Cover Image for Vardan (वरदान) by Munshi Premchand - Novel
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उपन्यास•1921•26 अध्याय•5h 44m

वरदान

Vardan

प्रेमचंद का उपन्यास 'वरदान' प्रताप और विरजन की प्रेमकथा के माध्यम से बेमेल विवाह, सामाजिक सुधार, त्याग और समाज-सेवा के प्रश्नों को प्रस्तुत करता है।

पात्र:प्रताप, विरजन, सुवामा, कमलाचरण, माधवी, मुंशी संजीवन लाल, सुशीला
सेटिंग:20वीं सदी के प्रारंभ में उत्तर भारत, विशेष रूप से बनारस और उसके आसपास का सामाजिक परिवेश

अध्याय 17 / 26

40 मिनट पठन • 5,900 शब्द

अध्याय 17: कमला के नाम विरजन के पत्र

मझगाँव

'प्रियतम,

प्रेम पत्र आया। सिर पर चढ़ाकर नेत्रों से लगाया। ऐसे पत्र तुम न लिखा करो !हृदय विदीर्ण हो जाता है। में लिखूँ तो असंगत नहीं। यहाँ चित्त अति व्याकुल हो रहा है। कया सुनती थी ओर क्या देखती हें? टूटे-फूटे फूस के झोंपड़े, मिट्टी की दीवारें, घरों के सामने कूड़े-करकट के बड़े-बड़े ढेर, कीचड़ में लिपटी हुई भेंसे, दुर्बल गायें, ये सब दृश्य देखकर जी चाहता है कि कहीं चली जाऊँ। मनुष्यों को देखो, तो उनकी शोचनीय दशा हे। हड़ियाँ निकली हुई है। वे विपत्ति की मूर्तियाँ ओर दरिद्रता के जीवित चित्र हैं। किसी के शरीर पर एक बेफटा वस्त्र नहीं हे ओर केसे भाग्यहीन कि रात-दिन पसीना बहाने पर भी कभी भरपेट रोटियाँ नहीं मिलतीं। हमारे घर के पिछवाड़े एक गड्ढा है। माधवी खेलती थी। पाँव फिसला तो पानी में गिर पड़ी। यहाँ किंवदन्ती है कि गड्ढे में चुड़ेलें नहाने आया करती है ओर वे अकारण यह चलनेवालों से छेड़-छाड़ किया करती है। इसी प्रकार द्वार पर एक पीपल का पेड़ है। वह भूतों का आवास है। गड्ढे का तो भय नहीं है, परन्तु इस पीपल का वास सारे-सारे गाँव के हृदय पर ऐसा छाया हुआ है। कि सूर्यास्त ही से मार्ग बन्द हो जाता है। बालक ओरे स्त्रियाँ तो उधर पैर ही नहीं रखते! कहाँ, अकेले-दुकेले पुरुष कभी-कभी चले जाते हें, पर पे भी घबराये हुए। ये दो स्थान मानो उस निकृष्ट जीबों के केन्द्र हैं। इनके अतिरिक्त सेकड़ों भूत-चुड़ेल भिन्न-भिन्न स्थानों के निवासी पाये जाते हें। इन लोगों को चुड़ेलें दीख पड़ती हैं। लोगों ने इनके स्वभाव पहचान किये है। किसी भूत के विषय में कहा जाता है कि वह सिर पर चढ़ता है तो महीनों नहीं उतरता और कोई दो-एक पूजा लेकर अलग हो जाता है। गाँव वालों में इन विषयों पर इस प्रकार वार्तालाप होता है, मानों ये प्रत्यक्ष घटनाएँ है। यहाँ तक सुना गया हें कि चुड़ेल भोजन-पानी माँगने भी आया करती हैं। उनकी साड़ियाँ प्रायः बगुले के पंख की भाँति उज्ज्वल होती हैं और वे बातें कुछ-कुछ नाक से करती है। कहाँ, गहनों को प्रचार उनकी जाति में कम है। उन्ही स्त्रियों पर उनके आक्रमण का भय रहता है, जो बनाव श्रेगार किये रंगीन वस्त्र पहिने, अकेली उनकी दृष्टि मे पड़ जायें। फूलों की बास उनको बहुत भाती है। सम्भव नहीं कि कोई स्त्री या बालक रात को अपने पास फूल रखकर सोये।

भूतों के मान ओर प्रतिष्ठा का अनुमान बड़ी चतुराई से किया गया है। जोगी बाबा आधीरात को काली कमरिया ओडढ़े, खड़ाऊँ पर सवार, गाँव के चारों आर भ्रमण करते हैं ओर भूले-भटके पथिकों को मार्ग बताते है। साल-भर में एक बार उनकी पूजा होती हैं। वह अब भूतों में नहीं वरन्‌ देवताओं में गिने जाते है।

वह किसी भी आपत्ति को यथाशक्ति गाँव के भीतर पग नहीं रखने देते। इनके विरुद्ध धोबी बाबा से गाँव-भर थर्राता हे। जिस वृक्ष पर उसका वास हे, उधर से यदि कोई दीपक जलने के पश्चात्‌ निकल जाए, तो उसके प्राणों की कुशलता नहीं। उन्हें भगाने के लिए दो बोतल मदिरा काफी है। उनका पुजारी मंगल के दिन उस वृक्ष के तले गाजा ओर चरस रख आता है। लाला साहब भी भूत बन बेठे हैं। यह महाशय पटवारी थे। उन्हें कई पंडित असामियों ने मार डाला था। उनकी पकड़ ऐसी गहरी है कि प्राण लिये बिना नहीं छोड़ती। कोई पटवारी यहाँ एक वर्ष से अधिक नहीं जीता। गाँव से थोड़ी दूर पर एक पेड़ है। उस पर मोलवी साहब निवास करते है। वह बेचारे किसी को नहीं छेड़ते। हाँ, बृहस्पति के दिन पूजा न पहुँचायी जाए, तो बच्चों को छेड़ते हें। केसी मूर्खता है! केसी मिथ्या भक्ति है! ये भावनाएँ हृदय पर वज़लीक हो गयी हे। बालक बीमार हुआ कि भूत की पूजा होने लगी। खेत-खलिहान में भूत का भोग जहाँ देखिये, भूत-ही-भूत दीखते हैं। यहाँ न देवी हे,न देवता। भूतों का ही साम्राज्य हें। यमराज यहाँ चरण नहीं रखते, भूत ही जीव-हरण करते हैं। इन भावों का किस प्रकार सुधार हो? किमधिकम

