Cover Image for Vardan (वरदान) by Munshi Premchand - Novel
Cover Image for Vardan (वरदान) by Munshi Premchand - Novel
उपन्यास•1921•26 अध्याय•5h 44m

वरदान

Vardan

प्रेमचंद का उपन्यास 'वरदान' प्रताप और विरजन की प्रेमकथा के माध्यम से बेमेल विवाह, सामाजिक सुधार, त्याग और समाज-सेवा के प्रश्नों को प्रस्तुत करता है।

पात्र:प्रताप, विरजन, सुवामा, कमलाचरण, माधवी, मुंशी संजीवन लाल, सुशीला
सेटिंग:20वीं सदी के प्रारंभ में उत्तर भारत, विशेष रूप से बनारस और उसके आसपास का सामाजिक परिवेश

अध्याय 22 / 26

13 मिनट पठन • 1,885 शब्द

अध्याय 22: माधवी

कभी-कभी वन के फूलों में वह सुगन्धित ओर रंग-रूप मिल जाता है जो सजी हुई वाटिकाओं को कभी प्राप्त नहीं हो सकता।

माधवी थी तो एक मूर्ख ओर दरिद्र मनुष्य की लड़की, परन्तु विधाता ने उसे नारियों के सभी उत्तम गुणों से सुशोभित कर दिया था। उसमें शिक्षा सुधार को ग्रहण करने की विशेष योग्यता थी। माधवी और विरजन का मिलाप उस समय हुआ जब विरजन ससुराल आयी। इस भोली-भाली कन्या ने उसी समय से विरजन के संग असाधारण प्रीति प्रकट करनी आरम्भ की। ज्ञात नहीं, वह उसे देवी समझती थी या क्‍या? परन्तु कभी उसने विरजन के विरुद्ध एक शब्द भी मुख से न निकाला। विरजन भी उसे अपने संग सुलाती ओर अच्छी-अच्छी रेशमी वस्त्र पहिनाती इससे अधिक प्रीति वह अपनी छोटी भगिनी से भी नहीं कर सकती थी। चित्त का चित्त से सम्बन्ध होता है। यदि प्रताप को वृजरानी से हार्दिक सम्बन्ध था तो वृजरानी भी प्रताप के प्रेम में पड़ी हुई थी। जब कमलाचरण से उसके विवाह की बात पक्की हुई जो वह प्रतापचन्द्र से कम दुखी न हुई। हाँ लज्जावश उसके हृदय के भाव कभी प्रकट न होते थे। विवाह हो जाने के पश्चात उसे नित्य चिन्ता रहती थी कि प्रतापचन्द्र के पीडित हृदय को केसे तसल्‍ली दूँ?

मेरा जीवन तो इस भाँति आनन्द से बीतता है। बेचारे प्रताप के ऊपर न जाने केसी बीतती होगी। माधवी उन दिनों ग्यारहवें वर्ष में थी। उसके रंग-रुप की सुन्दरता, स्वभाव ओर गुण देख-देखकर आश्चर्य होता था। विरजन को अचानक यह ध्यान आया कि क्‍या मेरी माधवी इस योग्य नहीं कि प्रताप उसे अपने कण्ठ का हार बनाये? उस दिन से वह माधवी के सुधार ओर प्यार में ओर भी अधिक प्रवृत हो गयी थी वह सोच-सोचकर मन-ही-मन फूली न समाती कि जब माधवी सोलह-सत्रह वर्ष की हो जायेगी, तब में प्रताप के पास जाऊँगी ओर उससे हाथ जोड़कर कहूँगी कि माधवी मेरी बहिन हे। उसे आज से तुम अपनी चेरी समझो क्‍या प्रताप मेरी बात टाल देंगे? नहीं -- वे ऐसा नहीं कर सकते। आनन्द तो तब है जब कि चाची स्वयं माधवी को अपनी बहू बनाने की मुझसे इच्छा करें। इसी विचार से विरजन ने प्रतापचन्द्र के प्रशंसनीय गुणों का चित्र माधवी के हृदय में खींचना आरम्भ कर दिया था, जिससे कि उसका रोम-रोम प्रताप के प्रेम में पग जाय। वह जब प्रतापचन्द्र का वर्णन करने लगती तो स्वतः उसके शब्द असामान्य रीति से मधुर और सरस हो जाते। शनेः- शने: माधवी का कामल हृदय प्रेम-रस का आस्वादन करने लगा। दर्पण में बाल पड़ गया।

