जाय, तो शायद किराये में कुछ किफायत हो और काम ज्यादा व्यवस्थित रूप से चलने लगे। ऐसी उपयोगी संस्था के पास अपना भवन न हो और उसे साढ़े तीन हजार रुपये सालाना किराये के रूप में देना पढ़े, यह हिन्दी- प्रेमियों रे लिए गर्व कौ बात नहीं। इसका कारण यही मालूम होता है, कवि अभी तक हमने हिन्दी- प्रचार का महत्त्व नहीं समझ पाया। इसकी जिम्मेदारी दाक्षण से कहीं ज्यादा उत्तर भारत पर है।

हिन्दी या हिन्दुस्तानी दक्षिण भाग्त के लिए विदेशी भी प्राय: दक्षिण के लोग हैं। छात्रों को पुस्तकें पढ़ने के सित्रा हिन्दी को व्यवहार में लाने के लिए शायद बहुत कम मौक मिलते होंगे। इसका परिणाम यह हो सकता है कि उनका भाषा ज्ञान केवल किताबी ज्ञान होकर रह लाय। इसके कुछ उदाहरण भी मिले। हमें ऐसे कितने ही सज्जन मिले, जा किताब तो समझ लेते हैं, लेकिन हिल्‍्दी बोल नहीं सकते, और न हिन्दी भाषण आसानी मे समझ पाते हैँ। अगर अध्यापकगण क्लासों में छात्रों से हिन्दुस्तानी #* मं बोन और उसका ख्याल रखें कि छात्र भी आपस में कम-से कम क्लास म॑ हिन्दुस्तानी का व्यय्शर ८ तो उन्हें शड बोलने का अभ्यास हो जायगा और वह हास्यजनक भूले ने करे, जिनकी एक विनोद - प्रचारक, महांदय ले कुछ मिसाले देकर हमे खूब “खाया था, दूसरा निवेदन जो में प्रसार महोंदयों ले करूंगा, वह यह है +, ये हिददी का प्ऑों जै३काओं का अध्ययन करते रहें, जिससे उनका भाषा ज्ञान बदता जाय। जि. उागहित्य रचा का कुछ शौक ह 7न्‍ह कभी कभी पत्रां में कुछ लिखते रटनता चाहिए। दक्षिण के साहित्य में ऐसी कितनी ही चीजें होंगी, जिन्हें हिन्दी मे लाकर वे तर ओर दक्षिण की सांस्कृतिक ग्फ़ता को दृढ़ करेंगे।

मद्रास से हमने पांचते दिल मैसूर को प्रस्थान विया। यहां से छोटी लाइन जाती 0 गादी में बड़ो ठेलम ठेल थी, लेकिन किसी तरह बैठ गए। मैसूर के मुख्य प्रचारक श्री हिर्ण्यमय जी हमारे पथ प्रदर्शक थे। बशलोय के श्रो अम्बूनाथ जी भी उसी डब्बे पे थे। मेरे सामने केगल प्रांत के एक सज्दन बेठे था 5नसे सारित्य ओ हदी प्रचार के विषय में बड़ी देर तक बानें होती रही। रिक्दी प्रचार से उन्हें प्रेम तो था. पर उन्हें घर भय भी था कि कहों यह आदालन आगे चलकर हवा में न उड़ जाय। स्म ताद का संदेह कभी -कभो मन मे होना स्वार्भात हों हैं। हमार आंदोलन इतने जोश से शुरू किये जाते है, और धोड़े हो दिना से लोग उनको ओर इतने उदासीन ऐ जाने हैं, कि हम किसी आंदोलन को सजीव देखऊर भी आशंकाओं से निवृत्त नहीं हो सकते। मैंने उस सउजन को विश्वाख दिलाया कि हिन्दी प्रचार आकर केवल द। एक झूग़ाही व्यक्तियों का खेल नहों गहां, गह एक संस्था है , जिसने कक के दिलों में अपना स्थान प्राप्त कर लिया है, और आदा है कि दिन दिन इसकी उनति होगी। हम सुबह को मैसूर पहुंचे। हिन्दी प्रेमियों ने हम, स्वागत किया और हम कृष्ण- भवन मे ठहरे। यहां हमे हर तरह का आगग था और शटल क॑ स्तामा श्रां शिवप्रसाद जो ने जिस उदारता से हमारा स्वागत किया, उसकी ऊहां तक तारोफ करें। इनको उप्र अभो अद्ाइस-तीस साल से ज्यादा नहीं हैं, और इनका बाल जीवन हक बड़ा हो प्ंकटमय था , यहां तक कि केबल बारह राल को उमर में उन्हें घर से भागना

] भाषा ने समान है। अध्यापक

पड़ा और वह बंगलोर आकर एक होटल में नौकर हो गए। वहां उन्होंने जो प्राप्त किया, उससे उन्होंने दो-एक मित्रों के सहयोग से यह होटल खोलने का उत्साह किया। और अब आप अपने पुरुषार्थ के फलस्वरूप स्वतंत्र हैं। आपको साहित्य और धर्म से विशेष रुचि है, पर आपके विचार बड़े उदार हैं, धार्मिक संकीर्णता का कहीं नाम भो नहीं। मानसिक और व्यापारिक उन्‍नति के साथ अपने दैहिक उन्नति का भी ध्यान रखा है। आप नियमित रूप से सूर्य नमस्कार और व्यायाम करते हैं। आम चैश्या की भांति आप केवल धन संग्रह करके ही संतुष्ट नहीं हुए। बल संग्रह भो किया है। आप बलिष्ठ और स्वस्थ युवक हैं। और किसी दुर्व्यसन को अपने पास नहीं फटकन देते। बुरी से-बुरी दशाओं में पुरुषार्थी आदमी क्‍या कुछ कर सकता है। यह उपदेश हमारे युवक शिवप्रसाद जी के जीवन से ले सकते हैं। मुझे यह देखकर बडा हर्ष हुआ कि आपने धन को अपना स्वामी नहीं बनने दिया, स्वयं उसके स्वामी हैं। आपके जीवन का उद्देश्य परोपकार है। आपका इरादा है, कि अपने जन्म -स्थान बुलंदशहर में एक अच्छी व्यायामशाला कायम करें और युवकों को अपनी देह और स्वास्थ्य को बलवान करने का अवसर दें। कितना पवित्र उद्देश्य है।

