Cover Image for Vardan (वरदान) by Munshi Premchand - Novel
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उपन्यास•1921•26 अध्याय•5h 44m

वरदान

Vardan

प्रेमचंद का उपन्यास 'वरदान' प्रताप और विरजन की प्रेमकथा के माध्यम से बेमेल विवाह, सामाजिक सुधार, त्याग और समाज-सेवा के प्रश्नों को प्रस्तुत करता है।

पात्र:प्रताप, विरजन, सुवामा, कमलाचरण, माधवी, मुंशी संजीवन लाल, सुशीला
सेटिंग:20वीं सदी के प्रारंभ में उत्तर भारत, विशेष रूप से बनारस और उसके आसपास का सामाजिक परिवेश

अध्याय 9 / 26

15 मिनट पठन • 2,172 शब्द

अध्याय 9: ईर्ष्या

प्रतापचन्द्र ने विरजन के घर आना-जाना विवाह के कुछ दिन पूर्व से ही त्याग दिया था। वह विवाह के किसी भी कार्य में सम्मिलित नहीं हुआ। यहाँ तक कि महफिल में भी न गया। मलिन मन किये, मुँह लटकाये, अपने घर बेठा रहा, मुंशी संजीवनलाल, सुशीला, सुवामा सब बिनती करके हार गये, पर उसने बारात की ओर दृष्टि न फेरी। अंत में मुंशीजी का मन टूट गया ओर फिर कुछ न बोले। यह दशा विवाह के होने तक थी। विवाह के पश्चात तो उसने इधर का मार्ग ही त्याग दिया।

स्कूल जाता तो इस प्रकार एक ओर से निकल जाता, मानों आगे कोई बाघ बेठा हुआ है, या जैसे महाजन से कोई ऋणी मनुष्य आँख बचाकर निकल जाता है। विरजन की तो परछाई से भागता। यदि कभी उसे अपने घर में देख पाता तो भीतर पग न देता।

माता समझाती -- बेटा। विरजन से बोलते-चालते क्‍यों नहीं? क्यों उससे मन मोटा किये हुए हो? वह आ-आकर छघप्टों रोती है कि मेने क्या किया हे जिससे वह रूष्ट हो गया हे। देखो, तुम और वह कितने दिनों तक एक संग रहे हो। तुम उसे कितना प्यार करते थे। अकस्मात्‌ तुमको क्‍या हो गया? यदि तुम ऐसे ही रूठे रहोगे तो बेचारी लड़की की जान पर बन जायेगी। सूखकर काँटा हो गया हे। ईश्वर ही जानता हे, मुझे उसे देखकर करूणा उत्पन्न होती है। तुम्हारी चर्चा के अतिरिक्त उसे कोई बात ही नहीं भाती।

प्रताप आँखें नीची किये हुए सब सुनता ओर चुपचाप सरक जाता। प्रताप अब भोला बालक नहीं था। उसके जीवनरूपी वृक्ष में योवनरूपी कोपलें फूट रही थी। उसने बहुत दिनों से-ठसी समय से जब से उसने होश संभाला -- विरजन के जीवन को अपने जीवन में शर्करा क्षीर की भाँति मिला लिया था। उन मनोहर ओर सुहावने स्वप्नों का इस कठोरता और निर्दयता से धूल में मिलाया जाना उसके कोमल हृदय को बविदीर्ण करने के लिए काफी था, वह जो अपने विचारों में विरजन को अपना सर्वस्व समझता था, कहीं का न रहा, ओर अपने विचारों में विरजन को अपना सर्वस्व समझता था, कहीं का न रहा, ओर वह, जिसने विरजन को एक पल के लिए भी अपने ध्यान में स्थान न दिया था, उसका सर्वस्व हो गया। इस वितर्क से उसके हृदय में व्याकुलता उत्पन्न होती थी और जी चाहता था कि जिन लोगों ने मेरी स्वप्नवत्‌ भावनाओं का नाश किया है ओर मेरे जीवन की आशाओं को मिट्टी में मिलाया हे, उन्हें में भी जलाऊँ ओर सुलगाऊँ। सबसे अधिक क्रोध उसे जिस पर आता था वह बेचारी सुशीला थी।

