Cover Image for Vardan (वरदान) by Munshi Premchand - Novel
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उपन्यास•1921•26 अध्याय•5h 44m

वरदान

Vardan

प्रेमचंद का उपन्यास 'वरदान' प्रताप और विरजन की प्रेमकथा के माध्यम से बेमेल विवाह, सामाजिक सुधार, त्याग और समाज-सेवा के प्रश्नों को प्रस्तुत करता है।

पात्र:प्रताप, विरजन, सुवामा, कमलाचरण, माधवी, मुंशी संजीवन लाल, सुशीला
सेटिंग:20वीं सदी के प्रारंभ में उत्तर भारत, विशेष रूप से बनारस और उसके आसपास का सामाजिक परिवेश

अध्याय 21 / 26

10 मिनट पठन • 1,484 शब्द

अध्याय 21: विदुषी वृजरानी

जब से मुंशी संजीवनलाल तीर्थ यात्रा को निकले और प्रतापचन्द्र प्रयाग चला गया उस समय से सुवामा के जीवन में बड़ा अन्तर हो गया था। वह ठेके के कार्य को उन्नत करने लगी। मुंशी संजीवनलाल के समय में भी व्यापार में इतनी उन्नति नहीं हुई थी। सुवामा रात-रात भर बेठी ईंट-पत्थरों से माथा लड़ाया करती ओर गारे-चूने की चिंता में व्याकुल रहती। पाई-पाई का हिसाब समझती ओर कभी-कभी स्वयं कुलियों के कार्य की देखभाल करती। इन कार्यो में उसकी ऐसी प्रवृत्ति हुई कि दान ओर ब्रत से भी वह पहले का-सा प्रेम न रहा। प्रतिदिन आय वृद्धि होने पर भी सुवामा ने व्यय किसी प्रकार का न बढ़ाया। कोड़ी-कोड़ी दाँतों से पकड़ती ओर यह सब इसलिए कि प्रतापचन्द्र धनवान हो जाए ओर अपने जीवन-पर्यन्त सानन्द रहे।

सुवामा को अपने होनहार पुत्र पर अभिमान था। उसके जीवन की गति देखकर उसे विश्वास हो गया था कि मन में जो अभिलाषा रखकर मेंने पुत्र माँगा था, वह अवश्य पूर्ण होगी। वह कालेज के प्रिंसिपल और प्रोफेसरों से प्रताप का समाचार गुप्त रीति से लिया करती थी ओर उनकी सूचनाओं का अध्ययन उसके लिए एक रोचक कहानी के तुल्य था। ऐसी दशा में प्रयाग से प्रतापचन्द्र को लोप हो जाने का तार पहुँचा मानों उसके हृदय पर वज् का गिरना था। सुवामा एक ठण्डी साँस ले, मस्तक पर हाथ रख बेठ गयी। तीसरे दिन प्रतापचन्द्र की पुस्तक, कपड़े ओर सामग्रियाँ भी आ पहुँची, यह घाव पर नमक का छिड़काव था।

प्रेमवती के मरने का समाचार पाते ही प्राणनाथ पटना से ओर राधाचरण नेनीताल से चले। उसके जीते-जी आते तो भेंट हो जाती, मरने पर आये तो उसके शव को भी देखने को सोभाग्य न हुआ। मृतक-संस्कार बड़ी धूम से किया गया। दो सप्ताह गाँव में बड़ी धूम-धाम रही। तत्पश्चात्‌ मुरादाबाद चले गये और प्राणनाथ ने पटना जाने की तेयारी प्रारम्भ कर दी। उनकी इच्छा थी कि स्त्री को प्रयाग पहुँचाते हुए पटना जायूँ। पर सेवती ने हठ किया कि जब यहाँ तक आये हैं, तो विरजन के पास भी अवश्य चलना चाहिए नहीं तो उसे बड़ा दुःख होगा। समझेगी कि मुझे असहाय जानकर इन लोगों ने भी त्याग दिया।

सेवती का इस उचाट भवन मे आना मानो पुष्पों में सुगन्ध में आना था। सप्ताह भर के लिए सुदिन का शुभागमन हो गया। विरजन बहुत प्रसन्न हुई ओर खूब रोयी। माधवी ने मुन्नू को अंक में लेकर बहुत प्यार किया।

