Cover Image for Vardan (वरदान) by Munshi Premchand - Novel
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उपन्यास•1921•26 अध्याय•5h 44m

वरदान

Vardan

प्रेमचंद का उपन्यास 'वरदान' प्रताप और विरजन की प्रेमकथा के माध्यम से बेमेल विवाह, सामाजिक सुधार, त्याग और समाज-सेवा के प्रश्नों को प्रस्तुत करता है।

पात्र:प्रताप, विरजन, सुवामा, कमलाचरण, माधवी, मुंशी संजीवन लाल, सुशीला
सेटिंग:20वीं सदी के प्रारंभ में उत्तर भारत, विशेष रूप से बनारस और उसके आसपास का सामाजिक परिवेश

अध्याय 14 / 26

10 मिनट पठन • 1,464 शब्द

अध्याय 14: भ्रम

वृजरानी की विदाई के पश्चात सुवामा का घर ऐसा सूना हो गया, मानो पिंजरे से सुआ उड़ गया। वह इस घर का दीपक और शरीर की प्राण थी। घर वही हे, पर चारों ओर उदासी छायी हुई है। रहनेवाले वे ही है। पर सबके मुख मलिन और नेत्र ज्योति- हीन हो रहे है। वाटिका वही है, पर ऋतु पतझड़ की हे। विदाई के एक मास पश्चात्‌ मुंशी संजीवनलाल भी तीर्थयात्रा करने चले गये। धन-संपत्ति सब प्रताप को समर्पित कर दी। अपने संग मृगछाला, भगवद्‌ गीता ओर कुछ पुस्तकों के अतिरिक्त कुछ न ले गये।

प्रतापचन्द्र की प्रेमाकांक्षा बड़ी प्रबल थीं पर इसके साथ ही उसे दमन की असीम शक्ति भी प्राप्त थी। घर की एक-एक वस्तु उसे विरजन का स्मरण कराती रहती थी। यह विचार एक क्षण के लिए भी दूर न होता था यदि विरजन मेरी होती, तो ऐसे सुख से जीवन व्यतीत होता। परन्तु विचार को वह हटाता रहता था। पढ़ने बेठता तो पुस्तक खुली रहती और ध्यान अन्यत्र जा पहुँचता। भोजन करने बेठता तो विरजन का चित्र नेत्रों में फिरने लगता। प्रेमागिनि को दमन की शक्ति से दबाते-दबाते उसकी अवस्था ऐसी हो गयी, मानो वर्षों का रोगी हे प्रेमियों को अपनी अभिलाषा पूरी होने की आशा हो यान हो, परन्तु वे मन-ही-मन अपनी प्रेमिकाओं से मिलने का आनन्द उठाते रहते है। वे भाव- संसार मे अपने प्रेम-पात्र से वार्तालाप करते हैं, उसे छोड़ते हें, उससे रूठते हैं, उसे मनाते हे ओर इन भावों में उन्हें तृप्ति होती है और मन को एक सुखद ओर रसमय कार्य मिल जाता है। परन्तु यदि कोई शक्ति उन्हें इस भावोद्यान की सेर करने से रोके, यदि कोई शक्ति ध्यान में भी उस प्रियतम का चित्र न देखने दे, तो उन अभागों प्रेमियों को क्या दशा होगा? प्रताप इन्ही अभागों में था। इसमें संदेह नहीं कि यदि वह चाहता तो सुखद भावों का आनन्द भोग सकता था।

भाव-संसार का भ्रमण अतीव सुखमय होता है, पर कठिनता तो यह थी कि वह विरजन का ध्यान भी कुत्सित वासनाओं से पवित्र रखना चाहता था। उसकी शिक्षा ऐसे पवित्र नियमों से हुई थी ओर उसे ऐसे पवित्रात्माओं ओर नीतिपरायण मनुष्यों की संगति से लाभ उठाने के अवसर मिले थे कि उसकी दृष्टि में विचार की पवित्रता की भी उतनी ही प्रतिष्ठा थी जितनी आचार की पवित्रता की। यह कब संभव था कि वह विरजन को -- जिसे कई बार बहिन कह चुका था और जिसे अब भी बहिन समझने का प्रयज्ञ करता रहता था -- ध्यानावस्था में भी ऐसे भावों का केंद्र बनाता, जो कुवासनाओं से भले ही शुद्व हो, पर मन की दूषित आवेगों से मुक्त नहीं हो सकते थे जब तक मुंशीजी संजीवनलाल विद्यमान थे, उनका कुछ-न-कुछ समय उनके संग ज्ञान और धर्म-चर्चा में कट जाता था, जिससे आत्मा को संतोष होता था !परन्तु उनके चले जाने के पश्चात आत्म-सुधार का यह अवसर भी जाता रहा।

