दूसरे दिन बालाजी स्थान-स्थान से निवृत्त होकर राजा धर्मसिंह की प्रतीक्षा करने लगे। आज राजघाट पर एक विशाल गोशाला का शिलारोपण होने वाला था, नगर की हाट-बाट और वीथियाँ मुस्कुराती हुई जान पड़ती थी। सड़क के दोनों पार्श्व में झण्डे और झण्डियाँ लहरा रही थीं। गृहद्वार फूलों की माला पहिने स्वागत के लिए तेयार थे, क्योंकि आज उस स्वदेश-प्रेमी काशुभागमन हे, जिसने अपना सर्वस्व देश के हित बलिदान कर दिया हे।
हर्ष की देवी अपनी सखी-सहेलियों के संग टहल रही थी। वायु झूमती थी। दुःख ओर विषाद का कहीं नाम न था। ठोर-ठौर पर बधाइयाँ बज रही थीं। पुरुष सुहावने वस्त्र पहने इठलाते थे। स्त्रियाँ सोलह श्रृंगार किये मंगल-गीत गाती थी। बालक-मण्डली केसरिया साफा धारण किये कलोलें करती थीं हर पुरुष-स्त्री के मुख से प्रसन्नता झलक रही थी, क्योंकि आज एक सच्चे जाति- हितेषी का शुभागमन हे जिसने अपना सर्वस्व जाति के हित में भेंट कर दिया हे।
बालाजी अब अपने सुहृदों के संग राजघाट की ओर चले तो सूर्य भगवान ने पूर्व दिशा से निकलकर उनका स्वागत किया। उनका तेजस्वी मुखमण्डल ज्यों ही लोगों ने देखा सहस्रों मुखों से 'भारत माता की जय' का घोर शब्द सुनायी दिया और वायुमंडल को चीरता हुआ आकाश-शिखर तक जा पहुँचा। घण्टों ओर शंखों की ध्वनि निनादित हुई और उत्सव का सरस राग वायु में गूँजने लगा। जिस प्रकार दीपक को देखते ही पतंग उसे घेर लेते हें उसी प्रकार बालाजी को देखकर लोग बड़ी शीघ्रता से उनके चतुर्दिक् एकत्र हो गये। भारत-सभा के सवा सो सभ्यों ने अभिवादन किया। उनकी सुन्दर वर्दियाँ और मनचले घोड़ों नेत्रों में खूब जाते थे। इस सभा का एक-एक सभ्य जाति का सच्चा हितेषी था ओर उसके उमंग-भरे शब्द लोगों के चित्त को उत्साह से पूर्ण कर देते थें सड़क के दोनों ओर दर्शकों की श्रेणी थी। बधाइयाँ बज रही थीं। पुष्प ओर मेघों की वृष्टि हो रही थी।
ठौर-ठोर नगर की ललनाएँ श्रृंगार किये, स्वर्ण के थाल में कपूर, फूल ओर चन्दन लिये आरती करती जाती थीं। ओर दूकानें नवागत वधू की भाँति सुसज्जित थीं। सारा नगर अपनी सजावट से वाटिका को लज्जित करता था ओर जिस प्रकार श्रावण मास में काली घटाएँ उठती हैं ओर रह-रहकर वन की गरज हृदय को कँपा देती है और उसी प्रकार जनता की उमंगवर्द्धक ध्वनि (भारत माता की जय) हृदय में उत्साह ओर उत्तेजना उत्पन्न करती थी। जब बालाजी चोक में पहुँचे तो उन्होंने एक अद्भुत दृश्य देखा। बालक-वृन्द ऊदे रंग के लेसदार कोट पहिने, केसरिया पगड़ी बाँधे हाथों में सुन्दर छुड़ियाँ लिये मार्ग पर खड़े थे। बालाजी को देखते ही वे दस-दस की श्रेणियों में हो गये एवं अपने डण्डे बजाकर यह ओजस्वी गीत गाने लगे --
बालाजी तेरा आना मुबारक होवे।
धनि-धनि भाग्य हैं इस नगरी के; धनि-धनि भाग्य हमारे॥
धनि-धनि इस नगरी के बासी जहाँ तब चरण पधारे।
बालाजी तेरा आना मुबारक होवे॥
