जब से वृजरानी का काव्य-चन्द्र उदय हुआ, तभी से उसके यहाँ सदेव महिलाओं का जमघट लगा रहता था। नगर मे स्त्रियों की कई सभाएँ थी उनके प्रबंध का सारा भार उसी को उठाना पड़ता था। उसके अतिरिक्त अन्य नगरों से भी बहुधा स्त्रियों उससे भेंट करने को आती रहती थी जो तीर्थयात्रा करने के लिए काशी आता, वह विरजन से अवश्य मिलता। राजा धर्मसिंह ने उसकी कविताओं का सर्वाग-सुन्दर संग्रह प्रकाशित किया था। उस संग्रह ने उसके काव्य--चमत्कार का डंका, बजा दिया था। भारतवर्ष की कोन कहे, यूरोप और अमेरिका के प्रतिष्ठित कवियों ने उसे उनकी काव्य मनोहरता पर धन्यवाद दिया था। भारतवर्ष में एकाध ही कोई रसिक मनुष्य रहा होगा जिसका पुस्तकालय उसकी पुस्तक से सुशोभित न होगा। विरजन की कविताओं को प्रतिष्ठा करने वालों मे बालाजी का पद सबसे ऊँचा था। वे अपनी प्रभावशालिनी वक्तृताओं और लेखों में बहुधा उसी के वाक्यों का प्रमाण दिया करते थे। उन्होंने 'सरस्वती' में एक बार उसके संग्रह की सविस्तार समालोचना भी लिखी थी।
एक दिन प्रातः काल ही सीता, चन्द्रकुँवर ,रुक्मिणी और रानी विरजन के घर आर्यी। चन्द्रा ने इन स्त्रियों को फर्श पर बिठाया ओर आदर सत्कार किया। विरजन वहाँ नहीं थी क्योंकि उसने प्रभात का समय काव्य चिन्तन के लिए नियत कर लिया था। उस समय यह किसी आवश्यक कार्य के अतिरिक्त सखियों से मिलती-जुलती नहीं थी। वाटिका में एक रमणीक कुंज था। गुलाब की सुगन्धित से सुरभित वायु चलती थी। वहीं विरजन एक शिलासन पर बेठी हुई काव्य--रचना किया करती थी। वह काव्य रूपी समुद्र से जिन मोतियों को निकालती, उन्हें माधवी लेखनी की माला में पिरों लिया करती थी। आज बहुत दिनों के बाद नगरवासियों के अनुरोध करने पर विरजन ने बालाजी की काशी आने का निमंत्रण देने के लिए लेखनी को उठाया था। बनारस ही वह नगर था, जिसका स्मरण कभी-कभी बालाजी को व्यग्र कर दिया करता था। किन्तु काशी वालों के निरन्तर आग्रह करने पर भी उन्हें काशी आने का अवकाश न मिलता था। वे सिंहल और रंगून तक गये, परन्तु उन्होनें काशी की ओर मुख न फेरा इस नगर को वे अपना परीक्षा भवन समझते थे।
इसलिए आज विरजन उन्हें काशी आने का निमंत्रण दे रही हैं। लोगों का विचार आ जाता है, तो विरजन का चन्द्रानन चमक उठता हे, परन्तु इस समय जो विकास और छटा इन दोनों पुष्पों पर हे, उसे देख-देखकर दूर से फूल लज्जित हुए जाते हें।
नो बजते-बजते विरजन घर में आयी।
सेवती ने कहा-- आज बड़ी देर लगायी।
विरजन -- कुन्ती ने सूर्य को बुलाने के लिए कितनी तपस्या की थी।
सीता -- बाला जी बड़े निष्टुर हैं। में तो ऐसे मनुष्य से कभी न बोलूँ।
रुक्मिणी -- जिसने संन्यास ले लिया, उसे घर-बार से क्या नाता? चन्द्रकुँवर- यहाँ आयेंगे तो में मुख पर कह दूँगी कि महाशय, यह नखरे कहाँ सीखें?