तुम्हारी विरजन


(2)

मझगाँव

प्यारे,

बहुत दिनों को पश्चात्‌ आपकी प्रेम-पत्री प्राप्त हुई। क्या सचमुच पत्र लिखने का अवकाश नहीं? पत्र क्या लिखा हे, मानो बेगार टाली है। तुम्हारी तो यह आदत न थी। क्‍या वहाँ जाकर कुछ ओर हो गये? तुम्हें यहाँ से गये दो मास से अधिक होते है। इस बीच में कई छोटी-बड़ी छुट्टियाँ पड़ी, पर तुम न आये। तुमसे कर बाँधकर कहती हूँ -- होली की छुट्टी में अवश्य आना। यदि अब की बार तरसाया तो मुझे सदा उलाहना रहेगा।

यहाँ आकर ऐसी प्रतीत होता है, मानो किसी दूसरे संसार में आ गयी हूँ। रात को शयन कर रही थी कि अचानक हा-हा, हू-हू का कोलाहल सुनायी दिया। चोॉंककर उठा बेठी! पूछा तो ज्ञात हुआ कि लड़के घर-घर से उपले ओर लकड़ी जमा कर रहे थे। होली माता का यही आहार था। यह बेढंगा उपद्रव जहाँ पहुँच गया, ईंधन का दिवाला हो गया। किसी की शक्ति नही जो इस सेना को रोक सके। एक नम्बरदार की मड़िया लोप हो गयी। उसमें दस-बारह बेल सुगमतापूर्वक बाँधे जा सकते थे। होली वाले कई

दिन घात में थे। अवसर पाकर उड़ा ले गये। एक कुरमी का झोंपड़ा उड़ गया। कितने उपले बेपता हो गये। लोग अपनी लकड़ियाँ घरों में भर लेते हैं। लालाजी ने एक पेड़ ईंधन के लिए मोल लिया था। आज रात को वह भी होली माता के पेट में चला गया। दो-तीन घरों को किवाड़ उतर गये। पटवारी साहब द्वार पर सो रहे थे। उन्हें भूमि पर ढकेलकर लोगे चारपाई ले भागे। चतुर्दिक ईंधन की लूट मची है। जो वस्तु एक बार होली माता के मुख में चली गयी, उसे लाना बड़ा भारी पाप है। पटवारी साहब ने बड़ी धमकियाँ दी। में जमाबन्दी बिगाड़ दूँगा, खसरा झूठ कर दूँगा, पर कुछ प्रभाव न हुआ! यहाँ की प्रथा ही है कि इन दिनों वाले जो वस्तु पा जायें, निर्विध्न उठा ले जायें।

कौन किसकी पुकार करे? नवयुवक पुत्र अपने पिता की आँख बचाकर अपनी ही वस्तु उठवा देता हे। यदि वह ऐसा न करे, तो अपने समाज मे अपमानित समझा जाए।

खेत पक गये हे।,पर काटने में दो सप्ताह का विलम्ब है। मेरे द्वार पर से मीलों का दृश्य दिखाई देता है। गेहूँ और जो के सुथरे खेतों के किनारे-किनारे कुसुम के अरुण और केसर-वर्ण पुष्पों की पंक्ति परम सुहावनी लगती है। तोते चतुर्दिक्‌ मँडलाया करते हें।

माधवी ने यहाँ कई सखियाँ बना रखी हैं। पड़ोस में एक अहीर रहता है। राधा नाम है। गत वर्ष माता-पिता प्लेग के ग्रास हो गये थे। गृहस्थी का कुल भार उसी के सिर पर है। उसकी स्त्री तुलसा प्रायः हमारे यहाँ आती हैं। नख से शिख तक सुन्दरता भरी हुई है। इतनी भोली है कि जो चाहता हे कि घप्टों बातें सुना करूँ। माधवी ने इससे बहिनापा कर रखा है। कल उसकी गुड़ियों का विवाह हैं। तुलसी की गुड़िया है ओर माधवी का गुड्डा। सुनती हूँ, बेचारी बहुत निर्धन है। पर मैंने उसके मुख पर कभी उदासीनता नहीं देखी। कहती थी कि उपले बेचकर दो रुपये जमा कर लिये हैं। एक रुपया दायज दूँगी ओर एक रुपये में बरातियों का खाना-पीना होगा। गुड़ियों के वस्त्राभूषण का भार राधा के सिर हें! केसा सरल संतोषमय जीवन हे!

लो, अब विदा होती हूँ। तुम्हारा समय निरर्थक बातों में नष्ट हुआ। क्षमा करना। तुम्हें पत्र लिखने बेठती हूँ, तो लेखनी रुकती ही नहीं। अभी बहुतेरी बातें लिखने को पड़ी हैं। प्रतापचन्द्र से मेरी पालागन कह देना।

तुम्हारी विरजन


(3)

मझगाँव

प्यारे,

तुम्हारी, प्रेम पत्रिका मिली। छाती से लगायी। वाह!चोरी ओर मुँहजोरी। अपने न आने का दोष मेरे सिर धरते हो? मेरे मन से कोई पूछे कि तुम्हारे दर्शन की उसे कितनी अभिलाषा प्रतिदिन व्याकुलता के रुप में परिणत होती है। कभी-कभी बेसुध हो जाती हूँ। मेरी यह दशा थोड़ी ही दिनों से होने लगी है। जिस समय यहाँ से गये हो, मुझे ज्ञान न था कि वहाँ जाकर मेरी दलेल करोगे। खेर, तुम्हीं सच ओर में ही झूठ। मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई कि तुमने मरे दोनों पत्र पसन्द किये। पर प्रतापचन्द्र को व्यर्थ दिखाये। वे पत्र बड़ी असावधानी से लिखे गये हे। सम्भव हे कि अशुद्धियाँ रह गयी हों। मुझे विश्वास नहीं आता कि प्रताप ने उन्हें मूल्यवान समझा हो। यदि वे मेरे पत्रों का इतना आदर करते हैं कि उनके सहार से हमारे ग्राम्य-जीवन पर कोई रोचक निबन्ध लिख सकें, तो में अपने को परम भाग्यवान्‌ समझती हूँ । कल यहाँ देवीजी की पूजा थी। हल, चक्की, पुर चूल्हे सब बन्द थे। देवीजी की ऐसी ही आज्ञा है। उनकी आज्ञा का उल्लंघन कोन करे? हुक्का-पानी बन्द हो जाए। साल-भर में यही एक दिन है, जिस गाँववाले भी छुट्टी का समझते हैं। अन्यथा होली-दिवाली भी प्रति दिन के आवश्यक कामों को नहीं रोक सकती।

