पहला दिन तो कमलाचरण ने किसी प्रकार छात्रालय में काटा। प्रात: से सायंकाल तक सोया किये। दूसरे दिन ध्यान आया कि आज नवाब साहब ओर तोखे मिर्जा के बटेरों में बढ़ाऊ जोड़ हें। कैसे-केसे मस्त पट्टे हैं! आज उनकी पकड़ देखने के योग्य होगी। सारा नगर फट पड़े तो आश्चर्य नहीं। क्या दिल्लगी हे कि नगर के लोग तो आनंद उड़ाये ओर में पड़ा रोऊँ। यह सोचते-सोचते उठा ओर बात-की-बात में अखाड़े में था।
यहाँ आज बड़ी भीड़ थी। एक मेला-सा लगा हुआ था। भिश्ती छिड़काव कर रहे थे, सिगरेट, खोमचे वाले ओर तम्बोली सब अपनी-अपनी दुकान लगाये बेठे थे। नगर के मनचले युवक अपने हाथों में बटेर लिये या मखमली अड्डों पर बुलबुलों को बेठाये मटरगश्ती कर रहे थे कमलाचरण के मित्रों की यहाँ क्या कमी थी? लोग उन्हें खाली हाथ देखते तो पूछते -- अरे राजा साहब!
आज खाली हाथ केसे? इतने में मियां, सेयद मजीद, हमीद आदि नशे में चूर, सिगरेट के धुएँ भकाभक उड़ाते दीख पड़े। कमलाचरण को देखते ही सब-के-सब सरपट दोड़े ओर उससे लिपट गये।
मजीद -- अब तुम कहाँ गायब हो गये थे यार, कुरान की कसम मकान के सेंकड़ो चक्कर लगाये होंगे।
रामसेवक -- आजकल आनंद की रातें हैं, भाई! आँखें नहीं देखते हो, नशा-सा चढ़ा हुआ है।
चन्दुलाल -- चैन कर रहा हे पट्टा। जब से सुन्दरी घर में आयी, उसने बाजार की सूरत तक नहीं देखी। जब देखिये, घर में घुसा रहता है। खूब चेन कर ले यार!
कमला -- चेन क्या खाक करूँ? यहाँ तो केद में फंस गया। तीन दिन से बोर्डिंग में पड़ा हुआ हूँ।
मजीद -- भरे! खुदा की कसम?
कमला -- सच कहता हूँ, परसों से मिट्टी पलीद हो रही है। आज सबकी आँख बचाकर निकल भागा।
रामसेवक -- खूब उड़े। वह मुछंदर सुपरिण्टेण्डण्ट झल्ला रहा होगा।
कमला -- यह मार्के का जोड़ छोड़कर किताबों में सिर कोन मारता।
सेयद -- यार, आज उड़ आये तो क्या? सच तो यह हे कि तुम्हारा वहाँ रहना आफत है। रोज तो न आ सकोगे? ओर यहाँ आये दिन नयी सेर, नयी-नयी बहारें, कल लाला डिग्गी पर, परसों प्रेट पर, नरसों बेड़ों का मेला-कहाँ तक गिनाऊँ, तुम्हारा जाना बुरा हुआ।
कमला -- कल की कटाव तो में जरूर देखूँगा, चाहे इधर की दुनिया उधर हो जाय।
सेयद -- ओर बेड़ों का मेला न देखा तो कुछ न देखा।
तीसरे पहर कमलाचरण मित्रों से बिदा होकर उदास मन छात्रालय की ओर चला। मन में एक चोर-सा बेठा हुआ था। द्वार पर पहुँचकर झाँकने लगा कि सुपरिण्टेण्डेण्ट साहब न हों तो लतपककर करमेरे में हो रहूँ। तो यह देखता हे कि वह भी बाहर ही की ओर आ रहे हैं। चित्त को भली-भाँति दृढ़ करके भीतर पैठा।
सुरिण्टेण्डेण्ट साहब ने पूछा -- अब तक हाँ थे?