केसा चित्ताकर्षक दृश्य था। गीत यद्यपि साधारण था, परन्तु अनेक ओर सच हुए स्वरों ने मिलकर उसे ऐसा मनोहर ओर प्रभावशाली बना दिया कि पांव रुक गये। चतुर्दिक सन्नाटा छा गया। सन्नाटे में यह राग ऐसा सुहावना प्रतीत होता था जैसे रात्रि के सन्नाटे में बुलबुल का चहकना। सारे दर्शक चित्त की भाँति खड़े थे। दीन भारतवासियों, तुमने ऐसे दृश्य कहाँ देखे? इस समय जी भरकर देख लो। तुम वेश्याओं के नृत्य-वाद्य से सन्तुष्ट हो गये। वारांगनाओं की काम-लीलाएँ बहुत देख चुके, खूब सेर सपाटे किये ; परन्तु यह सच्चा आनन्द ओर यह सुखद उत्साह, जो इस समय तुम अनुभव कर रहे हो तुम्हें कभी ओर भी प्राप्त हुआ था? मनमोहनी वेश्याओं के संगीत और सुन्दरियों का काम-कौतुक तुम्हारी वेषयिक इच्छाओं को उत्तेजित करते है। किन्तु तुम्हारे उत्साहों को और निर्बल बना देते हें और ऐसे दृश्य तुम्हारे हृदयों में जातीयता और जाति-अभिमान का संचार करते हैं। यदि तुमने अपने जीवन मे एक बार भी यह दृश्य देखा है, तो उसका पवित्र चिह्न तुम्हारे हृदय से कभी नहीं मिटेगा।
बालाजी का दिव्य मुखमंडल आत्मिक आनन्द की ज्योति से प्रकाशित था ओर नेत्रों से जात्याभिमान की किरणें निकल रही थीं। जिस प्रकार कृषक अपने लहलहाते हुए खेत को देखकर आनन्दोन्मत्त हो जाता है, वही दशा इस समय बालाजी की थी। जब राग बन्द हो गया, तो उन्होंने कई डग आगे बढ़कर दो छोटे-छोटे बच्चों को उठा कर अपने कंधों पर बेठा लिया और बोले, 'भारत-माता की जय!”
इस प्रकार शनेः: शनेः लोग राजघाट पर एकत्र हुए। यहाँ गोशाला का एक गगनस्पर्शी विशाल भवन स्वागत के लिये खड़ा था। आँगन में मखमल का बिछावन बिछा हुआ था। गृहद्वार ओर स्तंभ फूल-पत्तियों से सुसज्जित खड़े थे। भवन के भीतर एक सहस््र गायें बंधी हुई थीं। बालाजी ने अपने हाथों से उनकी नॉँदों में खली-भूसा डाला। उन्हें प्यार से थपकियाँ दी। एक विस्तृत गृह मे संगमरमर का अष्टभुज कुण्ड बना हुआ था। वह दूध से परिपूर्ण था। बालाजी ने एक चुल्लू दूध लेकर नेत्रों से लगाया ओर पान किया।
अभी आँगन में लोग शान्ति से बेठने भी न पाये थे कई मनुष्य दोौड़े हुए आये और बोले -- पण्डित बदलू शास्त्री, सेठ उत्तमचन्द्र ओर लाला माखनलाल बाहर खड़े कोलाहल मचा रहे हैं और कहते है। कि हमको बालाजी से दो-दो बातें कर लेने दो। बदलू शास्त्री काशी के विख्यात पण्डित थे। सुन्दर चन्द्र-तिलक लगाते, हरी बनात का अँगरखा परिधान करते ओर बसन्ती पगड़ी बाँधते थे। उत्तमचन्द्र और माखनलाल दोनों नगर के धनी और लक्षाधीश मनुष्य थे। उपाधि के लिए सहस्रों व्यय करते और मुख्य पदाधिकारियों का सम्मान और सत्कार करना अपना प्रधान कर्त्तव्य जानते थे। इन महापुरुषों का नगर के मनुष्यों पर बड़ा दबाव था। बदलू शास्त्री जब कभी शास्त्रार्थ करते, तो निःसंदेह प्रतिवादी की पराजय होती। विशेषकर काशी के पण्डे ओर प्राग्वाल तथा इसी पन््थ के अन्य धार्मिकगण तो उनके पसीने की जगह रुधिर बहाने का उद्यत रहते थे। शास्त्री जी काशी मे हिन्दू धर्म के रक्षक ओर महान् स्तम्भ प्रसिद्ध थे। उत्तमचन्द्र ओर माखनलाल भी धार्मिक उत्साह की मूर्ति थे। ये लोग बहुत दिनों से बालाजी से शास्त्रार्थ करने का अवसर ढूंढ रहे थे। आज उनका मनोरथ पूरा हुआ। पंडों ओर प्राग्वालों का एक दल लिये आ पहुँचे।
