Cover Image for Vardan (वरदान) by Munshi Premchand - Novel
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उपन्यास•1921•26 अध्याय•5h 44m

वरदान

Vardan

प्रेमचंद का उपन्यास 'वरदान' प्रताप और विरजन की प्रेमकथा के माध्यम से बेमेल विवाह, सामाजिक सुधार, त्याग और समाज-सेवा के प्रश्नों को प्रस्तुत करता है।

पात्र:प्रताप, विरजन, सुवामा, कमलाचरण, माधवी, मुंशी संजीवन लाल, सुशीला
सेटिंग:20वीं सदी के प्रारंभ में उत्तर भारत, विशेष रूप से बनारस और उसके आसपास का सामाजिक परिवेश

अध्याय 19 / 26

14 मिनट पठन • 2,087 शब्द

अध्याय 19: दुःख-दशा

सोभाग्यवती स्त्री के लिए उसका पति संसार की सबसे प्यारी वस्तु होती है। वह उसी के लिए जीती ओर मारती है। उसका हँसना-बोलना उसी के प्रसन्न करने के लिए ओर उसका बनाव- श्रेंगर उसी को लुभाने के लिए होता है। उसका सोहाग जीवन है ओर सोहाग का उठ जाना उसके जीवन का अन्त हे। कमलाचरण की अकाल-मृत्यु व॒जरानी के लिए मृत्यु से कम न थी। उसके जीवन की आशाएँ ओर उमंगें सब मिट्टी मे मिल गयीं। क्या-क्या अभिलाषाएँ थीं ओर क्‍या हो गय? प्रति-क्षण मृत कमलाचरण का चित्र उसके नेत्रों में भ्रमण करता रहता। यदि थोड़ी देर के लिए उसकी आँखें झपक जाती, तो उसका स्वरुप साक्षात नेत्रों के सम्मुख आ जाता।

किसी-किसी समय में भोतिक त्रय-तापों को किसी विशेष व्यक्ति या कुटुम्ब से प्रेमससा हो जाता है। कमला का शोक शान्त भी न हुआ था बाबू श्यामाचरण की बारी आयी। शाखा-भेदन से वृक्ष को मुरझाया हुआ न देखकर इस बार दुर्देव ने मूल ही काट डाला। रामदीन पाण्डे बड़ा दंभी मनुष्य था। जब तक डिप्टी साहब मझगाँव में थे, दबका बेठा रहा, परन्तु ज्योंही वे नगर को लोटे, उसी दिन से उसने उत्पात करना आरम्भ किया। सारा गाँव-का-गाँव उसका शत्रु था। जिस दृष्टि से मझगाँव वालों ने होली के दिन उसे देखा, वह दृष्टि उसके हृदय में काँटे की भाँति खटक रही थी। जिस मण्डल में मझगाँव स्थित था, उसके थानेदार साहब एक बडे घाघ ओर कुशल रिश्वती थे।

सहस्रों की रकम पचा जायें, पर डकार तक न लें। अभियोग बनाने ओर प्रमाण गढ़ने में ऐसे अभ्यस्त थे कि बाट चलते मनुष्य को फाँस लें ओर वह फिर किसी के छुड़ाये न छूटे। अधिकार वर्ग उसके हथकण्डों से विज्ञ था, पर उनकी चतुराई ओर कार्यदक्षता के आगे किसी का कुछ बस न चलता था। रामदीन थानेदार साहब से मिला और अपने हृदयरोग की ओषधि माँगी। इसके एक सप्ताह पश्चात्‌ मझगाँव में डाका पड़ गया। एक महाजन नगर से आ रहा था। रात को नम्बरदार के यहाँ ठहरा। डाकुओं ने उसे लोटकर घर न जाने दिया। प्रातःकाल थानेदार साहब तहकीकात करने आये ओर एक ही रस्सी में सारे गाँव को बाँधकर ले गये। देवात्‌ मुकदमा बाबू श्यामाचरण की इजलास में पेश हुआ। उन्हें पहले से सारा कच्चा-चिट्ठा विदित था और ये थानेदार साहब बहुत दिनों से उनकी आँखों पर चढ़े हुए थे।

उन्होंने ऐसी बाल की खाल निकाली की थानेदार साहब की पोल खुल गयी। छः मास तक अभियोग चला ओर धूम से चला। सरकारी वकीलों ने बड़े- बड़े उपाय किये परन्तु घर के भेदी से क्या छिप सकता था?फल यह हुआ कि डिप्टी साहब ने सब अभियुक्तों को बेदाग छोड़ दिया ओर उसी दिन सायंकाल को थानेदार साहब मुअत्तल कर दिये गये।

