पिछले आषाद में मुझे गुरुकुल कांगड़ी के दर्शनों का अवसर मिला। इच्छा तो बहुत दिनों से थी, मगर यह सोचकर कि उस वेद वेदांगों के केन्द्र में मुझ-जैसे धर्मशून्य व्यक्ति का कहां गुजर, कभी जाने की हिम्मत न पड़ी। सौभाग्य से साहित्य-परिषद् ने उन्हीं दिनों अपना वार्षिक उत्सव करने की ठानी और मुझे न्योता मिला। ऐसा अवसर पाकर भला केसे चूकता। दिली मुराद पूरी हुईं। रात को लखनऊ से चलकर प्रातःकाल हरिद्वार जा पहुंचा। वहां दो ब्रह्मचारी मेरो राह देख र८ थे। गुरुकुल को सिद्धांतवादिता का कुछ धोड़ा-सा परिचय मुझे स्टेशन पर ही मिला। एक तांगा करने की ठहरी। तांगे बाले ने शायद यह समझकर कि दो नए यात्री हैं. कनखल के आठ आने मांगे। इधर से छ: आने कहा गया। तांगे बाल ने शायद कहा, आठ आने से कम न होंगे। ब्रह्मचारियों ने वाजिब किराया कह दिया था। तांगे वाले से ठांय-ठांय करना उनकी शान के खिलाफ था। आध मोल जाकर दूसरा तांगा उन्हीं दामों पर लाए। पहला तांगे वाला उन्हीं दामों पर चलने को तैयार था, अपना अपराध क्षमा कराता था, अपनी भूल स्वीकार करता था, पर ब्रह्मचारियों को उस पर दया न आईं। उसने यात्रियों को ठगना चाहा था, इसका दण्ड उसे देना जरूरी था। और नीति की दृष्टि में दया का कोई मूल्य नहीं।
तांगा आध घंटे में कनखल आ पहुंचा। हम लोग उतरकर घाट पर पहुंचे। सामने की पहाडियां हरे- भरे आभूषण पहने खड़ी थीं। नीचे गंगा पहाड़ियों को गोद से निकलकर उछलती-कूदतो चली जाती थी। यहां कई धाराएं हैं, जो वर्षाकाल में मिलकर कांगड़ी के नीचे तक चली जाती हैं। मैंने समझा था किसी किश्ती पर नदी पार करनी पड़ेगी,
मगर किश्ती का कहीं पता न था। यहां पानी का तोड़ इतना तेज है, नीचे का पेटा इतना पथरीला कि थोड़ी दूर के बाद किश्ती आगे जा ही नहीं सकती। तमेड़ों पर बैठकर लोग आते-जाते हैं। यह एक प्रकार की घननई है, जिसमें मिट्टी के मटकों की जगह टीन के कनस्तर होते हैं। कई कनस्तरों को लंबे-लंबे रखकर रस्सी और बांसों से बांध देते हैं। तमेड़ा बीच में चौड़ा और दोनों सिरों पर पतला होता है। जिन्हें इस पर पहली बार बैठना पड़े उन्हें मन में कुछ संशय होने लगता है कि यह डोंगा पार लगेगा या बीच ही में डूबेगा। मगर थोड़ी ही दूर चलकर यह संशय दूर हो जाता है। यह डोंगी डूब नहीं सकती। पानी का बहाव कितना ही तेज हो, भंवर कितनी ही भंयकर हों, वायु कितनी ही प्रचण्ड हो, लहरें उछलकर उसके ऊपर ही क्यों न आ जाती हों, पर उसे परास्त नहीं कर सकती। आदमी अगर उस पर जरा संभलकर बैठा रहे, तो चाहे अनंत तक पहुंच जाय, डूब नहीं सकता। इस तुच्छ-सी वस्तु को विराट् और प्रचंड जल-प्रवाह का इतनी वीरता से सामना करते देखकर ऐसा जान पड़ता था मानो कोई अकेली आत्मा प्राण-सागर की लहरों को ठुकराती, विघध्न-बाधाओं को कुचलती परम धाम कौ ओर चली जा रही हो।
अभी आध घंटा भी न गुजरने पाया था कि घटा छा गई और वर्षा होने लगी। सारे कपडे भीग गए, हवा भी चलने लगी। लहरें उछलती ही न थीं, छलांगें भरती थीं। कई बार तमेड़ा नीचे की चट्टान से टकराया और हम गिरते-गिरते बचे। दस बजते - बजते हम कांगड़ी पहुंच गए।