सुवामा उसे यों मलिन-मन पाती तो उसे बहुत दुःख होता। एक दिन उसने कहा -- यदि तुम्हारा चित्त न लगता हो, प्रयाग चले जाओ वहाँ शायद तुम्हारा जी लग जाए। यह विचार प्रताप के मन में भी कई बार उत्पन्न हुआ था, परन्तु इस भय से कि माता को यहाँ अकेले रहने में कष्ट होगा, उसने इस पर कुछ ध्यान नहीं दिया था। माता का आदेश पाकर इरादा पक्का हो गया। यात्रा की तेयारियाँ करने लगा, प्रस्थान का दिन निश्चित हो गया।

अब सुवामा की यह दशा है कि जब देखिए, प्रताप को परदेश में रहने-सहने की शिक्षाएँ दे रही है -- बेटा, देखो किसी से झगड़ा मत मोल लेना | झगड़ने की तुम्हारी वेसे भी आदत नहीं हे, परन्तु समझा देती हूँ। परदेश की बात हे फँक-फूँककर पग धरना। खाने-पीने में असंयम न करना। तुम्हारी यह बुरी आदत हे कि जाड़ों में सांयकाल ही सो जाते हो, फिर कोई कितना ही बुलाये पर जागते ही नहीं। यह स्वभाव परदेश में भी बना रहे तो तुम्हें साँझ का भोजन काहे को मिलेगा? दिन को थोड़ी देर के लिए सो लिया करना। तुम्हारी आँखों में तो दिन को जैसे नींद नहीं आती।

उसे जब अवकाश मिला, बेटे को ऐसी समयोचित शिक्षाएँ दिया करती।

निदान प्रस्थान का दिन आ ही गया। गाड़ी दस बजे दिन को छूटती थी। प्रताप ने सोचा -- विरजन से भेंट कर लूँ। परदेश जा रहा हूँ। फिर न जाने कब भेंट हो। चित को उत्सुक किया। माता से कह बेठा। सुवामा बहुत प्रसन्न हुईं। सुवामा बहुत प्रसन्न हुई। एक थाल में मोदक समोसे ओर दो-तीन प्रकार के मुरब्बे रखकर रधिया को दिये कि लललू के संग जा। प्रताप ने बाल बनवाये, कपड़े बदले। चलने को तो चला, पर ज्यों-ज्यों पण आगे उठाता है, दिल बेठा जाता है। भाँति-भाँति के विचार आ रहे है।

विरजन न जाने क्‍या मन में समझे, क्या सन समझे। चार महीने बीत गये, उसने एक चिट्ठी भी तो मुझे अलग से नहीं लिखी। फिर क्योंकर कहूँ कि मेरे मिलने से उसे प्रसन्नता होगी। अजी, अब उसे तुम्हारी चिन्ता ही कया हे? तुम मर भी जाओ तो वह आँसू न बहाये। यहाँ की बात ओर थी। वह अवश्य उसकी आँखों में खटकेगा। कहीं यह न समझे कि लालाजी बन-ठनकर मुझे रिझाने आये हैं। इसी सोच-विचार में गढ़ता चला जाता था। यहाँ तक कि श्यामाचरण का मकान दिखाई देने लगा। कमला मैदान टहल रहा था उसे देखते ही प्रताप की वह दशा हो गई कि जो किसी चोर की दशा सिपाही को देखकर होती है झट एक घर कर आड़ में छिप गया ओर रधिया से बोला - तू जा, ये वस्तुएँ दे आ। में कुछ काम से बाजार जा रहा हूँ। लोटता हुआ जाऊँगा। यह कह कर बाजार की ओर चला, परन्तु केवल दस ही डग चला होगा कि फिर महरी को बुलाया और बोला -- मुझे शायद देर हो जाय, इसलिए न आ सकूँगा। कुछ पूछे तो यह चिट्ठी दे देना, कहकर जेब से पेन्सिल निकाली ओर कुछ पंक्तियाँ लिखकर दे दी, जिससे उसके हृदय की दशा का भली-भंति परिचय मिलता है।

“में आज प्रयाग जा रहा हूँ, अब वहीं पढूँगा। जल्दी के कारण तुमसे नहीं मिल सका। जीवित रहूँगा तो फिर आऊँगा। कभी- कभी अपने कुशल-क्षेम की सूचना देती रहना।

तुम्हारा प्रताप”

प्रताप तो यह पत्र देकर चलता हुआ, रधिया धीरे-धीरे विरजन के घर पहुँची। वह इसे देखते ही दौड़ी ओर कुशल-क्षेम पूछने लगी -- लाला की कोई चिट्ठी आयी थी?