बालाजी ने इन महात्मा के आने का समाचार सुना तो बाहर निकल आये। परन्तु यहाँ की दशा विचित्र पायी। उभय पक्ष के लोग लाठियाँ सँभाले अँगरखे की बाँहें चढाये गुथने का उद्यत थे। शास्त्रीजी प्राग्वालों को भिड़ने के लिये ललकार रहे थे ओर सेठजी उच्च स्वर से कह रहे थे कि इन शूद्रों की धज्जियाँ उड़ा दो। अभियोग चलेगा तो देखा जाएगा। तुम्हारा बाल-बाँका न होने पायेगा। माखनलाल साहब गला फाड़-फाड़कर चिल्लाते थे कि निकल आये जिसे कुछ अभिमान हो। प्रत्येक को सब्जबाग दिखा दूँगा। बालाजी ने जब यह रंग देखा तो राजा धर्मसिंह से बोले -- आप बदलू शास्त्री को जाकर समझा दीजिये कि वह इस दुष्टता को त्याग दें, अन्यथा दोनों पक्षवालों की हानि होगी ओर जगत में उपहास होगा सो अलग।
राजा साहब के नेत्रों से अग्नि बरस रही थी। बोले -- इस पुरुष से बातें करने में अपनी अप्रतिष्ठा समझता हूँ। उसे प्राग्वालों के समूहों का अभिमान है परन्तु मैं। आज उसका सारा मद चूर्ण कर देता हूँ। उनका अभिप्राय इसके अतिरिक्त ओर कुछ नहीं है कि वे आपके ऊपर वार करें। पर जब तक मै। और मरेपाँच पुत्र जीवित हैं तब तक कोई आपकी ओर कुदृष्टि से नहीं देख सकता। आपके एक संकेत-मात्र की देर है। में पलक मारते उन्हें इस दुष्टता का स्वाद चखा दूँगा।
बालाजी जान गये कि यह वीर उमंग में आ गया है। राजपूत जब उमंग में आता है तो उसे मरने-मारने के अतिरिक्त और कुछ नहीं सूझता। बोले -- राजा साहब, आप दूरदर्शी होकर ऐसे वचन कहते है? यह अवसर ऐसे बचनों का नहीं है। आगे बढ़कर अपने आदमियों को रोकिये, नहीं तो परिणाम बुरा होगा।
बालाजी यह कहते-कहते अचानक रुक गये। समुद्र की तरंगों का भाँति लोग इधर-उधर से उमड़ते चले आते थे। हाथों में लाठियाँ थी ओर नेत्रों में रुधिर की लाली, मुखमंडल कद्ध, भूकुटी कुटिल। देखते-देखते यह जन-समुदाय प्राग्वालों के सिर पर पहुँच गया। समय सन्निकट था कि लाठियाँ सिर को चूमे कि बालाजी विद्युत की भाँति लपककर एक घोड़े पर सवार हो गये ओर अति उच्च स्वर में बोले --
भाइयों! क्या अंधेर है? यदि मुझे अपना मित्र समझते हो तो झटपट हाथ नीचे कर लो ओर पैरों को एक इंच भी आगे न बढ़ने दो। मुझे अभिमान हे कि तुम्हारे हृदयों में वीरोचित क्रोध ओर उमंग तरंगित हो रहे है। क्रोध एक पवित्र उद्बेग ओर पवित्र उत्साह है। परन्तु आत्म-संवरण उससे भी अधिक पवित्र धर्म हे। इस समय अपने क्रोध को दृढ़ता से रोको। क्या तुम अपनी जाति के साथ कुल का कर्त्तव्य पालन कर चुके कि इस प्रकार प्राण विसर्जन करने पर कटिबद्ध हो क्या