माधवी प्रथम ही से मुरझायी हुई कली थी। निराशा ने उसे ख़ाक में मिला दिया। बीस वर्ष की तपस्विनी योगिनी हो गयी। उस बेचारी का भी केसा जीवन था कि या तो मन में कोई अभिलाषा ही उत्पन्न न हुई, या हुई दुर्देव ने उसे कुसुमित न होने दिया। उसका प्रेम एक अपार समुद्र था। उसमें ऐसी बाढ आयी कि जीवन की आशाएँ ओर अभिलाषाएँ सब नष्ट हो गयीं। उसने योगिनी के से वस्त्र पहिन लिये। वह सांसारिक बन्धनों से मुक्त हो गयी। संसार इन्ही इच्छाओं ओर आशाओं का दूसरा नाम हैं। जिसने उन्हें नेराश्य-नद में प्रवाहित कर दिया, उसे संसार में समझना भ्रम हें।
इस प्रकार के मद से मतवाली योगिनी को एक स्थान पर शांति न मिलती थी। पुष्प की सुगंधि की भाँति देश-देश भ्रमण करती ओर प्रेम के शब्द सुनाती फिरती थी। उसके प्रीत वर्ण पर गेहुएँ रंग का वस्त्र परम शोभा देता था। इस प्रेम की मूर्ति को देखकर लोगों के नेत्रों से अश्वु टपक पड़ते थे। जब अपनी वीणा बजाकर कोई गीत गाने लगती तो सुनने वालों के चित अनुराग में पग जाते थे उसका एक-एक शब्द प्रेम-रस डूबा होता था।
मतवाली योगिनी को बालाजी के नाम से प्रेम था। वह अपने पदों में प्रायः उन्हीं की कीर्ति सुनाती थी। जिस दिन से उसने योगिनी का वेष घारण किया और लोक-लाज को प्रेम के लिए परित्याग कर दिया उसी दिन से उसकी जिह्वा पर माता सरस्वती बेठ गयी। उसके सरस पदों को सुनने के लिए लोग सेकडों कोस चले जाते थे। जिस प्रकार मुरली की ध्वनि सुनकर गोपियाँ घरों से व्याकूल होकर निकल पड़ती थीं उसी प्रकार इस योगिनी की तान सुनते ही श्रोताजनों का नद उमड़ पड़ता था। उसके पद सुनना आनन्द के प्याले पीना था।
इस योगिनी को किसी ने हँसते या रोते नहीं देखा। उसे न किसी बात पर हर्ष था,न किसी बात का विषाद। जिस मन में कामनाएँ न हों, वह क्यों हँसे ओर क्यों रोये? उसका मुख-मण्डल आनन्द की मूर्ति था। उस पर दृष्टि पड़ते ही दर्शक के नेत्र पवित्र आनन्द से परिपूर्ण हो जाते थे।