जब डिप्टी साहब फैसला सुनाकर लोटे, एक हितचिन्तक कर्मचारी ने कहा -- हुजूर, थानेदार साहब से सावधान रहियेगा। आज बहुत झललाया हुआ था। पहले भी दो-तीन अफसरों को धोखा दे चुका है। आप पर अवश्य वार करेगा। डिप्टी साहब ने सुना ओर मुस्कराकर उस मनुष्य को धन्यवाद दिया; परन्तु अपनी रक्षा के लिए कोई विशेष यत्ञ न किया। उन्हें इसमें अपनी भीरुता जान पड़ती थी। राधा अहीर बड़ा अनुरोध करता रहा कि मै। आपके संग रहूँगा, काशी भर भी बहुत पीछे पड़ा रहा ; परन्तु उन्होंने किसी को संग न रखा। पहिले ही की तरह अपना काम करते रहे।

जालिम खाँ बात का धनी था, वह जीवन से हाथ धोकर बाबू श्यामाचरण के पीछे पड़ गया। एक दिन वे सैर करके शिवपुर से कुछ रात गये लोट रहे थे पागलखाने के निकट कुछ फिटिन का घोड़ा बिदका गाड़ी रूक गयी और पलभर में जालिम खाँ ने एक वृक्ष की आड़ से पिस्तोल चलायी। पड़ाके का शब्द हुआ ओर बाबू श्यामाचरण के वक्षस्थल से गोली पार हो गयी। पागलखाने के सिपाही दोड़े। जालिम खाँ पकड़ लिया गया, साईस ने उसे भागने न दिया था।

इस दुर्घटनाओं ने कुटुम्ब का सत्यानाश कर दिया। प्रेमबती यद्यपि बड़ी सुशीला और हँसमुख स्त्री थी तथापि उसके स्वभाव ओर व्यवहार में अकस्मात्‌ बड़ा भारी परिवर्तन कर दिया। बात- बात पर विरजन से चिढ़ जाती और कटूक्तियों से उसे जलाती। उसे यह भ्रम हो गया कि ये सब आपत्तियाँ इसी बहू की लायी हई है। यही अभागिन जब से घर आयी,घर का सत्यानाश हो गया। इसका पोरा बहुत निकृष्ट है। कई बार उसने खुलकर विरजन से कह भी दिया कि - तुम्हारे चिकने रुप ने मुझे ठग लिया। में क्‍या जानती थी कि तुम्हारे चरण ऐसे अशुभ हें ! विरजन ये बातें सुनती ओर कलेजा थामकर रह जाती। जब दिन ही बुरे आ गये, तो भली बातें क्योंकर सुनने में आयें। यह आठों पहर का ताप उसे दुःख के आँसू भी न बहाने देता। आँसू तब निकलते है। जब कोई हितेषी हो और दुख को सुने। ताने और व्यंग्य की अग्नि से आँसू जल जाते हें।

एक दिन विरजन का चित्त बेठे-बेठे घर में ऐसा घबराया कि वह तनिक देर के लिए वाटिका में चली आयी। आह ! इस वाटिका में केसे-केसे आनन्द के दिन बीते थे |इसका एक-एक पोधा मरने वाले के असीम प्रेम का स्मारक था। कभी वे दिन भी थे कि इन फूलों और पत्तियों को देखकर चित्त प्रफुल्लित होता था और सुरभित वायु चित्त को प्रमोदित कर देती थी। यही वह स्थल हे, जहाँ अनेक सन्ध्याएँ प्रेमालाप में व्यतीत हुई थीं। उस समय पुष्पों की कलियाँ अपने कोमल अधरों से उसका स्वागत करती थीं। पर शोक! आज उनके मस्तक झुके हुए और अधर बन्द थे।

क्‍या यह वही स्थान न था जहाँ 'अलबेली मालिन' फूलों के हार गँँथती थी? पर भोली मालिन को क्‍या मालूम था कि इसी स्थान पर उसे अपने नेतरें से निकले हुए मोतियों को हार गूँथने पड़ेंगे। इन्हीं विचारों में विरजन की दृष्टि उस कुंज की ओर उठ गयी जहाँ से एक बार कमलाचरण मुस्कराता हुआ निकला था, मानो वह पत्तियों का हिलना ओर उसके वस्त्रों की झलक देख रही है। उससे मुख पर उसे समय मन्द-मन्द मुस्कान-सी प्रकट होती थी, जैसे गंगा में डूबते हुए की पीली ओर मलिन किरणों का प्रतिबिम्ब पड़ता है। अचानक प्रेमवती ने आकर कर्णकटु शब्दों में कहा -- अब आपका सेर करने का शोक हुआ हे !