तुम दीपक लेकर भी कृप में गिरना चाहते हो? ये लोग तुम्हारे स्वदेश बान्धव और तुम्हारे ही रुधिर हैं। उन्हें अपना शत्रु मत समझो। यदि वे मूर्ख हें तो उनकी मूर्खता का निवारण करना तुम्हारा कर्तव्य हैं। यदि वे तुम्हें अपशब्द कहें तो तुम बुरा मत मानों। यदि ये तुमसे युद्ध करने को प्रस्तुत हो तुम नग्रता से स्वीकार कर तो और एक चतुर वैद्य की भाँति अपने विचारहीन रोगियों की ओषधि करने में तललीन हो जाओ। मेरी इस आशा के प्रतिकूल यदि तुममें से किसी ने हाथ उठाया तो वह जाति का शत्रु होगा।'
इन समुचित शब्दों से चतुर्दिक शांति छा गयी। जो जहाँ था वह वहीं चित्रलेखित-सा हो गया। इस मनुष्य के शब्दों में कहाँ का प्रभाव भरा था,जिसने पचास सहस्र मनुष्यों के उमड़ते हुए उद्बेग को इस प्रकार शीतल कर दिया ,जिस प्रकार कोई चतुर सारथी दुष्ट घोडों को रोक लेता हैं, और यह शक्ति उसे किसने की दी थी? न उसके सिर पर राजमुकुट था,न वह किसी सेना का नायक था। यह केवल उस पवित्र ओर निःस्वार्थ जाति सेवा का प्रताप था, जो उसने की थी। स्वजाति सेवक के मान और प्रतिष्ठा का कारण वे बलिदान होते हैं जो वह अपनी जाति के लिए करता है। पण्डों और प्राग्वालों ने बालाजी का प्रतापवान रुप देखा ओर स्वर सुना, तो उनका क्रोध शान्त हो गया। जिस प्रकार सूर्य के निकलने से कुहरा आ जाता है उसी प्रकार बालाजी के आने से विरोधियों की सेना तितर-बितर हो गयी। बहुत से मनुष्य -- जो उपद्रव के उद्देश्य से आये थे -- श्रद्धापूर्वक बालाजी के चरणों में मस्तक झुका उनके अनुयायियों के वर्ग में सम्मिलित हो गये। बदलू शास्त्री ने बहुत चाहा कि वह पण्डों के पक्षपात और मूर्खता को उत्तेजित करें, किन्तु सफलता न हुई।
उस समय बालाजी ने एक परम प्रभावशाली वक्तुता दी जिसका एक-एक शब्द आज तक सुननेवालों के हृदय पर अंकित हैं ओर जो भारतवासियों के लिए सदा दीप का काम करेगी। बालाजी की वक्त॒ताएँ प्रायः सारगर्भित हैं। परन्तु वह प्रतिभा, वह ओज जिससे यह वक्तृता अलंकृत है, उनके किसी व्याख्यान में दीख नहीं पड़ते। उन्होनें अपने वाक्यों के जादू से थोड़ी ही देर में पण्डों को, अहीरों ओर पासियों से गले मिला दिया। उस वक्त॒ता के अंतिम शब्द थे --
यदि आप दृढता से कार्य करते जाएँगे तो अवश्य एक दिन आपको अभीष्ट सिद्धि का स्वर्ण स्तम्भ दिखायी देगा। परन्तु धेर्य को कभी हाथ से न जाने देना। दृढता बड़ी प्रबल शक्ति हें।
दृढता पुरुष के सब गुणों का राजा हैं। दृढ़ता वीरता का एक प्रधान अंग हैं। इसे कदापि हाथ से न जाने देना। तुम्हारी परीक्षाएँ होंगी। ऐसी दशा में दृढ़ता के अतिरिक्त कोई विश्वासपात्र पथ-प्रदर्शक नहीं मिलेगा। दृढ़ता यदि सफल न भी हो सके, तो संसार में अपना नाम छोड़ जाती हे'।
बालाजी ने घर पहुँचकर समाचार-पत्र खोला, मुख पीला हो गया, ओर सकरूुण हृदय से एक ठण्डी सांस निकल आयी। धर्मसिंह ने घबराकर पूछा -- कुशल तो है?