बकरा चढा। हवन हुआ। सत्तू खिलाया गया। अब गाँव के बच्चे-बच्चे को पूर्ण विश्वास है कि प्लेग का आगमन यहाँ न हो सकेगा। ये सब कौतुक देखकर सोयी थी। लगभग बारह बजे होंगे कि सेंकड़ों मनुष्य हाथ में मशालें लिये कोलाहल मचाते निकले और सारे गाँव का फेरा किया। इसका यह अर्थ था कि इस सीमा के भीतर बीमारी पेर न रख सकेगी। फेरे के सप्ताह होने पर कई मनुष्य अन्य ग्राम की सीमा में घुस गये ओर थोड़े फूल,पान, चावल, लॉग आदि पदार्थ पृथ्वी पर रख आये। अर्थात्‌ अपने ग्राम की बला दूसरे गाँव के सिर डाल आये। जब ये लोग अपना कार्य समाप्त करके वहाँ से चलने लगे तो उस गाँववालों को सुनगुन मिल गयी। सेकड़ों मनुष्य लाठियाँ लेकर चढ़ दोड़े। दोनों पक्षवालों में खूब मारपीट हुईं। इस समय गाँव के कई मनुष्य हल्दी पी रहे हें।

आज प्रातःकाल बची-बचायी रस्में पूरी हुई, जिनको यहाँ कढ़ाई देना कहते हैं। मेरे द्वार पर एक भट्ठा खोदा गया ओर उस पर एक कड़ाह दूध से भरा हुआ रखा गया। काशी नाम का एक भर है। वह शरीर में भभूत रमाये आया। गाँव के आदमी टाट पर बेठे। शंख बजने लगा। कड़ाह के चतुर्दिक माला-फूल बिखेर दिये गये। जब कड़ाह में खूब उबाल आया तो काशी झट उठा ओर जय कालीजी की कहकर कड़ाह में कूद पड़ा। में तो समझी अब यह जीवित न निकलेगा। पर पाँच मिनट पश्चात्‌ काशी ने फिर छलाँग मारी ओर कड़ाह के बाहर था। उसका बाल भी बाँका न हुआ। लोगों ने उसे माला पहनायी। वे कर बाँधकर पूछने लगे -- महाराज! अबके वर्ष खेती की उपज केसी होगी? बीमारी अवेगी या नहीं? गाँव के लोग कुशल से रहेंगे? गुड़ का भाव केसा रहेगा? आदि। काशी ने इन सब प्रश्नों के उत्तर स्पष्ट पर किंचित्‌ रहस्यपूर्ण शब्दों में दिये। इसके पश्चात्‌ सभा विसर्जित हुईं। सुनती हूँ ऐसी क्रिया प्रतिवर्ष होती है।

काशी की भविष्यवाणियाँ सब सत्य सिद्ध होती हैं। ओर कभी एकाध असत्य भी निकल जाय तो काशी उनका समाधान भी बड़ी योग्यता से कर देता है। काशी बड़ी पहुँच का आदमी हे। गाँव में कहीं चोरी हो, काशी उसका पता देता है। जो काम पुलिस के भेदियों से पूरा न हो, उसे वह पूरा कर देता हे। यद्यपि वह जाति का भर है तथापि गाँव में उसका बड़ा आदर है। इन सब भक्तियों का पुरस्कार वह मदिरा के अतिरिक्त और कुछ नहीं लेता। नाम निकलवाइये, पर एक बोतल उसको भेंट कीजिये। आपका अभियोग न्यायालय में हैं; काशी उसके विजय का अनुष्ठान कर रहा है। बस, आप उसे एक बोतल लाल जल दीजिये।

होली का समय अति निकट है !एक सप्ताह से अधिक नहीं। अहा! मेरा हृदय इस समय केसा खिल रहा हे? मन में आनन्दफप्रद

गुदगुदी हो रही हे। आँखें तुम्हें देखने के लिए अकुला रही हे। यह सप्ताह बड़ी कठिनाई से कटेगा। तब में अपने पिया के दर्शन पाऊँगी।

तुम्हारी विरजन


(4)

मझगाँव

प्यारे,

तुम पाषाणहृदय हो, कट्टर हो, स्नेह-हीन हो, निर्दय हो, अकरुण हो झूठे हो! में तुम्हें ओर क्‍या गालियाँ दूँ ओर कया कोसूँ? यदि तुम इस क्षण मेरे सम्मुख होते, तो इस वज्हृदयता का उत्तर देती। में कह रही हूँ, तुम दगाबाज हो। मेरा क्या कर लोगे? नहीं आते तो मत आओ । मेरा प्रण लेना चाहते हो, ले लो। रुलाने की इच्छा है, रुलाओ। पर में क्‍यों रोऊँ ! मेरी बला रोवे। जब आपको इतना ध्यान नहीं कि दो घण्टे की यात्रा है, तनिक उसकी सुधि लेता आऊँ, तो मुझे क्‍या पड़ी है कि रोऊँ ओर प्राण खोऊँ? ऐसा क्रोध आ रहा है कि पत्र फाड़कर फेंक दूँ ओर फिर तुमसे बात न करूँ। हाँ ।तुमने मेरी सारी अभिलाषाएँ, केसे धूल में मिलायी हैं?

होली! होली !किसी के मुख से यह शब्द निकला ओर मेरे हृदय में गुदगुदी होने लगी, पर शोक !होली बीत गयी ओर में निराश रह गयी। पहिले यह शब्द सुनकर आनन्द होता था। अब दुःख होता है। अपना-अपना भाग्य है। गाँव के भूखे-नंगे लँगोटी में फाग खेलें, आनन्द मनावें, रंग उड़ावें ओर में अभागिनी अपनी चारपाई पर सफेद साड़ी पहिने पड़ी रहूँ। शपथ लो जो उस पर एक लाल धब्बा भी पड़ा हो। शपथ लें लो जो मेंने अबीर ओर गुलाल हाथ से छुई भी हो। मेरी इन्र से बनी हुई अबीर, केवड़े में घोली गुलाल, रचकर बनाये हुए पान सब तुम्हारी अकृपा का रोना रो रहे हैं। माधवी ने जब बहुत हठ की, तो मेंने एक लाल टीका लगवा लिया। पर आज से इन दोषारोपणों का अन्त होता है। यदि फिर कोई शब्द दोषारोपण का मुख से निकला तो जबान काट लूँगी।

