इन तजावीज़ (उपायों) के ज़मरे (दायरे) में जो इस्लाह (सुधार) मुआशरत (सभ्यता) से तअल्लुक रखती है, खानदान मुश्तरका (पारिवारिक मेलजोल) का मसला भी निहायत अहम व नतीजाखेज़ (महत्त्वपूर्ण एवं सारगर्भित ) है। मगर बरअक्स (प्रतिकूल, प्रत्युत) दीगर मसाइल (अन्य समस्याओं) के अभी तक इस पर मुस्लेहे-कौम (जाति अथवा देश-सुधारक) के सहरबयानियों (नरम भाषणों) और आतिशबयानियों (जोशीले बयानों) का जादू नहीं चला। कई मसलों की अहमियत (महत्त्व) तो अम्रे-मुसलिमा (सर्वमान्य कार्य) हो गई है और इनका कुछ-न-कुछ अमली असर भी हो चला है। मसला अज़्दवाजे-बेवगान (शादी के बाद हुई विधवाओं की समस्या ) को ही ले लीजिए जो अभी तक इसका रिवाज़ आम नहीं हुआ और न ही एक सदी तक हम यह उम्मीद करने की ज़ुरअत कर सकते हैं। ताहम (फिर भी) गाहे-माहे (कभी-कभी) हमको ऐसी शादियों की मिसालें मिल जाया करती हैं और गवर्नमेंट ने भी अज़्दवाजे-बेवगान (विधवा-विवाह ) का ऐक्ट पास करे इन तमाम तरद्यात व तनाज़आत (विवादों और उलझनों) को, जो ऐसी शादियों से ज़रूर वाके हुए, रफा कर दिया। एक और मसला इंसिदाद (बंद होने) शादी सिगरसिनी (बाल-विवाह) का है। इस अम्र (कार्य) में रिफार्मरों को काबिले-इत्मीनान ओर काबिले-मुबारकबाद कामयाबी हासिल हुई है, न यह कि चंद हिन्दुस्तानी सरबर आबुर्दा रियासतों ने (देशी राज्याध्यक्षों ने) इसकी कानूनी इमदाद की, बल्कि इस्लाहे-मुआशरत (सभ्यता के सुधार) के हर ज़लसे में इस पर बड़े शद्दोमद (ज़ोर-शोर) के साथ बहस की जाती है, और कोई ऐसी मज्ददाना ( श्रेष्ठ, पुनीत) जमाअत न होगी जिसने इस मसले को अमली हैबत (कार्य रूप) में लाने की कोशिश न की हो। अलहज़ा (इसके अतिरिक्त) और भी चंद मसायल हैं जो अब मुनाज़िर (शास्त्रार्थ)-ओ-मुबाहसा (वाद-विवाद) की सख्त मदारज ( मंज़िलें) तय करके अम्रे-मुसलिमा (सर्वमान्य कार्य) के पाये तक पहुंच चुके हैं। मगर खानदान मुश्तरका (साझा परिवार) का मसला कुछ ऐसा पेचीदा है, और हमारे कौमी आदात ( जातीय परंपराएं) खुजस्ता (कल्याणमयता) का एक ऐसा अच्छा नमूना हैं कि उनके खिलाफ कुछ कहते या लिखते तबीयत हिचकिचाती है। इसमें कोई शक नहीं कि मौजूदा तजे-मआशरत (जीविका की पद्धति) व तर्जे-तालीम ने उसके असर को कमजोर करना शुरू कर दिया है। मगर ताहम (फिर भी) अभी तक मास्वाये (उन्हें छोड़कर) उन हज़रत के जो गैरमुमालिक (दूसरे देशों) से आला दर्जे की तालीम पाकर आए हैं। मुतबस्सित तबके (मध्यवर्ग) में इसका रिवाज अगर बढ़ता नहीं है तो घट भी नहीं रहा है। इसके कई असबाब (कारण) हैं। इस्लाह (सुधार) के जितने दूसरे मसले थे, उनकी ताईद व तस्कीन (पुष्टि एवं संतोष) कमोबेश मज़हबी किताबों से दी गईं, उलमाए-दीनियात (धर्माचार्यों) के फतवे लिए गए। यह जोर देकर कहा गया कि हम रिफार्म के नये रिवाज़ नहीं फैलाना चाहते, बल्कि सलफ (पूर्वजों) के रिवाज़ों के