रुक्मिणी -- महारानी। ऋषि-महात्माओं का तो शिष्टाचार किया करों जिह्वा क्या है कतरनी है।
चन्द्रकुँवर-- ओर क्या, कब तक सन्तोष करें जी। सब जगह जाते हैं, यहीं आते पेर थकते हें।
विरजन-- (मुस्कराकर) अब बहुत शीघ्र दर्शन पाओगे। मुझे विश्वास है कि इस मास में वे अवश्य आयेंगे।
सीता-- धन्य भाग्य कि दर्शन मिलेंगे। में तो जब उनका वृतांत पढ़ती हूँ यही जी चाहता हें कि पाऊँ तो चरण पकड़कर घतण्टों रोऊँ।
रुक्मिणी -- ईश्वर ने उनके हाथों में बड़ा यश दिया। दारानगर की रानी साहिबा मर चुकी थी सांस टूट रही थी कि बालाजी को सूचना हुई। झट आ पहुँचे ओर क्षण-मात्र में उठाकर बेठा दिया। हमारे मुंशीजी (पति)उन दिनों वहीं थे। कहते थे कि रानीजी ने कोश की कुंजी बालाजी के चरणों पर रख दी ओर कहा -- 'आप इसके स्वामी हें'। बालाजी ने कहा -- 'मुझे धन की आवश्यकता नहीं अपने राज्य में तीन सो गोशालाएँ खुलवा दीजिये!। मुख से निकलने की देर थी। आज दारानगर में दूध की नदी बहती हैं। ऐसा महात्मा कौन होगा।
चन्द्रकुंवर -- राजा नवलखा का तपेदिक उन्ही की बूटियों से छूटा। सारे वेद्य डाक्टरजवाब दे चुके थे। जब बालाजी चलने लगें, तो महारानी जी ने नो लाख का मोतियों का हार उनके चरणों पर रख दिया। बालाजी ने उसकी ओर देखा तक नहीं। रानी -- कैसे रूखे मनुष्य हें।
रुक्मिणी -- हाँ, ओर क्या, उन्हें उचित था कि हार ले लेते, नहीं- नहीं, कण्ठ में डाल लेते।
विरजन -- नहीं, लेकर रानी को पहिना देते। क्यों सखी?
रानी -- हाँ में उस हार के लिए गुलामी लिख देती।
चन्द्रकुँवर -- हमारे यहाँ (पति)तो भारत-सभा के सभ्य बेठे हें ढाई सो रुपये लाख यत्ञ करके रख छोड़े थे, उन्हें यह कहकर उठा ले गये कि घोड़ा लेंगे। क्या भारत-सभावाले बिना घोड़े के नहीं चलते?
रानी--कल ये लोग श्रेणी बांधकर मेरे घर के सामने से जा रहे थे,बडे भले मालूम होते थे।
इतने ही में सेवती नवीन समाचार-पत्र ले आयी।
विरजन ने पूछा -- कोई ताजा समाचार हे?
सेवती-हाँ, बालाजी मानिकपुर आये हैं। एक अहीर ने अपनी पुत्र के विवाह का निमंत्रण भेजा था। उस पर प्रयाग से भारतसभा के सभ्यों हित रात को चलकर मानिकपुर पहुंचे। अहीरों ने बडे उत्साह और समारोह के साथ उनका स्वागत किया है ओर सबने मिलकर पाँच सो गाएँ भेंट दी हैं बालाजी ने वधू को आशीर्वाद दिया ओर दुल्हे को हृदय से लगाया। पाँच अहीर भारत सभा के सदस्य नियत हुए।
विरजन -- बड़े अच्छे समाचार हें। माधवी, इसे काट के रख लेना। और कुछ?
सेवती -- पटना के पासियों ने एक ठाकुरद्वारा बनवाया हें वहाँ की भारतसभा ने बड़ी धूमधाम से उत्सव किया।
विरजन -- पटना के लोग बडे उत्साह से कार्य कर रहें हें। चन्द्रकुँवर -- गडूरियां भी अब सिन्दूर लगायेंगी। पासी लोग ठाकुर द्वारे बनवायंगे?