"एक काम से बाजार गया था!।
“यह बाजार जाने का समय नहीं हे'।
'मुझे ज्ञात नहीं था, अब ध्यान रखूँगा को जब कमला चारपाई पर लेटा तो सोचने लगा -- यार, आज तो बच गया, पर उत्तम तभी हो कि कल बचूँ। ओर परसों भी महाशय की आँख में धूल डालूँ। कल का दृश्य वस्तुतः दर्शनीय होगा। पतंग आकाश में बातें करेंगे ओर लम्बे-लम्बे पेंच होंगे। यह ध्यान करते-करते सो गया। दूसरे दिन प्रातः काल छात्रालय से निकल भागा। सुहृदगण लाल डिग्गी पर उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। देखते ही गदगद् हो गये ओर पीठ ठोंकी।
कमलाचरण कुछ देर तक तो कटाव देखता रहा। फिर शोक चर्राया कि क्यों न में भी अपने कनकोए मँगाऊँ ओर अपने हाथों की सफाई दिखलाऊँ। सेयद ने भड़काया, बद-बदकर लड़ाओ। रुपये हम देंगे।चट घर पर आदमी दोड़ा दिया। पूरा विश्वास था कि अपने माँझे से सबको परास्त कर दूँगा। परन्तु जब आदमी घर से खाली हाथ आया, तब तो उसकी देह में आग-सी-लग गयी। हण्टर लेकर दोड़ा ओर घर पहुँचते ही कहारों को एक ओर से सटर-सटर पीटना आरंभ किया। बेचारे बेठे हुक्का-तमाखू कर रहे थे। निरपराध अचानक हण्टर पड़े तो चिल्ला-चिललाकर रोने लेंगे। सारे मुहल्ले में एक कोलाहल मच गया। किसी को समझ ही में न आया कि हमारा क्या दोष हे? वहाँ कहारों का भली-भाँति सत्कार करके कमलाचरण अपने कमरे में पहुंचा।
परन्तु वहाँ की दुर्दशा देखकर क्रोध ओर भी प्रज्ज्वलित हो गया। पतंग फटे हुए थे, चर्खियाँ टूटी हुई थीं, मांझे लच्छियाँ उलझी पड़ी थीं, मानो किसी आपत्ति ने इन यवन योद्धाओं का सत्यानाश कर दिया था। समझ गया कि अवश्य यह माताजी की करतूत हे। क्रोध से लाल माता के पास गया ओर उच्च स्वर से बोला -- क्या माँ! तुम सचमुच मेरे प्राण ही लेने पर आ गयी हो? तीन दिन हुए कारागार में भिजवाया पर इतने पर भी चित्त को संतोष न हुआ। मेरे विनोद की सामग्रियों को नष्ट कर डाला क्यों? प्रेमवती -- (विस्मय से) मैंने तुम्हारी कोई चीज़ नहीं छुई! कया हुआ?
कमला -- (बिगड़कर) झूठों के मुख में कीड़े पड़ते हैं। तुमने मेरी वस्तुएँ नहीं छुई तो किसको साहस हे जो मेरे कमरे में जाकर मेरे कनकोए ओर चर्खियाँ सब तोड़-फोड़ डाले, क्या इतना भी नहीं देखा जाता।
प्रेमवती -- ईश्वर साक्षी हे। मेंने तुम्हारे कमरे में पांव भी नहीं रखा। चलो, देखूँ कौन-कौन चीज़ें टूटी हैं। यह कहकर प्रेमवती तो इस कमरे की ओर चली और कमला क्रोध से भरा आंगन में खड़ा रहा कि इतने में माधवी विरजन के कमरे से निकली ओर उसके हाथ में एक चिट्ठी देकर चली गयी। लिखा हुआ था - “अपराध मैंने किया हे। अपराधिन में हूँ। जो दण्ड चाहे दीजिए'।
यह पत्र देखते ही कमला भीगी बिल्ली बन गया ओर दबे पांव बेठक की ओर चला। प्रेमवती पर्दे की आड़ से सिसकते हुए नोकरों को डांट रही थी, कमलाचरण ने उसे मना किया ओर उसी क्षण कुछ और कनकोए जो बचे हुए थे, स्वंय फाड़ डाले, चर्खियां टुकड़े-टुकड़े कर डालीं और डोर में दियासलाई लगा दी। माता के ध्यान ही में नहीं आता था कि क्या बात है? कहाँ तो अभी- अभी इन्हीं वस्तुओं के लिए संसार सिर पर उठा लिया था, ओर कहा आप ही उसका शत्रु हो गया। समझी, शायद क्रोध से ऐसा कर रहा हों मानाने लगीं, पर कमला की आकृति से क्रोध तनिक भी प्रकट न होता था। स्थिरता से बोला -- क्रोध में नहीं हूँ। आज से दृढ़ प्रतिज्ञा करता हूँ कि पतंग कभी न उड़ाऊँगा मेरी मूर्खता थी, इन वस्तुओं के लिए आपसे झगड़ बेठा।
