कुछ काल से सुवामा ने द्रव्याभाव के कारण महाराजिन, कहार ओर दो महरियों को जवाब दे दिया था क्योंकि अब न तो उसकी कोई आवश्यकता थी और न उनका व्यय ही सँभाले सँभलता था। केवल एक बुढ़िया महरी शेष रह गयी थी। ऊपर का काम-काज वह करती रसोई सुवामा स्वयं बना लेगी। परन्तु उस बेचारी को ऐसे कठिन परिश्रम का अभ्यास तो कभी था नहीं, थोड़े ही दिनों में उसे थकान के कारण रात को कुछ ज्वर रहने लगा। धीरे-धीरे यह गति हुई कि जब देखें ज्वर विद्यमान हे। शरीर भुना जाता है, न खाने की इच्छा है न पीने की। किसी कार्य में मन नहीं लगता। पर यह है कि सदैव नियम के अनुसार काम किये जाती है। जब तक प्रताप घर रहता है तब तक वह मुखाकृति को तनिक भी मलिन नहीं होने देती परन्तु ज्यों ही वह स्कूल चला जाता हे, त्यों ही वह चद्दर ओढ़कर पड़ी रहती हे ओर दिन-भर पड़े-पड़े कराहा करती हे।
प्रताप बुद्धिमान लड़का था। माता की दशा प्रतिदिन बिगड़ती हुई देखकर ताड गया कि यह बीमार है। एक दिन स्कूल से लोटा तो सीधा अपने घर गया। बेटे को देखते ही सुवामा ने उठ बेठने का प्रयत्ञ किया पर निर्बलता के कारण मूर्छा आ गयी ओर हाथ- पांव अकड़ गये। प्रताप ने उसे सँभाला और उसकी ओर भर्त्सना की दृष्टि से देखकर कहा -- अम्मा तुम आजकल बीमार हो क्या? इतनी दुबली क्यों हो गयी हो? देखो, तुम्हारा शरीर कितना गर्म है। हाथ नहीं रखा जाता।
सुवामा ने हँसने का उद्योग किया। अपनी बीमारी का परिचय देकर बेटे को केसे कष्ट दे? यह निःस्पृह और निःस्वार्थ प्रेम की पराकाष्ठा है। स्वर को हलका करके बोली नहीं बेटा बीमार तो नहीं हूँ। आज कुछ ज्वर हो आया था, संध्या तक चंगी हो जाऊँगी। आलमारी में हलुवा रखा हुआ है निकाल लो। नहीं, तुम आओ बेठो, में ही निकाल देती हूँ।
प्रताप -- माता, तुम मुझ से बहाना करती हो। तुम अवश्य बीमार हो। एक दिन में कोई इतना दुर्बल हो जाता हे?
सुवामा -- (हँसकर) क्या तुम्हारे देखने में में दुबली हो गयी हूँ।
प्रताप -- में डॉक्टर साहब के पास जाता हूँ।
सुवामा -- (प्रताप का हाथ पकड़कर) तुम क्या जानो कि वे कहाँ रहते हें?
