पं माखनलाल चतुर्वेदी के निमंत्रण पर प्रेमचंद सपत्नीक बंबई से बिदा होने के पश्चात् 5 अप्रैल को खंडवा पहुंचे और 9 अप्रैल को सागर के लिए प्रस्थान किया। खटवा में वे चतुर्वदी जी के यहां ठहरे तथा आस-पास क दर्शनीय स्थलों को देखने क॑ बाद 7 अप्रैल की संध्या को स्थानीय तुलसी-उत्सत्र कमेटी तथा ललित-साहित्य
मंडल की ओर से मारिस मेमोरियल लाइब्रेरी में उनका अभिनंदन किया गया। सभी की अध्यक्षता की प॑* माखलनाल चतुर्वेदी ने तथा अभिनंदन-पत्र घढ़ा शिवशरण पाडय ने। इस सभा भ॑ प्रेमचंद ने जो भाषण दिया, उसे 'धर्मवीर' नै ]3 अप्रैल, 936 के अंक में प्रकाशित किया तथा इसे पूर्ण विवरण के साथ डॉ श्रीकांत जोशी ने 'बीणा' (अप्रैल, 988) में 'कथा-पुरुष' प्रेमचंद की खंडवा-यात्रा ' शीर्षक लेख म॑ संकलित करके पुन: प्रकाशित कराया। इस गोप्ठी का विवरण तथा भाषण 'हिन्दो राष्ट्रभाषा होगी' एवं 'दिल से निकले और दिलों पर असर करे वही साहित्य है
शीर्षक से छपा था। यहां इसी से प्रेमचंद का भाषण प्रस्तुत है-
भाषण
विधाता के घर में जिस समय वाणी बंट रही थी, उस समय में सो रहा था। इसलिए मैं उतनी अच्छी तरह बोल नहीं सकता। बोलना मेरे काबू के बाहर की बात है। हां, लिख ज़रूर लेता हूं। यदि बोलने की कला मुझमें होती तो शायद मैं और अधिक आज आपको खुर कर सकता, परंतु अफसोस तो यही है कि न तो मुझे बोलने की कला का अभ्यास है और न कला का स्वांग भरना ही आता है।
आपने मुझे आज जो इज्जत बख्शी है और जो कृपा दिखाई है, उसके योग्य तो मैं नहीं था, लेकिन कृपा जो मुफ्त ही मिल रही है तो क्यों न लू?
साहित्य क्या है?
साहित्य क्या है? इस विषय पर थोड़ा कह लूं। मुख्तलिफ लोगों क मुख्तलिफ राय है। कोई विशेषज्ञ कहते हैं कि साहित्य जावन की आलोचना है, साहित्य बडे मस्तिष्क की उपज हे, साहित्य हृदय की उमंगों और भावों का दिग्दर्शन है। लेकिन मेरी राय में “जो दिल से निकले और दिलों पर असर करे, वास्तव में तो बही साहित्य है।''
साहित्य उपन्यास नहीं है, न इतिहास साहित्य है। (प्रतीत होता है यह उक्ति ठीक तरह नहीं ली गई, संभवत: प्रेमचंद जी ने कहा होगा-'साहित्य' इतिहास नहीं है और न इतिहास साहित्य है।-सं>) भूगोल भी साहित्य नहीं है, क्योंकि वे सब एक निश्चित बात को निश्चित काल तक बताते हैं। भगवान् तिलक का 'गीता-रहस्य' माहित्य है। वह हमारे भावों को जाग्रत करके जीवन-शक्त प्रदान करने में समर्थ है। साहित्य वह भी है, जिसमें हमारे भावों को जगाने की शक्ति हो।
साहित्य की सृष्टि क्यों होती है?
