Cover Image for Vardan (वरदान) by Munshi Premchand - Novel
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उपन्यास•1921•26 अध्याय•5h 44m

वरदान

Vardan

प्रेमचंद का उपन्यास 'वरदान' प्रताप और विरजन की प्रेमकथा के माध्यम से बेमेल विवाह, सामाजिक सुधार, त्याग और समाज-सेवा के प्रश्नों को प्रस्तुत करता है।

पात्र:प्रताप, विरजन, सुवामा, कमलाचरण, माधवी, मुंशी संजीवन लाल, सुशीला
सेटिंग:20वीं सदी के प्रारंभ में उत्तर भारत, विशेष रूप से बनारस और उसके आसपास का सामाजिक परिवेश

अध्याय 7 / 26

6 मिनट पठन • 887 शब्द

अध्याय 7: निष्ठुरता और प्रेम

सुवामा तन-मन से विवाह की तेयारियाँ करने लगीं। भोर से संध्या तक विवाह के ही धन्धों में उलझी रहती। सुशीला चेरी की भाँति उसकी आज्ञा का पालन किया करती। मुंशी संजीवनलाल प्रातःकाल से साँझ तक हाट की धूल छानते रहते। ओर विरजन जिसके लिए यह सब तैयारियाँ हो रही थी, अपने कमरे में बेठी हुई रात-दिन रोया करती। किसी को इतना अवकाश न था कि क्षण-भर के लिए उसका मन बहलाये। यहाँ तक कि प्रताप भी अब उसे निठुर जान पड़ता था। प्रताप का मन भी इन दिनों बहुत ही मलिन हो गया था।

सबेरे का निकला हुआ साँझ को घर आता ओर अपनी मुंडेर पर चुपचाप जा बेठता। विरजन के घर जाने की तो उसने शपथ-सी कर ली थी। वरन जब कभी वह आती हुई दिखाई देती, तो चुपके से सरक जाता।

यदि कहने-सुनने से बेठता भी तो इस भाँति मुख फेर लेता ओर रूखाई का व्यवहार करता कि विरजन रोने लगती ओर सुवामा से कहती -- चाची, लल्लू मुझसे रूष्ट हे, में बुलाती हूँ,.तो नहीं बोलते। तुम चलकर मना दो। यह कहकर वह मचल जाती ओर सुवामा का आँचल पकड़कर खींचती हुई प्रताप के घर लाती। परन्तु प्रताप दोनों को देखते ही निकल भागता।

वृजरानी द्वार तक यह कहती हुई आती कि -- ललल्‍लू तनिक सुन लो, तनिक सुन लो, तुम्हें हमारी शपथ, तनिक सुन लो। पर जब वह न सुनता ओर न मुँह फेरकर देखता ही तो बेचारी लड़की पृथ्वी पर बेठ जाती ओर भली-भाँति फूट-फ््‌टकर रोती और कहती -- यह मुझसे क्‍यों रूठे हुए है? मेने तो इन्हें कभी कुछ नहीं कहा। सुवामा उसे छाती से लगा लेती और समझाती -- बेटा। जाने दो, लल्लू पागल हो गया है। उसे अपने पुत्र की निठुरता का भेद कुछ-कुछ ज्ञात हो चला था।

निदान विवाह को केवल पाँच दिन रह गये। नातेदार ओर सम्बन्धी लोग दूर तथा समीप से आने लगे। आँगन में सुन्दर मण्डप छा गया। हाथ में कंगन बँध गये। यह कच्चे धागे का कंगन पवित्र धर्म की हथकड़ी है, जो कभी हाथ से न निकलेगी ओर मण्डप उस प्रेम ओर कृपा की छाया का स्मारक हे, जो जीवनपर्यन्त सिर से न उठेगी। आज संध्या को सुवामा, सुशीला, महाराजिनें सब-की-सब मिलकर देवी की पूजा करने को गयीं। महरियाँ अपने धंधों में लगी हुई थी। विरजन व्याकुल होकर अपने घर में से निकली ओर प्रताप के घर आ पहुँची।