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गुरुकूल की इमारतें देखकर बेअखि्तियार मुंह से निकल गया-नाम बड़े दर्शन थोड़े एक ही इमारत है जिसे इमारत कह सकते हैं, पर साधारण हाईस्कूलों की इमारत भी इससे अच्छी होती है। तीन साल पहले यहां कई और इमारतें थीं। पर सन् 924 की बाढ़ में कई इमारतें बह गईं और हरा-भरा बाग बालू से भर गया। गिरे हुए भवनों के खंडहर अभी तक नजर आते हैं। हम लोग एक छोटे-से पक्के घर में ठहरे, जिसे यहां पक्का धर्मशाला कहते हैं। श्रद्धेय पंडित पद्मसिंह जी शर्मा भी आ गए थे। हम दोनों इसी कमरे में ठहरे। स्नान किया। इतने में भोजन आ गया। खाने बैठ गए। पेड़े बहुत स्वादिष्ट थे। अतिथि- सत्कार यहां की विशेषता है। भस्मक रोगी भी यहां से तृप्त हुए बिना नहीं जा सकता। सबसे बड़ा आनंद मुझे यहां के ब्रह्मचारियों को देखकर हुआ। ऐसे सरल-हृदय, सेवाशील युवक हमारे अंग्रेजी कालेजों में बहुत कम हैं। वह पंडिताई वातावरण, जो काशी की किसी संस्कृत पाठशाला में नजर आता है, यहा नाम को भी न था। यहां विद्यालय का मेहमान प्रत्येक ब्रह्मचारी का मेहमान है, वह उसकी चारपाई बिछा देगा, उसके लिए पानी भर लाएगा और उसकी धोती भी खुशी से छांट देगा। यह विद्यालय नहीं, किसी ऋषि का आश्रम मालूम होता है। ऐसे उत्साह युवक मैंने नहीं देखे। जो काम करते हैं, उसमें तन-मन से लिपट जाते हैं। प्रमाद की मात्रा इनमें बहुत ही कम है। कुछ सीखने के लिए, कुछ जानने के लिए यह लोग सदैव उत्सुक रहते हैं।
साहित्य-परिषद् का उत्सव संध्या-समय हुआ। आचार्यजी का व्याख्यान हुआ। ब्रह्मचारियों ने अपनी-अपनी रचानाएं सुनाईं। कुछ साहित्यिक लेख थे, दो-चार गल्पें थीं, एक-दो लेख ऐतिहासिक थे। इन रचनाओं को किस ऊंचे आदर्श से तोलना अन्याय होगा-ये प्रौढ़ लेखकों की कृतियां न थीं, पर किसी विद्यालय के शिष्यों को उन पर भर्व हो सकता है। हां, यहां जो संगीत सुनने में आया, उससे कुछ निराशा हुई। गुरुकुल में संगीत-शिक्षा क्रा कोई प्रबंध नहीं। शायद संगीत ब्रह्मचर्य के लिए बाधक समझा जाता हो। मगर मुझे तो ऐसी धार्मिक संकीर्णता यहां कहीं न दिखाईं दी। सबसे बड़ा आश्चर्य मुझे ब्रह्मचारियों में विचार-स्थातंत्रय पर हुआ। उनके राजनैतिक , सामाजिक, धार्मिक विचारों में मुझे संकीर्णता का कोई चिह्न नहीं मिला।
दूसरे दिन प्रीतिभोज था। भोजनगृह में सभी ब्रह्मचारी और आचार्य फर्श पर बैठकर थालियों में भोजन कर रहे थे। हमारे अंग्रेजी विद्यालयों में कुर्सियों और मेजों कं व्यवहार होता है। यहां अभी तक अंग्रेजियत की वह हवा नहीं आई। हमारे जातीय रीति-नीति, आचार-विचार की रक्षा अगर हो सकती है तो ऐसो ही संस्थाओं में हो सकती है। मगर शायद अब उसकी रक्षा करने की जरूरत ही नहीं समझी जाती। आजकल यही पक्का आर्य है, जो चाहे और सभो बातों में विदेशियों का गुलाम हो, केवल अन्य धर्मावलम्बियों को गाली देता जाय।
आज संध्या-समय एक कवि-सम्मेलन था। पंडित पद्मसिंह जी सभापति थे। ब्रह्मचारियों ने अपनी-अपनी रचनाओं सुनायी। अधिकांश कविताएं हाम्यास्पद थीं, मगर में ब्रह्मचारियों के साहस की तारीफ करूंगा कि उन्हें अपनी अंड-बंड रचानाएं सुनाने में लेशमात्र भी संकोच न होता था। किसी हद तक तो यह बालोचित साहस सराहनीय है। हमने ऐसे बालक भी देखे हैं, जों किसी सभा में खड़े कर दिए जाय तो उनकौ धिः्धी बंध जायगी। उस झिझक के देखते तो यह धृष्टता फिर भी अच्छी है। पर रसिकजनों के सामने ऐसी रचानाएं न सुनाना ही अच्छा, जिएले रनकर हंसी आवे। रचनाओं के समाप्त हो जाने के बाद शर्माजी ने विचारपूर्ण वकक्तृता । और ब्रह्मचारियों को खूब हंसाया। शर्माजी जितने विद्वान् हैं, उतने ही सरल और उदार है। और मेहमानवाजी तो उनका जौहर है।
