Cover Image for Vardan (वरदान) by Munshi Premchand - Novel
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उपन्यास•1921•26 अध्याय•5h 44m

वरदान

Vardan

प्रेमचंद का उपन्यास 'वरदान' प्रताप और विरजन की प्रेमकथा के माध्यम से बेमेल विवाह, सामाजिक सुधार, त्याग और समाज-सेवा के प्रश्नों को प्रस्तुत करता है।

पात्र:प्रताप, विरजन, सुवामा, कमलाचरण, माधवी, मुंशी संजीवन लाल, सुशीला
सेटिंग:20वीं सदी के प्रारंभ में उत्तर भारत, विशेष रूप से बनारस और उसके आसपास का सामाजिक परिवेश

अध्याय 11 / 26

6 मिनट पठन • 849 शब्द

अध्याय 11: विरजन की विदाई

राधाचरण रुड़की कालेज से निकलते ही मुरादाबाद के इंजीनियर नियुक्त हुए ओर चन्द्रा उनके संग मुरादाबाद को चली। प्रेमबती ने बहुत रोकना चाहा, पर जानेवाले को कोन रोक सकता है। सेवती कब की ससुराल आ चुकी थी। यहाँ घर में अकेली प्रेमवती रह गई। उसके सिर घर का काम-काज पडा।

निदान यह राय हुई कि विरजन के गोौने का संदेशा भेजा जाए। डिप्टी साहब सहमत न थे, परन्तु घर के कामों में प्रेमवती ही की बात चलती थी।

संजीवनलाल ने संदेशा स्वीकार कर लिया। कुछ दिनों से वे तीर्थयात्रा का विचार कर रहे थे। उन्होंने क्रम-क्रम से सांसारिक संबंध त्याग कर दिये थे। दिन-भर घर में आसन मारे भगवदगीता ओर योगवासिष्ठ आदि ज्ञान-सम्बन्धिनी पुस्तकों का अध्ययन किया करते थे। संध्या होते ही गंगा-स्नान को चले जाते थे।

वहाँ से रात्रि गये लोटते ओर थोड़ा-सा भोजन करके सो जाते। प्राय: प्रतापचन्द्र भी उनके संग गंगा-स्नान को जाता। यद्चपि उसकी आयु सोलह वर्ष की भी न थी, पर कुछ तो निज स्वभाव, कुछ पेतृक संस्कार और कुछ संगति के प्रभाव से उसे अभी से वैज्ञानिक विषयों पर मनन ओर विचार करने में बडा आनन्द प्राप्त होता था। ज्ञान तथा ईश्वर सम्बन्धिनी बातें सुनते-सुनते उसकी प्रवत्ति भी भक्ति की ओर चली थी, ओर किसी-किसी समय मुंशीजी से ऐसे सूक्ष्म विषयों पर विवाद करता कि वे विस्मित हो जाते। वृजरानी पर सुवामा की शिक्षा का उससे भी गहरा प्रभाव पड़ा था जितना कि प्रतापचन्द्र पर मुंशीजी की संगति ओर शिक्षा का। उसका पन्द्रहवाँ वर्ष था।

इस आयु में नयी उमंगें तरंगित होती हे ओर चितवन में सरलता चंचलता की तरह मनोहर रसीलापन बरसने लगता है। परन्तु वृजरानी अभी वही भोली-भाली बालिका थी। उसके मुख पर हृदय के पवित्र भाव झलकते थे ओर वार्तालाप में मनोहारिणी मधुरता उत्पन्न हो गयी थी। प्रातःकाल उठती ओर सबसे प्रथम मुंशीजी का कमरा साफ करके, उनके पूजा-पाठ की सामग्री यथोचित रीति से रख देती। फिर रसोई घर के धन्धे में लग जाती। दोपहर का समय उसके लिखने-पढने का था। सुवामा पर उसका जितना प्रेम ओर जितनी श्रद्धा थी, उतनी अपनी माता पर भी न रही होगी। उसकी इच्छा विरजन के लिए आज्ञा से कम न थी।

सुवामा की तो सम्मति थी कि अभी विदाई न की जाए। पर मुंशीजी के हठ से विदाई की तेयारियाँ होने लगीं। ज्यों-ज्यों वह विपत्ति की घडी निकट आती, विरजन की व्याकुलता बढ़ती जाती थी। रात-दिन रोया करती। कभी पिता के चरणों में पड़ती ओर कभी सुवामा के पदों में लिपट जाती। पार विवाहिता कन्या पराये घर की हो जाती है, उस पर किसी का क्‍या अधिकार?