कृष्ण- भवन से मिला हुआ ही एक दूसरा होटल है - आनन्द भवन। इसके स्वामी बद्रीप्रसाद जी हैं। मैसूर में उत्तर भारतीयों का यह पहला ही होटल है। ओर बडे सुव्यवस्थित रूप से चल रहा है। बद्रीप्रसाद जी बड़े प्रसन्‍न -चित्त, सेवा -तत्पर , साहित्य रसिक व्यक्ति एं, और हिन्दी-साहित्य की प्रगति से खूब परिचित हैं। आप भी बुलन्दर टर के निवासी हैं और सपरिवार यहीं रहते हैं। हमें मैसूर मुख्य दर्शनीय स्थानों की मे कराने का जिम्मा आपने लिया था, और इसके लिए हम आपके आभारी हैं।

मैसूर में यों नो देखने की बहुत-सी चीजें हैं, लेकिन हमारे पास समय ते था इसलिए हमें उन्हीं स्थानों को देखकर संतुष्ट होना पड़ा, जो मैसूर से मिले हुए हें और जिन्हें हम कम-से-कम समय में देख सकते हैं। मैसूर बढ़ा ही साफ सुभग सुन्दर उद्यानों से सज हुआ, रमणीक स्थान है। जिधर जाइये उधर पार्क, यहां टक कि रेलवे लाइन के किनारे भी फूलों को लाइन नजर आतो है। सड़कें चौड़ी हैँ, गद गुबार से पाक, चौरस्ते पर बेलों और पौधों से सजे हुए म्क्‍्वायर बने हैं। बिजला शक्ति की तो यहां इतनी इफरात है, कि देहातों में भी बिजली की रोशनी है। और है भी बेहद सस्ती। देहातों में तो केवल दो आना यूनिट है। दूसरे शहरों म॑ कंबल म्युनिसिपैलिटी के अन्दर रोशनी होती है। उसके बाहर अंधेरा। यहा हरेक पक्की सड़क पर बिजली की रोशनों है, और चामुंढा पढ़ाड़ी से नगर को देखिये, तो मालूग होता है, बिजली प्रकाश का जाल बिछा हुआ है। यह पहाड़ी शहर से मिली हुई है अर अक्सर शाम जबेरे शहर के लोग उस पर हवा खाने जाते हैं। कोई एक हजार फट ऊंची होगी। चढ़ाई के लिए मोटर चलने लायक सड़क बनी हुई है। जिस पर बिजली की रोशनी है। चोटी पर चामुंडादेवी का मन्दिर है। उससे जरा और ऊंचाई पर महाराजा के निवास के लिए एक सुन्दर बंगला बना हुआ है। चामुंडा देवी मैसूर राजा को कुल-देवी है और महाराज अक्सर यहां पूजन के लिए आते हैं।

मैसूर नगर से दस-बारह मील पर मैसूर की पुरानी राजधानी सेरिगापद्टम है।

बहां तक पक्‍की सड़क चली गयी है। सेरिंगापट्टम पहले बहुत गुलजार बस्ती थी लिये अब लोग इसे छोड़-छोड़कर दूसरी जगहों में आबाद होते जाते हैं। पुराना किला तो मिस्मार हो गया। चारदीवारी कहीं-कहीं बाकी है। यहां की सबसे दर्शनीय वस्तु सुलतान #ैददअली और टीपू की मजार है। एक रमणीक उद्यान गञ

न ध्यान के मध्य में मजार कौ शानदार इमारत है, जो काले पत्थर की है। अन्दर बड़ी खूबसूरत पच्चीकारी है और दरवाजे

पर हाथी दांत का काम है, जो मैसूर को खास कला है। किले के बाहर सुलतान टीपू का महल है, जिसका नाम दरिया दौलत बाग है। टोपू सुलतान गर्मियों में यहां आकर विश्राम किया करते थे। इसी की बाहरी दीवारों पर उस जमाने की प्राय: सभी ऐतिहासिक और राजनैतिक घटनाओं के चित्र बन हुए हैं, जो बहुत कुछ उन चित्रों से मिलते हैं, जो आज भी शहर के चित्रकार दीवारों पर बनाया करते हैं. लेकिन अंदर नक्‍्काशी बहुत ही बारीक है। जिस स्थान पर सुलतान अपनी प्रजा को दर्शन दिया करते थे, वह दरबार किसी तरह भी दिल्ली के दरबार आम से कम विशाल नहीं है। सेरिगापट्रम से हम कृष्णराज सागर दखने आये। यह एक बहत बडा सागर हे , जो कावेरी नदी को बांध से रोककर बनाया गया है। बांध कोई दो मौल लंबा और जमीन से कोई एक सौ पचास फीट ऊंचा होगा। चौड़ा इतना है, कि उस पर मोखें बढ़ी आसानी से आ जा सकती हैं। इस बांध को बनने में मैसूर सरकार का करीब दो करोड़ से ऊपर खर्च हो गया है। इस सागर से नहर निकाली गयी है, जो लगभग पचास मील तक की भूमि की सिंचाई करती है। इसका फल यह हुआ है, कि अब यहां धान और ऊख की पैदावार कसरत से होने लगी है। ऊख की खपत के लिए मग्कार ने एक शक्कर मिल भी बनवाया है। इसी पानी से बिजली भी निकाली जाती है। इस निर्माण में रियासत के लगभग पांच कगेड खर्च हो गये हैं। भारत मे इससे बड़ा दूसरा बांध नहीं है। बांध के नौचे एक रमणीक स्थान है, जिसे वृंदावन कहते हैं। यहां फौवारों की विचित्र लीला देखने में आतो है। एक नाल से दरिया का पानी लाकर एक ढालू नहर में बड़े बेग में पराहित किया गया है। दानों तरफ फोवारों की छटा है, जिनके पास रंग बिरंगे शीशों म॑ बिजली का प्रकाश किया जाता है। उछलते हुए पानो पर जब इस रंगीन प्रकाश कः प्रतिबिंत पड़ता है, तो ऐसा मालूम हाता है कि फोबारों से रंगीन पानी निकल रहा है। दूर से देखने पर इंद्रधनुष का- सा दृश्य आंखों को मुग्ध कर देता है। मैसूर का राजभवन भी देखने लायक है, मगर यह कोई उल्लेखनीय बात नहीं। ण्जभवन तो उन रियासतों में भी आंखों को मुग्ध कर देते हैं, जहां प्रजा नरक के कष्ट भोग रही है। हमारे राजाओं में निन्‍्यानबरे फीसदी तो वही हैं, जो अपनी रिसत की आमदनी का बड़ा भाग अपने ही भोग विलास पर ट्व देते हैं। उनकी प्रजा मानो है हो इसलिए कि कमा-कमाकर राजा साहब को उड़ाने के लिए दे और मुंह से पले नहों वर्ना उसकी जबान काट ली जायेगी। मैसूर तो सम्पन्न राज्य है और उसके /जेभवन को रियासत की शान के अनुसार होना ही चाहिए। एक-एक हाल को सजावट देखते रहिए। दरबार हाल तो इस ठाट का है कि शायद ही किसी राज्य में हो। यहा