रुक्मिणी -- क्यों, वे मनुष्य नहीं हैं? ईश्वर ने उन्हें नहीं बनाया। आप हीं अपने स्वामी की पूजा करना जानती हें?
चन्द्रकुँवर -- चलो, हटो, मुझें पासियों से मिलाती हो। यह मुझे अच्छा नहीं लगता।
रुक्मिणी -- हाँ, तुम्हारा रंग गोरा हे न? ओर वस्त्र-आभूषणों से सजी बहुत हो। बस इतना ही अन्तर है कि और कुछ? चन्द्रकुँवर -- इतना ही अन्तर क्यों हैं? पृथ्वी आकाश से मिलाती हो? यह मुझे अच्छा नहीं लगता। मुझे कछवाहों वंश में हूँ, कुछ खबर हे?
रुक्मिणी -- हाँ, जानती हूँ ओर नहीं जानती थी तो अब जान गयी। तुम्हारे ठाकुर साहब (पति)किसी पासी से बढ़कर मल्ल- युद्ध करेंगें? यह सिर्फ टेढी पाग रखना जानते हें? में जानती हूँ कि कोई छोटा --सा पासी भी उन्हें काँख --तले दबा लेगा।
विरजन -- अच्छा अब इस विवाद को जाने तो। तुम दोनों जब आती हो, लड़ती हो आती हो।
सेवती -- पिता ओर पुत्र का केसा संयोग हुआ हे? ऐसा मालूम होता हैं कि मुंशी शलिग्राम ने प्रतापचन्द्र ही के लिए संन्यास लिया था। यह सब उन्हीं कर शिक्षा का फल हें।
रुक्मिणी -- हाँ ओर क्या? मुंशी शलिग्राम तो अब स्वामी ब्रह्मानन्द कहलाते हैं। प्रताप को देखकर पहचान गये होगें । सेवती -- आनन्द से फूले न समाये होगें।
रुक्मिणी -- यह भी ईश्वर की प्रेरणा थी, नहीं तो प्रतापचन्द्र मानसरोवर क्या करने जाते?
सेवती--ईश्वर की इच्छा के बिना कोई बात होती हे? विरजन--तुम लोग मेरे लालाजी को तो भूल ही गयी। ऋषीकेश में पहले लालाजी ही से प्रतापचन्द्र की भेंट हुई थी। प्रताप उनके साथ साल-भर तक रहे। तब दोनों आदमी मानसरोवर की ओर चले।
रुक्मिणी-हाँ, प्राणनाथ के लेख में तो यह वृतान्त था। बालाजी तो यही कहते हैं कि मुंशी संजीवनलाल से मिलने का सोभाग्य मुझे प्राप्त न होता तो में भी माँगने-खानेवाले साधुओं में ही होता।
चन्द्रकुंवर -- इतनी आत्मोन्नति के लिए विधाता ने पहले ही से सब सामान कर दिये थे।
सेवती--तभी इतनी-सी अवस्था में भारत के सूर्य बने हुए हैं। अभी पचीसवें वर्ष में होगें?
विरजन -- नहीं, तीसवां वर्ष है। मुझसे साल भर के जेठे हें। रुक्मिणी -- मैंने तो उन्हें जब देखा, उदास ही देखा।
चन्द्रकुँवर -- उनके सारे जीवन की अभिलाषाओं पर ओंस पड़ गयी। उदास क्यों न होंगी?
रुक्मिणी -- उन्होने तो देवीजी से यही वरदान मांगा था। चन्द्रकुँवर -- तो क्या जाति की सेवा गृहस्थ बनकर नहीं हो सकती?