रधिया -- जब से गये, चिट्टी-पत्री कुछ भी नहीं आयी।

बिरजन -- चाची तो सूख से हैं?

रधिया-- लल्लू बाबू प्रयागराज जात है तीन तनिक उदास रहत हे।

विरजन -- (चौंककर) लल्लू प्रयाग जा रहे हें।

रधिया -- हाँ,हम सब बहुत समझाया कि परदेश माँ कहाँ जेहो।

मुदा कोऊ की सनुत हे?

रधिया -- कब जायेंगे?

रधिया -- आज दस बजे की टे से जवय्या है। तुसे भेंट करन आवत रहेन, तवन दुवारि पर आइ के लबट गयेन।

विरजन -- यहाँ तक आकर लोट गये। द्वार पर कोई था कि नहीं?

रधिया -- द्वार पर कहाँ आये, सड़क पर से चले गये।

विरजन -- कुछ कहा नहीं, क्यों लोटा जाता हूँ?

रधिया -- कुछ कहा नहीं, इतना बोले कि "हमार टेम छूटि जहे, तोन हम जाइत हें।'

विरजन ने घड़ी पर दृष्टि डाली, आठ बजने वाले थे। प्रेमवती के पास जाकर बोली -- माता! लललू आज प्रयाग जा रहे हें, यदि आप कहें तो उनसे मिलती आऊँ। फिर न जाने कब मिलना हो, कब न हो। महरी कहती है कि बस मुझसे मिलने आते थे, पर सड़क के उसी पार से लोट गये।

प्रेमवती -- अभी न बाल गुँथवाये, न माँग भरवायी, न कपड़े बदले बस जाने को तेयार हो गयी।

विरजन -- मेरी अम्माँ! आज जाने दीजिए। बाल गुँथवाने बेहूँगी तो दस यहीं बज जायेंगे।

प्रेमवती -- अच्छा, तो जाओ, पर संध्या तक लोट आना। गाड़ी तैयार करवा लो, मेरी ओर से सुवामा को पालागन कह देना।

विरजन ने कपड़े बदले, माधवी को बाहर दोड़ाया कि गाड़ी तेयार करने के लिए कहो ओर तब तक कुछ ध्यान न आया। रधिया से पूछा -- कुछ चिट्टी-पत्री नहीं दी?

रधिया ने पत्र निकालकर दे दिया। विरजन ने उसे हर्ष से लिया, परन्तु उसे पढ़ते ही उसका मुख कुम्हला गया। सोचने लगी कि वह द्वार तक आकर क्‍यों लोट गये ओर पत्र भी लिखा तो ऐसा उखड़ा ओर अस्पष्ट। ऐसी कोन जल्दी थी? कया गाड़ी के नोकर थे, दिनभर में अधिक नहीं तो पाँच-छः गाड़ियाँ जाती होंगी। क्‍या मुझसे मिलने के लिए उन्हे दो घंटों का विलम्ब भी असहय हो गया? अवश्य इसमें कुछ-न-कुछ भेद है। मुझसे क्या अपराध हुआ? अचानक उसे उस सय का ध्यान आया, जब वह अति व्याकुल हो प्रताप के पास गयी थी और उसके मुख से निकला था, 'लल्लू मुझसे केसे सहा जायेगा/विरजन को अब से पहिले कई बार ध्यान आ चुका कि मेरा उस समय उस दशा में जाना बहुत अनुचित था। परन्तु विश्वास हो गया कि में अवश्य लललू की दृष्टि से गिर गयी। मेरा प्रेम ओर मन अब उनके चित्त में नहीं है। एक ठण्डी सांस लेकर बेठ गयी और माधवी से बोली -- कोचवान से कह दो, अब गाड़ी न तेयार करें। में न जाऊँगी।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "वरदान." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1921, https://munshipremchand.com/works/novels/vardan. Accessed 22 Sep. 2026.