प्रेमवती के चले जाने पर विरजन उस गृह में अकेली रह गई थी। केवल माधवी उसके पास थी। हृदय-ताप ओर मानसिक दुःख ने उसका वह गुण प्रकट कर दिया, जा अब तक गुप्त था। वह काव्य ओर पद्च-रचना का अभ्यास करने लगी। कविता सच्ची भावनाओं का चित्र हे और सच्ची भावनाएँ चाहे वे दुःख हों या सुख की, उसी समय सम्पन्न होती हैं जब हम दुःख या सुख का अनुभव करते हैं। विरजन इन दिनों रात-रात बेठी भाषा में अपने मनोभावों के मोतियों की माला गँँथा करती। उसका एक- एक शब्द करुणा ओर वेराग्य से परिपूर्ण होता था। अन्य कवियों के मनों में मित्रों की वहा-वाह ओर काव्य-प्रेमियों के साधुवाद से उत्साह पेदा होता है, पर विरजन अपनी दुःख कथा अपने ही मन को सुनाती थी।

सेवती को आये दो-तीन दिन बीते थे। एक दिन विरजन से कहा

  • में तुम्हें बहुधा किसी ध्यान में मग्न देखती हूँ ओर कुछ लिखते भी पाती हूँ। मुझे न बताओगी?

विरजन लज्जित हो गयी। बहाना करने लगी कि कुछ नहीं, यों ही जी कुछ उदास रहता हे।

सेवती ने कहा - में न मानृँगी।

फिर वह विरजन का बाक्स उठा लायी, जिसमें कविता के दिव्य मोती रखे हुए थे। विवश होकर विरजन ने अपने नय पद्च सुनाने शुरु किये। मुख से प्रथम पद्य का निकलना था कि सेवती के रोएँ खड़े हो गये ओर जब तक सारा पद्य समाप्त न हुआ, वह तन्‍्मय होकर सुनती रही। प्राणनाथ की संगति ने उसे काव्य का रसिक बना दिया था। बार-बार उसके नेत्र भर आते। जब विरजन चुप हो गयी तो एक समाँ बँधा हुआ था मानों को कोई मनोहर राग अभी थम गया है। सेवती ने विरजन को कण्ठ से लिपटा लिया, फिर उसे छोड़कर दोड़ी हुई प्राणनाथ के पास गयी, जेसे कोई नया बच्चा नया खिलोना पाकर हर्ष से दोड़ता हुआ अपने साथियों को दिखाने जाता है। प्राणनाथ अपने अफसर को प्रार्थना-पत्र लिख रहे थे कि मेरी माता अति पीड़ित हो गयी हे, अतएव सेवा में प्रस्तुत होने में विलम्ब हुआ। आशा करता हूँ कि एक सप्ताह का आकस्मिक अवकाश प्रदान किया जायगा। सेवती को देखकर चट अपना प्रार्थना-पत्र छिपा लिया ओर मुस्कराये। मनुष्य केसा धूर्त है! वह अपने आपको भी धोखा देने से नहीं चूकता।

सेवती -- तनिक भीतर चलो, तुम्हें विरजन की कविता सुनवाऊँ, फड़क उठोगे।

प्राणनाथ -- अच्छा, अब उन्हें कविता की चाट हुई है? उनकी भाभी तो गाया करती थी -- तुम तो श्याम बड़े बेखबर हो। सेवती -- तनिक चलकर सुनो, तो पीछे हँसना। मुझे तो उसकी कविता पर आश्चर्य हो रहा है।

प्राणनाथ -- चलो, एक पत्र लिखकर अभी आता हूँ।

सेवती -- अब यही मुझे अच्छा नहीं लगता। में आपके पत्र नोच डालूँगी।

सेवती प्राणनाथ को घसीट ले आयी। वे अभी तक यही जानते थे कि विरजन ने कोई सामान्य भजन बनाया होगा। उसी को सुनाने के लिए व्याकुल हो रही होगी। पर जब भीतर आकर बेठे और विरजन ने लजाते हुए अपनी भावपूर्ण कविता 'प्रेम की मतवाली' पढ़नी आरम्भ की तो महाशय के नेत्र खुल गये। पद्च क्‍या था, हृदय के दुख की एक धारा ओर प्रेम-रहस्य की एक कथा थी। वह सुनते थे और मुग्ध होकर झुमते थे। शब्दों की एक-एक योजना पर, भावों के एक-एक उद्बार पर लहालोट हुए जाते थे। उन्होंने बहुतेरे कवियों के काव्य देखे थे,पर यह उच्च विचार, यह नूतनता, यह भावोत्कर्ष कहीं दीख न पड़ा था। वह समय चित्रित हो रहा था जब अरुणोदय के पूर्व मलयानिल लहराता हुआ चलता है, कलियाँ विकसित होती हैं, फूल महकते हैं ओर आकाश पर हल्की लालिमा छा जाती है। एक-एक शब्द में नवविकसित पुष्पों की शोभा ओर हिमकिरणों की शीतलता विद्यमान थी।