रुक्मिणी -- जाति ही कया, कोई भी सेवा गृहस्थ बनकर नहीं हो सकती। गृहस्थ केवल अपने बाल-बच्चों की सेवा कर सकता है।
चन्द्रकुँवर -- करनेवाले सब कुछ कर सकते हें, न करनेवालों के लिए सो बहाने हें।
एक मास ओर बीता। विरजन की नई कविता स्वागत का सन्देशा लेकर बालाजी के पास पहुँची परन्तु यह न प्रकट हुआ कि उन्होंने निमंत्रण स्वीकार किया या नहीं। काशीवासी प्रतीक्षा करते--करते थक गये। बालाजी प्रतिदिन दक्षिण की ओर बढ़ते चले जाते थे। निदान लोग निराश हो गये ओर सबसे अधिक निराशा विरजन को हुई।
एक दिन जब किसी को ध्यान भी न था कि बालाजी आयेंगे, प्रागनाथ ने आकर कहा -- बहिन। लो प्रसन्न हो जाओ, आज बालाजी आ रहे हें।
विरजन कुछ लिख रही थी, हाथों से लेखनी छूट पड़ी। माधवी उठकर द्वार की ओर लपकी।
प्राणनाथ ने हँसकर कहा -- क्या अभी आ थेड़े ही गये हैं कि इतनी उद्विग्न हुई जाती हो।
माधवी -- कब आयेंगे इधर से ही होकर जानेंगे न?
प्राणनाथ -- यह तो नहीं ज्ञात हे कि किधर से आयेंगे। उन्हें आडम्बर ओर धूमधाम से बड़ी घृणा है। इसलिए पहले से आने की तिथि नहीं नियत की। राजा साहब के पास आज प्रातःकाल एक मनुष्य ने आकर सूचना दी कि बालाजी आ रहे हैं ओर कहा है कि मेरी अग॒वानी के लिए धूमधाम न हो, किन्तु यहाँ के लोग कब मानते हैं? अगवानी होगी, समारोह के साथ सवारी निकलेगी, ओर ऐसी कि इस नगर के इतिहास में स्मरणीय हो। चारों ओर आदमी छूटे हुए हैं। ज्योंही उन्हें आते देखेंगे, लोग प्रत्येक मुहल्ले में टेलीफोन द्वारा सूचना दे देंगे। कालेज ओर स्कूलों के विद्यार्थी वर्दियाँ पहने ओर झण्डियाँ लिये इन्तजार में खड़े हें। घर-घर पुष्प-वर्षा की तैयारियाँ हो रही हैं बाजार में दुकानें सजायी जा रहीं हैं। नगर में एक धूम सी मची हुई हे।
माधवी -- इधर से जायेंगे तो हम रोक लेंगी।
प्राणनाथ -- हमने कोई तैयारी तो की नहीं, रोक कया लेंगे? और यह भी तो नहीं ज्ञात हें कि किधर से जायेंगे।
विरजन -- (सोचकर) आरती उतारने का प्रबन्ध तो करना ही होगा।
प्राणनाथ -- हाँ अब इतना भी न होगा? में बाहर बिछावन आदि बिछावाता हूँ।
प्राणनाथ बाहर की तैयारियों में लगे, माधवी फूल चुनने लगी, विरजन ने चांदी का थाल भी धोकर स्वच्छ किया। सेवती ओर चन्द्रा भीतर सारी वस्तुएँ क्रमानुसार सजाने लगीं। माधवी हर्ष के मारे फूली न समाती थी। बारम्बार चोक-चॉककर द्वार की ओर देखती कि कहीं आ तो नहीं गये।