परसों सायंकाल ही से गाँव में चहल-पहल मचने लगी। नवयुवकों का एक दल हाथ में डफ लिये, अश्लील शब्द बकते द्वार-द्वार फेरी लगाने लगा। मुझे ज्ञान न था कि आज यहाँ इतनी गालियाँ खानी पड़ेगी। लज्जाहीन शब्द उनके मुख से इस प्रकार बेधड़क निकलते थे जैसे फूल झड़ते हों। लज्जा ओर संकोच का नाम न था। पिता, पुत्र के सम्मुख और पुत्र, पिता के सम्मुख गालियाँ बक रहे थे। पिता ललकार कर पृत्र-वधू से कहता है --

आज होली हे! वधू घर में सिर नीचा किये हुए सुनती है और मुस्करा देती है। हमारे पटवारी साहब तो एक ही महात्मा निकले। आप मदिरा में मस्त, एक मेली-सी टोपी सिर पर रखे इस दल के नायक थे। उनकी बहू-बेटियाँ उनकी अश्लीलता के वेग से न बच सकीं। गालियाँ खाओ ओर हँसो। यदि बदन पर तनिक भी मेल आये, तो लोग समझेंगे कि इसका मुहर्रम का जन्म हैं भली प्रथा है।

लगभग तीन बजे रात्रि के झुण्ड होली माता के पास पहुँचा। लड़के अग्नि-कीड़ादि में तत्पर थे। में भी कई स्त्रियों के पास गयी, वहाँ स्त्रियाँ एक ओर होलियाँ गा रही थीं। निदान होली म आग लगाने का समय आया। अग्नि लगते ही ज्वाल भड़की और सारा आकाश स्वर्ण-वर्ण हो गया। दूर-दूर तक के पेड़-पत्ते प्रकाशित हो गय। अब इस अग्नि-राशि के चारों ओर 'होली माता की जय! चिल्ला कर दोड़ने लगे। सबके हाथों में गेहूँ ओर जो की बालियाँ थी, जिसको वे इस अग्नि में फेंकते जाते थे।

जब ज्वाला बहुत उत्तेजित हुई, तो लेग एक किनारे खड़े होकर 'कबीर' कहने लगे। छः घण्टे तक यही दशा रही। लकड़ी के कुन्दों से चटाक-पटाक के शब्द निकल रहे थे। पशुगण अपने- अपने खूँटों पर भय से चिल्‍ला रहे थे। तुलसा ने मुझसे कहा -- अब की होली की ज्वाला टेढ़ी जा रही है। कुशल नहीं। जब ज्वाला सीधी जाती हे, गाँव में साल-भर आनन्द की बधाई बजती है। परन्तु ज्वाला का टेढ़ी होना अशुभ है निदान लपट कम होने लगी। आँच की प्रखरता मन्द हुई।

तब कुछ लोग होली के निकट आकर ध्यानपूर्वक देखने लगे। जेसे कोई वस्तु ढूँढ रहे हों। तुलसा ने बतलाया कि जब बसन्‍्त के दिन होली नींव पड़ती है, तो पहिले एक एरण्ड गाड़ देते हैं। उसी पर लकड़ी और उपलों का ढेर लगाया जाता है। इस समय लोग उस एरण्ड के पोधे का ढूँढ रहे हैं। उस मनुष्य की गणना वीरों में होती है जो सबसे पहले उस पौधे पर ऐसा लक्ष्य करे कि वह टूट कर दूज जा गिर। प्रथम पटवारी साहब पेंतरे बदलते आये,पर दस गज की दूरी से झाँककर चल दिये। तब राधा हाथ में एक छोटा-सा सोंटा लिये साहस ओर दृढ़तापूर्वक आगे बढ़ा और आग में घुस कर वह भरपूर हाथ लगाया कि पोधा अलग जा गिरा। लोग उन टुकड़ों को लूटने लगे। माथे पर उसका टीका लगाते हैं और उसे शुभ समझते हें।

यहाँ से अवकाश पाकर पुरुष-मण्डली देवीजी के चबूतरे की ओर बढ़ी। पर यह न समझना, यहाँ देवीजी की प्रतिष्ठा की गई होगी। आज वे भी गालियाँ सुनना पसन्द करती है। छोटे-बड़े सब उन्हें अश्लील गालियाँ सुना रहे थे। अभी थोड़े दिन हुए उन्हीं देवीजी की पूजा हुई थी। सच तो यह हे कि गाँवों में आजकल ईश्वर को गाली देना भी क्षम्य है। माता-बहिनों की तो कोई गणना नहीं।

प्रभात होते ही लाला ने महाराज से कहा -- आज कोई दो सेर भंग पिसवा लो। दो प्रकार की अलग-अलग बनवा लो। सलोनी आ मीठी। महारा ज निकले और कई मनुष्यों को पकड़ लाये। भांग पीसी जाने लगी। बहुत से कुल्हड़ मँगाकर क्रमपूर्वक रखे गये। दो घड़ों में दोनो प्रकार की भांग रखी गयी। फिर क्‍या था, तीन-चार घण्टों तक पियक्कड़ों का ताँता लगा रहा। लोग खूब बखान करते थे ओर गर्दन हिला-हिलाकर महाराज की कुशलता की प्रशंसा करते थे। जहाँ किसी ने बखान किया कि महाराज ने दूसरा कुल्हड़ भरा बोले -- ये सलोनी है। इसका भी स्वाद चख लो। अजी पी भी लो। क्‍या दिन-दिन होली आयेगी कि सब दिन हमारे हाथ की बूटी मिलेगी? इसके उत्तर में किसान ऐसी दृष्टि से ताकता था, मानो किसी ने उसे संजीवन रस दे दिया ओर एक की जगह तीन-तीन कुल्हड़ चट कर जाता। पटवारी के जामाता मुंशी जगदम्बा प्रसाद साहब का शुभागमन हुआ है। आप कच्हरी में अरायजनवीस हैं। उन्हें महाराज ने इतनी पिला दी कि आपे से बाहर हो गये ओर नाचने-कूदने लगे। सारा गाँव उनसे पदोरी करता था।

एक किसान आता है और उनकी ओर मुस्कराकर कहता है -- तुम यहाँ ठाढ़ी हो, घर जाके भोजन बनाओ, हम आवत हैें। इस पर बड़े जोर की हँसी होती है, काशी भर मद में माता लट्टा कन्धे पर रखे आता और सभास्थित जनों की ओर बनावटी क्रोध से देखकर गरजता है -- महाराज, अच्छी बात नहीं है कि तुम हमारी नयी बहुरिया से मजा लूटते हो। यह कहकर मुंशीजी को छाती से लगा लेता है।