विरजन खड़ी हो गई ओर रोती हुई बोली -- माता !जिसे नारायण ने कुचला, उसे आप क्‍यों कुचलती हें !

निदान प्रेमवती का चित्त वहाँ से ऐसा उचाट हुआ कि एक मास के भीतर सब सामान ओने-पोने बेचकर मझगाँव चली गयी। वृजरानी को संग न लिया। उसका मुख देखने से उसे घृणा हो गयी थी। विरजन इस विस्तृत भवन में अकेली रह गयी। माधवी के अतिरिक्त अब उसका कोई हितेषी न रहा। सुवामा को अपनी मुँहबोली बेटी की विपत्तियों का ऐसा ही शोक हुआ, जितना अपनी बेटी का होता। कई दिन तक रोती रही ओर कई दिन बराबर उसे समझाने के लिए आती रही। जब विरजन अकेली रह गयी तो सुवामा ने चाहा कि यह मेरे यहाँ उठ आये ओर सुख से रहे। स्वयं कई बार बुलाने गयी, पर विरजन किसी प्रकार जाने को राजी न हुई। वह सोचती थी कि ससुर को संसार से सिधारे भी तीन मास भी नहीं हुए, इतनी जल्दी यह घर सूना हो जायेगा, तो लोग कहेंगे कि उनके मरते ही सास ओर बहू लड़ मरीं। यहाँ तक कि उसके इस हठ से सुवामा का मन मोटा हो गया। मझ्गाँव में प्रेमवती ने एक अंधेर मचा रखी थी। असामियों को कट वजन कहती। कारिन्दा के सिर पर जूती पटक दी।

पटवारी को कोसा। राधा अहीर की गाय बलात्‌ छीन ली। यहाँ कि गाँव वाले घबरा गये ! उन्होंने बाबू राधाचरण से शिकायत की। राधाचरण ने यह समाचार सुना तो विश्वास हो गया कि अवश्य इन दुर्घटनाओं ने अम्माँ की बुद्धि भ्रष्ट कर दी है। इस समय किसी प्रकार इनका मन बहलाना चाहिए। सेवती को लिखा कि तुम माताजी के पास चली जाओ ओर उनके संग कुछ दिन रहो। सेवती की गोद में उन दिनों एक चाँद-सा बालक खेल रहा था ओर प्राणनाथ दो मास की छुट्टी लेकर दरभंगा से आये थे। राजा साहब के प्राइवेट सेक्रेटरी हो गये थे। ऐसे अवसर पर सेवती केसे आ सकती थी? तेयारियाँ करते-करते महीनों गुजर गये। कभी बच्चा बीमार पड़ गया, कभी सास रुष्ट हो गयी कभी साइत न बनी। निदान छठे महीने उसे अवकाश मिला। वह भी बड़े विपत्तियों से।

परन्तु प्रेमवती पर उसके आने का कुछ भी प्रभाव न पड़ा। वह उसके गले मिलकर रोयी भी नहीं, उसके बच्चे की ओर आँख उठाकर भी न देखा। उसके हृदय में अब ममता ओर प्रेम नाम- मात्र को भी न रह गया। जैसे ईख से रस निकाल लेने पर केवल सीठी रह जाती हे, उसकी प्रकार जिस मनुष्य के हृदय से प्रेम निकल गया, वह अस्थि-चर्म का एक ढेर रह जाता है। देवी- देवता का नाम मुख पर आते ही उसके तेवर बदल जाते थे। मझमगाँव में जन्माष्टमी हुई। लोगों ने ठाकुरजी का ब्रत रख ओर चन्दे से नाम कराने की तेयारियाँ करने लगे। परन्तु प्रेमवती ने ठीक जन्म के अवसर पर अपने घर की मूर्ति खेत से फिकवा दी। एकादशी ब्रत टूटा, देवताओं की पूजा छूटी। बह प्रेमवती अब प्रेमवती ही न थी।

सेवती ने ज्यों-त्यों करके यहाँ दो महीने काटे। उसका चित्त बहुत घबराता। कोई सखी-सहेली भी न थी, जिसके संग बेठकर दिन काटती। विरजन ने तुलसा को अपनी सखी बना लिया था। परन्तु सेवती का स्वभाव सरल न था। ऐसी स्त्रियों से मेल-जोल करने में वह अपनी मानहानि समझती थी। तुलसा बेचारी कई बार आयी, परन्तु जब देखा कि यह मन खोलकर नहीं मिलती तो आना-जाना छोड़ दिया।