प्रतापचन्द्र और विरजन कितने ही दिनों तक भाई-बहन की भाँति एक साथ रहें। पर जब विरजन की आँखें उसे देखते ही नीचे को झुक जाती थीं। प्रताप की भी यही दशा थी। घर में बहुत कम आता था। आवश्यकतावश आया, तो इस प्रकार दृष्टि नीचे किए हुए ओर सिमटे हुए, मानों दुलहिन है।

उसकी दृष्टि में वह प्रेम-रहस्य छिपा हुआ था, जिसे वह किसी मनुष्य-यहाँ तक कि विरजन पर भी प्रकट नहीं करना चाहता था।

एक दिन सन्ध्या का समय था। विदाई को केवल तीन दिन रह गये थे। प्रताप किसी काम से भीतर गया ओर अपने घर में लेम्प जलाने लगा कि विरजन आयी। उसका अंचल आँसुओं से भीगा हुआ था। उसने आज दो वर्ष के अनन्तर प्रताप की ओर सजल- नेत्र से देखा ओर कहा -- लल्लू। मुझसे केसे सहा जाएगा? प्रताप के नेत्रों में आँसू न आये। उसका स्वर भारी न हुआ। उसने सुदृढ़ भाव से कहा -- ईश्वर तुम्हें धर्य धारण करने की शक्ति देंगे।

विरजन का सिर झुक गया। आँखें पृथ्वी में पड़ गयीं और एक सिसकी ने हृदय-वेदना की यह अगाध कथा वर्णन की, जिसका होना वाणी द्वारा असंभव था।

विदाई का दिन लड़कियों के लिए कितना शोकमय होता हे। बचपन की सब सखियों-सहेलियों, माता-पिता, भाई-बन्धु से नाता टूट जाता है। यह विचार कि में फिर भी इस घर में आ सकूँगी, उसे तनिक भी संतोष नहीं देता। क्‍यों अब वह आयेगी तो अतिथिभाव से आयेगी। उन लोगों से विलग होना, जिनके साथ जीवनोद्यान में खेलना ओर स्वातन्त्र्य-वाटिका में भ्रमण करना उपलब्ध हुआ हो,

उसके हृदय को विदीर्ण कर देता है। आज से उसके सिर पर ऐसा भार पड़ता है, जो आमरण उठाना पड़ेगा।

विरजन का श्रृंगार किया जा रहा था। नाइन उसके हाथों ब पेरों में मेंहदी रचा रही थी। कोई उसके बाल गूँथ रही थी। कोई जुडे में सुगन्ध बसा रही थी। पर जिसके लिये ये तेयारियाँ हो रही थी, वह भूमि पर मोती के दाने बिखेर रही थी। इतने में बारह से संदेशा आया कि मुहूर्त्त टला जाता हे, जल्दी करों। सुवामा पास खड़ी थी। विरजन, उसके गले लिपट गयी ओर अश्रु- प्रवाह का आतंक, जो अब तक दबी हुई अगिन की नाई सुलग रहा था, अकस्मात्‌ ऐसा भडक उठा मानों किसी ने आग में तेल डाल दिया हे।

थोड़ी देर में पालकी द्वार पर आयी। विरजन पडोस की स्त्रियों से गले मिली। सुवामा के चरण छुए, तब दो-तीन स्त्रियों ने उसे पालकी के भीतर बिठा दिया। उधर पालकी उठी, इधर सुवामा मूच्छित हो भूमि पर गिर पड़ी, मानों उसके जीते ही कोई उसका प्राण निकालकर लिये जाता था। घर सूना हो गया। सेकडों स्त्रियों का जमघट था, परन्तु एक विरजन के बिना घर फाड़े खाता था।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "वरदान." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1921, https://munshipremchand.com/works/novels/vardan. Accessed 22 Sep. 2026.