मुंशीजी बेचारे छोटे कद के मनुष्य, इधर-उधर फड़फड़ाते हें, पर नक्कारखाने मे तूती की आवाज कोन सुनता हे? कोई उन्हें प्यार करता है ओर ग़ले लगाता है। दोपहर तक यही छेड़-छाड़ हुआ की। तुलसा अभी तक बेठी हुई थी। मेंने उससे कहा -- आज हमारे यहाँ तुम्हारा न्योता है। हम तुम संग खायेंगी। यह सुनते ही महराजिन दो थालियों में भोजन परोसकर लायी। तुलसा इस समय खिड़की की ओर मुँह करके खड़ी थी। मैंने जो उसको हाथ पकड़कर अपनी और खींचा तो उसे अपनी प्यारी-प्यारी आँखों से मोती के सोने बिखेरते हुए पाया। में उसे गले लगाकर बोली -- सखी सच-सच बतला दो, क्यों रोती हो? हमसे कोई दुराव मत रखो। इस पर वह ओर भी सिसकने लगी। जब मेंने बहुत हठ की, उसने सिर घुमाकर कहा -- बहिन! आज प्रातःकाल उन पर निशान पड़ गया। न जाने उन पर क्‍या बीत रही होगी। यह कहकर वह फूट-फूटकर रोने लगी। ज्ञात हुआ कि राधा के पिता ने कुछ ऋण लिया था। वह अभी तक चुका न सका था।

महाजन ने सोचा कि इसे हवालात ले चलूँ तो रुपये वसूल हो जायें। राधा कन्नी काटता फिरता था। आज द्वेषियों को अवसर मिल गया ओर वे अपना काम कर गये। शोक !मूल धन रुपये से अधिक न था। प्रथम मुझ ज्ञात होता तो बेचारे पर त्योहार के दिन यह आपत्ति न आने पाती। मैंने चुपके से महाराज को बुलाया ओर उन्हें बीस रुपये देकर राधा को छुड़ाने के लिये भेजा।

उस समय मेरे द्वार पर एक टाट बिछा दिया गया था। लालाजी मध्य में कालीन पर बेठे थे। किसान लोग घुटने तक धोतियाँ बाँधे, कोई कुर्ता पहिने कोई नग्न देह, कोई सिर पर पगड़ी बाँधे ओर नंगे सिर, मुख पर अबीर लगाये -- जो उनके काले वर्ण पर विशेष छुटा दिखा रही थी -- आने लगे। जो आता, लालाजी के पेंरों पर थोड़ी-सी अबीर रख देता। लालाली भी अपने तश्तरी में से थोड़ी-सी अबीर निकालकर उसके माथे पर लगा देते ओर मुस्कुराकर कोई दिल्‍लगी की बात कर देते थे। वह निहाल हो जाता, सादर प्रणाम करता ओर ऐसा प्रसन्न होकर आ बेठता, मानो किसी रंक ने रत्न-राशि पायी है। मुझे स्वप्न में भी ध्यान न था कि लालाजी इन उजड्ड देहातियों के साथ बेठकर ऐसे आनन्द से वार्तालाप कर सकते हैं। इसी बीच में काशी भर आया। उसके हाथ में एक छोटी-सी कटोरी थी। वह उसमें अबीर लिए हुए था।

उसने अन्य लोगों की भाँति लालाजी के चरणों पर अबीर नहीं रखी, किंतु बड़ी धृष्टता से मुट्टीभर लेकर उनके मुख पर भली-भाँति मल दी। में तो डरी, कहीं लालाजी रुष्ट न हो जाय॑ँ। पर वह बहुत प्रसन्न हुए ओर स्वयं उन्होंने भी एक टीका लगाने के स्थान पर दोनों हाथों से उसके मुख पर अबीर मली। उसके सी उसकी ओर इस दृष्टि से देखते थे कि निस्संदेह तू वीर हे ओर इस योग्य है कि हमारा नायक बने। इसी प्रकार एक-एक करके दो-ढाई सो मनुष्य एकत्र हुए ! अचानक उन्होंने कहा -- आज कहीं राधा नहीं दीख पड़ता, क्या बात है? कोई उसके घर जाके देखा तो। मुंशी जगदम्बा प्रसाद अपनी योग्यता प्रकाशित करने का अच्छा अवसर देखकर बोले उठे -- हजूर वह दफा 43 नं. अलिफ ऐक्ट (आ) में गिरफ्तार हो गया। रामदीन पांडे ने वारण्ट जारी करा दिया। हरीच्छा से रामदीन पांडे भी वहाँ बेठे हुए थे। लाला ने उनकी ओर परम तिरस्कार दृष्टि से देखा और कहा -- क्‍यों पांडेजी, इस दीन को बन्दीगृह में बन्द करने से तुम्हारा घर भर जायगा? यही मनुष्यता और शिष्टता अब रह गयी है। तुम्हें तनिक भी दया न आयी कि आज होली के दिन उसे स्त्री ओर बच्चों से अलग किया। में तो सत्य कहता हूँ कि यदि में राधा होता, तो बन्दीगृह से लोटकर मेरा प्रथम उद्योग यही होता कि जिसने मुझे यह दिन दिखाया हे, उसे में भी कुछ दिनों हलदी पिलवा दूँ।

तुम्हें लाज नहीं आती कि इतने बड़े महाजन होकर तुमने बीस रुपये के लिए एक दीन मनुष्य को इस प्रकार कष्ट में डाला। डूब मरना था ऐसे लोभ पर! लालाजी को वस्तुतः क्रोध आ गया था। रामदीन ऐसा लज्जित हुआ कि सब सिट्टी- पिट्टी भूल गयी। मुख से बात न निकली। चुपके से न्यायालय की ओर चला। सब-के-सब कृषक उसकी ओर क्रोध-पूर्ण दृष्टि से देख रहे थे। यदि लालाजी का भय न होता तो पांडेजी की हडडी-पसली वहीं चूर हो जाती।