मुर्दा कालिब (निष्प्राण शरीर) में अज्ञसरे-नौ (नये सिरे से) रूह फूंक रहे हैं। मसला ज्वाइंट सिस्टम को ताईद किसी किताब से न हो सकी। दोयम यह कि दूसरे मसलों का वजूद मुद्दत दराज़ (लंबे समय) से है, मसलन अक़्दे-बेवगान (विधवा-विवाह) का मसला ईश्वरचन्द्र विद्यासागर मरहूम-ओ-मगफूर (स्वर्गीय) की दूरबीनी (दूरदर्शिता) का नतीजा है। मसला ज़ेरे-बहस की उम्र अभी बीस-बाईस साल से ज़्यादा नहीं, और इस ज़माने में भी उसकी परवरिश व परदाख्त (पालन-पोषण, संरक्षण) पर काफी तवज्जो नहीं की गई। सबसे बड़ी रुकावट जो इस मसले की तरक्की में होती वह गालबन हमारे तर्जे-माशरत ( रहन-सहन के तरीके ) की जानिब से हुई, क्यूंकि बरअक्स ( प्रतिकूल) दीगर मसाइल के इसमें और दस्तूरे-एलान (घोषित कानून) के उसूलों में निहायत करीबी तअल्लुक है।
यह तो तमाम बाखबर असहाब जानते हैं कि हर मुल्क के तहज़ीब का इब्तदाई ज़माना (आरम्भिक युग) जंग-व-जदल ( मार-काट) के औसाफ (गुणों) से मुतसिन््नफ (लिखा) होता है। क्यूंकि उस वक्त रिज़्क (जीविका) का दारोमदार हरबो-जर्ब (लड़ाई- झगड़े) पर होता है। यही हाल हिन्दुस्तान का भी था, जब कस्बे-मआश (रोजी-रोटी) का बजुज़ (अलावा) शिकार के और कोई दूसरा वसीला (माध्यम) न हो और शबोरोज़ ( रात-दिन) वहशी जानवरों के हमले का अंदेशा हो तो तकाज़ए-फितरत यही है कि इंसान वहशी बन जाए। चुनांचे उस वक्त आदमियों और जानवरों में सिवाय शक्लो-शबाहत ( आकार-प्रकार) के कोई दूसरा फर्क न था। दरिंदों की तरह एक-दूसरे का खून का प्यासा होता था। बात-बात पर खून की नदियां बहती थीं। मरना-मारना एक दिलचस्प मश्गला (कार्य) समझा जाता था। ऐसी हालत में लाज़िम आया कि इंसान भी जानवरों की तरह जत्थे बना-बनाकर रहे, और अपनी जमाअत को गज़ंदों (कष्टों) से बचा ले। जब तहज़ीब (सभ्यता) की यह हालत हो तो औरतों की हालत का क्या ज़िक्र? वह कनीज़ें (दासियां) खयाल की जाती थीं और उनका काम था कि मर्दों को खिलायें, पिलायें और हत्तलवुसू (यथा शक्ति) उनकी खिदमत करें। हुकूके-निसवां (स्त्रियों के अधिकार) तहज़ीब के साथ पैदा होते हैं और इसके साथ नश्वो-नुमा (विकसित, विकास) पाते हैं।
अमरीका के मशहूर फिलॉस्फर इमर्सन का कौल है कि हर एक मुल्क की तहज़ीब का सबसे आला कयास (विचार) यह है कि वहां औरतों की क्या हालत है। यह रस्म किसी ज़माने में बकाये-वजूद (जीवन-रक्षा, अस्तित्व, अनश्वरता) की ग़रज़ से निकाली गई थी। अब बिगड़ते-बिगड़ते खानदान-मुश्तरका की मौजूदा हालत को पहुंच गई।
