Cover Image for Khel (खेल) by Munshi Premchand - Short Story
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कहानी•1931•16 मिनट

खेल

Khel

प्रेमचंद की कहानी 'खेल' बच्चों की मासूमियत, कल्पनाशीलता और खेल-खेल में मिलने वाली असीम खुशी को दर्शाती एक सजीव कहानी है।

पात्र:फुन्दन, जतीन
स्थान:एक भारतीय गाँव की सड़क और नीम का पेड़

खेल का मूल पाठ

तीसरा पहर हो गया था। किसान अपने खेतों में पहुँच चुके थे। दरख्तों के साये झुक चले थे। ईंख के हरे-भरे खेतों में जाबजा (जगह-जगह) सारस आ बैठे थे। फिर भी धूप तेज थी और हवा गर्म । बच्चे अभी तक लू के खौफ से घरों से न निकलने पाये थे कि यकायक एक झोंपड़े का दरवाज़ा खुला, और एक चार-पाँच साल के लड़क॑ ने दरवाजे से झाँका। झोंपड़े के सामने नीम के साये में एक बुढ़िया बैठी अपनी कमजोर आँखों पर जोर डाल-डालकर एक टोकरी बुन रही थी। बच्चे को देखते ही उसने पुकारा, “कहाँ जाते हो फुन्दन ? जाकर अन्दर सोओ, धूप बहुत कड़ी है। अभी तो सब लड़के सो रहे हैं।'

फुन्दन ने ठनक कर कहा, “अम्मा तो खेत गोड़ाने गयीं। मुझे अकेले घर में डर लगता है?

बुढ़िया गाँव भर के बच्चों की दादी थी, जिसका काम बच्चों की आजादी में मुखिल (बाधक) होना था। गढ़िया के किनारे अमियाँ गिरी हुई थीं, लेकिन कोई बच्चा उधर नहीं जा सकता। गढ़िया में गिर पड़ेगा। बेरों का दरख़्त सुर्ख व जर्द (लान और पीले) बेरों से लदा हुआ है। कोई लड़का उस पर चढ़ नहीं सकता, फिसल पड़ेगा। तालाब में कितना साफ पानी भरा हुआ है, मछलियाँ उसमें फुदक रही हैं। कमल खिले हुए हैं, पर कोई लड़का तालाब के किनारे नहीं जा सकता, डूब जायेगा। इसलिए बच्चे उसकी सूरत से बेजार (विमुख, अप्रसन्‍न) थे। उसकी आँखें बचाकर सरक जाने की हिक्मतें (युक्तियाँ) सोचा करते थे। मगर बुढ़िया अपने हश्तादसाला (अस्सी वर्ष के) तजुर्बे से उनकी हर एक नकुल व हरकत को ताड़ जाती थी और कोई-न-कोई पेशबन्दी कर लेती थी।

बुढ़िया ने डॉटा, “मैं तो बैठी हूँ। डर किस बात का है ? जा सो रह, नहीं उठती हूँ।

लड़के ने दरवाज़े के बाहर आकर कहा, “अब तो निकलने की बेला हो गई ।”

“अभी से निकल के कहाँ जाओगे ?”

“कहीं नहीं जाता हूँ दादी |”

वह दस कृदम और आगे बढ़ा। दादी ने टोकरी और सूजा रख दिया और उठना ही चाहती थीं कि फुन्दन ने छलाँग मारी और सो गज क॑ फासले पर था। बुढ़िया ने अब सख्ती से काम न चलते देखकर नरमी से पुकारा, “अभी कहीं मत जा बेटा ।”

फुन्दन ने वहीं खड़े-खड़े कहा, '“जतीन को देखने जाते हैं”, और भागता हुआ गाँव के बाहर निकल गया।

