Cover Image for Vardan (वरदान) by Munshi Premchand - Novel
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उपन्यास•1921•26 अध्याय•5h 44m

वरदान

Vardan

प्रेमचंद का उपन्यास 'वरदान' प्रताप और विरजन की प्रेमकथा के माध्यम से बेमेल विवाह, सामाजिक सुधार, त्याग और समाज-सेवा के प्रश्नों को प्रस्तुत करता है।

पात्र:प्रताप, विरजन, सुवामा, कमलाचरण, माधवी, मुंशी संजीवन लाल, सुशीला
सेटिंग:20वीं सदी के प्रारंभ में उत्तर भारत, विशेष रूप से बनारस और उसके आसपास का सामाजिक परिवेश

अध्याय 8 / 26

11 मिनट पठन • 1,609 शब्द

अध्याय 8: सखियाँ

डिप्टी श्यामाचरण का भवन आज सुन्दरियों के जमघट से इन्द्र का अखाड़ा बना हुआ था। सेवती की चार सहेलियाँ -- रुक्मिणी, सीता, रामदेई ओर चन्द्रकुँवर-सोलहों सिंगार किये इठलाती फिरती थी। डिप्टी साहब की बहिन जानकी कुँवर भी अपनी दो लड़कियों के साथ इटावे से आ गयी थीं। इन दोनों का नाम कमला ओर उमादेवी था। कमला का विवाह हो चुका था। उमादेवी अभी कुँवारी ही थी। दोनों सूर्य ओर चन्द्र थी।

मंडप के तले डोमनियाँ और गवनिहारिनें सोहर और सोहाग, अलाप रही थी। गुलबिया नाइन ओर जमुनी कहारिन दोनों चटकीली साड़ियाँ पहिने, माँग सिंदूर से भरवाये, गिलट के कड़े पहिने छम-छम करती फिरती थीं। गुलबिया चपला नवयोवना थी। जमुना की अवस्था ढल चुकी थी। सेवती का क्‍या पूछना? आज उसकी अनोखी छटा थी। रसीली आँखें आमोदाधिक्य से मतवाली हो रही थीं ओर गुलाबी साड़ी की झलक से चम्पई रंग गुलाबी जान पड़ता था। धानी मखमल की कुरती उस पर खूब खिलती थी। अभी स्नान करके आयी थी, इसलिए नागिन-सी लट कंधों पर लहरा रही थी। छेड़छाड़ और चुहल से इतना अवकाश न मिलता था कि बाल गुँथवा ले। महराजिन की बेटी माधवी छींट का लहँगा पहने, आँखों में काजल लगाये, भीतर-बाहर किये हुए थी।

रुक्मिणी ने सेवती से कहा -- सितो। तुम्हारी भावज कहाँ हे? दिखायी नहीं देती। क्‍या हम लोगों से भी पर्दा हे?

रामदेई -- (मुस्कराकर) परदा क्‍यों नहीं हे? हमारी नजर न लग जायगी?

सेवती -- कमरे में पड़ी सो रही होंगी। देखो अभी खींचे लाती हूँ।

यह कहकर वह चन्द्रमा से कमरे में पहुँची। वह एक साधारण साड़ी पहने चारपाई पर पड़ी

द्वार की ओर टकटकी लगाये हुए थी। इसे देखते ही उठ बेठी। सेवती ने कहा -- यहाँ क्‍या पड़ी हो, अकेले तुम्हारा जी नहीं घबराता?

चन्द्रा -- उँह, कोन जाए, अभी कपड़े नहीं बदले।

सेवती -- बदलती क्‍यों नहीं? सखियाँ तुम्हारी बाट देख रही हें। चन्द्रा -- अभी में न बदलूँगी।

सेवती -- यही हठ तुम्हारा अच्छा नहीं लगता। सब अपने मन में क्या कहती होंगी?

चन्द्रा -- तुमने तो चिट्ठी पढ़ी थी, आज ही आने को लिखा था न?

सेवती -- अच्छा,तो यह उनकी प्रतीक्षा हो रही है, यह कहिये तभी योग साधा हे।

चन्द्रा -- दोपहर तो हुई, स्यात्‌ अब न आयेंगे।

इतने में कमला ओर उमादेवी दोनों आ पहुँची। चन्द्रा ने घूंघट निकाल लिया ओर फर्श पर आ बेठी। कमला उसकी बड़ी ननद होती थी।

कमला -- भरे, अभी तो इन्होंने कपड़े भी नहीं बदले।

सेवती -- भैया की बाट जोह रही है। इसलिए यह भेष रचा है।

कमला -- मूर्ख हैं। उन्हें गरज होगी, आप आयेंगे।

सेवती -- इनकी बात निराली हे।

कमला - पुरूषों से प्रेम चाहे कितना ही करे, पर मुख से एक शब्द भी न निकाले, नहीं तो व्यर्थ सताने और जलाने लगते हें। यदि तुम उनकी उपेक्षा करो, उनसे सीधे बात न करों, तो वे तुम्हारा सब प्रकार आदर करेंगे। तुम पर प्राण समर्पण करेंगे, परन्तु ज्यों ही उन्हें ज्ञात हुआ कि इसके हृदय में मेरा प्रेम हो गया, बस उसी दिन से दृष्टि फिर जायेगी। सैर को जायेंगे, तो अवश्य देर करके आयेंगे।