दशहरे के उत्सव पर महाराजा साहब सिंहासन पर बिराजते हैं और दरबारी और कर्मचारी अपने रुतबे के अनुसार कुर्सियों पर बैठते हैं। इत्र-पान से उनका स्वागत किया जाता है, मगर इस इंद्रपुरी का इंद्र अतुल विभूति का स्वामी होते हुए भी, त्याग का उपासक है। अन्य रियासतों की भांति यहां का दरबार इंद्र का अखाड़ा नहीं, कि संन्यासी का आश्रम है। महाराज को राज्य से बाईस लाख रुपये सालाना मिलते हैं, पर यह उनके भोग-विलास में न खर्च कर प्रजा-हित के कामों में हो खर्च किये जाते हैं। यहाँ कारण है, कि यहां की प्रजा अपने राजा को पूजती है और उस पर गर्व करती है। महाराज संगीत और व्यायाम के प्रेमी हैं और साहित्य से भी आपकी रुचि है।

मैसूर का चिड़ियाघर देखकर बंबई और मद्रास के चिड़ियाघर वैसे हो लगह हैं जैसे महल के सामने झोंपड़ा। जितने विचित्र पशु-पक्षी और जल-जीव यहां हैं शायद कलककत्ते के चिड़ियाघर के सिवा और कहीं नहीं हैं। पशुओं के लिए नैसर्गिक दशाओं की व्यवस्था ऐसी शायद हो कहीं हो। हमने जितने जीव देखे, सभी द्वष्ट- पुष्ट, साफ सुथरे और प्रसन्‍न दिखायी दिये थे।

मैसूर में सरकार की ओर से रेशम का कारखाना भी खुला हुआ है, चंदन के तेल का भी। चंदन पर इस रियासत की मनोपोली या इजारा है। उसका व्यापार सरकाः के हाथों में है। कला-कौशल का विभाग भी है, जहां लकड़ी, बेंत, हाथी -दांत, धाव कुम्हारी आदि की शिक्षा दी जाती है। वहां की बनो हुईं चीजों का प्रदर्शन शाता # और बिक्री भी होती है, पर चीजों की कीमत बहुत ज्यादा है। यहां सबसे अच्छा बात जो हमें मालूम हुई वह यह है कि रियासत के कर्मचारियों का या पुलिस का यहां बिल्कुल आतंक नहीं है और रिश्वत की चर्चा यहां बहुत ही कम है। राज्य की सुव्यवस्था का इससे बढ़कर हमारे विचार में दूसरा प्राण नहीं हो सकता

मैसूर में हिल्दी-प्रचार के कार्यकर्ताओं और संचालकों में मैंने शुद्ध एकात्मक भाव देखा। सभी में हिन्दी के प्रति मिशनरी उत्साह और अनुराग है। पं+ हिरण्यमय जी चुपपाय काम करने वाले व्यक्ति हैं, जो शायद स्वप्न में भी प्रचार ही का स्वप्न देखते हों। * टॉ० कृष्ण मूर्ति और श्री के* श्रीनिवास मूर्ति, दोनों ही सज्जन यहां की प्रचार -सभा के मंत्री हैं और केवल पदाधिकारी मंत्री नहीं, बल्कि सभा में जीवन का मंत्र डालने वाल मंत्री। दोनों ही शिक्षा विभाग में अध्यापक हैं, लेकिन हिन्दी-प्रचार को अपना व्यसन बना चुके हैं। एक तीसरे उत्साही युवक मि० जे० पी० वर्मा हैं। यह इंटर यूनीवर्सिटी बाड में हैं और यहां शायद साल-भर ही उनका रहना होगा, लेकिन हिन्दी प्रचार में इस जीरा से सहयोग दे रहे हैं, जो संक्रामक है। अपने उत्साह के सामने बाधाओं को कुछ समइ7 ही नहीं। इन्हें यहां उत्तर भारत के रहने वालों को संगठित करने के लिए एक ' हिन्दुस्ताना हितैषी मंडल खोलने की धुन है। कोई सुने या न सुने, आप अपना कथन ऊिये जाते हैं। आखिर मेरे हाथों उस मंडल को स्थापित करा के ही छोड़ा, बुनियाद की रश्म ते मैंने कर दी, उस पर इमारत खड़ी करना मैसूर के उन सज्जनों का काम है, जो लाया में धन कमाना ही नहीं चाहते, अपने भाइयों की सेवा में उसका एक अंश अर्पण करन भी चाहते हैं। और जिम्मेदारी भी सबसे ज्यादा उन्हों लोगों पर आती है, जो संसार के प्रगति को देखते और सम्झते हैं।