शनेः-शने: उसकी यह दशा हो गई कि जब स्कूल से आता तो कमलाचरण के सम्बन्ध की कोई घटना अवश्य वर्णन करता। विशेष कर उस समय जब सुशीला भी बेठी रहती। उस बेचारी का मन दुखाने में इसे बड़ा ही आनन्द आता। यघ्रपि अव्यक्त रीति से उसका कथन ओर वाक्य-गति ऐसी हृदय-भेदिनी होती थी कि सुशीला के कलेजे में तीर की भाँति लगती थी। आज महाशय कमलाचरण तिपाई के ऊपर खड़े थे, मस्तक गगन का स्पर्श करता था। परन्तु निर्लज्ज इतने बड़े कि जब मैंने उनकी ओर संकेत किया तो खड़े-खड़े हँसने लगे। आज बड़ा तमाशा हुआ। कमला ने एक लड़के की घड़ी उड़ा दी। उसने मास्टर से शिकायत की। उसके समीप वे ही महाशय बेठे हुए थे। मास्टर ने खोज की तो आप ही फेटे से घड़ी मिली। फिर क्‍या था? बड़े मास्टर के यहाँ रिपोर्ट हुई। वह सुनते ही झल्‍ला गये और कोई तीन दर्जन बेंतें लगायी, सड़ासड़। सारा स्कूल यह कोतूहल देख रहा था। जब तक बेंतें पड़ा की, महाशय चिल्लाया किये, परन्तु बाहर निकलते ही खिलखिलाने लगे ओर मुँछों पर ताव देने लगे।

चाची। नहीं सुना? आज लड़कों ने ठीक स्कूल के फाटक पर कमलाचरण को पीटा। मारते-मारते बेसुध कर दिया। सुशीला ये बातें सुनती ओर सुन-सुनकर कुढ़ती। हाँ। प्रताप ऐसी कोई बात विरजन के सामने न करता। यदि वह घर में बेठी भी होती तो जब तक चली न जाती, यह चर्चा न छेड़ता। वह चाहता था कि मेरी बात से इसे कुछ दुःख न हो।

समय-समय पर मुंशी संजीवनलाल ने भी कई बार प्रताप की कथाओं की पुष्टि की। कभी कमला हाट में बुलबुल लड़ाते मिल जाता, कभी गुण्डों के संग सिगरेट पीते, पान चबाते, बेढंगेपन से घूमता हुआ दिखायी देता। मुंशीजी जब जामाता की यह दशा देखते तो घर आते ही स्त्री पर क्रोध निकालते -- यह सब तुम्हारी ही करतूत है। तुम्हीं ने कहा था घर-वर दोनों अच्छे हें, तुम्हीं रीझी हुई थीं। उन्हें उस क्षण यह विचार न होता कि जो दोषारोपण सुशील पर है, कम-से-कम मुझ पर ही उतना ही हे। वह बेचारी तो घर में बन्द रहती थी, उसे क्‍या ज्ञात था कि लडका केसा है। वह सामुद्रिक विद्या थोड़े ही पढ़ी थी?