ताप - पूछते-पूछते चला जाऊँगा।
सुवामा कुछ ओर कहना चाहती थी कि उसे फिर चक्कर आ गया। उसकी आँखें पथरा गयीं। प्रताप उसकी यह दशा देखते ही डर गया। उससे ओर कुछ तो न हो सका, वह दोड़कर विरजन के द्वार पर आया ओर खड़ा होकर रोने लगा।
प्रतिदिन वह इस समय तक विरजन के घर पहुँच जाता था। आज जो देर हुई तो वह अकुलायी हुई इधर-उधर देख रही थी। अकस्मात द्वार पर झांकने आयी, तो प्रताप को दोनों हाथों से मुख ढाँके हुए देखा। पहले तो समझी कि इसने हंसी से मुख छिपा रखा हे। जब उसने हाथ हटाये तो आँसू दीख पड़े। चोंककर बोली -- लल्लू क्यों रोते हो? बता दो।
प्रताप ने कुछ उत्तर न दिया, वरन और सिसकने लगा।
विरजन बोली -- न बताओगे! कया चाची ने कुछ कहा? जाओ, तुम चुप नही होते।
प्रताप ने कहा -- नहीं, विरजन, माँ बहुत बीमार हे।
यह सुनते ही वृजरानी दोड़ी ओर एक सांस में सुवामा के सिरहाने जा खड़ी हुई। देखा तो वह सुन्न पड़ी हुई हे, आँखें मुँदी हुई हें ओर लम्बी साँसें ले रही हैं। उनका हाथ थाम कर विरजन झिझोड़ने लगी -- चाची, केसी जी हे, आँखें खोलों, केसा जी हे? परन्तु चाची ने आँखें न खोलीं। तब वह ताक पर से तेल उतारकर सुवामा के सिर पर धीरे-धीरे मलने लगी। उस बेचारी को सिर में महीनों से तेल डालने का अवसर न मिला था, ठण्डक पहुँची तो आँखें खुल गयी।
विरजन -- चाची, कैसा जी हे? कहीं दर्द तो नहीं हे?
सुवामा -- नहीं, बेटी दर्द कहीं नहीं हे। अब में बिल्कुल अच्छी हूँ। भेया कहाँ हैं?
विरजन -- वह तो मेरे घर हे, बहुत रो रहे हें।
सुवामा -- तुम जाओ, उसके साथ खेलों, अब में बिल्कुल अच्छी हूँ।
अभी ये बातें हो रही थीं कि सुशीला का भी शुभागमन हुआ। उसे सुवामा से मिलने की तो बहुत दिनों से उत्काष्ठा थी, परन्तु कोई अवसर न मिलता था। इस समय वह सान्त्वना देने के बहाने आ पहुँची | विरजन ने अपनी माता को देखा तो उछल पड़ी ओर ताली बजा-बजाकर कहने लगी -- माँ आयी, माँ आयी।
दोनों स्त्रियों में शिष्टाचार की बातें होने लगीं। बातों-बातों में दीपक जल उठा। किसी को ध्यान भी न हुआ कि प्रताप कहाँ है। थोड़ी देर तक तो वह द्वार पर खड़ा रोता रहा,फिर झटपट आँखें पोंछकर डॉक्टर किचलू के घर की ओर लपकता हुआ चला। डॉक्टर साहब मुंशी शालिग्राम के मित्रों में से थे। ओर जब कभी का पड़ता, तो वे ही बुलाये जाते थे। प्रताप को केवल इतना विदित था कि वे बरना नदी के किनारे लाल बँगले में रहते हैं। उसे अब तक अपने मुहल्ले से बाहर निकलने का कभी अवसर न पड़ा था। परन्तु उस समय मातृभक्ती के वेग से उद्विग्न होने के कारण उसे इन रुकावटों का कुछ भी ध्यान न हुआ।
घर से निकलकर बाजार में आया ओर एक इक्केवान से बोला -- लाल बँगले चलोगे? लाल बंगला प्रसाद स्थान था।
इक्कावान तैयार हो गया। आठ बजते-बजते डॉक्टर साहब की फिटन सुवामा के द्वार पर आ पहुँची।
यहाँ इस समय चारों ओर उसकी खोज हो रही थी कि अचानक वह सवेग पेर बढ़ाता हुआ भीतर गया ओर बोला - पर्दा करो। डॉक्टर साहब आते हें। सुवामा ओर सुशीला दोनों चोंक पड़ी। समझ गयीं, यह डॉक्टर साहब को बुलाने गया था। सुवामा ने प्रेमाधिक्य से उसे गोदी में बेठा लिया डर नहीं लगा? हमको बताया भी नहीं यों ही चले गये? तुम खो जाते तो में क्या करती? ऐसा लाल कहाँ पाती?