मैसूर में इंदिरा बहन से मिलकर चित्त प्रसन्‍न हुआ है। इस देवी से मैं प्रयाग और दिल्ली में मिल चुका था। प्रयाग-महिला- काशी,

विद्यापीठ में दो साल तक इन्होंने हिन्दी का विशेष ज्ञान प्राप्त किया है और आजकल यहां प्रचार कर रही हैं। आप

प्रचार-सभा के मंत्री श्री कृष्णमूर्ति जी की सहधर्मिणी हैं। हिन्दी-प्रम इन्हें प्रयाग खींच ले गया। पति ने भी सहर्ष अनुमति दी। अपनी छोटी -सी बच्ची को घर पर छोड़कर वह प्रयाग चली गयीं। जिस आंदोलन में ऐसे साधक हों, वह क्‍यों न सफल हो। एक दूसरी देवी श्रीमती लक्ष्मी अम्मां हैं। इस वृद्धावस्था में इन्होंने विशारद पास किया और अब उर्दू पढ़ रही हैं। उनका उत्साह अदम्य है और युवकों को भी लज्जित करता है। जहां-जहां मैं गया वह मेरे स्वागत के लिए मौजूद थीं। हम उनकी कुटिया में उस श्रद्धा से गये जैसे मंदिर में जाते हैं और वहां हमने दस-पांच मिनट तक इस तरह गुजारे, मानो अपनी बहुत दिनों कौ बिछुड़ी हुई बहन से मिल रहे हों और बहन उतने ही समय में अपने स्तेह और मेहमानदारी के सारे अरमान पूरे कर लेना चाहती हो। प्रो* सूस्त्री के दर्शनों का सौभाग्य भी हमें मिला। आप मैसूर-विश्वविद्यालय में फारसी के अध्यापक हैं और उर्दू के अच्छे जानकार हैं। आपको हिन्दोस्तानी से प्रेम है और संस्कृत के तो आप पंडित हैं। आप इन दिनों भगवद्‌ गीता का फारसी में अनुवाद कर रह हैं। हिन्दू-मुसलिम समस्या पर आपने जो सोने के-से विचार प्रकट किये, काश वह हमारे लीडरों में भी होते तो भारत आज स्वर्ग हो जाता। आप साधुओं का-सा जीवन व्यतीत कर रहे हैं। सांप्रदायिक मनोवृत्ति से आपको घृणा है। आपके चरणों में बैठकर हमने जो आत्मिक शांति लाभ की, वह दिव्य दर्शन से होती है। हिन्दी में एक और उपासक प्रो« नांजुन डैया के सत्संग का भी सुअवसर हमें मिला। आप मैसूर-विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के अध्यापक हैं और इन दिनों अस्वस्थ हैं आपने जिस उदारता से हमारा स्वागत किया, वह हमारे जीवन की बड़ी मधुर अनुभूति है। आप इन दिनों उर्दू का अध्ययन कर रहे हैं और हमारी कई उर्दू रचनाएं आपको नजरों से गुजर चुकी हैं। आपका विशुद्ध साहित्य-प्रेम और घाहित्य के एक “च्छ सेवक के पति आपका उमड़ता हुआ सम्मान देखकर हम कृतार्थ हो गये। आप प हमें यही शिकायत है कि आपने हाथी दांत की नक्‍्काशी से सजा हुआ एक सिगरेट बक्स भेट करके हमें यह पाठ पढ़ाया कि सिगरेट पीना भी कोई सद्व्यसन है और तब में सिगरेट के प्रति हमारा अनुराग बढ़ गया है, क्योंकि बकस को हम खाली नहीं देख सकते-दावात में स्याही नहीं तो वह कुल्हिया है-और जब सिगरेटों से भरा हुआ डब्बा सामने हो, तो लोभ को रोकना जरा कारे दार॑द।

यों हमें तो यहां दो जलसों में हिन्दी के विषय में अपने विचार प्रकट करने का अवसर मिला, लेकिन विशेष आनंद का अवसर वह था, जब हम विश्वविद्यालय भवन में हिन्दी के सैनिकों से मिले। पचास मित्रों से *म न थे और यह सभी उुबक हैं, जो खुद विश्वविद्यालय में पढ़ रहे हैं। पर हिन्दी से इतना प्रेम रखते हैं कि कुछ- न कुछ समय निकालकर हिन्दी-प्रचार की भेंट करते हैं। यह राष्ट्रभाषा के उत्साही मविक हैं और उसके प्रचार का संपूर्ण श्रेय इनको है। कई मित्रों ने हिन्दी में हल "या हुईं चीजें पढ़ीं और हम लोगों में घंटे भर तक काफी के साथ साहित्यिक समस्या