भोली माधवी सोचने लगी, में केसी भाग्यवती हूँ। मुझे ऐसे स्वामी मिलेंगे जिनके चरण धोने के योग्य भी में नहीं हूँ, परन्तु क्या वें मुझे अपनी चेरी बनायेंगे? कुछ तो, में अवश्य उनकी दासी बनूँगी ओर यदि प्रेम में कुछ आकर्षण हे, तो में उन्हें अवश्य अपना बना लूँगी। परन्तु उस बेचारी को क्‍या मालूम था कि ये आशाएँ शोक बनकर नेत्रों के मार्ग से बह जायेगी? उसको पन्द्रहवां पूरा भी न हुआ था कि विरजन पर गृह-विनाश की आपत्तियां आ पड़ी। उस आँधी के झोंके ने माधवी की इस कल्पित पुष्प वाटिका का सत्यानाश कर दिया। इसी बीच में प्रताप चन्द्र के लोप होने का समाचार मिला। आँधी ने जो कुछ अवशिष्ट रखा था वह भी इस अग्नि ने जलाकर भस्म कर दिया।

परन्तु मानस कोई वस्तु है, तो माधवी प्रतापचन्द्र की स्त्री बन चुकी थी। उसने अपना तन ओर मन उन्हें समर्पण कर दिया। प्रताप को ज्ञान नहीं। परन्तु उन्हें ऐसी अमूल्य वस्तु मिली, जिसके बराबर संसार में कोई वस्तु नहीं तुल सकती। माधवी ने केवल एक बार प्रताप को देखा था ओर केवल एक ही बार उनके अमृत-वचन सुने थे। पर इसने उस चित्र को और भी उज्जवल कर दिया था,जो उसके हृदय पर पहले ही विरजन ने खींच रखा था। प्रताप को पता नहीं था, पर माधवी उसकी प्रेमाग्नि में दिन- प्रतिदिन घुलती जाती है। उस दिन से कोई ऐसा ब्रत नहीं था, जो माधवी न रखती हो, कोई ऐसा देवता नहीं था,जिसकी वह पूजा न करती हो और वह सब इसलिए कि ईश्वर प्रताप को जहाँ कहीं वे हों कुशल से रखें। इन प्रेम-कल्पनाओं ने उस बालिका को ओर अधिक दृढ़ सुशील और कोमल बना दिया। शायद उसके चित ने यह निणर्य कर लिया था कि मेरा विवाह प्रतापचन्द्र से हो चुका। विरजन उसकी यह दशा देखती ओर रोती कि यह आग मेरी ही लगाई हुई है। यह नवकुसुम किसके कण्ठ का हार बनेगा? यह किसकी होकर रहेगी?

हाय रे जिस चीज को मेंने इतने परिश्रम से अंकुरित किया और मधुक्षीर से सींचा,उसका फूल इस प्रकार शाखा पर ही कुम्हलाया जाता है। विरजन तो भला कविता करने में उलझी रहती, किन्तु माधवी को यह सन्‍्तोष भी न था उसके प्रेमी ओर साथी उसके प्रियतम का ध्यान मात्र था -- उस प्रियतम का जो उसके लिए सर्वथा अपरिचित था पर प्रताप के चले जाने के कई मास पीछे एक दिन माधवी ने स्वप्न देखा कि वे संन्‍्यासी हो गये है। आज माधवी का अपार प्रेम प्रकट हुआ है। आकाशवाणी सी हो गयी कि प्रताप ने अवश्य संन्यास ते लिया। आज से वह भी तपस्विनी बन गयी उसने सुख ओर विलास की लालसा हृदय से निकाल दी।

जब कभी बेठे-बेठे माधवी का जी बहुत आकुल होता तो वह प्रतापचन्द्र के घर चली जाती। वहाँ उसके चित की थोड़ी देर के लिए शांति मिल जाती थी। परन्तु जब अन्त में विरजन के पवित्र ओर आदर्शों जीवन ने यह गाँठ खोल दी वे गंगा यमुना की भाँति परस्पर गले मिल गयीं, तो माधवी का आवागमन भी बढ़ गया।