भोजन करने बेढेंगे तो मुँह जूठा करके उठ जायेंगे, बात-बात पर रूठेंगे। तुम रोओगी तो मनायेंगे, मन में प्रसन्न होंगे कि केसा फंदा डाला है। तुम्हारे सम्मुख अन्य स्त्रियों की प्रशंसा करेंगें। भावार्थ यह है कि तुम्हारे जलाने में उन्हें आनन्द आने लगेगा। अब मेरे ही घर में देखो पहिले इतना

आदर करते थे कि क्‍या बताऊँ। प्रतिक्षण नोकरों की भाँति हाथ बाँधे खड़े रहते थे। पंखा झेलने को तेयार, हाथ से कौर खिलाने को तैयार यहाँ तक कि (मुस्कुराकर) पाँव दबाने में भी संकोच न था। बात मेरे मुख से निकली नहीं कि पूरी हुईं। में उस समय अबोध थी। पुरुषों के कपट व्यवहार क्‍या जानूँ। पटी में आ गयी।

जानते थे कि आज हाथ बांध कर खड़ी होगीं। मेने लम्बी तानी तो रात-भर करवट न ली। दूसरे दिन भी न बोली। अंत में महाशय सीधे हुए, पेरों पर गिरे, गिड़गिड़ाये, तब से मन में इस बात की गाँठ बाँध ली है कि पुरूषों को प्रेम कभी न जताओ।

सेवती -- जीजा को मेने देखा है। भेया के विवाह में आये थे। बड़े हँसमुख मनुष्य हें।

कमला - पार्वती उन दिनों पेट में थी,इसी से में न आ सकी थी। यहाँ से गये तो लगे तुम्हारी प्रशंसा करने। तुम कभी पान देने गयी थी? कहते थे कि मेने हाथ थामकर बेठा लिया, खूब बातें हुई।

सेवती -- झूठे हैं, लबारिये हैं। बात यह हुई कि गुलबिया और जमुनी दोनों किसी कार्य से बाहर गयी थीं। माँ ने कहा, वे खाकर गये हैं, पान बना के दे आ। में पान लेकर गयी, चारपाई पर लेटे थे, मुझे देखते ही उठ बेठे। मैंने पान देने को हाथ बढ़ाया तो

आप कलाई पकड़कर कहने लगे कि एक बात सुन लो, पर में हाथ छुड़ाकर भागी।

कमला -- निकली न झूठी बात। वही तो में भी कहती हूँ कि अभी ग्यारह-बारह वर्ष की छोकरी, उसने इनसे क्‍या बातें की होगी? परन्तु नहीं, अपना ही हठ किये जाये। पुरूष बड़े प्रलापी होते है। मैने यह कहा, मैने वह कहा। मेरा तो इन बातों से हृदय सुलगता है। न जाने उन्हें अपने ऊपर झूठा दोष लगाने में क्या स्वाद मिलता हे? मनुष्य जो बुरा-भला करता है, उस पर परदा डालता है। यह लोग करेंगें तो थोड़ा,मिथ्या प्रलाप का आल्हा गाते फिरेंगे ज्यादा। में तो तभी से उनकी एक बात भी सत्य नहीं मानती।

इतने में गुलबिया ने आकर कहा -- तुम तो यहाँ ठाड़ी बतलात हो। ओर तुम्हार सखी तुमका आँगन में बुलोती हे।

सेवती -- देखो भाभी, अब देर न करो। गुलबिया, तनिक इनकी पिटारी से कपड़े तो निकाल ले।

कमला चन्द्रा का श्रृंगार करने लगी। सेवती सहेलियों के पास आयी। रुक्मिणी बोली -- वाह बहिन, खूब। वहाँ जाकर बेठ रही। तुम्हारी दीवारों से बोले क्या?

सेवती -- कमला बहिन चली गयी। उनसे बातचीत होने लगीं। दोनों आ रही हें।

रुक्मिणी -- लड़कोरी है न?

सेवती -- हाँ, तीन लड़के हें।

रामदेई -- मगर काठी बहुत अच्छी है।

चन्द्रकुँवर -- मुझे उनकी नाक बहुत सुन्दर लगती है, जी चाहता है छीन लूँ।

सीता -- दोनों बहिनें एक-से-एक बढ़ कर हे।

सेवती -- सीता को ईश्वर ने वर अच्छा दिया हे, इसने सोने की गो पूजी थी।

रुक्मिणी -- (जलकर) गोरे चमड़े से कुछ नहीं होता।

सीता -- तुम्हें काला ही भाता होगा।

सेवती -- मुझे काला वर मिलता तो विष खा लेती।

रुक्मिणी -- यो कहने को जो चाहे कह लों, परन्तु वास्तव में सुख काले ही वर से मिलता हे।