पर खूब गपशप हुई।

मैसूर की राजभाषा कनाडी है और बोलने वालों की संख्या डेढ़ करोड़ के लगभग है, मगर यह संख्या, मद्रास, बंबई, हैदराबाद रियासत और मैसूर में फैली हुई है और इससे इस भाषा के विकास में बाधा पड़ रही है। कनाडी का प्राचीन साहित्य ऊचे दरजे का है और नये साहित्य में भी अच्छी उन्नति हो रही है। बंगलोर में कनाडी.- साहित्य-परिषद का अपना भवन है, पुस्तकालय है और उसके द्वारा कनाड़ी-साहित्य के अच्छे ग्रंथ प्रकाशित हो रहे हैं। मैसूर में मुसे कई कनाड़ी-साहित्य-सेवियों की सेवा में हाजिर होने का अवसर मिला। कई अन्य प्रांतीय भाषाओं की तरह कनाडी को भी यह शंका होने लगी है कि हिन्दी-प्रचार के उद्देश्य के विषय में कुछ भ्रम अभी तक बाकी हेै। हिन्दोस्तानी प्रचार का उद्देश्य यह हर्गिज नहीं है कि वह प्रांतीय भाषाओं का स्थात्ञ छीन ले। वह तो अंग्रेजी भाषा का वह स्थान लेना चाहती है, जो उसने भारतवर्ष में प्राप्त कर लिया है। राष्ट्रभाषा और प्रांतीय भाषाओं में कुछ वही संबंध रहेगा, जो प्रांतीय कौंसिलों और भारतीय एसेम्बली में है। एसेम्बली प्रांतीय कौंसिलों के किसी काम में बाधा नहीं डालती। हां, कुछ ऐसे विषय हैं, जिनका संबंध पूर्ण भारत से है और एसेम्बली उन्हीं के विषय में व्यवस्था करती है। जो लेखक या पत्रकार अपनी पुस्तक या पत्र का सारे भारतवर्ष में प्रचार चाहेगा, उसके लिए अंग्रेज! माध्यम की जगह हिन्दी माध्यम का साधन उपस्थित कर देना ही हमारा ध्येय है। आखिर कोई ऐसा दिन तो आयेगा ही, चाहे वह दूर भविष्य में ही क्‍यों न आये. कि भारत अपनी संस्कृति और अपने साहित्य के साथ अन्य राष्ट्रों के पहलू में बैठ अगर हम भारत को एक देश न मानकर महाद्वीप मान लें, जिसमें बहुत से देश हे. तब भी तो हमें एक प्रधान भाषा की जरूरत पड़ेगी ही,.जिसमें अंतर्देशीय व्यवहार किया जा सके। हां, अगर इन देशों में कोई संबंध ही न रहे, तो दूसरी बात है। तब तो एक प्रांत भी अपनी पृथक्‌ सत्ता न कायम रख सकेगा। हमारा ख्याल है कि हिन्दुस्तानी का प्रचार साहित्य-सेवियों के लिए यश और कीर्ति का एक महान क्षेत्र खोल देता है और प्रांतीय भाषाओं को उससे बदगुमान होने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। अभी तक हमने जो कुछ किया है, वह प्रांतीय दृष्टि से ही किया है। हम परिभाषिक शब्दों का कोष बनाते हैं।तो अलग-अलग साधारण कोष बनाते हैं, तो भी अलग-अलग! अगर हमारे पास कोई अंतरप्रांतीय या राष्ट्र-भाषा-परिषद ऐसी होती, जहां प्रतिवर्ष प्रत्येक भाषा के महारथी एकत्र होकर, दो-चार दिन या दो--चार हफ्ते बैठकर राष्ट्रभाषा संबंध गरी समस्याओं पर विचार किया करते, तो शायद दस-बीस साल में हमारी एक संपन्न राष्ट्रभाषा बन जाती। पृथक-पृथक्‌ काम करने से समय और शक्ति का सम थे रहा हैं। दर्शन, विज्ञान, शास्त्र के हजारों ही शब्द हैं, जो सभी प्रांतीय भाषाओं में एक हो सकते थे। अलग-अलग माथापच्ची करने की जरूरत ही न पड़ती।

पांच दिन मैसूर की मेहमानी खाकर हमने बंगलोर का प्रस्थान किया।

मैसूर से बंगलोर कोई चार घंटे का सफर है। बीच का प्राकृतिक दुश्य बडे ही रमणीक है। कहीं हरे-भरे खेत हैं, कहीं आम, नारियल और सुपारी के बाग और कहीं हरियाली से ढकी हुई ऊंची-ऊंची पहाड़ियां। आकाश में कुछ बादल थे और

उस मंद प्रकाश में वह पर्वत। शोभा स्वप्निल हो गयी थी। बीच-बीच घाटियों की गोद में विश्राम करते हुए ग्राम नजर आ जाते थे, जिनकी कलई से पुती हुई दीवारें गांव वालों की सफाई और सुरुचि का पता दे रही थीं। यहां की मिट्टी लाल है । जिससे खेतों को छटा और भी सुहावनी हो जाती है। खेतों में जो किसान काम करते नजर आते थे, उनका पहिरावा कुरता और जांधिया था। धोती के मुकाबले में जांघिया किफायत की चीज है। वहां धान के खेत भी बहुत मिले, जिनमें नहर से सिंचाई हो रही थी। अब यहां गन्ना भी पैदा होने लगा है और राज्य की ओर एक शक्कर की मिल भी है।

शामको हम बंगलोर पहुंच गये। स्टेशन पर हिन्दी-प्रचार-सभा के अध्यक्ष श्री निट्टूर, श्रीनिवास राव, श्री जम्बुनाथन जी आदि सज्जन मौजूद थे। हम अध्यक्ष जी के मेहमान हुए।

बंगलोर समुद्र की सतह से तीन हजार फीट की ऊंचाई पर है और मैसूर से कुछ ठंडा है। बंगलोर शहर के दो भाग हैं। शहर जो मैसूर राज्य के अधीन है और छावनी पर अंग्रेजी सरकार का राज्य है। आबादी तीन लाख के ऊपर है। शहर में तो कोई खास बात नहीं, प्रयाग या लखनऊ जेसा ही है, लेकिन छावनी की सड़कों की सफाई और बंगलों की सजावट देखकर चित्त प्रसन्‍न हो गया। बंगलोर में और प्राय: दक्षिण ४ 3 आंगन के घर होते हैं। घर में हैसियत के अनुसार दो-तीन-चार कोटठरियां होती हैं। मकान के सामने एक कछोटा-सा बाग और चारदीवारी भी बनायी जाती है। हर एक घर बंगले जैसा मालम होता है।