बारम्बार कान लगाकर सुनती कि कहीं बाजे की ध्वनि तो नहीं आ रही है। हृदय हर्ष के मारे धडक रहा था। फूल चुनती थी, किन्तु ध्यान दूसरी ओर था। हाथों में कितने ही कांटे चुभा लिए। फूलों के साथ कई शाखाएँ मरोड़ डालीं। कई बार शाखाओं में उलझकर गिरी। कई बार साड़ी कांटों में फँसा दीं। उस समय उसकी दशा बिलकुल बच्चों की-सी थी।
किन्तु विरजन का बदन बहुत सी मलिन था। जैसे जलपूर्ण पात्र तनिक हिलने से भी छलक जाता हे, उसी प्रकार ज्यों-ज्यों प्राचीन घटनाएँ स्मरण आती थी, त्यों-त्यों उसके नेत्रों से अश्रु छलक पड़ते थे। आह!कभी वे दिन थे कि हम ओर वह भाई-बहिन थे। साथ खेलते, साथ रहते थे। आज चोदह वर्ष व्यतीत हुए, उनका मुख देखने का सोभाग्य भी न हुआ। तब में तनिक भी रोती वह मेरे आँसू पोंछते ओर मेरा जी बहलाते। अब उन्हें क्या सुधि कि ये आँखें कितनी रोयी हैं ओर इस हृदय ने केसे-केसे कष्ट उठाये हैं। क्या खबर थी की हमारे भाग्य ऐसे दृश्य दिखायेंगे? एक वियोगिन हो जायेगी ओर दूसरा सन्यासी।
अकस्मात् माधवी को ध्यान आया कि सुवासा को कदाचित बालाजी के आने की सुचना न हुई हो। वह विरजन के पास आक बोली - में तनिक चची के यहाँ जाती हूँ। न जाने किसी ने उनसे कहा या नहीं?
प्राणगनाथ बाहर से आ रहे थे, यह सुनकर बोले -- वहाँ सबसे पहले सूचना दी गयीं भली-भाँति तेयारियाँ हो रही है। बालाजी भी सीधे घर ही की ओर पधारेंगे। इधर से अब न आयेंगे।
विरजन -- तो हम लोगों का चलना चाहिए। कहीं देर न हो जाए। माधवी -- आरती का थाल लाऊँ?
विरजन -- कोन ले चलेगा? महरी को बुला लो (चॉककर) अरे! तेरे हाथों में रुधिर कहाँ से आया?
माधवी -- ऊँह! फूल चुनती थी, काँटे लग गये होंगे।
चन्द्रा -- अभी नयी साड़ी आयी हे। आज ही फाड़ के रख दी। माधवी -- तुम्हारी बला से!
माधवी ने कह तो दिया, किन्तु आँखें अश्रपूर्ण हो गयीं। चन्द्रा साधारणतः बहुत भली स्त्री थी। किन्तु जब से बाबू राधाचरण ने जाति-सेवा के लिए नोकरी से इस्तीफा दे दिया था वह बालाजी के नाम से चिढ़ती थी। विरजन से तो कुछ न कह सकती थी, परन्तु माधवी को छेड़ती रहती थी। विरजन ने चन्द्रा की ओर घूरकर माधवी से कहा -- जाओ, सन्दूक से दूसरी साड़ी निकाल लो। इसे रख आओ। राम-राम, मार हाथ छलनी कर डाले!
