Cover Image for Vardan (वरदान) by Munshi Premchand - Novel
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उपन्यास•1921•26 अध्याय•5h 44m

वरदान

Vardan

प्रेमचंद का उपन्यास 'वरदान' प्रताप और विरजन की प्रेमकथा के माध्यम से बेमेल विवाह, सामाजिक सुधार, त्याग और समाज-सेवा के प्रश्नों को प्रस्तुत करता है।

पात्र:प्रताप, विरजन, सुवामा, कमलाचरण, माधवी, मुंशी संजीवन लाल, सुशीला
सेटिंग:20वीं सदी के प्रारंभ में उत्तर भारत, विशेष रूप से बनारस और उसके आसपास का सामाजिक परिवेश

अध्याय 3 / 26

6 मिनट पठन • 797 शब्द

अध्याय 3: नये पड़ोसियों से मेल-जोल

मुंशी संजीवनलाल, जिन्होंने सुवामा का घर भाड़े पर लिया था, बड़े विचारशील मनुष्य थे। पहले एक प्रतिष्ठित पद पर नियुक्त थे, किन्तु अपनी स्वतंत्र इच्छा के कारण अफसरों को प्रसन्न न रख सके। यहाँ तक कि उनकी रुष्टता से विवश होकर इस्तीफा दे दिया। नोकर के समय में कुछ पूंजी एकत्र कर ली थी, इसलिए नोकरी छोड़ते ही वे ठेकेदारी की ओर प्रवृत्त हुए ओर उन्होंने परिश्रम द्वारा अल्पकाल में ही अच्छी सम्पत्ति बना ली। इस समय उनकी आय चार-पाँच सो मासिक से कम न थी। उन्होंने कुछ ऐसी अनुभवशालिनी बुद्धि पायी थी कि जिस कार्य में हाथ डालते, उसमें लाभ छोड़ हानि न होती थी। मुंशी संजीवनलाल का कुटुम्ब बड़ा न था। सनन्‍्तानें तो ईश्वर ने कई दीं, पर इस समय माता-पिता के नयनों की पुतली केवल एक पुत्री ही थी। उसका नाम वृजरानी था। वही दम्पति का जीवनाश्रय थी। प्रतापचन्द्र और वृजरानी में पहले ही दिन से मैत्री आरंभ हो गयी। आधे घंटे में दोनों चिड़ियों की भाँति चहकने लगे। विरजन ने अपनी गुड़िया, खिलोने ओर बाजे दिखाये, प्रतापचन्द्र ने अपनी

किताबें, लेखनी ओर चित्र दिखाये। विरजन की माता सुशीला ने प्रतापचन्द्र को गोद में ले लिया ओर प्यार किया। उस दिन से वह नित्य संध्या को आता ओर दोनों साथ-साथ खेलते। ऐसा प्रतीत होता था कि दोनों भाई-बहिन है। सुशीला दोनों बालकों को गोद में बेठाती और प्यार करती। घंटों टकटकी लगाये दोनों बच्चों को देखा करती, विरजन भी कभी-कभी प्रताप के घर जाती। विपत्ति की मारी सुवामा उसे देखकर अपना दुःख भूल जाती, छाती से लगा लेती और उसकी भोली-भाली बातें सुनकर अपना मन बहलाती।

एक दिन मुंशी संजीवनलाल बाहर से आये तो कया देखते हें कि प्रताप और विरजन दोनों दफ्तर में कुर्सियों पर बेठे हैं। प्रताप कोई पुस्तक पढ़ रहा हे और विरजन ध्यान लगाये सुन रही है। दोनों ने ज्यों ही मुंशीजी को देखा उठ खड़े हुए। विरजन तो दोड़कर पिता की गोद में जा बेठी और प्रताप सिर नीचा करके एक ओर खड़ा हो गया। केसा गुणवान बालक था। आयु अभी आठ वर्ष से अधिक न थी, परन्तु लक्षण से भावी प्रतिभा झलक रही थी। दिव्य मुखमण्डल, पतले-पतले लाल-लाल अधर, तीत्र चितवन, काले-काले श्रमर के समान बाल उस पर स्वच्छ कपड़े