पहले दिन प्रात:काल हम लाल बाग की सेर करने गये। इसका रक्‍बा एक सौ एकड़ है। बाग कौ बनावट और सफाई और सुंदरता साफ -सुथरी रविशें, फूलों की क्यारियां, शीश मंडप मन को मुग्ध कर लेती है। खास बात यह है कि यह पार्क- सुलतान हेदरअली की सुरुचि और वनस्पति-प्रेम की यादगार है। यहां पौधों और बीजों की बिक्री होती है और विचित्र प्रदार की वनस्पतियों को विदेशी से मांगकर उपजाया जाता है। बंगलोर की सबसे दर्शनीय वस्तु यही पार्क है।

बंगलोर से तोन मील पर विज्ञान का वह प्रसिद्ध विद्यालय है, से श्री जमशेद जी नौशेरवां जी ताता ने स्थापित किया थधा। बंगलोर आकर इस विज्ञान-मंदिर के दर्शन न करना दुर्भाग्य की बात होती है। रतिवार के दिन हम कोई तीन बजे वहां पहुंचे। विद्यालय बंद थे, पर डॉ० सर सी* वी*« रमन ने बड़ी खुशी से हमारा स्वागत किया और हमें विद्यालय के रासायनिक विभाग, पुस्तकालय और लेबोरेटरी की सैर करायी। में दो-चार वैज्ञानिकों से पहले भी मिल चुका हूं। यह बड़ा समन्वय बड़ ही आकर्षक, गूढ़, शुष्क और अपनी धुन में मस्त होता है। प्रकृति की अनंत रहस्यमयी रचनाओं में संदेह विचरते रहने के कारण कदाचित्‌ मनुष्य उसके लिए मामूली पशु-मात्र रह जाता है, लेकिन वैज्ञानिकों के इस प्रिंस को देखकर णें चकित हो गया। ऐसा एसनन्‍नचित्त व्यक्ति, जिसका पोर-पोर बालकों के सरल उछाह से उबला पड़ता हो, मेंने दूसरा नहीं देखा। वह विज्ञान के आशिक हैं। और वह इश्क उनकी आंखों में, उनके कपोलों पर, एक-एक अंग में रमा हुआ है। वह इस तरह से दौड़-दौड़कर एक-एक चीज हमें दिखा रहे थे, मानो कोई बालक अपने किसी सखा को अपने खिलौने और कनकोवे

और नये कपड़े दिखाने के लिए अधीर हो रहा हो और चाहता हो कि एक हो सांस में सारी विभूतियां दिखा दूं, जिसमें कुछ बाकी न रह जाय। मैं अगर कहूं कि इसी इंस्टीट्यूट में उनके प्राण बसते हैं, तो गलत न होगा। इसकी एक-एक रविश, एक- एक फूल, एक-एक पौधे, यहां तक कि उसके मनोरम प्राकृतिक दृश्य पर भी उन्हें गर्व है, मानो वह प्राकृतिक छटा भी उनकी अपनी रचना हो। इस विद्यालय से देश को अब तक क्‍या लाभ पहुंचा है, यह तो कोई वैज्ञानिक ही जानता होगा, हम तो सर रमन के व्यक्तित्व की छाप दृदय पर लेकर आये। विद्युत-विभाग और अन्य विभाग बंद थे, वह हम न देख सके। सर रमन ने हमें एक मजे का तमाशा दिखाया, जो हमारे लिए तो खेल था, पर बुद्धिमानों के लिए तात्विक छान-बीन की चीज है। तबले के चर्मभाग पर चुटकी भर बालू बिखेर दो और तबले पर एक थाप मारो। बालू कभी सीधी रेखा का रूप धारण कर लेती है, कभी उृत्त का। तबले की अलग-अलग धवन भिन्‍न-भिन्‍न आकार में प्रकट होती है। सर रमन जिस जिंदादिली और जोश से तबले पर बालू बिखेरते ओर थाप लगाते थे, वह देखकर कौन ऐसा मुर्दादिल होगा, जो गदगद न हो उठता।

चार बजे हम डॉक्टर साहब से बिदा हुए और यह सोचते हुए निकले कि काश बड़े लोग अपने बड़प्पन को अपनी कब्र न बनाकर ज्योति बना सकते, तो उससे कितना प्रकाश फैलता।

उसी दिन हमने चीनो के बर्तनों का कारखाना देखा, जो इंस्टीट्यूट से मिला हुआ है। क्रिया बिल्कुल कुम्हारों कौ-सी है। एक खास तरह को मिट्टी यहां निकल है, जिसमें दो-एक चीजें मिला देने से लुग्दी तैयार हो जाती है। लुग्दी को भिन्‍न भिन्‍न सांचों में डालकर बाहर निकालते हैं, फिर सुखाते हैं, रंगते हैं, और भट्ट में पकाते हैं। शो-रूम में यहां के बने हुए खिलौनों और मूर्तियों और फूलवानों आदि का अच्छा संग्रह है, “जिससे मालूम होता है कि इस काम में यहां कितनी उनलति हुई है। नल, खपरे, मार्बल, तार की चिड़ियां सब कुछ यहां तैयार होती हैं। मैसूर राज्य-में बिजली का व्यवहार बड़ो कसरत से होता है, उसके लिए चीनी का जितना सामान दरकार होता है, वह इसी कारखाने में तैयार होता है। ु

बंगलोर में भी मैसूर की भांति हिन्दी का अच्छा प्रचार हो रहा है। यहां के नेशनल हाईस्कूल में तो हिन्दी लाजिमी कर दी गयी है। कुछ उद्योग-घंधे भी सिखाये जाते हैं। यहां एक जलसा हुआ, जिसके सभापति प्रो ए० आर» वाडिया थे। प्रो* वाडिया मैसूर हिन्दी-प्रचार-सभा के प्रेसिडेंट हैं। मैसूर में उनके दर्शन न हो सके थे। वह सौभाग्य यहां मिला। आपको हिन्दी और उर्दू से विशेष रुचि है मगर बोलते हैं अंग्रेजी में और बहुत अच्छा बोलते हैं। स्कूल हेडमास्टर श्री सम्पतराव गिरि, एम० ए० भी हिन्दी के उपासक हैं और आपने तुलसीकृत रामायण का कनाड़ी गद्य में अनुवाद किया है। इस स्कूल के साथ एक॑ व्यायामशाला भी है, जिसे गत वर्ष महात्मा जी ने खाला था।