माधवी -- देर हो जायेगी, में इसी भाँति चलूँगी।
विरजन -- नही, अभी घण्टा भर से अधिक अवकाश हे।
यह कहकर विरजन ने प्यार से माधवी के हाथ धोये। उसके बाल गाँये, एक सुन्दर साड़ी पहिनायी, चादर ओढ़ायी और उसे हृदय से लगाकर सजल नेत्रों से देखते हुए कहा -- बहिन! देखो, धीरज हाथ से न जाय।
माध्वी मुस्कराकर बोली -- तुम मेरे ही संग रहना, मुझे सँभलती रहना। मुझे अपने हृदय पर भरोसा नहीं हे।
विरजन ताड़ गई कि आज प्रेम ने उन्मत्तता का पद ग्रहण किया है और कदाचित् यही उसकी पराकाष्ठा है। कहाँ !यह बावली बालू की भीत उठा रही है।
माधवी थोड़ी देर के बाद विरजन, सेवती, चन्द्रा आदि कई स्त्रियों के संग सुवामा के घर चली। वे वहाँ की तेयारियाँ देखकर चकित हो गयीं। द्वार पर एक बहुत बड़ा चँँदोवा बिछावन, शीशे ओर भाँति-भाँति की सामग्रियों से सुसज्जित खड़ा था। बधाई बज रही थी! बड़े-बड़े टोकरों में मिठाइयाँ ओर मेवे रखे हुए थे। नगर के प्रतिष्ठित सभ्य उत्तमोत्तम वस्त्र पहिने हुए स्वागत करने को खड़े थे। एक भी फिटन या गाड़ी नहीं दिखायी देती थी, क्योंकि बालाजी सर्वदा पेदल चला करते थे। बहुत से लोग गले में झोलियाँ डालें हुए दिखाई देते थे, जिनमें बालाजी पर समर्पण करने के लिये रुपये-पेसे भरे हुए थे। राजा धर्मसिंह के पाँचों लड़के रंगीन वस्त्र पहिने, केसरिया पगड़ी बांधे, रेशमी झण्डियाँ कमरे से खोंसे बिगुल बजा रहे थे। ज्योंही लोगों की दृष्टि विरजन पर पड़ी, सहस्नों मस्तक शिष्टाचार के लिए झुक गये। जब ये देवियां भीतर गयीं तो वहाँ भी आंगन ओर दालान नवागत वधू की भाँति सुसज्जित दिखे! सेकड़ो स्त्रीयां मंगल गाने के लिए बेठी थीं। पुष्पों की राशियाँ ठोर-ठोर पड़ी थी। सुवामा एक श्वेत साड़ी पहिने सन््तोष ओर शान्ति की मूर्ति बनी हुई द्वार पर खड़ी थी। विरजन ओर माधवी को देखते ही सजल नयन हो गयी। विरजन बोली -- चची! आज इस घर के भाग्य जग गये।
सुवामा ने रोकर कहा -- तुम्हारे कारण मुझे आज यह दिन देखने का सोभाग्य हुआ। ईश्वर तुम्हें इसका फल दे।
दुखिया माता के अन्तःकरण से यह आशीर्वाद निकला। एक माता के शाप ने राजा दशरथ को पुत्रशोक में मृत्यु का स्वाद चखाया था। क्या सुवामा का यह आशीर्वाद प्रभावहीन होगा?
दोनों अभी इसी प्रकार बातें कर रही थीं कि घण्टे और शंख की ध्वनि आने लगी। धूम मची की बालाजी आ पहुंचे। स्त्रियों ने मंगलगान आरम्भ किया। माधवी ने आरती का थाल ले लिया मार्ग की ओर टकटकी बांधकर देखने लगी। कुछ ही काल मे अद्वेताम्बरधारी नवयुवकों का समुदाय दिखायी पड़ा। भारतसभा के सो सभ्य घोड़ों पर सवार चले आते थे। उनके पीछे अगणित मनुष्यों का झुण्ड था। सारा नगर टूट पड़ा। कन्धे से कन्धा छिला जाता था मानो समुद्र की तरंगें बढ़ती चली आती हैं। इस भीड़ में बालाजी का मुखचन्द्र ऐसा दिखायी पड़ता था मानो मेघाच्छुदित चन्द्र उदय हुआ है। ललाट पर अरुण चन्दन का तिलक था ओर कण्ठ में एक गेहुएँ रंग की चादर पड़ी हुई थी। सुवामा द्वार पर खड़ी थी, ज्योंही बालाजी का स्वरुप उसे दिखायी दिया धीरज हाथ से जाता रहा। द्वार से बाहर निकल आयी ओर सिर झुकाये, नेत्रों से मुक्ताहार गूँथती बालाजी के ओर चली। आज उसने अपना खोया हुआ लाल पाया है। वह उसे हृदय से लगाने के लिए उद्विग्न है।