बालाजी--सदिया में नदी का बाँध फट गया बस साहस मनुष्य गृहहीन हो गये।
धर्मसिंह -- ओ हो।
बालाजी- सहसौरों मनुष्य प्रवाह की भेंट हो गये। सारा नगर नष्ट हो गया। घरों की छतों पर नावें चल रही हैं। भारत सभा के लोग पहुँच गये हें ओर यथा शक्ति लोगों की रक्षा कर रहें हे, किन्तु उनकी संख्या बहुत कम हें।
धर्मसिंह (जलनयन होकर) हे ईश्वर। तू ही इन अनाथों को नाथ हैं। गयीं। तीन घण्टे तक निरन्तर मूसलाधार पानी बरसता रहा। सोलह इंच पानी गिरा। नगर के उतरीय विभाग में सारा नगर एकत्र हैं। न रहने कों गृह हे, न खाने को अन्न। शव की
राशियां लगी हुई हैं बहुत से लोग भूखे मर जाते है। लोगों के विलाप ओर करुणाक्रन्दन से कलेजा मुँह को आता हैं। सब उत्पात-पीडित मनुष्य बालाजी को बुलाने की रट लगा रह हें। उनका विचार यह हे कि मेरे पहुँचने से उनके दुःख दूर हो जायेंगे।
कुछ काल तक बालाजी ध्यान में मग्न रहें, तत्पश्चात बोले -- मेरा जाना आवश्यक हे। में तुरंत जाऊँगा। आप सदियों की , भारत सभा” की तार दे दीजिये कि वह इस कार्य में मेरी सहायता करने को उद्यत् रहें।
राजा साहब ने सविनय निवेदन किया -- आज्ञा हो तो में चलूँ? बालाजी -- में पहुँचकर आपको सूचना दूँगा। मेरे विचार में आपके जाने की कोई आवश्यकता न होगी।
धर्मसिंह -- उत्तम होता कि आप प्रातःकाल ही जाते।
बालाजी -- नहीं। मुझे यहाँ एक क्षण भी ठहरना कठिन जान पड़ता है। अभी मुझे वहाँ तक पहुँचने में कई दिन लगेंगे। पल-भर में नगर में ये समाचार फेल गये कि सदिया में बाढ आ गयी और बालाजी इस समय वहाँ आ रहें हैं। यह सुनते ही सहसौ्रों मनुष्य बालाजी को पहुँचाने के लिए निकल पड़े। नो बजते--बजते द्वार पर पचीस सहस््र मनुष्यों क समुदाय एकत्र हो गया। सदिया की दुर्घटना प्रत्येक मनुष्य के मुख पर थी लोग उन आपत्ति-पीडित मनुष्यों की दशा पर सहानुभूति ओर चिन्ता प्रकाशित कर रहे थे। सेकडों मनुष्य बालाजी के संग जाने को कटिबद्ध हुए। सदियावालों की सहायता के लिए एक फण्ड खोलने का परामर्श होने लगा।
उधर धर्मसिंह के अन्तः पुर में नगर की मुख्य प्रतिष्ठित स्त्रियों ने आज सुवामा को धन्यवाद देने के लिए एक सभा एकत्र की थी। उस उच्च प्रसाद का एक-एक कोना स्त्रियों से भरा हुआ था। प्रथम वृजरानी ने कई स्त्रियों के साथ एक मंगलमय सुहावना गीत गाया। उसके पीछे सब स्त्रियाँ मण्डल बाँध कर गाते-बजाते आरती का थाल लिये सुदामा के गृह पर आयीं। सेवती ओर चन्दा अतिथि-सत्कार करने के लिए पहले ही से प्रस्तुत थी सुवामा प्रत्येक महिला से गले मिली ओर उन्हें आशीर्वाद दिया कि तुम्हारे अंक में भी ऐसे ही सपूत बच्चे खेलें। फिर रानीजी ने उसकी आरती की ओर गाना होने लगा। आज माधवी का मुखमंडल पुष्प की भाँति खिला हुआ था। मात्र वह उदास ओर चिंतित न थी। आशाएँ विष की गांठ हैं। उन्हीं आशाओं ने उसे कल रुलाया था। किन्तु आज उसका चित्र उन आशाओं से रिक्त हो गया हैं। इसलिए मुखमण्डल दिव्य ओर नेत्र विकसित हे।
निराशा रहकर उस देवी ने सारी आयु काट दी, परन्तु आशापूर्ण रह कर उससे एक दिन का दुःख भी न सहा गया।
सुहावने रागों के आलाप से भवन गूंज रहा था कि अचानक सदिया का समाचार वहाँ भी पहुंचा ओर राजा धर्मसिंह यह कहते यह सुनायी दिये -- आप लोग बालाजी को विदा करने के लिए तैयार हो जायें वे अभी सदिया जाते हें।
यह सुनते ही अर्धरात्रि का सन्नाटा छा गया। सुवामा घबड़ाकर उठी ओर द्वार की ओर लपकी, मानों वह बालाजी को रोक लेगी। उसके संग सब-की-सब स्त्रियाँ उठ खड़ी हुई ओर उसके पीछे-पीछे चली। वृजरानी ने कहा -- चची। क्या उन्हें बरबस विदा करोगी? अभी तो वे अपने कमरे में हें।
में उन्हें न जाने दूँगी। विदा करना केसा?