बंगलोर में महिलाओं की कई संचालित संस्थाएं हैं और प्रायः उन सभी मे हिन्दी पढ़ायी जाती है। सिलाई, बुनाई, कताई, बेंत का काम, संगीत, कसीदे कादनां प्राय; सभी संस्थाओं में जारी है। अध्यापन और संचालन -कार्य देवियों हो के हाथों

में हैं। कहीं-कहीं लड़कियों के लिए व्यायामशालाएं भी हैं। स्त्रियों की यह जागृति शष्ट्र के आशाप्रद भविष्यत्‌ कौ सूचक है। यहां का कोमल जलवायु संगीत के लिए बहुत अनुकूल जान पड़ता है। सभी महिला-समाजों में संगीत का प्रचार है। वीणा यहां का प्यारा बाजा है। काश, ये देवियां महीने में दो दिन आस-पास के देहातों को भेंट कर दिया करें, तो गांव वाली स्त्रियों को भी उनको जागृति का कुछ प्रकाश मिले। यों तो सभी संस्थाएं तरक्की कर रही हैं, पर मल्लेश्वरम्‌ महिला-समाज कौ उन्नति विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यहां 930 में हिन्दी क्लास खोला गया। पहले साल केवल चार देवियां परीक्षा में बैठों और गतवर्ष यह संख्या बढ़कर पैंतालिस तक पहुंच गई। इसी संस्था को दो देवियां प्रयाग महिला विद्यापीठ में पढ रही हैं। अब तक तीन सौ देवियां इस समाज से हिन्दी का कामचलाऊ ज्ञान प्राप्त कर चुकी है। यहां एक वाग्वर्धिनी सभा भी है, जिसमें देवियां सामाजिक विषयों पर मुबाहसे करती हैं। इतना ही नहीं, यहां से 'समाज भारती ' नाम का एक हिन्दी त्रैमासिक पत्र भी निकलता है, जिसमें देवियां भिन्‍न-भिन्‍न विषयों पर लेख लिखती हैं। समय- समय पर यहां विद्वानों और राष्ट्र नेताओं के भाषण भी होते हैं। एक बार महात्मा जी भी यहां पथ अमृत उपदेश कर चुके हैं। इस कीर्ति पर कौन-सी संस्था गर्व न करेगी। कनाडी भाषा और साहित्य-परिषद भी बंगलोर में ही है। हमने बड़ी श्रद्धा से इस साहित्य-मंदिर की परिक्रमा कौ। अच्छा खासा परिषद का अपना भवन है, जिसमें एक हॉल है, एक पुस्तकालय, वाचनालय और दफ्तर। कनाड़ी भाषा के कई महत्त्वपूर्ण ग्रंध -परिषद द्वारा प्रकाशित हो चुके हैं। आजकल परिषद में मैसूर राज्य के प्रोत्साहन से एक बृहद्‌ कनाड़ी-अंग्रेजी कोष बन रहा है। जिसके एडिटर और कोष-मंडल के अध्यक्ष एक बयोवुद्ध सज्जन प्रो" वेंकट नारायणप्पा हैं। आप जिस उत्साह और तन्मयता से यह कार्य-संपादन कर रहे हैं, वह जवानों को लज्बिर करता है। २0५ पहले मैसूर विश्वविद्यालय में कैमिस्ट्री के अध्यापक थे। अब पेंशन पाते हैं। कनाड़ी रूहित्य बहुत पुराना है और इसका काव्य साहित्य तो बड़े ऊचे दरजे का है। नया माहित्य भी बड़े वेग से बढ रहा है। परिषद के कुशल उपसभापति श्री गुंडप्पा जो के दर्शनों का सौभाग्य भी हमें हुआ। आप साहित्य के एक यशस्वी लेखक और कवि हैं और प्राचीन साहित्य क गहरे विद्वान। कनाडी साहित्य कितना धनी है, इसका अनुमान इसी से किया जा पकता है कि उनन्‍्नीसवीं सदी के अंत तक इसमें लगभग बारह सौ कवि हो गए थे, जिनमें पच्चीस महिलाएं थीं और पच्चीस राजे-रईस। एक विद्वान ने तीन जिलों में उनके जीवन-चरित्र लिखकर कनाड़ी साहित्य के इतिहास की अच्छो सामग्री जुटा दी है। अगर कनाडी साहित्य की कुछ चीजें हिन्दी-सारित्य में आ सकें, तो 37दान- प्रदान से दोनों ही भाषाओं को लाभ हो। कुमार व्यास की अमर कृति ' भारत शायद कनाड़ी साहित्य का सबसे उत्तम ग्रंथ है। कनाड़ी विद्वानों का कहना है कि ऐसे कवि भारतवर्ष में दो-चार ही हुए हैं। अब इस प्रांत में हिन्दी का प्रचार हो रहा का है, तो शायद भविष्यत्‌ में कोई कनाड़ी विद्वान अपने साहित्य-रत्नों को हिन्दी में भेंट करें। हंस' में गुजराती, मराठी, उर्दू, अंग्रेजी पत्रों के संग्रहणीय और विचारपूर्ण लेखों पर

टिप्पणियां दी जाती हैं, अगर कोई हिन्दी जानने वाले कनाडी विद्वान कनाड़ी के सामयिक साहित्य पर टिप्पणियां लिखकर 'हंस' में भेजने की कृपा करें, तो 'हंस' उपकार मानकर उसे सहर्ष स्वीकार करेगा, बल्कि अपना गौरव समझेगा।