तीसरे दिन हमने मुख्याधिष्ठाता जी के घर भोजन किया। उसका स्वाद अभो तक भूला नहीं। रामदेव जी उन रज्जनों में हैं, जिनको बातों से जी नहीं भरता। ज्यौं- ज्यों बातें मालूम होती हैं और मनोरंजन भी होता है, आप अंग्रेजी साहित्य के अच्छे ज्ञाता हैं और भारतीय इतिहास के तो आप पूरे माहिर हैं। ब्रह्मचारियों को उन पर असीम श्रद्धा है। गुरुकूल अगर कुछ न करे, तो भी इतने युवकों के सम्मुख सरल जीवन और उच्च विचार का आदर्श रखना ही उसके जीवित रहने के । लिए काफो है। अंग्रेजी कालेजों में तो आवश्यकताओं की गुलामी सिखाई जाती है और अध्यापक लोग ही इस विद्या के सबसे बडे शिक्षक होते हैं। जिंदगी को दौड़ में वे युवक क्या पेश पा सकते हैं, जिनके पैरों गें जरूरतों की भारी बेड़ियां पड़ी हों। सरकारी विभागों में चाहे बे अच्छे पद पा जाएं, पर सरकारी नौकरियों से तो राष्ट्र नहीं बनते। गुरुकुल ने अपने जीवन के थोडे से सालों में राष्ट्र के जितने सेवक पैदा किए हैं, उतने और
किसी विद्यालय ने न किए होंगे। डिग्रियां लेकर पद प्राप्त करना राष्ट्रीय सेवा नहीं। प्रचार और उद्धार के कामों को संभालना ही राष्ट्रीय सेवा है। अब तक गुरुकुल ने एक सौ इकतालीस स्नातक निकाले हैं। उनमें सार्वजनिक जीवन में भाग लेने वालों की संख्या सत्तासी है। यह कहने में जरा भी अत्युक्ति नहीं है कि हिन्दी भाषा को जितना प्रोत्साहन गुरुकूल से मिला है, उतना शायद ही और किसी विद्यालय से मिला हो।
गुरुकूल की उपयोगिता के विषय में पहले जनता में बड़ा संदेह फैला हुआ था। पर गुरुकुल से निकले हुए स्नातकों का सांसारिक जीवन देखकर इस विषय की सभी शंकाएं शांत हो जाती हैं। इस सौ इकतालीस स्नातकों में उन्तीस तो गुरुकुलो में काम कर रहे हैं, नौ साहित्य-सेवा में लगे हुए हैं, तेईस आर्य-समाज के उपदेशक हैं, पांच सफल वैद्य हैं, अठारह व्यापार में लगे हुए हैं और सात विदश में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। इनमें से दो उत्तीर्ण होकर लौट आये हैं। डाक्टर प्राणनाथ हाल ही में इंग्लैंड से डाक्टर होकर लौटे हैं, एक और महाशय बैरिस्टर हो आए हैं। पिछल साल चार ब्रह्मचारी 5ल।त ('शात्रात/८ परीक्षा में सम्मिलित हुए और तीन पास र। गए। इससे यह सिद्ध हो जाता है कि ब्रह्मचारियों को अंग्रेजी में भी काफी अभ्यास हो जाता है। महाशय सत्यत्रत जी सिद्धांतालंकार ने हाल ही में ब्रह्मचर्य पर अग्रैजी में एक ग्रंथ लिखा है। जिसकी शैली और भाषा दोनों ही परिमार्जित हैं। किसी यूनिर्तिर्सि से के विद्यार्थी के लिए ऐसी पुस्तक लिखना गर्व का कारण हो सकता है।
गुरुकुल विद्यालय में एक आयुर्वेद विद्यालय भी है। यहां ब्रह्मचारियों का ज॑ बूटियों तथा रसों का भी ज्ञान हो जाता है। शरीर विज्ञान.क्ी शिक्षा भी एन 3. को दी जाती है। हमें आशा है कि यहां के पढे हुए बैद्यां द्वारा आयुर्वेद का उद्धार होगा। वे केवल पुरानी लकौर के फकोर नहीं होते, बल्कि मानव शरीर के तत्वों +' जानते हैं और शल्य-चिकित्सा में भी दखल रखते हें।
गुरुकुल को प्राकृतिक शोभा को तो कहना ही क्या। बलवान् चरित्र एस ह जलवायु में विकसित होते हैं। मामने गंगा को जल- क्रीड़ा है, पीछे पर्वतों का मो संगीत। दाहिने-बाएं मीलों तक शीशम और कत्थे के वक्ष, ऐसी साफ छनी हुई, विमल वायु में सांस लेना स्वयं आत्मशुद्धि को एक क्रिया है। न शहरों का दूध-घी, न यर की स्वच्छ वायु। ब्रह्मचारी गंगा माता की गांद में किलालें करते हैं, ओर बड़ी दूर तक तैग्ते चले जात हैं, नगरें की दूषित जलवायु में यह गुण कहां। मगर पिछले! बाढ़ ने विद्यालय को जो क्षति पहुंचाई है, उसको देखते हुए अब विद्यालय का स्थान बदल देने का प्रशन आवश्यक हो गया है। इसका प्रबंध भो हो रहा है।
प्रकाशन इतिहास
[संस्मरण/लेख। 'माधुरी', अप्रैल, 1928 में प्रकाशित। 'विविध प्रसंग' भाग-3 में संकलित।]