उसके माता-पिता को सभ्य देखा, उनकी कुलीनता ओर बेभव पर सहमत हो गयी। पर मुंशीजी ने तो अकर्मण्यता ओर आलस्य के कारण छान-बीन न की, यद्यपि उन्हें इसके अनेक अवसर प्राप्त थे, और आलस्य के कारण छान-बीन न की, यद्यपि उन्हें इसके अनेक अवसर प्राप्त थे, और मुंशीजी के अगणित बान्धव इसी भारतवर्ष में अब भी विद्यमान हे जो अपनी प्यारी कन्‍्याओं को इसी प्रकार नेत्र बन्द करके कुएँ में ढकेल दिया करते हें।

सुशीला के लिए विरजन से प्रिय जगत में अन्य वस्तु न थी। विरजन उसका प्राण थी, विरजन उसका धर्म थी ओर विरजन ही उसका सत्य थी। वही उसकी प्राणाधार थी, वही उसके नयनों को ज्योति ओर हृदय का उत्साह थी, उसकी सर्वोच्च सांसारिक अभिलाषा यह थी कि मेरी प्यारी विरजन अच्छे घर जाय।

उसके सास-ससुर, देवी-देवता हों। उसके पति शिष्टता की मूर्ति ओर श्रीरामचन्द्र की भाँति सुशील हो। उस पर कष्ट की छाया भी न पड़े। उसने मर-मरकर बड़ी मिन्नतों से यह पुत्री पायी थी और उसकी इच्छा थी कि इन रसीले नयनों वाली, अपनी भोली-भाली बाला को अपने मरण-पर्यन्त आँखों से अदृश्य न होने दूँगी। अपने जामाता को भी यही बुलाकर अपने घर रखूँगी। जामाता मुझे माता कहेगा, में उसे लडका समझूँगी। जिस हृदय में ऐसे मनोरथ हों, उस पर ऐसी दारुण और हृदयविदारणी बातों का जो कुछ प्रभाव पड़ेगा, प्रकट हे।

हाँ। हनत। दीना सुशीला के सारे मनोरथ मिट्टी में मिल गये। उसकी सारी आशाओं पर ओस पड़ गयी। कया सोचती थी ओर क्या हो गया। अपने मन को बार-बार समझाती कि अभी क्‍या हे, जब कमला सयाना हो जाएगी तो सब बुराइयाँ स्वयं त्याग देना। पर एक निन्दा का घाव भरने नहीं पाता था कि फिर कोई नवीन घटना सुनने में आ जाती। इसी प्रकार आधघात-पर-आघात पड़ते गये। हाय। नहीं मालूम विरजन के भाग्य में कया बदा हे?

क्‍या यह गुन की मूर्ति, मेरे घर की दीपि, मेरे शरीर का प्राण इसी दुष्प्रकृति मनुष्य के संग जीवन व्यतीत करेगी? कया मेरी श्यामा इसी गिद्ध के पाले पड़ेगी? यह सोचकर सुशीला रोने लगती और घंटों रोती रहती है। पहिले विरजन को कभी-कभी डाँट-डपट भी दिया करती थी, अब भूलकर भी कोई बात न कहती। उसका मुँह देखते ही उसे याद आ जाती। एक क्षण के लिए भा उसे सामने से अदृश्य न होने देगी। यदि जरा देर के लिए वह सुवामा के घर चली जाती, तो स्वयं पहुँच जाती।

उसे ऐसा प्रतीत होता मानों कोई उसे छीनकर ले भागता है। जिस प्रकार वधिक की छुरी के तले अपने बछुड़े को देखकर गाय का रोम-रोम काँपने लगता हे, उसी प्रकार विरजन के दुख का ध्यान करके सुशीला की आँखों में संसार सूना जाना पड़ता था। इन दिनों विरजन को पल-भर के लिए नेत्रों से दूर करते उसे वह कष्ट ओर व्याकुलता होती,जो चिडिया को घोंसले से बच्चे के खो जाने पर होती हे। सुशीला एक तो यो ही जीर्ण रोगिणी थी।