इसके पश्चात लोगों ने गाना आरम्भ किया। मद में तो सब-के- सब गाते ही थे, इस पर लालाजी के भ्रातृ-भाव के सम्मान से उनके मन ओर भी उत्साहित हो गये। खूब जी तोड़कर गाया। डफें तो इतने जोर से बजती थीं कि अब फर्टी और तब फर्टी। जगदम्बाप्रसाद ने दुहरा नशा चढ़ाया था। कुछ तो उनके मन में स्वतः उमंग उत्पन्न हुई, कुछ दूसरों ने उत्तेजना दी। आप मध्य सभा में खड़ा होकर नाचने लगे; विश्वास मानो, नाचने लग। मेंने अचकन, टोपी, धोती ओर मूँछोंवाले पुरुष को नाचते न देखा था। आध घण्टे तक वे बन्दरों की भाँति उछलते-कूदते रहे। निदान मद ने उन्हें पृथ्वी पर लिटा दिया। तत्पश्चात्‌ एक और अहीर उठा। एक अहीरिन भी मण्डली से निकली ओर दोनों चोक में जाकर नाचने लगे। दोनों नवयुवक फुर्तीले थे। उनकी कमर ओर पीठ की लचक विलक्षण थी।

उनके हाव-भाव, कमर का लचकना, रोम-रोम का फड़कना, गर्दन का मोड़, अंगों का मरोड़ देखकर विस्मय होता था। बहुत अभ्यास और परिश्रम का कार्य है।

अभी यहाँ नाच हो ही रहा था कि सामने बहुत-से मनुष्य लंबी- लंबी लाठियाँ कन्‍्धों पर रखे आते दिखायी दिये। उनके संग डफ भी था। कई मनुष्य हाथों से झाँस ओर मर्जीरे लिये हुए थे। वे गाते-बजाते आये और हमारे द्वार पर रुके। अकस्मात तीन-चार मनुष्यों ने मिलकर ऐसे आकाशभेदी शब्दों में 'अररर...कबीर' की ध्वनि लगायी कि घर काँप उठा। लालाजी निकले। ये लोग उसी गाँव के थे, जहाँ निकासी के दिन लाठियाँ चली थीं। लालाजी को देखते ही कई पुरुषों ने उनके मुख पर अबीर मला। लालाजी ने भी प्रत्युत्तर दिया। फिर लोग फर्श पर बेठा। इलायची ओर पान से उनका सम्मान किया। फिर गाना हुआ। इस गाँववालों ने भी अबीर मलीं और मलवायी। जब ये लोग बिदा होने लगे, तो यह होली गायी --

“सदा आनन्द रहे हि द्वारे मोहन खेलें होरी।'

कितना सुहावना गीत हे! मुझे तो इसमें रस ओर भाव कूट-कूटकर भारा हुआ प्रतीत होता है। होली का भाव कैसे साधारण ओर संक्षिप्त शब्दों में प्रकट कर दिया गया है। में बारम्बार यह प्यारा गीत गाती हूँ, आनन्द लूटती हूँ। होली का त्योहार परस्पर प्रेम ओर मेल बढ़ाने के लिए है। सम्भव सन था कि वे लोग, जिनसे कुछ दिन पहले लाठियाँ चली थीं, इस गाँव में इस प्रकार बेधड़क चले आते। पर यह होली का दिन हे। आज किसी को किसी से द्रेष नहीं है। आज प्रेम ओर आनन्द का स्वराज्य है। आज के दिन यदि दुखी हो तो परदेशी बालम की अबला। रोवे तो युवती विधवा! इनके अतिरिक्त और सबके लिए आनन्द की बधाई हे। सन्ध्या-समय गाँव की सब स्त्रियाँ हमारे यहाँ खेलने आयीं।

माताजी ने उन्हें बड़े आदर से बेठाया। रंग खेला, पान बाँटा। में मारे भय के बाहर न निकली। इस प्रकार छुट्टी मिली। अब मुझे ध्यान आया कि माधवी दोपहर से गायब है। मैंने सोचा था शायद गाँव में होली खेलने गयी हो। परन्तु इन स्त्रियों के संग न थी। तुलसा अभी तक चुपचाप खिड़की की ओर मुँह किये बेठी थी। दीपक में बत्ती पड़ी रही थी कि वह अकस्मात्‌ उठी, मेरे चरणों पर गिर पड़ी ओर फूट-फूटकर रोने लगी। मैंने खिड़की की ओर झाँका तो देखती हूँ कि आगे-आगे महाराज, उसके पीछे राधा ओर सबसे पीछे रामदीन पांडे चल रहे हैं। गाँव के बहुत से आदमी उनके संग है। राधा का बदन कुम्हलाया हुआ है। लालाजी ने ज्योंही सुना कि राधा आ गया, चट बाहर निकल आये ओर बड़े स्नेह से उसको कण्ठ से लगा लिया, जैसे कोई अपने पुत्र का गले से लगाता है।

राधा चिल्ला-चिल्लाकर के चरणों में गिर पड़ी। लालाजी ने उसे भी बड़े प्रेम से उठाया। मेरी आँखों में भी उस समय आँसू न रुक सके। गाँव के बहुत से मनुष्य रो रहे थे। बड़ा करुणापूर्ण दृश्य था। लालाजी के नेत्रों में मेंने कभी आँसू ने देखे थे। वे इस समय देखे। रामदीन पाण्डेय मस्तक झुकाये ऐसा खड़ा था, माना गौ-हत्या की हो। उसने कहा -- मेरे रुपये मिल गये, पर इच्छा है, इनसे तुलसा के लिए एक गाय ले दूँ। राधा ओर तुलसा दोनों अपने घर गये। परन्तु थोड़ी देर में तुलसा माधवी का हाथ पकड़े हँसती हुई मरे घर आयी बोली -- इनसे पूछी, ये अब तक कहाँ थीं?

मैं -- कहाँ थी? दोपहर से गायब हो?

माधवी -- यहीं तो थी।

मैं -- यहाँ कहाँ थीं? मैंने तो दोपहर से नहीं देखा। सच-सच बता दो मैं रुष्ट न होऊँगी।

माधवी -- तुलसा के घर तो चली गयी थी।

मैं -- तुलसा तो यहाँ बेठी है, वहाँ अकेली क्‍या सोती रहीं?

तुलसा -- (हँसकर) सोती काहे को जागती रह। भोजन बनाती रही, बरतन चोका करती रही।

माधवी -- हाँ, चोका-बरतर करती रही। कोई तुम्हारा नोकर लगा हुआ है न!