मुंशी जी ने कहा -- यहाँ आओ, प्रताप ।

प्रताप धीरे-धीरे कुछ हिचकिचाता-सकुचाता समीप आया। मुंशी जी ने पितृवत्‌ प्रेम से उसे गोद में बेठा लिया और पूछा -- तुम अभी कोन-सी किताब पढ़ रहे थे।

प्रताप बोलने ही को था कि विरजन बोल उठी -- बाबा। अच्छी- अच्छी कहानियाँ थीं। क्‍यों बाबा। क्‍या पहले चिड़ियाँ भी हमारी भाँति बोला करती थीं।

मुंशी जी मुस्कराकर बोले -- हाँ। वे खूब बोलती थीं।

अभी उनके मुँह से पूरी बात भी न निकलने पायी थी कि प्रताप जिसका संकोच अब गायब हो चला था, बोला -- नहीं विरजन तुम्हें भुलाते हें ये कहानियाँ बनायी हुई हें।

मुंशी जी इस निर्भीकतापूर्ण खण्डन पर खूब हँसे।

अब तो प्रताप तोते की भाँति चहकने लगा -- स्कूल इतना बड़ा है कि नगर भर के लोग उसमें बेठ जायें। दीवारें इतनी ऊँची हें, जेसे ताड़। बलदेव प्रसाद ने जो गेंद में हिट लगायी, तो वह आकाश में चला गया। बड़े मास्टर साहब की मेज पर हरी-हरी बनात बिछी हुई है। उस पर फूलों से भरे गिलास रखे हें। गंगाजी का पानी नीला है। ऐसे जोर से बहता है कि बीच में पहाड़ भी हो तो बह जाये। वहाँ एक साधु बाबा है। रेल दोड़ती है सन-सन। उसका इंजिन बोलता हे झक-झक। इंजिन में भाष होती है, उसी के जोर से गाड़ी चलती है। गाड़ी के साथ पेड़ भी दोड़ते दिखायी देते हें।

इस भाँति कितनी ही बातें प्रताप ने अपनी भोली-भाली बोली में कहीं विरजन चित्र की भाँति चुपचाप बेठी सुन रही थी। रेल पर वह भी दो-तीन बार सवार हुई थी। परन्तु उसे आज तक यह ज्ञात न था कि उसे किसने बनाया और वह क्‍यों कर चलती हे। दो बार उसने गुरुजी से यह प्रश्न किया भी था परन्तु उन्होंने यही कह कर टाल दिया कि बच्चा, ईश्वर की महिमा कोई बड़ा भारी ओर बलवान घोड़ा है, जो इतनी गाडियों को सन-सन खींचे लिए जाता है। जब प्रताप चुप हुआ तो विरजन ने पिता के गले हाथ डालकर कहा -- बाबा। हम भी प्रताप की किताब पढ़ेंगे।

मुंशी -- बेटी, तुम तो संस्कृत पढ़ती हो, यह तो भाषा हे। विरजन - तो में भी भाषा ही पढूँगी। इसमें केसी अच्छी-अच्छी कहानियाँ हैं। मेरी किताब में तो भी कहानी नहीं। क्‍यों बाबा, पढ़ना किसे कहते हे?

मुंशी जी बगलें झाँकने लगे। उन्होंने आज तक आप ही कभी ध्यान नही दिया था कि पढ़ना क्‍या वस्तु है।

अभी वे माथ ही खुजला रहे थे कि प्रताप बोल उठा -- मुझे पढ़ते देखा, उसी को पढ़ना कहते हें।

विरजन - क्या में नहीं पढ़ती? मेरे पढ़ने को पढ़ना नहीं कहते? विरजन सिद्धान्तकोमुदी पढ़ रही थी, प्रताप ने कहा -- तुम तोते की भाँति रटती हो।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "वरदान." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1921, https://munshipremchand.com/works/novels/vardan. Accessed 22 Sep. 2026.