तीन मास व्यतीत हो चुके थे। एक दिन सेवती दिन चढ़े तक सोती रही। प्राणनाथ ने रात को बहुत रुलाया था। जब नींद उचटी तो क्‍या देखती हे कि प्रेमवती उसके बच्चे को गोद में लिये चूम रही हे। कभी आँखों से लगाती है ,कभी छाती से चिपटाती है। सामने अंगीठी पर हलुवा पक रहा है। बच्चा उसकी ओर उंगली से संकेत करके उछलता है कि कटोरे में जा बेहूँ ओर गरम-गरम हलुवा चखूँ। आज उसका मुखमण्डल कमल की भाँति खिला हुआ है। शायद उसकी तीत्र दृष्टि ने यह जान लिया हे कि प्रेमबती के शुष्क हृदय में प्रेम ने आज फिर से निवास किया है। सेवती को विश्वास न हुआ। वह चारपाई पर पुलकित लोचनों से ताक रही थी मानों स्वप्न देख रही थी। इतने में प्रेमवती प्यार से बोली -- उठो बेटी !उठो !दिन बहुत चढ़ आया है।

सेवती के रोंगटे खड़े हो गये ओर आँखें भर आयी। आज बहुत दिनों के पश्चात माता के मुख से प्रेममय वचन सुने। झट उठ बेठी ओर माता के गले लिपट कर रोने लगी। प्रेमवती की आँखों से भी आँसू की झड़ी लग गयी, सूखा वृक्ष हरा हुआ। जब दोनों के आँसू थमे तो प्रेमवती बोली -- सित्तो ! तुम्हें आज यह बातें अचरज प्रतीत होती हे ;हाँ बेटी, अचरज ही न। में केसे रोऊँ, जब आँखों में आँसू ही न रहे? प्यार कहाँ से लाऊँ जब कलेजा सूखकर पत्थर हो गया? ये सब दिनों के फेर हैं। आँसू उनके साथ गये ओर कमला के साथ। अज न जाने ये दो बूँद कहाँ से निकल आये? बेटी ! मेरे सब अपराध क्षमा करना।

यह कहते-कहते उसकी आँखें झपकने लगीं। सेवती घबरा गयी। माता हो बिस्तर पर लेटा दिया ओर पख झलने लगी। उस दिन से प्रेमवती की यह दशा हो गयी कि जब देखो रो रही है। बच्चे को एक क्षण लिए भी पास से दूर नहीं करती। महरियों से बोलती तो मुख से फूल झड़ते। फिर वही पहिले की सुशील प्रेमवती हो गयी। ऐसा प्रतीत होता था, मानो उसके हृदय पर से एक पर्दा-सा उठ गया है !जब कड़ाके का जाड़ा पड़ता हे, तो प्रायः नदियाँ बर्फ से ढँक जाती है। उसमें बसनेवाले जलचर बर्फ मे पर्दे के पीछे छिप जाते हैं, नोकाएँ फँस जाती हे और मंदगति, रजतवर्ण प्राण-संजीवन जल-स्रोत का स्वरुप कुछ भी दिखायी नहीं देता है। यद्यपि बर्फ की चद्दर की ओट में वह मधुर निद्रा में अलसित पड़ा रहता था, तथापि जब गरमी का साम्राज्य होता हे, तो बर्फ पिघल जाती है ओर रजतवर्ण नदी अपनी बर्फ का चद्दर उठा लेती है, फिर मछलियाँ ओर जलजन्तु आ बहते हैं, नोकाओं के पाल लहराने लगते हैं ओर तट पर मनुष्यों ओर पक्षियों का जमघट हो जाता हे।

परन्तु प्रेमतती की यह दशा बहुत दिनों तक स्थिर न रही। यह चेतनता मानो मृत्यु का सन्देश थी। इस चित्तोद्िगनता ने उसे अब तक जीवन-कारावास में रखा था, अन्यथा प्रेमवती जेसी कोमल- हृदय स्त्री विपत्तियों के ऐसे झोंके कदापि न सह सकती।

सेवती ने चारों ओर तार दिलवाये कि आकर माताजी को देख जाओ पर कहीं से कोई न आया। प्राणनाथ को छुट्टी न मिली, विरजन बीमार थी, रहे राधाचरण। वह नेनीताल वायु-परिवर्तन करने गये हुए थे। प्रेमवती को पुत्र ही को देखने की लालसा थी, पर जब उनका पत्र आ गया कि इस समय में नहीं आ सकता, तो उसने एक लम्बी साँस लेकर आँखें मूँद ली, ओर ऐसी सोयी कि फिर उठना नसीब न हुआ !

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "वरदान." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1921, https://munshipremchand.com/works/novels/vardan. Accessed 22 Sep. 2026.