रंगभूमि
Rangbhoomi
प्रेमचंद का महाकाव्यात्मक उपन्यास 'रंगभूमि' सूरदास नामक एक अंधे भिखारी की कहानी है जो अंग्रेज़ी औद्योगीकरण का विरोध करता है।
Social Commentary
समाज, जाति व्यवस्था और सामाजिक असमानता पर तीखा प्रहार करती प्रेमचंद की कहानियाँ
Rangbhoomi
प्रेमचंद का महाकाव्यात्मक उपन्यास 'रंगभूमि' सूरदास नामक एक अंधे भिखारी की कहानी है जो अंग्रेज़ी औद्योगीकरण का विरोध करता है।
Nasha
प्रेमचंद की कहानी 'नशा' में एक गरीब छात्र अपने अमीर दोस्त की जागीर में जाकर धन-सत्ता के नशे में चूर हो जाता है।
Sabhyata Ka Rahasya
प्रेमचंद की 'सभ्यता का रहस्य' सभ्यता की प्रचलित परिभाषा पर तीखा व्यंग्य है। राय रतनकिशोर जैसे प्रभावशाली अधिकारी और उनके गरीब नौकर दमड़ी के माध्यम से प्रेमचंद दिखाते हैं कि समाज में सभ्यता अक्सर नैतिकता से नहीं, बल्कि धन, पद, प्रतिष्ठा और अपने अपराधों पर पर्दा डालने की क्षमता से तय होती है।
Mandir Aur Masjid
प्रेमचंद की कहानी 'मंदिर और मस्जिद' सांप्रदायिक सौहार्द, धार्मिक सहिष्णुता और दुखद बलिदान की एक मार्मिक कथा है जिसमें चौधरी इतरत अली और उनके वफादार सेवक भजनसिंह का वृत्तांत है।
Pandit Moteram Ji Shastri
प्रेमचंद की कहानी 'पण्डित मोटेराम जी शास्त्री' एक ढोंगी शिक्षक के वैद्य बनकर लोगों को ठगने और अंततः पिटकर भागने का मनोरंजक व्यंग्य है।
Shudra
प्रेमचंद की 'शूद्रा' प्रवासी भारतीयों, गिरमिटिया मजदूरी, स्त्री की असुरक्षा और औपनिवेशिक शोषण की अत्यंत मार्मिक कहानी है। गरीब युवती गौरा का पति मंगरू वर्षों पहले बिना बताए घर छोड़कर चला जाता है। एक दिन एक बूढ़ा ब्राह्मण यह झूठ बोलकर गौरा को अपने साथ ले जाता है कि मंगरू ने उसे बुलाया है। गौरा पति से मिलने की आशा में कलकत्ता पहुँचती है और वहाँ से जहाज द्वारा मॉरिशस भेज दी जाती है। वहाँ उसे पता चलता है कि मंगरू स्वयं गिरमिटिया मजदूर के रूप में बंधा हुआ है और भारतीय मजदूरों तथा स्त्रियों का भयंकर शोषण होता है। जब एक अंग्रेज अधिकारी गौरा को अपने अधिकार में लेना चाहता है और उसके प्रतिरोध पर मंगरू को बुरी तरह पीटता है, तब गौरा अपने पति को बचाने के लिए स्वयं को बलिदान करने को तैयार हो जाती है। कहानी प्रवासी मजदूरों को बहकाकर विदेश ले जाने वाली व्यवस्था, औपनिवेशिक सत्ता की हिंसा और स्त्री के शरीर पर अधिकार जमाने की मानसिकता को उजागर करती है।
Sava Ser Gehun
प्रेमचंद की 'सवा सेर गेहूँ' ग्रामीण ऋण-व्यवस्था, सूदखोरी, किसान-शोषण और बंधुआ मजदूरी पर तीखा प्रहार करने वाली कहानी है। गरीब किसान शंकर एक साधु अतिथि को भोजन कराने के लिए केवल सवा सेर गेहूँ उधार लेता है। बाद में वह खलिहानी में उससे अधिक अनाज दे भी देता है, लेकिन महाजन उस उधार को अपने बही-खाते में जीवित रखता है। सात वर्ष बाद वही छोटा-सा ऋण साढ़े पाँच मन गेहूँ और फिर साठ रुपये के दस्तावेजी कर्ज में बदल जाता है। बढ़ते ब्याज के कारण शंकर अंततः जीवन-भर के लिए बंधुआ मजदूर बन जाता है और उसकी मृत्यु के बाद वही कर्ज उसके बेटे पर डाल दिया जाता है। प्रेमचंद दिखाते हैं कि गरीबी, अशिक्षा, धार्मिक भय और शोषणकारी ऋण-व्यवस्था मिलकर एक मामूली उधार को पीढ़ी-दर-पीढ़ी गुलामी में बदल सकती है।
Thakur Ka Kuan
प्रेमचंद की कहानी 'ठाकुर का कुआँ' गंगी की कहानी है जो अपने बीमार पति के लिए ठाकुर के कुएँ से पानी चुराने जाती है।