सुवामा को इस प्रकार आते देखकर सब लोग रुक गये। विदित होता था कि आकाश से कोई देवी उतर आयी है। चतुर्दिक् सन्नाटा छा गया। बालाजी ने कई डग आगे बढ़कर माताजी को प्रमाण किया और उनके चरणों पर गिर पड़े। सुवामा ने उनका मस्तक अपने अंक में लिया। आज उसने अपना खोया हुआ लाल पाया है। उस पर आँखों से मोतियों की वृष्टि कर रहीं है।
इस उत्साहवर्द्धक दृश्य को देखकर लोगों के हृदय जातीयता के मद में मतवाले हो गये। पचास सहस्र स्वर से ध्वनि आयी -- "बालाजी की जय।' मेघ गर्जा और चतुर्दिक् से पुष्पवृष्टि होने लगी। फिर उसी प्रकार दूसरी बार मेघ की गर्जना हुई। 'मुंशी शालिग्राम की जय' ओर सहसों मनुष्य स्वदेश-प्रेम के मद से मतवाले होकर दोड़े और सुवामा के चरणों की रज माथे पर मलने लगे। इन ध्वनियों से सुवामा ऐसी प्रमुदित हो रहीं थी जैसे महुअर के सुनने से नागिन मतवाली हो जाती है। आज उसने अपना खोया हुआ लाल पाया है। अमूल्य रत्न पाने से वह रानी हो गयी हे। इस रत्न के कारण आज उसके चरणों की रज लोगो के नेत्रों का अंजन ओर माथे का चन्दन बन रही हे।
अपूर्व दृश्य था। बारम्बार जय-जयकार की ध्वनि उठती थी और स्वर्ग के निवासियों को भारत की जागृति का शुभ-संवाद सुनाती थी। माता अपने पुत्र को कलेजे से लगाये हुए है। बहुत दिन के अनन्तर उसने अपना खोया हुआ लाल है, वह लाल जो उसकी जन्म-भर की कमाई था। फूल चारों ओर से निछावर हो रहे हे। स्वर्ण ओर रत्नों की वर्षा हो रही है। माता और पुत्र कमर तक पुष्पों के समुद्र में डूबे हुए हे। ऐसा प्रभावशाली दृश्य किसके नेत्रों ने देखा होगा।
सुवामा बालाजी का हाथ पकड़े हुए घर की ओर चली। द्वार पर पहुँचते ही स्त्रियाँ मंगल-गीत गाने लगीं ओर माधवी स्वर्ण रचित थाल दीप ओर पुष्पों से आरती करने लगी। विरजन ने फूलों की माला -- जिसे माधवी ने अपने रक्त से रंजित किया था -- उनके गले में डाल दी। बालाजी ने सजल नेत्रों से विरजन की ओर देखकर प्रणाम किया।
माधवी को बालाजी के दर्शन की कितनी अभिलाषा थी। किन्तु इस समय उसके नेत्र पृथ्वी की ओर झुके हुए है। वह बालाजी की ओर नहीं देख सकती। उसे भय हे कि मेरे नेत्र पृथ्वी हृदय के भेद को खोल देंगे। उनमें प्रेम रस भरा हुआ है। अब तक उसकी सबसे बड़ी अभिलाषा यह थी कि बालाजी का दर्शन पाऊँ। आज प्रथम बार माधवी के हृदय में नयी अभिलाषाएँ उत्पन्न हुई, आज अभिलाषाओं ने सिर उठाया हे, मगर पूर्ण होने के लिए नहीं, आज अभिलाषा-वाटिका में एक नवीन कली लगी हे, मगर खिलने के लिए नहीं, वरन मुरझाने मिट्टी में मिल जाने के लिए। माधवी को कोन समझाये कि तू इन अभिलाषाओं को हृदय में उत्पन्न होने दे। ये अभिलाषाएँ तुझे बहुत रुलायेंगी। तेरा प्रेम काल्पनिक है। तू उसके स्वाद से परिचित है। क्या अब वास्तविक प्रेम का स्वाद लिया चाहती है?