ज्ञात हुआ कि जब मेंने महाराज को राधा को छुड़ाने के लिए भेजा था, तब से माधवी तुलसा के घर भोजन बनाने में लीन रही। उसके किवाड़ खोले। यहाँ से आटा, घी, शक्कर सब ले गयी। आग जलायी ओर पूड़ियाँ, कचोड़ियाँ, गुलगुले और मीठे समोसे सब बनाये। उसने सोचा था कि में यह सब बताकर चुपके से चली जाऊँगी। जब राधा ओर तुलसा जायेंगे, तो विस्मित होंगे कि कोन बना गया! पर स्यात्‌ विलम्ब अधिक हो गया ओर अपराधी पकड़ लिया गया। देखा, केसी सुशीला बाला हे। अब विदा होती हूँ। अपराध क्षमा करना। तुम्हारी चेरी हूँ जेसे रखोगे वेसे रहूँगी। यह अबीर ओर गुलाल भेजती हूँ। यह तुम्हारी दासी का उपहार हे। तुम्हें हमारी शपथ मिथ्या सभ्यता के उमंग में आकर इसे फेंक न देना, नहीं तो मेरा हृदय दुखी होगा।

तुम्हारी, विरजन


(5)

मझगाँव

प्यारे!

तुम्हारे पत्र ने बहुत रुलाया। अब नहीं रहा जाता। मुझे बुला लो। एक बार देखकर चली आऊँगी। सच बताओ, यदि में तुम्हारे यहाँ आ जाऊँ, तो हँसी तो न उड़ाओगे? न जाने मन मे क्या समझोगे? पर केसे आऊँ? तुम लालाजी को लिखो खूब! कहेंगे यह नयी धुन समायी हे।

कल चारपाई पर पड़ी थी। भोर हो गया था,शीतल मन्द पवन चल रहा था कि स्त्रियाँ गाने का शब्द सुनायी पड़ा। स्त्रियाँ अनाज का खेत काटने जा रही थीं। झाँककर देखा तो दस-दस बारह-बारह स्त्रियों का एक-एक गोल था। सबके हाथों में हंसिया, कन्धों पर गठियाँ बाँधने की रस्सी ओर सिर पर भुने हुए मटर की छबड़ी थी। ये इस समय जाती हें, कहीं बारह बजे लोटेंगी। आपस में गाती, चुहुलें करती चली जाती थीं।

दोपहर तक बड़ी कुशलता रही। अचानक आकाश मेघाच्छ॒न्न हो गया। आँधी आ गयी ओर ओले गिरने लगे। मेंने इतने बड़े ओले गिरते न देखे थे। आलू से बड़े ओर ऐसी तेजी से गिरि जैसे बन्दूक से गोली। क्षण-भर में पृथ्वी पर एक फुट ऊँचा बिछावन बिछ गया। चारों तरफ से कृषक भागने लगे। गायें, बकरियाँ, भेड़े सब चिल्लाती हुई पेड़ों की छाया ढूँढ़ती, फिरती थीं। में डरी कि न-जाने तुलसा पर क्‍या बीती। आँखें फेलाकर देखा तो खुले मैदान में तुलसा, राधा ओर मोहिनी गाय दीख पड़ीं। तीनों घमासान ओले की मार में पड़े थे! तुलसा के सिर पर एक छोटी- सी टोकरी थी ओर राधा के सिर पर एक बड़ा-सा गट्टा। मेरे नेत्रों में आँसू भर आये कि न जाने इन बेचारों की क्‍या गति होगी। अकस्मात एक प्रखर झोंके ने राधा के सिर से गट्टा गिरा दिया। गट्टा का गिरना था कि चट तुलसा ने अपनी टोकरी उसके सिर पर ऑंधा दी। न-जाने उस पुष्प ऐसे सिर पर कितने ओले पड़े। उसके हाथ कभी पीठ पर जाते, कभी सिर सहलाते। अभी एक सेकेण्ड से अधिक यह दशा न रही होगी कि राधा ने बिजली की भाँति लपककर ग॒द्ठा उठा लिया और टोकरी तुलसा को दे दी। केसा घना प्रेम हे!

अनर्थकारी दुर्देव ने सारा खेल बिगाड़ दिया ! प्रातःकाल स्त्रियाँ गाती हुई जा रही थीं। सन्ध्या को घर-घर शोक छाया हुआ था। कितना के सिर लहूलुहान हो गये, कितने हल्दी पी रहे हैं। खेती सत्यानाश हो गयी। अनाज बर्फ के तले दब गया। ज्वर का प्रकोप हैं सारा गाँव अस्पताल बना हुआ है। काशी भर का भविष्य प्रवचन प्रमाणित हुआ। होली की ज्वाला का भेद प्रकट हो गया। खेती की यह दशा ओर लगान उगाहा जा रहा है।

बड़ी विपत्ति का सामना है। मार-पीट, गाली, अपशब्द सभी साधनों से काम लिया जा रहा है। दोनों पर यह देवी कोप!

तुम्हारी विरजन


(6)

मझगाँव

मेरे प्राणाधिक प्रियतम,

पूरे पन्द्रह दिन के पश्चात्‌ तुमने विरजन की सुधि ली। पत्र को बारम्बार पढ़ा। तुम्हारा पत्र रुलाये बिना नहीं मानता। में यों भी बहुत रोया करती हूँ। तुमको किन-किन बातों की सुधि दिलाऊँ? मेरा हृदय निर्बल हे कि जब कभी इन बातों की ओर ध्यान जाता है तो विचित्र दशा हो जाती है। गर्मी-सी लगती हे। एक बड़ी व्यग्र करने वाली, बड़ी स्वादिष्ट, बहुत रुलानेवाली, बहुत दुराशापूर्ण बेदना उत्पन्न होती है। जानती हूँ कि तुम नहीं आ रहे ओर नहीं आओगे; पर बार-बार जाकर खड़ी हो जाती हूँ कि आ तो नहीं गये।

कल सायंकाल यहाँ एक चित्ताकर्षक प्रहसन देखने में आया। यह धोबियों का नाच था। पन्द्रह-बीस मनुष्यों का एक समुदाय था। उसमे एक नवयुवक श्वेत पेशवाज पहिने, कमर में असंख्य घंटियाँ बाँधे, पाँव में घुँघरू पहिने, सिर पर लाल टोपी रखे नाच रहा था। जब पुरुष नाचता था तो मृदंग बजने लगती थी। ज्ञात हुआ कि ये लोग होली का पुरस्कार माँगने आये हैं। यह जाति पुरस्कार खूब लेती है। आपके यहाँ कोई काम-काज पड़े उन्हें पुरस्कार दीजिये; ओर उनके यहाँ कोई काम-काज पड़े, तो भी उन्हें पारितोषिक मिलना चाहिए। ये लोग नाचते समय गीत नहीं गाते। इनका गाना इनकी कविता है। पेशवाजवाला पुरुष मृदंग पर हाथ रखकर एक विरहा कहता है। दूसरा पुरुष सामने से आकर उसका प्रत्युत्तर देता है ओर दोनों तत्क्षण वह विरहा रचते हें। इस जाति में कवित्व-शक्ति अत्यधिक है।

