सामाजिक टिप्पणी

Social Commentary

समाज, जाति व्यवस्था और सामाजिक असमानता पर तीखा प्रहार करती प्रेमचंद की कहानियाँ

इस संग्रह में कुल 8 रचनाएँ शामिल हैं
मुंशी प्रेमचंद कृत सभ्यता का रहस्य का कवर इमेज
कहानी1925

सभ्यता का रहस्य

Sabhyata Ka Rahasya

प्रेमचंद की 'सभ्यता का रहस्य' सभ्यता की प्रचलित परिभाषा पर तीखा व्यंग्य है। राय रतनकिशोर जैसे प्रभावशाली अधिकारी और उनके गरीब नौकर दमड़ी के माध्यम से प्रेमचंद दिखाते हैं कि समाज में सभ्यता अक्सर नैतिकता से नहीं, बल्कि धन, पद, प्रतिष्ठा और अपने अपराधों पर पर्दा डालने की क्षमता से तय होती है।

21 मिनट
मुंशी प्रेमचंद कृत मंदिर और मस्जिद का कवर इमेज
कहानी

मंदिर और मस्जिद

Mandir Aur Masjid

प्रेमचंद की कहानी 'मंदिर और मस्जिद' सांप्रदायिक सौहार्द, धार्मिक सहिष्णुता और दुखद बलिदान की एक मार्मिक कथा है जिसमें चौधरी इतरत अली और उनके वफादार सेवक भजनसिंह का वृत्तांत है।

31 मिनट
मुंशी प्रेमचंद कृत शूद्रा का कवर इमेज
विशेष
कहानी1926

शूद्रा

Shudra

प्रेमचंद की 'शूद्रा' प्रवासी भारतीयों, गिरमिटिया मजदूरी, स्त्री की असुरक्षा और औपनिवेशिक शोषण की अत्यंत मार्मिक कहानी है। गरीब युवती गौरा का पति मंगरू वर्षों पहले बिना बताए घर छोड़कर चला जाता है। एक दिन एक बूढ़ा ब्राह्मण यह झूठ बोलकर गौरा को अपने साथ ले जाता है कि मंगरू ने उसे बुलाया है। गौरा पति से मिलने की आशा में कलकत्ता पहुँचती है और वहाँ से जहाज द्वारा मॉरिशस भेज दी जाती है। वहाँ उसे पता चलता है कि मंगरू स्वयं गिरमिटिया मजदूर के रूप में बंधा हुआ है और भारतीय मजदूरों तथा स्त्रियों का भयंकर शोषण होता है। जब एक अंग्रेज अधिकारी गौरा को अपने अधिकार में लेना चाहता है और उसके प्रतिरोध पर मंगरू को बुरी तरह पीटता है, तब गौरा अपने पति को बचाने के लिए स्वयं को बलिदान करने को तैयार हो जाती है। कहानी प्रवासी मजदूरों को बहकाकर विदेश ले जाने वाली व्यवस्था, औपनिवेशिक सत्ता की हिंसा और स्त्री के शरीर पर अधिकार जमाने की मानसिकता को उजागर करती है।

54 मिनट
मुंशी प्रेमचंद कृत सवा सेर गेहूँ का कवर इमेज
कहानी1924

सवा सेर गेहूँ

Sava Ser Gehun

प्रेमचंद की 'सवा सेर गेहूँ' ग्रामीण ऋण-व्यवस्था, सूदखोरी, किसान-शोषण और बंधुआ मजदूरी पर तीखा प्रहार करने वाली कहानी है। गरीब किसान शंकर एक साधु अतिथि को भोजन कराने के लिए केवल सवा सेर गेहूँ उधार लेता है। बाद में वह खलिहानी में उससे अधिक अनाज दे भी देता है, लेकिन महाजन उस उधार को अपने बही-खाते में जीवित रखता है। सात वर्ष बाद वही छोटा-सा ऋण साढ़े पाँच मन गेहूँ और फिर साठ रुपये के दस्तावेजी कर्ज में बदल जाता है। बढ़ते ब्याज के कारण शंकर अंततः जीवन-भर के लिए बंधुआ मजदूर बन जाता है और उसकी मृत्यु के बाद वही कर्ज उसके बेटे पर डाल दिया जाता है। प्रेमचंद दिखाते हैं कि गरीबी, अशिक्षा, धार्मिक भय और शोषणकारी ऋण-व्यवस्था मिलकर एक मामूली उधार को पीढ़ी-दर-पीढ़ी गुलामी में बदल सकती है।

22 मिनट