जब कमलाचरण कमरे में अकेला रह गया तो सोचने लगा -- निस्सन्देह मेरा पतंग उड़ाना उन्हे नापसन्द है, इससे हार्दिक घृणा है; नहीं तो मुझ पर यह अत्याचार कदापि न करतीं। यदि एक बार उनसे भेंट हो जाती तो पूछता कि तुम्हारी क्या इच्छा हे; पर केसे मुँह दिखाऊँ। एक तो महामूर्ख, तिस पर कई बार अपनी मूर्खता का परिचय दे चुका। सेंधवाली घटना की सूचना उन्हें अवश्य मिली होगी। उन्हें मुख दिखाने के योग्य नहीं रहा।
अब तो यही उपाय है कि न तो उनका मुख देखूँ न अपना दिखाऊँ, या किसी प्रकार कुछ विद्या सीखूँ। हाय !इस सुन्दरी ने केसा स्वरुप पाया हे! स्त्री नहीं अप्सरा जान पड़ती हे। क्या अभी वह दिन भी होगा जब कि वह मुझसे प्रेम करेगी? क्या लाल-लाल रसीले अधर है! पर है कठोर हृदय। दया तो उसे छू नहीं गयी। कहती हे जो दण्ड दूँ?यदि पा जाऊँ हृदय से लगा लू। अच्छा,तो अब आज से पढ़ना चाहिये। यह सोचते-सोचते उठा ओर दरबा खोलकर कबूतरों का उड़ाने लगा। सैकड़ों जोड़े थे ओर एक-से-एक बढ़- चढ़कर। आकाश मे तारे बन जाएँ, ड़ तो दिन-भर उतरने का नाम न लें। जगर क बूतरबाज एक-एक जोड़ पर गुलामी करने को तैयार थे। परन्तु क्षण-मात्र में सब-के-सब उड़ा दिये। जब दरबा खाली हो गया, तो कहाररों को आज्ञा दी कि इसे उठा ले जाओ ओर आग में जला दो। छत्ता भी गिरा दो, नहीं तो सब कबूतर जाकर उसकी पर बेठेंगें। कबूतरों का काम समाप्त करके बटेरों ओर बुलबुलों की ओर चले ओर उनकी भी कारागार से मुक्त कर दिया।
बाहर तो यह चरित्र हो रहा था, भीतर प्रेमवती छाती पीट रही थी कि लका न जाने क्या करने तर तत्पर हुआ है? बिरजन को बुलाकर कहा -- बेटी? बच्चे को किसी प्रकार रोको। न-जाने उसने मन मे क्या ठानी है? यह कहकर रोने लगी।विरजन को भी सन्देह हो रहा था कि अवश्य इनकी कुछ ओर नीयत है नहीं तो
यह क्रोध क्यों? यद्यपि कमला दुर्व्यसनी था, दुराचारी था, कुचरित्र था, परन्तु इन सब दोषों के होते हुए भी उसमें एक बड़ा गुण भी था, जिसका कोई स्त्री अवहेलना नहीं कर सकती। उसे वृजरानी से सच्ची प्रीति थी। ओर इसका गुप्त रीति से कई बार परिचय भी मिल गया था। यही कारण था जिसने विरजन को इतना गर्वशील बना दिया था। उसने कागज निकाला और यह पत्र बाहर भेजा।
“प्रियतम,
यह कोप किस पर हे? केवल इसीलिए कि मैंने दो-तीन कनकोए फाड़ डाले? यदि मुझे ज्ञात होता कि आप इतनी-सी बात पर ऐसे ऋद्ध हो जायेंगे,तो कदापि उन पर हाथ न लगाती। पर अब तो अपराध हो गया, क्षमा कीजिये। यह पहला कसूर हे
आपकी वृजरानी। ”
कमलाचरण यह पत्र पाकर ऐसा प्रमुदित हुआ, माने सारे जगत की संपत्ति प्राप्त हो गयी। उत्तर देने की इच्छा हुई, पर लेखनी ही नहीं उठती थी। न प्रशस्ति मिलती हे,न प्रतिष्ठा,न आरम्भ का विचार आता,न समाप्ति का। बहुत चाहते हैं कि भावपूर्ण
लहलहाता हुआ पत्र लिखूँ, पर बुद्धि तनिक भी नहीं दोड़ती। आज प्रथम बार कमलाचरण को अपनी मूर्खता ओर निरक्षरता पर रोना आया। शोक !में एक सीधा-सा पत्र भी नहीं लिख सकता। इस विचार से वह रोने लगा ओर घर के द्वार सब बन्द कर लिये कि कोई देख न ले।
तीसरे पहर जब मुंशी श्यामाचरण घर आये, तो सबसे पहली वस्तु जो उनकी दृष्टि में पड़ी,बह आग का अलावा था। विस्मित होकर नोकरों से पूछा -- यह अलाव केसा?