सुवामा के पास दिन-दिन भर बेठी रह जाती, इस भवन की, एक- एक अंगुल पृथ्वी प्रताप का स्मारक थी। इसी आँगन में प्रताप ने काठ के घोड़े दोड़ाये ओर इसी कुण्ड में कागज की नावें चलायी थीं। नोकरी तो स्यात्‌ काल के भंवर में पड़कर डूब गयीं, परन्तु घोडा अब भी विद्यमान था। माधवी ने उसकी जर्जरित अस्थियों में प्राण डाल दिया और उसे वाटिका में कुण्ड के किनारे एक पाटलवृक्ष की छाया में बांध दिया। यहीं भवन प्रतापचन्द्र का शयनागार था। माधवी अब उसे अपने देवता का मन्दिर समझती है। इस पलंग ने प्रताप को बहुत दिनों तक अपने अंक में थपक- थपककर सुलाया था। माधवी अब उसे पुष्पों से सुसज्ज्ति करती है। माधवी ने इस कमरे को ऐसा सुसज्जित कर दिया, जेसे वह कभी न था। चित्रों के मुख पर से धूल का यवनिका उठ गयी। लैम्प का भाग्य पुन: चमक उठा। माधवी की इस अनन्त प्रेम- भक्ति से सुवामा का दुःख भी दूर हो गया। चिरकाल से उसके मुख पर प्रतापचन्द्र का नाम अभी न आया था। विरजन से मेल- मिलाप हो गया, परन्तु दोनों स्त्रियों में कभी प्रतापचन्द्र की चर्चा भी न होती थी। विरजन लज्जा की संकुचित थी और सुवामा क्रोध से। किन्तु माधवी के प्रेमानल से पत्थर भी पिघल गया। अब वह प्रेमविह्वल होकर प्रताप के बालपन की बातें पूछने लगती तो सुवामा से न रहा जाता। उसकी आँखों से जल भर आता।

तब दोनों रोती ओर दिन-दिन भर प्रताप की बातें समाप्त न होती। क्‍या अब माधवी के चित्त की दशा सुवामा से छिप सकती थी? वह बहुधा सोचती कि क्‍या तपस्विनी इसी प्रकार प्रेमागिन मे जलती रहेगी और वह भी बिना किसी आशा के? एक दिन वृजरानी ने "कमला' का पेकेट खोला, तो पहले ही पृष्ठ पर एक परम प्रतिभा-पूर्ण चित्र विविध रंगों में दिखायी पड़ा। यह किसी महात्म का चित्र था। उसे ध्यान आया कि मेंने इन महात्मा को कहीं अवश्य देखा है। सोचते-सोचते अकस्मात उसका ध्यान प्रतापचन्द्र तक जा पहुंचा। आनन्द के उमंग में उछल पड़ी और बोली -- माधवी, तनिक यहाँ आना।

माधवी फूलों की क्‍्यारियाँ सींच रहीं थी। उसके चित्त-विनोद का आजकल वहीं कार्य था। वह साड़ी पानी में लथपथ, सिर के बाल बिखरे माथे पर पसीने के बिन्दु ओर नेन्रों में प्रेम का रस भरे हुए आकर खड़ी हो गयी। विरजन ने कहा -- आ तुझे एक चित्र दिखाऊँ।

माधवी ने कहा -- किसका चित्र हे, देखूँ।

माधवी ने चित्र को ध्यानपूर्वक देखा। उसकी आँखों में आँसू आ गये।

विरजन -- पहचान गयी?

माधवी -- क्यों? यह स्वरुप तो कई बार स्वप्न में देख चुकी हूँ?

बदन से कांति बरस रही हे।

विरजन -- देखो वृतान्त भी लिखा हे।

माधवी ने दूसरा पन्ना उल्टा तो 'स्वामी बालाजी' शीर्षक लेख

मिला थोड़ी देर तक दोनों तन्‍्मय होकर यह लेख पढ़ती रहीं, तब बातचीत होने लगी।

विरजन -- में तो प्रथम ही जान गयी थी कि उन्होनें अवश्य सन्यास ले लिया होगा।

माधवी पृथ्वी की ओर देख रही थी, मुख से कुछ न बोली।

विरजन --तब में ओर अब में कितना अन्तर है। मुखमण्डल से

कांति झलक रही है। तब ऐसे सुन्दर न थे।

माधवी --हूँ।

विरजन -- ईश्वर उनकी सहायता करे। बड़ी तपस्या की हे।

(नित्रों में जल भरकर) कैसा संयोग है। हम ओर वे संग-संग खेले, संग-संग रहे, आज वे सन्‍्यासी हैं ओर में वियोगिनी। न जाने उन्हें हम लोगों की कुछ सुध भी हैं या नहीं। जिसने सन्‍यास ले लिया, उसे किसी से क्या मतलब? जब चाची के पास पत्र न लिखा तो भला हमारी सुधि क्‍या होगी? माधवी बालकपन में वे कभी योगी-- योगी खेलते तो में मिठाइयों कि भिक्षा दिया करती थी।