उस पर भविष्य की असाध्य चिन्ता ओर जलन ने उसे ओर भी धुला डाला। निन्दाओं ने कलेजा चली कर दिया। छः मास भी बीतने न पाये थे कि क्षयरोग के चिह्नन दिखायी दिए। प्रथम तो कुछ दिनों तक साहस करके अपने दुःख को छिपाती रही, परन्तु कब तक? रोग बढ़ने लगा ओर वह शक्तिहीन हो गयी। चारपाई से उठना कठिन हो गया। वेद्य ओर डाक्टर ओषधि करने लगे। विरजन ओर सुवामा दोनों रात-दिन उसके पास बेठी रहती। विरजन एक पल के लिए उसकी दृष्टि से ओझल न होती। उसे अपने निकट न देखकर सुशीला बेसुध-सी हो जाती और फूट-फूटकर रोने लगती। मुंशी संजीवनलाल पहिले तो धैर्य के साथ दवा करते रहे, पर जब देखा कि किसी उपाय से कुछ लाभ नहीं होता ओर बीमारी की दशा दिन-दिन निकृष्ट होती जाती है तो अंत में उन्होंने भी निराश हो उद्योग और साहस कम कर दिया।

आज से कई साल पहले जब सुवामा बीमार पड़ी थी तब सुशीला ने उसकी सेवा-शुश्रषा में पूर्ण परिश्रम किया था, अब सुवामा बीमार पड़ी थी तब सुशीला ने उसकी सेवा-सुश्रूषा में पूर्ण परिश्रम किया था,अब सुवामा की बारी आयी। उसने पडोसी ओर भगिनी के धर्म का पालन भली-भाँति किया। रुग्ण-सेवा में अपने गृहकार्य को भूल-सी गई। दो-दो तीन-तीन दिन तक प्रताप से बोलने की नोबत न आयी। बहुधा वह बिना भोजन किये ही स्कूल चला जाता। परन्तु कभी कोई अप्रिय शब्द मुख से न निकालता।

सुशीला की रुग्णावस्था ने अब उसकी द्वेषाग्नि को बहुत कम कर दिया था। द्वेष की अग्नि द्रेष्टा की उन्नति ओर दुर्दशा के साथ-साथ तीबत्र ओर उज्ज्वलित हो जाती हे ओर उसी समय शान्त होती है जब द्वेष्टा के जीवन का दीपक बुझ जाता है।

जिस दिन वृजरानी को ज्ञात हो जाता कि आज प्रताप बिना भोजन किये स्कूल जा रहा है, उस दिन वह काम छोड़कर उसके घर दोड़ जाती ओर भोजन करने के लिए आग्रह करती, पर प्रताप उससे बात न करता, उसे रोता छोड़ बाहर चला जाता। निस्सन्देह वह विरजन को पूर्णतः निर्दोष समझता था, परन्तु एक ऐसे सम्बन्ध को, जो वर्ष छः मास में टूट जाने वाला हो, वह पहले ही से तोड़ देना चाहता था। एकान्त में बेठकर वह आप-ही-आप फूट- फूटकर रोता, परन्तु प्रेम के उद्गेश को अधिकार से बाहर न होने देता।

एक दिन वह स्कूल से आकर अपने कमेे में बेठा हुआ था कि विरजन आयी। उसके कपोल अश्रु से भीगे हुए थे ओर वह लंबी- लंबी सिसकियाँ ले रही थी। उसके मुख पर इस समय कुछ ऐसी निराशा छाई हुई थी ओर उसकी दृष्टि कुछ ऐसी करूणोत्पादक थी कि प्रताप से न रहा गया। सजल नयन होकर बोला - 'क्यों विरजन। रो क्‍यों रही हो? विरजन ने कुछ उतर न दिया, वरन ओर बिलख-बिलखकर रोने लगी। प्रताप का गाम्भीर्य जाता रहा।

वह निस्संकोच होकर उठा और विरजन की आँखों से आँसू पोंछने लगा। विरजन ने स्वर संभालकर कहा -- ललल्‍लू अब माताजी न जीयेंगी, में क्या करूँ? यह कहते-कहते फिर सिसकियाँ उभरने लगी।