जतीन एक खोंमचे वाले का नाम था। इधर कुछ दिनों से उसने गाँव का चक्कर लगाना शुरु किया था। हर रोज़ शाम को जरूर आ जाता | गाँव में पैसों की जगह अनाज मिल जाता था और अनाज असल कीमत से कुषठ ज़्यादा होता था। किसानों का अन्दाज हमेशा फैयाजी (दानशीलत) की जानिब (ओर) मायल (उन्मुख) होता है। इसीलिए जमीन करीब के कस्बे से तीन-चार मील की मसाफृत (फांसला) तय करके आता था। उसके खोंचे में मीठे और नमकीन सेव, तिल या रामदाने के लड्डू, कुछ बताशे और खुट्टियाँ, कुछ पड़ी होती थीं। उस पर एक मैला-सा वोसीदा (फटा-पुराना) कपड़ा पड़ा होता था, मगर गाँव के बच्चों के लिए वह ख्वान-ए-नेमत (अच्छी-अच्छी खाने की चीजों से भरा थाल) था, जिसे खडे होकर देखने के लिए सारे बच्चे बेताब रहते थे। इनकी ।0फलाना (बालोचित) सरगर्मियों (संलग्नता, तत्परता) में यह एक दिलचस्प इजाफा हो ग“* था। सब-के-सब तीसरे पहर ही से जतीन का इन्तजार करने लगते थे। हालाँकि ऐसे खुशनसीब लड़के कम थे, जिन्हें इस ख्वान-ए-नेमत से हकाइकी (यथार्थ में) फेज (लाभ) पहुँचता हो। मगर खोंचे के गिर्द (निकट) जमा होकर ख़्वानपोश (थाल पर ढेंके कपड़े) को आहिस्ता से उठते और उन नेमतों की रानियों की तरह अपनी-अपनी जगह तकल्लुफ (संकोच) से बैठे देखना बजायेखुद (स्वयं) बेहद दिलआवेज (प्रियदर्शन, खुशनुमा) था। हालाँकि जतीन का आना हर एक घर में कुहराम मचा देता था और आध घण्टे सारे गाँव में हगामा-सा बरपा (उपस्थित) हो जाता धा। मगर बच्चे इसका खैरमक्दम (स्वागत) करने को मुज्तरिब (अधीर) रहते थे। यह जानते हुए भी कि जतीन वी आमद (आगमन) उनके लिए हँसी का नहीं, रोने का मौका है। सब-के-सब बड़ी बेसब्री से उसके मुन्तज़िर (प्रतीक्षक) रहते थे, क्योंकि मिठाइयों के दर्शन से चाहे जबान आसूदा (सन्तुष्ट) न हो रे रूहानी तक््वियत (तसल्ली, सान्त्वना) जरूर होती थी। फुन्दन भी इन्हीं गरीब लड़कों में था। और लड़के मिठाइयाँ खाते थे, वह सिर्फ गरसना (भृूखी) निगाहों से देखता था। रोने और रूठने, तिफूलाना (बालोचित) मिनन्‍नत और खुशामद एक से भी उसकी मक्सद-बरारी (उद्देश्यपूर्ति) न होती थी, गोया नाकामी ही उसकी तकदीर में लिखी हो। मगर इन नाकामियों के बावजूद उसका हौसला पस्त न होता था।

आज फुन्दन दोपहर को न सोया। जतीन ने आज कच्ची गरी और इमर्तियाँ लाने का जिक्र किया था। यह ख़बर लड़कों की उस दुनिया में किसी अहम (महत्त्वपूर्ण) तारीख़ी-वाकिआ (ऐतिहासिक घटना) से कम न थी। सुबह ही से जतीन की तरफ दिल लगा हुआ था। ऐसी आँखों में नींद कहाँ से आती ?

फुन्दन ने बाग में पहुँचकर सोचा-क्या अभी सबेरा है ? इस वक्‍त तो जतीन आ जाता था, मगर नहीं, अभी सबेर है। चुन्नू और सोहन और कुल्लू एक भी तो नहीं उठे। जतीन सड़क पर पहुँच गया होगा। इमर्तियाँ जरूर लायेगा, सुर्ख और चिकनी होंगी। एक बार न जाने कब...हाँ, दसहरे के मेले में एक इमर्ती खाई थी। कितनी मजेदार थी ! उस जायके को याद करके उसके मुँह में पानी भर आया। इश्तियाक (उत्कण्ठा, लालसा) और भी तेज हो गया। वह बाग के आगे निकल गया। अब सड़क तक हमवार (समतल) मैदान था, लेकिन जतीन का कहीं पता न था।