नोकरों ने उत्तर दिया -- सरकार ! दरबा जल रहा है।
मुंशीजी -- (घुड़ककर) इसे क्यों जलाते हो? अब कबूतर कहाँ रहेंगे?
कहार -- छोटे बाबू की आज्ञा है कि सब दरबे जला दो
मुंशीजी -- कबूतर कहाँ गये?
कहार -- सब उड़ा दिये, एक भी नहीं रखा। कनकोए सब फाड़ डाले, डोर जला दी, बड़ा नुकसान किया।
कहारों ने अपनी समझ में मार-पीट का बदला लिया। बेचारे समझे कि मुंशीजी इस नुकसान के लिये कमलाचरण को बुरा- भला कहेंगे, परन्तु मुंशीजी ने यह समाचार सुना तो भोंचक्रे-से रह गये। उन्ही जानवरों पर कमलाचरण प्राण देता था, आज
अकस्मात् क्या कायापलट हो गयी? अवश्य कुछ भेद है। कहार से कहा -- बच्चे को भेज दो।
एक मिनट में कहार ने आकर कहा - ह॒जूर, दरवाजा भीतर से बन्द है। बहुत खटखटाया, बोलते ही नहीं।
इतना सुनना था कि मुंशीजी का रुधिर शुष्क हो गया। झट सन्देह हुआ कि बच्चे ने विष खा लिया। आज एक जहर खिलाने के मुकदमें का फैसला किया था। नंगे, पाँव दोड़े और बन्द कमरे के किवाड़ पर बलपूर्वक लात मारी ओर कहा -- बच्चा! बच्चा! यह कहते-कहते गला रुँध गया। कमलाचरण पिता की वाणी पहिचान कर झट उठा ओर अपने आँसू पोंछकर किवाड़ खोल दिया। परन्तु उसे कितना आश्चर्य हुआ, जब मुंशीजी ने धिक्कार, फटकार के बदले उसे हृदय से लगा लिया ओर व्याकुल होकर पूछा -- बच्चा, तुम्हें मेरे सिर की कसम, बता दो तुमने कुछ खा तो नहीं लिया? कमलाचरण ने इस प्रश्न का अर्थ समझने के लिये मुंशीजी की ओर आँखें उठायी तो उनमें जल भरा था, मुंशीजी को पूरा विश्वास हो गया कि अवश्य विपत्ति का सामना हुआ। एक कहार से कहा -- डाक्टर साहब को बुला ला। कहना, अभी चलिये।
अब जाकर दुर्बुद्धि कमलाचरण ने पिता की इस घबराहट का अर्थ समझा। दोड़कर उनसे लिपट गया और बोला -- आपको भ्रम हुआ है। आपके सिर की कसम, में बहुत अच्छी तरह हूँ।
परन्तु डिप्टी साहब की बुद्धि स्थिर न थी ;समझे, यह मुझे रोककर विलम्ब करना चाहता है। विनीत भाव से बोले -- बच्चा? ईश्वर के लिए मुझे छोड़ दो, में सन्दूक से एक ओषधि ले आऊँ। में क्या जानता था कि तुम इस नीयत से छात्रालय में जा रहे हो।
कमलाचरण - ईश्वर-साक्षी से कहता हूँ, में बिलकुल अच्छा हूँ। में ऐसा लज्जावान होता, तो इतना मूर्ख क्यों बना रहता? आप व्यर्थ ही डाक्टर साहब को बुला रहे हैं।
मुंशीजी -- (कुछ-कुछ विश्वास करके) तो किवाड़ बन्द कर क्या करते थे?
कमलाचरण -- भीतर से एक पत्र आया था, उत्तर लिख रहा था। मुंशीजी -- और यह कबूतर वगैरह क्यों उड़ा दिये?
कमला -- इसीलिए कि निश्चिन्तापूर्वक पढ़ूँ। इन्हीं बखेड़ों में समय नष्ट होता था। आज मैनें इनका अन्त कर दिया। अबा आप देखेंगे कि में पढ़ने में केसा जी लगाता हूँ।
अब जाके डिप्टी साहब की बुद्धि ठिकाने आयी। भीतर जाकर प्रेमवती से समाचार पूछा तो उसने सारी रामायण कह सुनायी। उन्होंने जब सुना कि विरजन ने क्रोध में आकर कमला के कनकोए फाड़ डाले ओर चर्खियाँ तोड़ डाली तो हँस पड़े ओर कमलाचरण के विनोद के सर्वनाश का भेद समझ में आ गया। बोले -- जान पड़ता है कि बहू इन लालाजी को सीधा करके छोड़ेगी।