इसमें कोई शक नहीं कि जमानए-कदीम (प्राचीन काल) में यह रस्म हमारे वजूद (अस्तित्व) के कायम रखने का बाइस (कारण) थी। इसी की पाबंदी पर ज़िंदगी का दारोमदार (निर्भरता) था और वो अब हमारा तर्ज़े-माशरत (रहन-सहन की पद्धति) बिल्कुल बदल गया है। ताहम (फिर भी) इस रिवाज़ की पाबंदी से मुल्क को बड़ा फायदा है। हमारे यहां बेवाएं (विधवाएं) कस्बे-मुआश (जीविका) के लिए मजबूर नहीं की जातीं। अगर एक घर में चार बेवाएं हों, और कमाने वाला सिर्फ एक, तो उन चारों की परवरिश करता है, और अगर ऐसा न हो तो 'ज़माना' उसको मतऊन (निन्दित) करता है। यूरोप में यह हाल है कि अगर शौहर ने मरते वक्त तक अपनी अयाल (बाल-बच्चों) की किफालत ( भरण-पोषण, परवरिश ) का कोई माकूल इंतज़ाम न किया तो बेचारी बेवा की हालत निहायत नाजुक हो जाती है। अज़ीज् व अकारिब (स्वजन, रिश्तेदार) उसकी दस्तगीरी (सहायता) करने को रहम खयाल करें तो करें, फर्ज़ (कर्त्तव्य) नहीं खयाल करते। वह तहसील-मआश (जीविका-उपार्जन) के लिए दर-ब-दर खाक फांकती फिरती है, तावक्तेकि (जब तक कि) उसका कोई दूसरा खरीददार न पैदा हो जाय। और अगर वह बदकिस्मती से जवानी से गिरी हुई है तो बेचारी की बकइया (शेष) ज़िंदगी रोते ही कटती है। बूढ़े जवान बेटों के होते चक्की पीसती हैं। यह इसी रस्म की पाबंदी का फैज्ञ (लाभ) है कि हम अपने बुजुर्गों की इतनी ताज़ीम व तकरीम (आदर-सत्कार) करते हैं। हमारे यहां मां-बाप के सामने हुक्का पीना या हंसकर बोलना, कंघी-आईना करना बेअदबी में दाखिल है। हम चाहे अपने जान दे दें, मगर वाल्देन का कहना नहीं टालते। गर्ज इसी रस्म ने सखावत (दानशीलता ) , गुर्बापरवरी (निर्धनों का पालन-पोषण ) , नफ्सकशी (इन्द्रिय-दमन) और बुजुर्गों की ताज़ीम (सम्मान) नीज़ ( और) दीगर (इसके अलावा) खसाइल हमीदा (सराहनीय आदतें) हमारी सरिश्त (योग्यता) में खमीर (शामिल, मिश्रित) कर दिए हैं।
मगर जब हम इन फवायदों (लाभों) का उन नुक्सानात-अज़ीम (बड़ी हानियों) से मुकाबला करते हैं जो इस रिवाज़ के बाइस से पैदा हो गए हैं, तो मजबूरन कहना पड़ता है कि इस रस्म की पाबंदी हमारे लिए जांगुज़ा (घोर कष्टदायक ) है। एक तजुर्बेकार फिलॉस्फर का कौल है कि जिस कौम अफराद (लोगों) को सादा खानदानी खुशियां मयस्सर नहीं हैं, वह कभी पाये-उरूज (बुलंदी) पर नहीं पहुंच सकती। और जिसने यह कहा है बहुत ठीक कहा है। हम लोग खानदानी मुसर्रतों (पारिवारिक खुशियों) से महरूम हैं। हमारे घरों में आए-दिन बमचख मची रहती है। कभी सास बहू से मुंह फुलाए बैठी है, कभी बहू