कुछ देर तक फुन्दन गाँव के निकस पर खड़ा जतीन की राह देखता रहा। उसके दिल में एक गुदगुदी उठी-आज मैं सबसे पहले जतीन को पुकारूँगा। मैं जतीन के साथ-साथ गाँव में पहुँचूँगा। तब लोग कितना चकरायेंगे ? इस ख्याल ने उसके इश्तियाक में बेसब्री का इजाफा कर दिया। वह तालियाँ बजा-बजाकर दिल-ही-दिल में चहकता हुआ सड़क की तरफ चला।

इत्तिफाक (संयोग) से उसी वक्त गेंदा आ गया। यह गाँव का पुंचायती कुत्ता था, चौकीदार का चौकीदार, खिलौने का खिलौना। हस्बे-मामूल (नित्य नियमानुसार) तीसरे पहर का गश्त लगाने निकला था। इसी वक्‍त साँड़ और बैल खेतों में घुसते थे। यहाँ पहुँचा तो फुन्दन को देखकर रुक गया और दुम हिलाकर गोया पूछा-तुम आज यहाँ क्यूँ आये ? फुन्दन ने उसके सिर पर थपकियाँ दीं, मगर गेंदा को ज़्यादा बातचीत करने की मुहलत (फुर्सत) न थी। वह आगे बढ़ा तो फुन्दन भी उसके पीछे दौड़ा। अब उसके दिल में एक ताजा उमंग पैदा हो रही थी। वह तनहा (अकेला) न था। उसका रफीक (दोस्त) भी साथ थधा। वह अब कच्ची सड़क पर जतीन का खैरमक्दम (स्वागत) करना चाहता था। सड़क पर पहुँचकर उसने दूर तक निगाह दौड़ाई। जतीन का कहीं निशान नहीं था। कई बार उसे वहम हुआ, वह जतीन आ रहा है, मगर एक लम्हे में उसका इजाला (निवारण) हो गया। सड़क पर नाजिरी (दर्शनीय) दिलचस्पियों की कमी न थी। बैल-गाड़ियों की कतारें थीं। कभी-कभी एक्के और पैर-गाड़ियाँ भी निकल जाती थीं। एक बार एक ऊँट भी नज़र आया, जिसके पीछे वह कई सौ कृदम तालियाँ बजाता गया, मगर इन सरीउस्सैर (शीघ्रगामी) दिलचस्पियों में वह इश्तियाक (लालसा) किसी मीनार की तरह खड़ा था।

सड़क के किनारे दो रोया (रूखे, आमने-सामने) दरख्त खड़े थे। उनमें आम के दरख़्त भी थे। इस इश्तियाक्‌ (उत्कण्ठा, लालसा) में उसे आमों पर निशाने मारने का एक दिलचस्प मशगला (काम) हाथ आया, मगर आँखें जतीन के लिए बरसरे-राह (ठीक रास्ते पर) थीं। यह बात क्‍या है, आज वह आ क्यूँ नहीं रहा है ?

रफ़्ता-रफ़्ता (धीरे-धीरे) साया लम्बा हो गया। धूप किसी थके हुए मुसाफिर की तरह पाँव फैलाकर सोती हुई मालूम हुई। अब तक जतीन के आने की उम्मीद रही। उम्मीद में वक्‍त उड़ता चला जाता था। मायूसी में वह गोया घुटने तोड़कर बैठ गया। फुन्दन की आँखों से बेअख़्तियार उम्मीद-ए-शिकस्ता (भग्न आशा) के आँसू बहने लगे। हिचकियाँ बँध गई। जतीन कितना बेरहम है ! रोज़ आप ही दौड़ा आता था। आज जब मैं दौड़ा आया तो घर बैठ रहा। कल आयेगा तो गाँव में घुसने न दूँगा। उसकी तिफुलाना (बालोचित) आरजूएँ हर सारी वल्वला (उत्साह) अगेजियों (पूर्वक) के साथ उसके दिल को मसोसने (मथने) लगीं ।