सेवती -- सुख नहीं धूल मिलती है। ग्रहण-सा आकर लिपट जाता होगा।

रुक्मिणी -- यही तो तुम्हारा लड़कपन है। तुम जानती नहीं सुन्दर पुरुष अपने ही बनाव-सिंगार में लगा रहता है। उसे अपने आगे स्त्री का कुछ ध्यान नहीं रहता। यदि स्त्री परम-रूपवती हो तो कुशल है। नहीं तो थोडे ही दिनों वह समझता हे कि में ऐसी दूसरी स्त्रियों के हृदय पर सुगमता से अधिकार पा सकता हूँ। उससे भागने लगता हे। ओर कुरूप पुरूष सुन्दर स्त्री पा जाता है तो समझता है कि मुझे हीरे की खान मिल गयी। बेचारा काला अपने रूप की कमी को प्यार ओर आदर से पूरा करता है। उसके हृदय में ऐसी धुकधुकी लगी रहती है कि में तनिक भी इससे खट्टा पड़ा तो यह मुझसे घृणा करने लगेगी।

चन्द्रकुँवर -- दूल्हा सबसे अच्छा वह, जो मुँह से बात निकलते ही पूरा करे।

रामदेई -- तुम अपनी बात न चलाओ। तुम्हें तो अच्छे-अच्छे गहनों से प्रयोजन हे, दूल्हा केसा ही हो।

सीता -- न जाने कोई पुरूष से किसी वस्तु की आज्ञा केसे करता है। क्‍या संकोच नहीं होता?

रुक्मिणी -- तुम बपुरी क्‍या आज्ञा करोगी, कोई बात भी तो पूछे?

सीता - मेरी तो उन्हें देखने से ही तृप्ति हो जाती है। वस्त्राभूषणों पर जी नहीं चलता।

इतने में एक ओर सुन्दरी आ पहुँची, गहने से गोंदनी की भाँति लदी हुई। बढ़िया जूती पहने, सुगंध में बसी। आँखों से चपलता बरस रही थी।

रामदेई -- आओ रानी, आओ, तुम्हारी ही कमी थी।

रानी -- क्‍या करूँ, निगोडी नाइन से किसी प्रकार पीछा नहीं छूटता था। कुसुम की माँ आयी तब जाके जूड़ा बाँधा।

सीता -- तुम्हारी जाकिट पर बलिहारी है।

रानी -- इसकी कथा मत पूछो। कपड़ा दिये एक मास हुआ। दस-बारह बार दर्जी सीकर लाया। पर कभी आस्तीन ढीली कर दी, कभी सीअन बिगाड़ दी, कभी चुनाव बिगाड़ दिया। अभी चलते- चलते दे गया हे।

यही बातें हो रही थी कि माधवी चिल्‍लाई हुई आयी -- 'भैया आये, भेया आये। उनके संग जीजा भी आये हैं, ओहो। ओहो। रानी -- राधाचरण आये क्‍या?

सेवती -- हाँ। चलूँ तनिक भाभी को सन्देश दे आऊँ। क्‍या रे। कहाँ बेठे हे?

माधवी -- उसी बड़े कमरे में। जीजा पगड़ी बाँधे हे, भैया कोट पहिने हैं, मुझे जीजा ने रूपया दिया। यह कहकर उसने मुट्टी खोलकर दिखायी।

रानी -- सितो। अब मुँह मीठा कराओ।

सेवती -- क्‍या मैने कोई मनोती की थी?

यह कहती हुई सेवती चन्द्रा के कमरे में जाकर बोली -- लो भाभी। तुम्हारा सगुन ठीक हुआ।

चन्द्रा -- क्या आ गये? तनिक जाकर भीतर बुला लो।

सेवती -- हाँ मदाने में चली जाऊँ। तुम्हारे बहनाई जी भी तो पधारे है।

चन्द्रा -- बाहर बेठे क्‍या कर रहे हैं? किसी को भेजकर बुला लेती, नहीं तो दूसरों से बातें करने लगेंगे।

अचानक खड़ाऊँ का शब्द सुनायी दिया ओर राधाचरण आते दिखायी दिये। आयु चोबीस-पच्चीस बरस से अधिक न थी। बड़े ही हँसमुख, गोर वर्ण, अंग्रेजी काट के बाल, फ्रेंच काट की दाढी, खड़ी मूँछें, लवंडर की लपटें आ रही थी। एक पतला रेशमी कुर्ता पहने हुए थे। आकर पलंग पर बेठ गए ओर सेवती से बोले -- क्या सितो। एक सप्ताह से चिट्ठी नहीं भेजी?

सेवती -- मैनें सोचा, अब तो आ रहें हो, क्यों चिट्ठी भेजूँ?यह कहकर वहाँ से हट गयी।

चन्द्रा ने घूँघट उठाकर कहा -- वहाँ जाकर भूल जाते हो?

राधाचरण -- (हृदय से लगाकर) तभी तो सेकड़ों कोस से चला आ रहा हूँ।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "वरदान." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1921, https://munshipremchand.com/works/novels/vardan. Accessed 22 Sep. 2026.