सास से रूठी है। ननद और भावज के झगड़े हमारे यहां गीतों, रक़्सों ( नृत्यों) और कहानियों में आमतौर पर मशहूर हैं। अगर घर में बेचारी एक बहू है और मर्दाने में दस आदमी, तो वह उन दसों की कनीज़ (दासी) समझी जाती है। उनके लिए खाना पकाना, उनकी वहमी ज़रूरियात (सभी आवश्यकताओं ) को रफा करना उसका फर्ज़ समझा जाता है। बेशुमार ऐसी बीवियां होंगी जो इस ज़िंदगी पर कनीज़ों (दासियों) की ज़िंदगी को तरजीह (प्रधानता) दें, और जो कहीं घर में कोई बूढ़ी सास हुई तो इस घर की कैफ़ियत न पूछो। दुनिया में कोई बादशाह ऐसा- मुतल्लिक-उल अनान (स्वेच्छाचारी, तानाशाह), ऐसा खुदराये, ऐसा इताअतख्वाह ( सेवक चाहने वाला) एसा खुशामद-पसंद, ऐसा जालिम और कट्टर और ऐसा जूदरंज (शीघ्र बुरा मानने वाला) और अपने रुतबे को ऐसी हासिदाना निगाहों (ईर्ष्यालु दृष्टि) से देखने वाला न होगा, जैसी यह बूढ़ी सास होती है। इसके मारे बेचारी बहुओं की ज़िंदगी दुभर हो जाती है, और तावक्तेकि (जब तक कि) उसके कई बच्चे न हो जाएं और उनकी बीवियां घर में न आ जावें, उस बहू की किस्मत वाकई नागुफ्ताबेह (अकथनीय) होती है। सैकड़ों नाज़ुक-अंदाम (कृशांगी) नई-नवेली बहुएं इन्हीं मज़ालिम (ज़ुल्मों) का ऐन जवानी में शिकार हो जाती हैं, और सैकड़ों अगर मर नहीं जातीं तो अपनी तंदुरुस्ती ज़रूर खो बैठती हैं। बेचारा नौजवान शौहर अपनी मां के मुकाबले में बीवी की ज़रा भी तरफदारी नहीं कर सकता और अगर करे तो कुछ तो खुद उसको नागवार मालूम होता है, और कुछ अहले-ज्ञमाना उसको बदनाम व रुसवा (निन्दित) करने लगते हैं। जब औरत की ज़िंदगी ऐसी हो कि उसको कभी दिली खुशियां हासिल न होती हों, उसे कभी आराम से बैठना नसीब न हुआ हो, वह जब बैठती हो तब घूंघट निकालकर और सात पर्दो के अंदर, तो वह खुद क्यूंकर तंदुरुस्त रह सकती है? और उसकी औलाद क्यूंकर तंदुरुस्त हो सकती है? और वह अपने शौहर को, जो बेचारा सारे कुनबे की मआश (पालन-पोषण) की फिक्र में अपने जिस्म को घुला रहा हो, क्या खुश कर सकती है? शौहर बेचारा सास और बहू, ननद और भावज के झगड़े सुन-सुनकर अपनी किस्मत पर रोता है। गर्ज़ सारा खानदान नाखुशी, बदमिज़ाजी और उदासी का मस्कन (डेरा, घर) मालूम हो सकता है।
यह तो खानगी जिंदगी (घरेलू जीवन) का हाल है। तमद्दुनी नुक्सानात, जो मुल्क को इस रस्म से होते हैं, उनका तो कुछ शुमार ही नहीं। हमारे यहां बहुत कम ऐसे कमाने वाले होंगे जिनके घर पर आए-दिन दस-पांच मेहमान अड़े न रहते हों। कोई खालूजाद भाई है, कोई मामूंजाद भाई, कोई पट्टीदार है, किसी का ससुराल से तअल्लुक है। गर्ज़ बेचारा साहिबेखाना (गृहस्वामी) गो इतने मेहमानों