दफ्अतन (सहसा) उसे जमीन पर एक टूटा हुआ झब्बा नजर आया। इस यास-ओ-नाकामी (निराशा और असफलता) के आलम में बचपन की फितरी (नैसर्गिक) खुशवाशी (निश्चिन्तता) ने अनदोह रूबाई (दुख दूर करने) का सामान पैदा कर दिया। कुछ पत्तियाँ चुनकर झब्बे में बिछाई। उसमें कुछ बजरियाँ और कंकड़ चुनकर रखे। अपना कुर्ता उतारकर उसको ढाँका और उसे सिर पर रखकर गाँव की तरफ चला; अब वह जतीन का मुतलाशी (दूँढ़ने वाला) लड़का न था, खुद जतीन था । वही ख़ान-ए-नेमत (अच्छी-अच्छी) खाने की चीजे स 4१ धाल) सिर पर रखे उसी तरह मुहमन (अर्थहीन) सदा (आवाज) लगाता हुआ, रफ़्तार भी वही, तर्जे-कलाम (बात करने का ढंग) भी वही। जतीन के आगे-आगे चलकर क्या उसे वह मुसर्रत (खुशी) हो सकती थी जो इस वक्‍त जतीन बनकर हो रही: थी ? वह हवा में उड़ा जा रहा था-सराब (म्रग-तृष्णा) में हकीकत का मजा लेता हुआ, नकल में असल की सूरत देखता हुआ। खुशी अस्बाब (कारण) से किस कृदर बेनियाज (निःस्पृह, आजाद) है। इसकी चाल कितनी मस्ताना थी ? गुरूर से उसका सिर कितना उठा हुआ था ?

वाकेइयत (यथार्थतः) का उसका तिफलाना (बालोचित) चेहरे पर ऐसा मुलम्मा था कि क्‍या मजाल जरा भी हँसी आ जाय। इस शान से ग्ह गाँव में दाखिन इआ। लड़कों ने उसकी आवाज सुनी “रेवड़ी कड़ाकेदार'”, और सब-के-सब दौड़े आन-की-ल+न में । फुन्दन मुशताक (उत्सुक) सूरतों से महसूर (घिरा हुआ) हो गया, उसी तरह जैसे जतीन हो जाता था। किसी ने न पूछा, यह क्या स्वॉग है ? दिल ने दिल की बात समझी। मिठाइयों को खरीद होने लगी। ठिकरों के पैसे थे, कंकड़ और बजरियों की मिठाई। इस खेल में लुत्फ कहीं ज्यादा था। माहियत (भौतिकता) में रूहनियत (आध्यात्मिकता) का अन्दाज कहाँ, मुसर्रत कहाँ, एहसास-ए-परवाज (उड़ने का अनुभव) कहाँ ? बा

मुन्नू ने एक ठीकरा देकर कहा, “जतीन, एक पैसे की खट्टियाँ दे दो।'”

जतीन ने एक पत्ते में तीन-चार कंकड़ रखकर दे दिए।

जलट्टियों में इतनी शीरीनी (मिठास), इतनी लज़्जत (आनन्द, स्वाद) कब शसिल हुई थी?

[प्रथम प्रकाशन 3 में। उर्दू मासिक पांत्राका 'चन्दन', अप्रैल, 1931 में प्रकाशित। हिन्दी रूप 'प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य' खण्ड-1 में संकलित]


खेल का सारांश

'खेल' मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित बाल मनोविज्ञान और बचपन की सहज कल्पनाशीलता पर आधारित एक अत्यंत सजीव और मर्मस्पर्शी कहानी है। तीसरे पहर जब तेज धूप और गर्म हवा चल रही थी, चार-पाँच वर्ष का फुन्दन गाँव की बूढ़ी दादी की निगाहें बचाकर घर से भाग निकलता है। फुन्दन असल में जतीन नामक फेरीवाले की प्रतीक्षा कर रहा था। जतीन रोज़ शाम को पास के कस्बे से गाँव में मिठाइयों का खोंचा लेकर आता था, जिसमें सेव, लड्डू, बताशे और खट्टियाँ होती थीं। यद्यपि फुन्दन एक गरीब बालक था और मिठाइयाँ खरीदने में असमर्थ था, फिर भी खोंचे के दर्शन मात्र से ही उसके बालमन को गहरी तृप्ति मिलती थी। आज जतीन ने इमरती और कच्ची गरी लाने की बात कही थी, जिसके उत्साह में फुन्दन दोपहर में सोया भी नहीं था।