यह कहकर उसने बेटे को बार-बार चूम लिया। प्रताप इतना प्रसन्न था, मानों परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया। थोड़ी देर में पर्दा हुआ और डॉक्टर साहब आये। उन्होंने सुवामा की नाड़ी देखी ओर सांत्वना दी। वे प्रताप को गोद में बेठाकर बातें करते रहे। ओषधियाँ साथ ले आये थे। उसे पिलाने की सम्मति देकर नो बजे बँगले को लोट गये। परन्तु जीर्णज्वर था, अतएव पूरे मास-भर सुवामा को कड़वी-कड़वी ओषधियां खानी पड़ी। डॉक्टर साहब दोनों वक्त आते और ऐसी कृपा और ध्यान रखते, मानो सुवामा उनकी बहिन है। एक बार सुवामा ने डरते-डरते फीस के रुपये एक पात्र में रखकर सामने रखे। पर डॉक्टर साहब ने उन्हें हाथ तक न लगाया।
केवल इतना कहा -- इन्हें मेरी ओर से प्रताप को दे दीजिएगा, वह पेदल स्कूल जाता हे, पेरगाड़ी मोल ले लेगा। विरजन ओर उनकी माता दोनों सुवामा की शुश्रूषा के लिए उपस्थित रहतीं। माता चाहे विलम्ब भी कर जाए, परन्तु विरजन वहाँ से एक क्षण के लिए भी न टलती। दवा पिलाती, पान देती जब सुवामा का जी अच्छा होता तो वह भोली-भोली बातों द्वारा उसका मन बहलाती। खेलना-कूदना सब छूट गया। जब सुवामा बहुत हठ करती तो प्रताप के संग बाग में खेलने चली जाती। दीपक जलते ही फिर आ बेठती और जब तक निद्रा के मारे झुक-झुक न पड़ती, वहाँ से उठने का नाम न लेती वरन प्रायः वहीं सो जाती, रात को नोकर गोद में उठाकर घर ले जाता। न जाने उसे कोन-सी धुन सवार हो गयी थी।
एक दिन वृजरानी सुवामा के सिरहाने बेठी पंखा झल रही थी। न जाने किस ध्यान में मग्न थी। आँखें दीवार की ओर लगी हुई थीं। ओर जिस प्रकार वृक्षों पर कोमुदी लहराती है, उसी भाँति भीनी-भीनी मुस्कान उसके अधरों पर लहरा रही थी। उसे कुछ भी ध्यान न था कि चाची मेरी ओर देख रही है। अचानक उसके हाथ से पंखा छूट गया। ज्यों ही वह उसको उठाने के लिए झुकी कि सुवामा ने उसे गले लगा लिया। और पुचकार कर पूछा -- विरजन, सत्य कहो, तुम अभी क्या सोच रही थी?
विरजन ने माथा झुका लिया और कुछ लज्जित होकर कहा -- कुछ नहीं, तुमको न बतलाऊँगी।
सुवामा -- मेरी अच्छी विरजन। बता तो क्या सोचती थी? विरजन -- (लजाते हुए) सोचती थी कि ... जाओ हँसो मत ...न बतलाऊँगी।
सुवामा -- अच्छा ले, न हँसूँगी,बताओ। ले यही तो अब अच्छा नही लगता, फिर में आँखें मूँद लूँगी।
विरजन -- किस से कहोगी तो नहीं?
सुवामा -- नहीं, किसी से न कहूँगी।
विरजन -- सोचती थी कि जब प्रताप से मेरा विवाह हो जायेगा, तब बड़े आनन्द से रहूँगी।
सुवामा ने उसे छाती से लगा लिया और कहा -- बेटी, वह तो तेरा भाई है।
विरजन -- हाँ भाई है। में जान गई। तुम मुझे बहू न बनाओगी।
सुवामा -- आज लल्लू को आने दो, उससे पूछूँ देखूँ क्या कहता है?
विरजन -- नहीं, नहीं, उनसे न कहना में तुम्हारे पेरों पड़ूँ।
सुवामा -- में तो कह दूँगी।
विरजन -- तुम्हें हमारी कसम, उनसे न कहना।