के तसर्रुफात (खखिदमतों) के बोझ से दबा जाता है, मगर इशारतन-किनायतन कभी अपनी बेबसी का इजहार नहीं कर सकता। सैकड़ों अच्छी तनख्वाह वाले तो इन्हीं में तबाह हो जाते हैं। जब हमारे तमाम जरूरियात जिंदगी बिला हाथ-पैर हिलाए रफा हो जावें तो हमको क्या गर्ज़ है कि ख्वामख्वाह मेहनत व मशक्कत करें? इनमें ज़्यादातर तो ऐसे होते हैं जो अपने को आली खानदान (कुलीनतम) व आलीदूदमान ( श्रेष्ठ वंश के ) बतलाते हैं, और मेहनत-मशककत करने को कस्रे-शान (अपमान) समझते र। अगर मुफ्त की फुलोरियां मिलने की उम्मीद न हो तो यही हजरात झक मारें और गेकरे ढोएं। इस तरह काहिलों की मदद करके “खानदान मुश्तरका' (संयुक्त परिवार) काहिली और आरामतलबी की तहरीक (समर्थन) करता है। इतना ही नहीं, आरामतलबी और मुफ्तखोरी के नतीजे हमेशा बुरे होते हैं। ये हमरात हमेशा नाकर्दनी (अकरणीय) हरकात ( कार्य) किया करते हैं। उनके खयालात निहायत गंदे होते हैं, उनके अफआल (करतूतें) निहायत नीच। खुद तो क्या बदनाम होंगे, साहिबेखाना (गृहस्वामी) को अलबत्ता बदनाम करते हैं। बिला मशक्कत की रोटी हमेशा खूने-फासिद (दूषित रक्त) पैदा करती है। साहिबेखाना जब तक जीता है, उन्हीं लवाहिकीन (परिवारजनों) की साजो-परदाख्त (पालन-पोषण एवं प्रबंध) में अपनी तमाम कमाई सफ करता है, ओर जब यकायक पंजए-अजल (यमराज के पंजे) में गिरफ्तार हो जाता है, तो उसके बाल-बच्चों का कोई पुरसां-हाल (पूछने वाला) नहीं होता।
रिआया की तमददुनी हालत (रहने-सहने की दशा) कभी मुस्तकिल और इत्मीनानबख्श नहीं हो सकती, तावक्तेकि (जब तक कि ) हर फर्देबशर ( प्रत्येक व्यक्ति)
अपनी ज़रूरतें आप रफा करने की कोशिश न करे। हर शख्स को आज़ादी हासिल करने और उससे फायदा उठाने की कोशिश करनी चाहिए। दूसरे की दी हुई रोटी खाने से चाहे और तरह का आराम हो, मगर इंसान का नफ्स (मन, अस्तित्व) मुत्अम्मुल (संकुचित, लालची), डरपोक और दब्बू बन जाता है, हालांकि हर एक कौम की अज़्मत (महिमा, आदर-सम्मान)-व-उरूज़ (उत्कर्ष) के लिए ज़रूरी है कि उसके अफराद (लोग) जोश, आज़ादी और खुदमुख्तारी से भरें और जब अपने हाथों से आज़ादी को छिनते हुए देखें तो उसको हाथ से न जाने देने की पुरजोर कोशिश करें। जिस शख्स ने खुद अपनी रोज़ी हासिल नहीं की, वह आज़ादी का मज़ा नहीं जान सकता और जब आज़ादी के मज़े से वाकिफ नहीं है, तो उसको इससे महरूम होने का अफसोस क्यूंकर हो सकता है? अब इस कशाकश के ज़माने में, जब गवर्नमेंट कुल अख्त्यारात अपने हाथ में लेना चाहती है, रिआया का सब्रो-तहम्मुल (धैर्य और सहिष्णुता) और बुज़दिली नुक्सानात से खाली नहीं। ज़रूरत है इसकी कि कोम