इन विरहों को ध्यान से सुनो तो उनमें बहुधा उत्तम कवित्व भाव प्रकट किये जाते हें। पेशवाजवाले पुरुषों ने प्रथम जो विरहा कहा था, उसका यह अर्थ कि ऐ धोबी के बच्चों! तुम किसके द्वार पर आकर खड़े हो? दूसरे ने उत्तर दिया -- अब न अकबर शाह है न राजा भोज, अब जो हें हमारे मालिक हें उन्हीं से माँगो। तीसरे विरहा का अर्थ यह हे कि याचकों की प्रतिष्ठा कम होती है अतएव कुछ मत माँगो, गा- बजाकर चले चलो, देनेवाला बिन माँगे ही देगा। घण्टे-भर से ये लोग विरहे कहते रहे। तुम्हें प्रतीति न होगी, उनके मुख से विरहे इस प्रकार बेधड़क निकलते थे कि आश्चर्य प्रकट होता था। स्यात इतनी सुगमता से वे बातें भी न कर सकते हों। यह जाति बड़ी पियक्कड़ है। मदिरा पानी की भाँति पीती है। विवाह में मदिरा गोने में मदिरा, पूजा-पाठ में मदिरा। पुरस्कार माँगेंगे तो पीने के लिए। धुलाई माँगेंगे तो यह कहकर कि आज पीने के लिए पैसे नहीं हैं। विदा होते समय बेचू धोबी ने जो विरहा कहा था, वह काव्यालंकार से भरा हुआ हे।

तुम्हारा परिवार इस प्रकार बढ़े जेसे गंगा जी का जल। लड़के फूलें-फलें, जेसे आम का बोर। मालकिन को सोहाग सदा बना रहे, जेसे दूब की हरियाली। केसी अनोखी कविता हे।

तुम्हारी विरजन


(7)

मझगाँव

प्यारे,

एक सप्ताह तक चुप रहने की क्षमा चाहती हूँ। मुझे इस सप्ताह में तनिक भी अवकाश न मिला। माधवी बीमार हो गयी थी।

पहले तो कुनेन को कई पुड़ियाँ खिलायी गयीं पर जब लाभ न हुआ ओर उसकी दशा ओर भी बुरी होने लगी तो, दिहलूराय वेद्य बुलाये गये। कोई पचास वर्ष की आयु होगी। नंगे पाँव सिर पर एक पगड़ी बाँधे, कन्धे पर अंगोछा रखे, हाथ में मोटा-सा सोटा लिये द्वार पर आकर बेठ गये। घर के जमीदार हें, पर किसी ने उनके शरीर मे मिजई तक नहीं देखी। उन्हें इतना अवकाश ही नहीं कि अपने शरीर-पालन की ओर ध्यान दे। इस मंडल में आठ-दस कोस तक के लोग उन पर विश्वास करते हैं। न वे हकीम को लाने, न डाक्टर को। उनके हकीम-डाक्टर जो कुछ हें वे दिहलूराय है। सन्देशा सुनते ही आकर द्वार पर बैठ गये। डाक्टरों की भाँति नहीं की प्रथम सवारी माँगेंगे -- वह भी तेज जिसमें उनका समय नष्ट न हो। आपके घर ऐसे बेठे रहेंगे, मानों गूँगे का गुड़ खा गये हैं। रोगी को देखने जायेंगे तो इस प्रकार भागेंगे मानो कमरे की वायु में विष भरा हुआ है। रोग परिचय ओर ओषधि का उपचार केवल दो मिनट में समाप्त। दिहलूराय डाक्टर नहीं हैं -- पर जितने मनुष्यों को उनसे लाभ पहुँचता हें, उनकी संख्या का अनुमान करना कठिन है। वह सहानुभूति की मूर्ति है। उन्हें देखते ही रोगी का आधा रोग दूर हो जाता हे। उनकी ओषधियाँ ऐसी सुगम ओर साधारण होती हें कि बिना पैसा- कोौड़ी मनों बटोर लाइए। तीन ही दिन में माधवी चलने -- फिरने लगी। वस्तुतः उस वैद्य की ओषधि में चमत्कार है।

यहाँ इन दिनों मुगलिये ऊधम मचा रहे हैं। ये लोग जड़े में कपड़े उधार दे देते हें ओर चेत में दाम वसूल करते हैं। उस समय कोई बहाना नहीं सुनते। गाली-गलोज मार-पीट सभी बातों पर उतरा आते हैं। दो-तीन मनुष्यों को बहुत मारा। राधा ने भी कुछ कपड़े लिये थे। उनके द्वार पर जाक सब-के-सब गालियाँ देने लगे। तुलसा ने भीतर से किवाड़ बन्द कर दिये। जब इस प्रकार बस न चला, तो एक मोहनी गाय को खूँटे से खोलकर खींचते हुए ले चला। इतने में राधा दूर से आता दिखाई दिया। आते ही आते उसने लाठी का वह हाथ मारा कि एक मुगलिये की कलाई लटक पड़ी। तब तो मुगलिये कुपित हुए, पेंतरे बदलने लगे। राधा भी जान पर खेन गया ओर तीन दुष्टों को बेकार कर दिया। इतने काशी भर ने आकर एक मुगलिये की खबर ली। दिहलूराय को मुगलियों से चिढ़ है। साभिमान कहा करते हैं कि मैंने इनके इतने रुपये डुबा दिये इतनों को पिटवा दिया कि जिसका हिसाब नहीं। यह कोलाहल सुनते ही वे भी पहुँच गये। फिर तो सैकड़ों मनुष्य लाठियाँ ले-लेकर दोड़ पड़े। उन्होंने मुगलियों की भली-भाँति सेवा की। आशा है कि इधर आने का अब साहस न होगा।

अब तो मई का मास भी बीत गया। क्‍यों अभी छुट्टी नहीं हुई? रात-दिन तुम्हारे आने की प्रतीक्षा है। नगर में बीमारी कम हो गई है। हम लोग बहुत शीघ्र यहाँ से चले जायँगे। शोक !तुम इस गाँव की सैर न कर सकोगे।

तुम्हारी विरजन

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "वरदान." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1921, https://munshipremchand.com/works/novels/vardan. Accessed 22 Sep. 2026.