चतुर्दिक्‌ सन्नाटा छाया हुआ था। केवल प्रताप के कमरे में धुँधला प्रकाश झलक रहा था। विरजन कमरे में आयी, तो क्‍या देखती है कि मेज पर लालटेन जल रही है ओर प्रताप एक चारपाई पर सो रहा है। धुँधले उजाले में उसका बदन कुम्हलाया और मलिन नजर आता है। वस्तुएँ सब इधर-उधर बेढंग पड़ी हुई है। जमीन पर मानों धूल चढ़ी हुई है। पुस्तकें फैली हुई है। ऐसा जान पड़ता है मानों इस कमरे को किसी ने महीनों से नहीं खोला। वही प्रताप है, जो स्वच्छता को प्राण-प्रिय समझता था। विरजन ने चाहा उसे जगा दूँ। पर कुछ सोचकर भूमि से पुस्तकें उठा-उठा कर आलमारी में रखने लगी। मेज पर से धूल झाड़ी, चित्रों पर से गर्द का परदा उठा लिया।

अचानक प्रतान ने करवट ली और उनके मुख से यह वाक्य निकला -- 'विरजन। में तुम्हें भूल नहीं सकता”।

फिर थोड़ी देर पश्चात -- 'विरजन'। कहाँ जाती हो, यही बेठो?

फिर करवट बदलकर - 'न बेठोगी”? अच्छा जाओ में भी तुमसे न बोलूँगा।

फिर कुछ ठहरकर-अच्छा जाओं, देखें कहाँ जाती है।

यह कहकर वह लपका, जेसे किसी भागते हुए मनुष्य को पकड़ता हो। विरजन का हाथ उसके हाथ में आ गया। उसके साथ ही आँखें खुल गयीं। एक मिनट तक उसकी भाव- शून्य दृष्टि विरजन के मुख की ओर गड़ी रही।

फिर अचानक उठ बैठा और विरजन का हाथ छोड़कर बोला -- तुम कब आर्यी, विरजन? में अभी तुम्हारा ही स्वप्न देख रहा था।

विरजन ने बोलना चाहा, परन्तु कण्ठ रूँध गया ओर आँखें भर आयीं। प्रताप ने इधर-उधर देखकर फिर कहा-क्या यह सब तुमने साफ किया? तुम्हें बड़ा कष्ट हुआ। विरजन ने इसका भी उतर न दिया।

प्रताप -- विरजन, तुम मुझे भूल क्‍यों नहीं जाती?

विरजन ने आई नेत्रों से देखकर कहा -- क्‍या तुम मुझे भूल गये?

प्रतान ने लज्जित होकर मस्तक नीचा कर लिया। थोड़ी देर तक दोनों भावों से भरे भूमि की ओर ताकते रहे।

फिर विरजन ने पूछा -- तुम मुझसे क्‍यों रूष्ट हो? मेने कोई अपराध किया हे?

प्रताप -- न जाने क्‍यों अब तुम्हें देखता हूँ,तो जी चाहता है कि कहीं चला जाऊँ।

विरजन -- क्‍या तुमको मेरी तनिक भी मोह नहीं लगती? में दिन- भर रोया करती हूँ। तुम्हें मुझ पर दया नहीं आती? तुम मुझसे

बोलते तक नहीं। बतलाओ मेने तुम्हें क्या कहा जो तुम रूठ गये?

प्रताप -- में तुमसे रूठा थोडे ही हूँ।

विरजन -- तो मुझसे बोलते क्‍यों नहीं।

प्रताप -- में चाहता हूँ कि तुम्हें भूल जाऊँ। तुम धनवान हो, तुम्हारे माता-पिता धनी हें, में अनाथ हूँ। मेरा तुम्हारा क्या साथ?

विरजन -- अब तक तो तुमने कभी यह बहाना न निकाला था, क्या अब में अधिक धनवान हो गयी?

यह कहकर विरजन रोने लगी। प्रताप भी द्रवित हुआ, बोला -- विरजन। हमारा तुम्हारा बहुत दिनों तक साथ रहा। अब वियोग के दिन आ गये। थोड़े दिनों में तुम यहाँ वालों को छोड़कर अपने ससुराल चली जाओगी। इसलिए में भी बहुत चाहता हूँ कि तुम्हें भूल जाऊँ। परन्तु कितना ही चाहता हूँ कि तुम्हारी बातें स्मरण में न आये, वे नहीं मानतीं। अभी सोते-सोते तुम्हारा ही स्वप्न देख रहा था।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "वरदान." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1921, https://munshipremchand.com/works/novels/vardan. Accessed 22 Sep. 2026.