साहित्य आनदंदायिनी वस्तु है, लेकिन आनंद क्या है? अपनी वस्तु का खुद आनंद भोगने के बाद उसी से पढने वालों को सुख पहुंचाना। यही साहित्य का आनंद है। अगनंद दो तरह का होता है; एक आनंद ऊंचा और दूसरा नोचा। मंगल की भावना का प्रचार ऊंचे दर्ज का आनंद है। एक हिलोर उठती है जिसे लेखक खुद भोगता है, फिर अपने परिचितों को उस आनंद का परिचय कराता है। नीचे दर्ज का साहित्य इसके ठीक प्रतिकूल होता है।
साहित्य और जीवन का संबंध
आजकल साहित्य को दो भागों में बांट रखा है। एक तो आदर्श जीवन का चित्रण ओर दूसरे यथार्थ का चित्रण। इसी का नाम ॥66शाज्ा। और एव्याञाा है। आधुनिकता यथार्थ जीबन की प्रेरक है। जीवन की नकल कर देना साहित्य नहीं, पर साहित्य वह है जो यथार्थ जीवन को सुंदर ढंग से लिख दे। इसके सिवा जीवन को स्वय
सुंदर बनाना चाहिए। रियलिज््म जीवन के अंधकारमय पहलुओं का उज्ज्वल कर देता है। अच्छी कला, अच्छा साहित्य वह है जिसे सर्वसाधारण बिना तकलीफ के समझ जाएं-कुछ लोग ऐसा कहते हैं। दूसरे लोग यह कहते हैं कि साहित्य वह है, जिसे समझने में कुछ दिमाग खर्च करना पड़े। परंतु महात्मा टॉल्स्टॉय (प0॥#०४)2 का कहना है कि कला विश्वव्यापी है, लेकिन इसके लिए रुचि का होना आवश्यक है। यदि हमें संगीत का ज्ञान नहीं है तो हम उसे समझ भी नहीं सकते। यदि नृत्य में हम रुचि नहीं रखते तो हम उसे दाद नहीं दे सकते।
साहित्य में जब रसिकों और जन-साधारण दोनों के लिए स्थान है तो कोई कारण नहीं दिखता कि उसकी महत्ता को नीचे गिराया जाय। जहां रसिकों के लिए रामायण है, वहां जन-साधारण के लिए आल्हा भी तो है।
लोगों को शिकायत है कि हमारा साहित्य उन्नति नहीं कर रहा है। इसका कारण जनता ही है। जनमत ओर लोकमत साहित्य की उन्नति के आधार हैं। यदि जनता की रुचि अच्छी समालोचक (क्रिटिक) होती है, तो उसका साहित्य निरंतर तरक्को करता जाता है, किन्तु जनता ही जब उस ओर उदासीन हो बैठती है तो उसके साहित्य का आगे बढ़ना स्वभावत: ही बंद हो जाता है। लेखक यदि यह चाहता है कि उसकी चीज़ की आलोचना हो तो उसे निष्पक्ष आलोचना मिलनी चाहिए, पर मुश्किल ता यह है कि आपका एप्रिसिएशन (मूल्यांकन) क्रियाशील नहीं होता।
हिन्दी-भाषा अब राष्ट्र-भाषा होने जा रही है। अपनी मंज़िल पांच-दस मील चल भी चुकी है। यह ठीक है कि उसे अभी बहुत दूर चलना है। हमारी इच्छा तो यह है कि अंतर्राष्ट्रीय व्यवहारों के अंदर हिन्दी का प्रयोग हो। मद्रास में तो हिन्दी का खूब प्रचार हो रहा है।
हम हिन्दी का रूप बनाकर चाहें कि उसका प्रचार हो तो नहीं हो सकता, पर महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू आदि कुछ कर जायें तो बह चल सकता है। हम यह प्रयत्न करेंगे कि महात्माजी राष्ट्र- भाषा को कोई बोर्ड बनावें, जिसमें एक कच्र से एक केंद्र-स्थल तक सब एक हो जायें। अत: में आप लोगों से भी कहूंगा, चूंकि आपका भी इससे संबंध हे, बोर्ड बनाने में आप लोग भी अपनी-अपनी राय दें।
मुझे इतने छोटे-से नगर में साहित्यिक रुचि के लोगों की इतनी तादाद देखकर बड़ा हर्ष हो रहा है।
प्रकाशन इतिहास
[भाषण/लेख। 7 अप्रैल, 1935 को पं० माखनलाल चतुर्वेदी की अध्यक्षता में 'तुलसी उत्सव कमेटी' तथा 'ललित साहित्य मंडल' खंडवा द्वारा आयोजित अभिनंदन समारोह में दिया गया भाषण। 'धर्मवीर', 13 अप्रैल, 1935 में प्रकाशित। 'वीणा', अप्रैल, 1988 में पुनर्प्रकाशित। 'प्रेमचंद का अप्राप्य साहित्य' खण्ड-2 में संकलित।]