वृजरानी -- में क्या सदिया को लेकर चार्टूँगी? भाड़ में जाय। में भी तो कोई हूँ? मेरा भी तो उन पर कोई अधिकार हे?
वृजरानी -तुम्हें मेरी शपथ, इस समय ऐसी बातें न करना। सहसौ्रों मनुष्य केवल उनके भरोसे पर जी रहें हैं। यह न जायेंगे तो प्रलय हो जायेगा।
माता की ममता ने मनुष्यत्व और जातित्व को दबा लिया था, परन्तु वृजरानी ने समझा-बुझाकर उसे रोक लिया। सुवामा इस घटना को स्मरण करके सर्वदा पछताया करती थी। उसे आश्चर्य होता था कि में आपसे बाहर क्यों हो गयी। रानी जी ने पूछा -- विरजन बालाजी को कोन जयमाल पहिनायेगा।
विरजन --आप।
रानीजी -- और तुम क्या करोगी?
विरजन -में उनके माथे पर तिलक लगाऊँगी।
रानीजी -- माधवी कहाँ हैं?
विरजन (धीरे-से) उसे न छेड़ो। बेचारी अपने ध्यान में मग्न हें। बालाजी ने सुवामा को देखा तो निकट आकर उसके चरण स्पर्श किये। सुवामा ने उन्हें उठाकर हृदय में लगाया। कुछ कहना चाहती थी, परन्तु ममता से मुख न खोल सकी। रानी जी फूलों की जयमाल लेकर चली कि उसके कण्ठ में डाल दूँ, किन्तु चरण थराये ओर आगे न बढ़ सकीं। वृजरानी चन्दन का थाल लेकर चर्ली, परन्तु नेत्र श्रावण-घन की भाँति बरसने लगें। तब माधव चली। उसके नेत्रों में प्रेम की झलक थी ओर मुँह पर प्रेम की लाली। अधरों पर मोहिनी मुस्कान झलक रही थी ओर मन प्रेमोन्माद में मगन था। उसने बालाजी की ओर ऐसी चितवन से देखा जो अपार प्रेम से भरी हुई। तब सिर नीचा करके फूलों की जयमाला उसके गले में डाली। ललाट पर चन्दन का तिलक लगाया।
लोक-संस्कार की न्यूनता, वह भी पूरी हो गयी। उस समय बालाजी ने गम्भीर साँस ली। उन्हें प्रतीत हुआ कि में अपार प्रेम के समुद्र में वहाँ जा रहा हूँ। घेर्य का लंगर उठ गया ओर उसे मनुष्य की भाँति जो अकस्मात् जल में फिसल पडा हो, उन्होंने माधवी की बांह पकड़ ली। परन्तु हाँ,जिस तिनके का उन्होंने सहारा लिया वह स्वयं प्रेम की धार में तीत्र गति से बहा जा रहा था। उनका हाथ पकड़ते ही माधवी के रोम-रोम में बिजली दोड गयी। शरीर में स्वेद-बिन्दु झलकने लगे और जिस प्रकार वायु के झोंके से पुष्पदल पर पड़े हुए ओस के जलकण पृथ्वी पर गिर जाते हैं, उसी प्रकार माधवी के नेत्रों से अश्रु के बिन्दु बालाजी के हाथ पर टपक पड़े। प्रेम के मोती थे, जो उन मतवाली आँखों ने बालाजी को भेंट किये। आज से ये आँखें फिर न रोयेंगी।
आकाश पर तारे छिटके हुए थे और उनकी आड़ में बेठी हुई स्त्रियाँ यह दृश्य देख रही थी आज प्रात:काल बालाजी के स्वागत में यह गीत गाया था --
बालाजी तेरा आना मुबारक होवे। ओर इस समय स्त्रियाँ अपने मन-भावन स्वरों से गा रहीं हैं --
बालाजी तेरा आना मुबारक होवे।
आना भी मुबारक था ओर जाना भी मुबारक हैं। आने के समय भी लोगों की आँखों से आँसू निकले थे ओर जाने के समय भी निकल रहें हैं। कल वे नवागत के अतिथि स्वागत के लिए आये थे। आज उसकी विदाई कर रहें हें उनके रंग-रुप सब पूर्ववत हे; परन्तु उनमें कितना अन्तर हें।