बंगलोर में मि० के० बी० ऐयर का व्यायाम मंदिर भी देखने की चीज है। मालूम नहीं ऐयर महोदय ने इसका नाम हर्क्यूलीस व्यायाम मंदिर क्‍यों रखा है। हमारे हनुमान जी तो हर्क्यूलीस से कुछ कम न थे। हर्क्यूुलीस ने अगर पहाड़ के दो टुकड़े कर दिए थे, तो हनुमान जी सूर्य को साफ निगल गए थे और धौलागिरि पर्वत को एक हाथ पर उठाकर कोई ढाई हजार मील दौड़ते चले आये थे। इस मंदिर में युवकों को हर एक तरह का व्यायाम सिखाया जाता है। ऐयर स्वयं बड़े ही सुगठित शरीर के स्वामी हैं, और आपके कई शिष्य अच्छे-खासे पहलवान हैं। आपने सूर्य नमस्कार के आधार पर अपनी एक व्यायाम-विधि निकाली है और इस विषय का बहुत सा साहित्य भी प्रकाशित कर चुके हैं, हम उनसे मिल तो न सके, क्योंकि उस दिन वह कहीं बाहर गये हुए थे। लेकिन उनके सचित्र बुकलेट जो हमने पढें, उससे मालृम हुआ कि आपने नवीन और प्राचीन विधियों का मिश्रण करके एक वेज्ञानिक अभ्यास- क्रम निकाला है, जिससे थोड़े समय में ही आइचर्यजनक फल प्राप्त हो सकता है। और यह पहलवान अपनी बाल्यावस्था में बहुत ही दुबला -पतला था। ऐसे मंदियों का प्रत्येक नगर में जरूरत है और हमारा ख्याल है कि जनता उनका बड़े हर्ष से स्वागत करेगी।

मैसूर राज्य में हिन्दी अभी तक अखितयारी मजमून है। हिन्दी प्रेमियों की »ः

यह आंदोलन हो रहा है कि हिन्दी का लाजिमी बना दिया जाय। अगर यह उद्याग

सफल हो जाय, तो हिन्दी-प्रचार दुगनी गति से बढ़ने लगे। इसी विषय पर कुछ विचार विनिमय करने के लिए में मैसूर राज्य के दीवान सर मिर्जा इस्माइल को खिदमत में हाजिर हुआ। दीवान साहब बड़े ही विद्या- प्रेमी और उदार व्यक्ति हैं। हमारी बातपी० हिन्दुस्तानी में हुई। उर्दू साहित्य का उन्हें अच्छा परिचय है, और बेतकल्लुफ उद्‌ बोलते हैं। हिन्दुस्तानी में एक राष्ट्रभाषा की जरूरत को वह भी स्वीकार करते हैं और इस आंदोलन से उन्हें सहानुभूति है, लेकिन एक सांस्कृतिक विषय में वह सरकार तोर पर कोई कार्यवाई करने के पक्ष में नहीं हैं। जब तक यह मांग इतनी बलवान नहीं हो जातो कि कार्यकारिणी समिति इसे बहुमत से स्वीकार कर ले, तब तक राज्य इसमें दखल देना मुनासिब नहीं समझता। सब-कुछ राष्ट्रभाषा के प्रेमियों और प्रचारकों के धैर्य, उत्साह और सेवा पर मुनस्सर है। जब तक हम हिन्दुस्तानी को सर्वसम्मति से राष्ट्रभापा स्वीकार न करा लें, तब तक राज्य उसे कैसे स्थीकार करेगा। दीवान साहब हमारे साथ बडे मेहरबानी से पेश आये। गोरे अधिकारियों ने हमें यह सिखाया है कि अधिकार और सज्जनता में मेल नहीं होता। दीवान साहब इसके अपवाद हैं। आपसे मिलकर “*फर-फिर मिलने को इच्छा होती है।

हमने चौथे दिन बंगलोर से पूना को प्रस्थान किया। श्रीनिवासराव जी ते हमार जो सत्कार किया, उसके लिए हम उनके एहसानमंद हैं। आप हैं तो एक हड्डी के व्यक्ति, मगर आपके पोर-पोर में सजीवता भरी हुई है। आप वकील हैं, प्रकाश+

हैं, लेखक हैं और हिन्दी-प्रचार के स्तंभ हैं। आपने कनाडी भाषा में 800८ ० [000/९08८ के ढंग की एक माला मासिक पत्रिका के रूप में प्रकाशित करना आंरभ किया है और शायद उसके चार नंबर निकल चुके हैं। इसमें अनेक ब्लाक हैं , और साहित्य, विज्ञान, इतिहास, भूगोल, कला-कौशल, जीव शास्त्र, वनस्पति आदि अनेक विषयों पर बालकोपयोगी निबंध हैं। और चेष्टा की गई है कि उसकी भाषा सरल, सजीव और रोचक रहे। हिन्दी में अभी तक ऐसी कोई माला नहीं निकली है। श्रीनिवासराव इसका एक हिन्दी एडिशन निकालने का प्रबंध कर रहे हैं। ब्लाक उनके पास हैं ही, केवल निबंधों का सरल हिन्दी में अनुवाद करना है। हमें आशा है कि हिन्दी में इस माला का आदर होगा। बच्चों के लिए हिन्दी में किस्से-कहानियां तो बहुत निकली हैं, लेकिन ज्ञान बढ़ाने वाली पुस्तकों का अभाव है। इस संग्रह से यह कमी पूरी हो जाएगी।


प्रकाशन इतिहास

[संस्मरण/लेख। 'हंस', फ़रवरी, 1935 में प्रकाशित। 'विविध प्रसंग' भाग-3 में संकलित।]

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "दक्षिण भारत में हमारी हिन्दी प्रचार-यात्रा." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1935, https://munshipremchand.com/works/non-fictions/dakshin-bharat-mein-hamari-hindi-prachar-yatra. Accessed 22 Sep. 2026.