में आज़ादी की रूह आ जाए, क्योंकि जब तक यह जोश सारी कौम के दिलों में मौज़ज़न (तरंगित) न हो, कौमी इत्तिहाद (एकता) व इत्तिफाक (सहमति) नामुमकिन ही नहीं, बल्कि मुहाल (असंभव) है। जिस शख्स में अपने पेट को पालने की कुव्वत नहीं, उससे कौमी बहबूद (उन्नति) की क्या उम्मीद की जा सकती है? मुफ्तखोरी इंसान को बेशर्म, बेहया, बुज़दिल और खुशामदी बना देती है।
बाज़औकात ' खानदान मुश्तरका ' (संयुक्त परिवार) के मुखालफीन (विरोधीगण ) से एतराज़ यह कहा जाता है कि अभी हमारी कौम इस रस्म को उठा देने के लिए मुत्लक (बिल्कुल) तैयार नहीं है, क्योंकि दरहालिया (आज़ के समय में) एक कौ कमाई दस खाते हैं। रोज़गार अनका (अप्राप्य) हो रहा है और जबकि मुतलाशियाने- रोज़गार (रोज़गार तलाश करने वालों) की तादाद और बढ़ जावेगी तब तो और भी मुश्किल आ पड़ेगी। यह एतराज़ बिल्कुल बेजा है। रोज़गार इंसान के पास नहीं आता, इंसान खुद उसकी तलाश करता है। जब हम रूखी रोटी और पतली दाल पर कनाअत (संतुष्ट) करके दूसरे के माथे खाने लगते हैं तो वह हौसला और वह तमकनत ( अभिमान) जो आज़ाद-मिज़ाजों में होती है, मुर्दा-व-फसुर्दा (मृत एवं जीर्ण-शीर्ण) हो जाती है। अगर आदमियों को अपनी बेकारी-व-बेशुगली महसूस होने लगे तो वह ज़रूर कस्बे- मुआश (रोज़ी-रोटी के उपार्जन) के नये रास्तों की टोह लगा लें और कौम के मालदार- व-मरफाहाल ( धनी-संपन्न) अशखास (लोग) दूसरों के भार से हल्के होकर अपना- अपना पसमांदा (बची राशि) हिरकत-व-सनअत (कारीगरी की गति) की तरक्की में खर्च करें, सरमाये की बढ़ती हो, कारखाने खुलने लगें और तहसीले-मआश (जीविका-उपार्जन) का रास्ता वसीअ (विस्तृत) हो जाए। तीस करोड़ की आबादी में कम-से-कम दस करोड़ औरतें और पांच करोड़ लड़के ऐसे हैं जो कोई काम नहीं कर सकते। अगर मुफ्तखोरों की तादाद पांच करोड़ और बढ़ा दीजिए तो बेकार तबका बीस करोड़ हो जाता है। बाकी दस करोड़ों की आबादी में कितने ही बूढ़े, कितने ही मरीज, कितने ही डाकू, कितने ही भिखमंगे, कितने ही साधु शमिल हैं। इस हिसाब से कमाने वालों, की तादाद मुश्किल से पांच करोड़ तक पहुंचती है, और एक आदमी को बहिसाब औसत छ: आदमियों की परवरिश करनी पड़ती है। प्रोफेसर मनोहरलाल साहब जुत्शी ने 'ज़्ञमाना' के दिसंबर-नवंबर में इस मज़मून पर लिखते हुए यूं फरमाया है, '' किसी रिवाज़ के हुस्नो-कबीह (गुण-अवगुण) को जांचने के लिए हम दो मेयार (कसौटियां) मुकर्रर कर सकते हैं। अव्वल यह कि वह अफराद (आदमियों) की खुशी-व-खुर्मी (हर्ष एवं आनंद) से (ज़ंदगी बसर करने में मदद देता है, और दूसरे यह कि वह आम ज़माअत -में मुत्तफिका (सर्वमान्य) कोशिश या मिलकर काम करने की काबलियत पैदा करता है।'' |