प्रताप यह समाचार सुनकर स्तब्ध हो गया। दोड़ा हुआ विरजन के घर गया ओर सुशीला की चारपाई के समीप खड़ा होकर रोने लगा। हमारा अन्त समय केसा धन्य होता है। वह हमारे पास ऐसे-ऐसे अहितकारियों को खींच लाता है, जो कुछ दिन पूर्व हमारा मुख नहीं देखना चाहते थे, ओर जिन्हें इस शक्ति के अतिरिक्त संसार की कोई अन्य शक्ति पराजित न कर सकती थी। हाँ यह समय ऐसा ही बलवान हे ओर बडे-बडे बलवान शत्रुओं को हमारे अधीन कर देता है। जिन पर हम कभी विजय न प्राप्त कर सकते थे, उन पर हमको यह समय विजयी बना देता है। जिन पर हम किसी शत्रु से अधिकार न पा सकते थे उन पर समय ओर शरीर के शक्तिहीन हो जाने पर भी हमको विजयी बना देता है। आज पूरे वर्ष भर पश्चात प्रताप ने इस घर में पर्दापण किया। सुशीला की आँखें बन्द थी,पर मुखमण्डल ऐसा विकसित था, जेसे प्रभातकाल का कमल। आज भोर ही से वह रट लगाये हुए थी कि लललू को दिखा दो। सुवामा ने इसीलिए विरजन को भेजा था।

सुवामा ने कहा -- बहिन। आँखें खोलों। लल्लू खड़ा है। सुशीला ने आँखें खोल दीं ओर दोनों हाथ प्रेम-बाहुल्य से फेला दिये। प्रताप के हृदय से विरोध का अन्तिम चिह्न भी विलीन हो गया। यदि ऐसे काल में भी कोई मत्सर का मेल रहने दे, तो वह मनुष्य कहलाने का हकदार नहीं है। प्रताप सच्चे पुत्रत्व-भाव से आगे बढ़ा और सुशीला के प्रेमांक में जा लिपटा। दोनों आधे घण्टे तक रोते रहे। सुशीला उसे अपने दोनों बाँहों में इस प्रकार दबाये हुए थी मानों वह कहीं भागा जा रहा है। वह इस समय अपने को सेकडों धिक्कार दे रहा था कि में ही इस दुखिया का प्राणहारी हूँ। मेने ही द्वेष-दुराबेग के वशीभूत होकर इसे इस गति को पहुंचाया है। में ही इस प्रेम की मूर्ति का नाशक हूँ। ज्यों. ज्यों यह भावना उसके मन में उठती, उसकी आँखों से आँसू बहते। निदान सुशीला बोली -- लललू। अब में दो-एक दिन की ओर मेहमान हूँ। मेरा जो कुछ कहा -- सुना हो, क्षमा करो। प्रताप का स्वर उसके वश में न था, इसलिए उसने कुछ उतर न दिया।

सुशीला फिर बोली - न जाने क्‍यों तुम मुझसे रूष्ट हो। तुम हमारे घर नही आते। हमसे बोलते नहीं। जी तुम्हें प्यार करने को तरस-तरसकर रह जाता है। पर तुम मेरी तनिक भी सुधि नहीं लेते। बताओ, अपनी दुखिया चाची से क्‍यों रूष्ट हो? ईश्वर

जानता हे, में तुमको सदा अपना लड़का समझती रही। तुम्हें देखकर मेरी छाती फूल उठती थी। यह कहते-कहते निर्बलता के कारण उसकी बोली धीमी हो गयी, जेसे क्षितिज के अथाह विस्तार में उड़नेवाले पक्षी की बोली प्रतिक्षण मध्यम होती जाती है -- यहाँ तक कि उसके शब्द का ध्यानमात्र शेष रह जाता हे। इसी प्रकार सुशीला की बोली धीमी होते-होते केवल सांय-सांय रह गयी।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "वरदान." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1921, https://munshipremchand.com/works/novels/vardan. Accessed 22 Sep. 2026.