माधवी ने रोते हुए 'न जाने कब दर्शन होंगें' कहकर लज्जा से सिर झुका लिया।

विरजन- शीघ्र ही आयेंगे। प्राणनाथ ने यह लेख बहुत सुन्दर लिखा हे।

माधवी-- एक-एक शब्द से भक्ति टपकती है।

विरजन -- वक्तृता की केसी प्रशंसा की है! उनकी वाणी में तो पहले ही जादू था, अब क्या पूछना! प्राणनाथ के चित पर जिसकी वाणी का ऐसा प्रभाव हुआ, वह समस्त पृथ्वी पर अपना जादू फैला सकता है।

माधवी -- चलो चाची के यहाँ चलें।

विरजन -- हाँ उनको तो ध्यान ही नहीं रहा देखें, क्या कहती हे। प्रसन्न तो क्या होगी।

माधवी -- उनको तो अभिलाषा ही यह थी, प्रसन्न क्यों न होगी? उनकी तो अभिलाषा ही यह थी, प्रसन्न क्यों न होंगी?

विरजन -- चल! माता ऐसा समाचार सुनकर कभी प्रसन्न नहीं हो सकती।

दोनो स्त्रियाँ घर से बाहर निकलीं। विरजन का मुखकमल मुरझाया हुआ था, पर माधवी का अंग-अंग हर्ष खिला जाता था। कोई उससे पूछे -- तेरे चरण अब पृथ्वी पर क्‍यों नहीं पहले? तेरे पीले बदन पर क्‍यों प्रसन्नता की लाली झलक रही है? तुझे कौन- सी सम्पत्ति मिल गयी? तू अब शोकान्वित ओर उदास क्‍यों न दिखायी पड़ती? तुझे अपने प्रियतम से मिलने की अब कोई आशा नहीं, तुझ पर प्रेम की दृष्टि कभी नहीं पहुँची फिर तू क्‍यों फूली नहीं समाती? इसका उत्तर माधवी देगी? कुछ नहीं। वह सिर झुका लेगी, उसकी आँखें नीचे झुक जायेंगी, जेसे डालियाँ फूलों के भार से झुक जाती है। कदाचित्‌ उनसे कुछ अश्रुबिन्दु भी टपक पड़े; किन्तु उसकी जिहवा से एक शबद भी न निकलेगा।

माधवी प्रेम के मद से मतवाली है। उसका हृदय प्रेम से उन्मत्त हैं। उसका प्रेम, हाट का सोदा नहीं। उसका प्रेम किसी वस्तु का भूखा नहीं है। वह प्रेम के बदले प्रेम नहीं चाहती। उसे अभिमान है कि ऐसे पवित्रता पुरुष की मूर्ति मेरे हृदय में प्रकाशमान हे। यह अभिमान उसकी उन्मत्तता का कारण हे, उसके प्रेम का पुरस्कार हे।

दूसरे मास में वृजरानी ने, 'बालाजी' के स्वागत में एक प्रभावशाली कविता लिखी यह एक विलक्षण रचना थी। जब वह मुद्रित हुई तो विद्या जगत्‌ विरजन की काव्य-प्रतिभा से परिचित होते हुए भी चमत्कृत हो गया। वह कल्पना-रूपी पक्षी, जो काव्य-गगन मे वायुमण्डल से भी आगे निकल जाता था, अबकी तारा बनकर चमका। एक-एक शब्द आकाशवाणी की ज्योति से प्रकाशित था

जिन लोगों ने यह कविता पढ़ी वे बालाजी के भक्त हो गये। कवि वह सँपेरा हे जिसकी पिटारी में साँपों के स्थान में हृदय बन्द होते हैं।

इस रचना को उद्धृत करें

शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "वरदान." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1921, https://munshipremchand.com/works/novels/vardan. Accessed 22 Sep. 2026.