उस पर विरजन का सुरीलापन और ध्वनि की मधुरता सोने में सुगन्ध थी। ये छन्द थे,जिन पर विरजन ने हृदय को दीपक की भाँति जलाया था। प्राणनाथ प्रहसन के उद्देश्य से आये थे। पर जब वे उठे तो बस्तुतः ऐसा प्रतीत होता था, मानो छाती से हृदय निकल गया हे। एक दिन उन्होंने विरजन से कहा -- यदि तुम्हारी कविताएँ छपे, तो उनका बहुत आदर हो।

विरजन ने सिर नीचा करके कहा -- मुझे विश्वास नहीं कि कोई इनको पसन्द करेगा।

प्राणनाथ -- ऐसा संभव ही नहीं। यदि हृदयों में कुछ भी रसिकता है तो तुम्हारे काव्य की अवश्य प्रतिष्ठा होगी। यदि ऐसे लोग विद्यमान हें, जो पुष्पों की सुगन्ध से आनन्दित हो जाते हैं, जो पक्षियों के कलरव ओर चाँदनी की मनोहारिणी छटा का आनन्द उठा सकते हें, तो वे तुम्हारी कविता को अवश्य हृदय में स्थान देंगे।

विरजन के हृदय मे वह गुदगुदी उत्पन्न हुई जो प्रत्येक कवि को अपने काव्य-चिन्तन की प्रशंसा मिलने पर, कविता के मुद्रित होने के विचार से होती है। यद्यपि वह नहीं--नहीं करती रही, पर वह, नहीं', 'हाँ' के समान थी।

प्रयाग से उन दिनों "कमला' नाम की अच्छी पत्रिका निकलती थी। प्राणनाथ ने 'प्रेम की मतवाली' को वहाँ भेज दिया। सम्पादक एक काव्य-रसिक महानुभाव थे कविता पर हार्दिक धन्यवाद दिया ओर जब यह कविता प्रकाशित हुई, तो साहित्य- संसार में धूम मच गयी। कदाचित ही किसी कवि को प्रथम ही बार ऐसी ख्याति मिली हो। लोग पढ़ते और विस्मय से एक-दूसरे का मुँह ताकते थे। काव्य-प्रेमियों मे कई सप्ताह तक मतवाली बाला के चर्चे रहे। किसी को विश्वास ही न आता था कि यह एक नवजात कवि की रचना हे।

अब प्रति मास ”कमला' के पृष्ठ विरजन की कविता से सुशोभित होने लगे ओर 'भारत महिला' को लोकमत ने कवियों के सम्मानित पद पर पहुंचा दिया। 'भारत महिला” का नाम बच्चे- बच्चे की जिहवा पर चढ़ गया। को इस समाचार-पत्र या पत्रिका 'भारत महिला” को ढूँढ़ने लगते। हाँ, उसकी दिव्य शक्तियाँ अब किसी को विस्मय में न डालती उसने स्वयं कविता का आदर्श उच्च कर दिया था।

तीन वर्ष तक किसी को कुछ भी पता न लगा कि 'भारत महिला! कोन है। निदान प्राणनाथ से न रहा गया। उन्हें विरजन पर

भक्ति हो गयी थी। वे कई मास से उसका जीवन-चरित्र लिखने की धुन में थे। सेवती के द्वारा धीरे-धीरे उन्होंने उसका सब जीवन चरित्र ज्ञात कर दिया ओर 'भारत महिला” के शीर्षक से एक प्रभाव-पूरित लेख लिया। प्राणनाथ ने पहिले लेख न लिखा था, परन्तु श्रद्धा ने अभ्यास की कमी पूरी कर दी थी। लेख अत्यन्त रोचक, समालोचनात्मक ओर भावपूर्ण था।

इस लेख का मुदित होना था कि विरजन को चारों तरफ से प्रतिष्ठा के उपहार मिलने लगे। राधाचरण मुरादाबाद से उसकी भेंट को आये। कमला, उमादेवी, चन्द्रकुंवर और कितनी ही पुरानी सखियाँ जिन्होनें उसे विस्मरण कर दिया था प्रतिदिन विरजन के दर्शनों को आने लगी। बडे बड़े गणमान्य सज्जन जो ममता के अभिमान से हाकिमों के सम्मुख सिर न झुकाते, विरजन के द्वार पर दर्शन को आते थे। चन्द्रा स्वयं तो न आ सकी, परन्तु पत्र में लिखा -- जो चाहता हे कि तुम्हारे चरणों पर सिर रखकर घंटों रोऊँ।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "वरदान." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1921, https://munshipremchand.com/works/novels/vardan. Accessed 22 Sep. 2026.