सतूरे-मुंदरजा बाला (उपर्युक्त पंक्तियों में) हमने यह दिखाने की कोशिश की है कि इस रस्म से उन दो फायदों में से एक भी हासिल नहीं होता। पस (अंततः), जितनी ज़ल्द कौम इस रस्म को खैरबाद (तिलांजलि) कहे, उतना ही अच्छा है।
दूसरा ऐतराज़ यह किया जाता है कि इस रस्म के उठ जाने से अज्ञीज-ओ- अकारब (प्रिय, स्वजनों) में वह मज़बूत रिश्ता कायम न रहेगा जो अब है। हम दुआ करते हैं कि वह दिन जल्द आए जब यह रिश्ते कमजोर हो जाएं, क्योंकि उनसे कौम को बेहद नुक्सान हो रहा है। यूरोप का एक बीस बरस का नौजवान घर से हज़ारों मील के फासले पर बिला खटके चला जाता है। न उसकी मां रोती है, न बाप आंसू बहाता है! हमारे यहां यह हाल है कि अगर मां सुने कि बेटा ब्रह्मा जा रहा है तो वह महीनों से दाना-पानी तर्क कर दे और या तो बेटे को रोक ले और या अपनी जान दे दे। नीची जातों में खानदान मुश्तरका (संयुक्त परिवार) अमलन (अमल के तौर पर) मादूम (समाप्त) है, क्योंकि एक आदमी की कमाई सिर्फ उसी को काफी हो सकती है। घर का हर शख्स अपनी रोज़ी कमाता है। औरतें ओर बच्चे भी बेकार नहीं बैठ सकते। इसका नतीज़ा यह है कि इनमें हौसला और जोश बाकी है। लाखों अहीर, चमार, कुर्मी, कुम्हार अपने वतन को खैरबाद कहकर अफ्रीका, अमरीका की राह लेते हैं और वहां रुपया कमाकर अपने मुल्क को मालामाल करते हैं। न तो मां दामन पकड़कर रोती है और न बाप। बरअक्स ( प्रतिकूल) इसके शुरफा (कुलीन लोग) ब्रह्मा या रंगून इसी हालत में जाना पसंद कर सकते हैं, जब अपने वतन में रोज़ी मिलने का कोई सहारा न हो और अफ्रीका या अमरीका का नाम सुनकर तो उनके होश ही पराए हो जाते हैं। इस बोदेपन की यही वज़ह है कि खानदान मुश्तरका की कुयूद (कैद) में अच्छी तरह जकड़े हुए हैं।
इस रस्म का उठ जाना इस्लाहे-माशरत (जीवन-सुधार) के और कई मसाइल (समस्याओं) के हक में भी आबे -हयात (अमृत-जल ) हो जाएगा। मसलन सिगरसिनी (बचपन) की शादियां आप- ही-आप बंद हो जाएंगी। ज़रूरते-मआश (जीविका कौ आवश्यकता) बेवाओं को भी अज़्दवाज (पुनर्विवाह) पर राज़ी कर लेंगी, और तालीमे- निस्वां (स्त्री-शिक्षा) रोज़ अफ्जूं (बहुत ज़्यादा) तरक्की करने लगेगी। जब इस एक इस्लाह (सुधार) से इतनी इस्लाहें खुद-ब-खुद हो सकती हैं, तो क्यूं न उसकी तकवियत (पृष्ठ-पोषण, आश्रय, बल) में ज़्यादा तवज्ज़ो ( गौर, ध्यान) की जाए।
प्रकाशन इतिहास
[उर्दू लेख। उर्दू मासिक पत्रिका 'उर्दू-ए-मुअल्ला', अप्रैल, 1905 में प्रकाशित। हिन्दी रूप 'प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य' खण्ड-2 में संकलित।]