गाँव के छोर पर पहुँचकर फुन्दन सोचता है कि वह सड़क पर जाकर जतीन की अगवानी करेगा और उसके साथ गाँव में प्रवेश करके सबको चकित कर देगा। रास्ते में गाँव का कुत्ता 'गेंदा', बैलगाड़ियाँ, ऊँट और आम के पेड़ मिलते हैं, परंतु फुन्दन की आँखें केवल जतीन की राह तकती रहती हैं। धीरे-धीरे शाम ढल जाती है और साये लंबे हो जाते हैं, किंतु जतीन नहीं आता। प्रतीक्षा के निष्फल होने पर फुन्दन का धैर्य टूट जाता है और उसकी आँखों से निराशा के आँसू बहने लगते हैं। वह जतीन को निष्ठुर समझकर सिसकने लगता है।

इसी निराशा के बीच फुन्दन को ज़मीन पर एक टूटा हुआ झब्बा पड़ा मिलता है। बचपन की सहज निश्चिंतता और सृजनशीलता से उसके दुख का निवारण हो जाता है। वह झब्बे में पत्तियाँ बिछाता है, कंकड़-बजरी चुनकर रखता है और अपने कुर्ते से उसे ढँककर सिर पर रख लेता है। अब वह जतीन का इंतज़ार करने वाला बालक नहीं, बल्कि स्वयं जतीन फेरीवाला बन जाता है। वह जतीन की ही तरह चाल और आवाज़ बनाकर "रेवड़ी कड़ाकेदार" की हाँक लगाते हुए गाँव में पहुँचता है। गाँव के अन्य बच्चे भी बिना किसी संशय के इस खेल में शामिल हो जाते हैं। ठीकरा देकर कंकड़ों की मिठाई खरीदी जाने लगती है। मुन्नू द्वारा ठीकरा दिए जाने पर फुन्दन पत्ते में कंकड़ रखकर देता है। इस खेल में बच्चों को जो आत्मिक आनंद, मिठास और स्वाद मिलता है, वह वास्तविक भौतिक मिठाइयों में भी कभी हासिल नहीं हुआ था।


प्रकाशन इतिहास

यह कहानी सर्वप्रथम उर्दू मासिक पत्रिका चन्दन में अप्रैल 1931 में प्रकाशित हुई थी। बाद में इसका हिंदी रूप प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य (खण्ड-1) में संकलित हुआ।


महत्त्व और विषय-विमर्श

  • बाल मनोविज्ञान और कल्पना की सृजनशीलता: कहानी यह दर्शाती है कि अभाव और निराशा के बीच भी बालमन अपनी कल्पना की शक्ति से आनंद का नया संसार रच लेता है। कंकड़-पत्तों को मिठाई और ठीकरों को पैसे में बदल देना बच्चों की अद्भुत कल्पनाशक्ति का प्रतीक है।
  • गरीबी में बाल-सुलभ संतोष: फुन्दन के पास पैसे नहीं हैं, फिर भी वह हीनभावना से ग्रस्त होने के बजाय मिठाइयों को देखने और उनकी कल्पना करने मात्र से संतुष्ट रहता है। प्रेमचंद ने निर्धन बच्चों की सादगी और आत्मिक तृप्ति को अत्यंत संवेदनशीलता से उभारा है।
  • सामूहिक खेल और निर्दोष सहभागिता: जब फुन्दन जतीन बनकर आता है, तो अन्य बालक किसी तर्क या उपहास के बिना खेल की स्वाभाविकता को स्वीकार कर लेते हैं। यह बच्चों की परस्पर भावनात्मक समझ और साझा आनंद की भावना को दर्शाता है।
  • भौतिकता पर आंतरिक आनंद की श्रेष्ठता: कहानी इस गहरे सत्य को स्थापित करती है कि वास्तविक सुख महँगी भौतिक वस्तुओं में नहीं, बल्कि मन की प्रसन्नता और भाव में है। ठीकरों और कंकड़ों के इस खेल में बच्चों को किसी भी असली मिठाई से अधिक मिठास और तृप्ति मिलती है।
  • कहानी का व्यापक महत्त्व: 'खेल' प्रेमचंद की बाल-साहित्यिक कृतियों में विशिष्ट स्थान रखती है। यह कहानी ग्रामीण परिवेश की सजीवता, बाल-सुलभ उत्कंठा, प्रतीक्षा की पीड़ा और अंततः खेल द्वारा दुख पर विजय पाने की बालमन की सहज कला को अमर बनाती है।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "खेल." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1931, https://munshipremchand.com/works/short-stories/khel. Accessed 22 Sep. 2026.