दिन जाते देर नहीं लगती। दो वर्ष व्यतीत हो गये। पण्डित मोटेराम नित्य प्रातः: काल आते और सिद्धान्त-कोमुदी पढ़ाते, परन्तु अब उनका आना केवल नियम पालने के हेतु ही था, क्योंकि इस
पुस्तक के पढ़ने में अब विरजन का जी न लगता था। एक दिन मुंशी जी इंजीनियर के दफ्तर से आये। कमरे में बेठे थे। नोकर जूते का फीता खोल रहा था कि रधिया महर मुस्कराती हुई घर में से निकली और उनके हाथ में मुँह छाप लगा हुआ लिफाफा रख, मुँह फेर हँसने लगी। श्रीनाम पर लिखा हुआ था -- श्रीमान बाबा साहब की सेवा में प्राप्त हो।
मुंशी -- अरे, तू किसका लिफाफा ले आयी? यह मेरा नहीं है।
महरी -- सरकार ही का तो है, खोले तो आप।
मुंशी -- किसने दिया? कोई आदमी बाहर से आया था?
महरी मुस्कराती हुई बोली -- आप खोलेंगे तो पता चल जायेगा।
मुंशी जी ने विस्मित होकर लिफाफा खोला। उसमें से जो पत्र निकला उसमें यह लिखा हुआ था --
बाबा को विरजन का प्रमाण और पालागन पहुंचे। यहाँ आपकी कृपा से कुशल-मंगल है आपका कुशल श्री विश्वनाथजी से सदा मनाया करती हूँ। मेंने प्रताप से भाषा सीख ली। वे स्कूल से आकर संध्या को मुझे नित्य पढ़ाते हैं। अब आप हमारे लिए अच्छी-अच्छी पुस्तकें लाइए, क्योंकि पढ़ना ही जी का सुख है ओर विद्या अमूल्य वस्तु है। वेद-पुराण में इसका महात्म्य लिखा है। मनुष्य को चाहिए कि विद्या-धन तन-मन से एकत्र करे। विद्या से सब दुख हो जाते हैं। मेंने कल बेताल-पचीस की कहानी चाची को सुनायी थी। उन्होंने मुझे एक सुन्दर गुड़िया पुरस्कार में दी है। बहुत अच्छी हे। में उसका विवाह करूँगी, तब आपसे रुपये लूँगी। में अब पण्डितजी से न पढ़ूँगी। माँ नहीं जानती कि में भाषा पढ़ती हूँ।
आपकी प्यारी विरजन
प्रशस्ति देखते ही मुंशी जी के अन्तः करण में गुदगुदी होने लगी। फिर तो उन्होंने एक ही सांस में भारी चिट्ठी पढ़ डाली। मारे आनन्द के हँसते हुए नंगे-पांव भीतर दोड़े। प्रताप को गोद में उठा लिया और फिर दोनों बच्चों का हाथ पकड़े हुए सुशीला के पास गये। उसे चिट्टी दिखाकर कहा -- बुझो किसी चिट्टी हे? सुशीला -- लाओ, हाथ में दो, देखूँ।
मुंशी जी -- नहीं, वहीं से बेठी-जेठी बताओ जल्दी।
सुशीला -- बूझ जाऊँ तो क्या दोगे?
मुंशी जी -- पचास रुपये, दूध के धोये हुए।
सुशीला -- पहिले रुपये निकालकर रख दो, नहीं तो मुकर जाओगे।
मुंशी जी -- मुकरने वाले को कुछ कहता हूँ, अभी रुपये लो। ऐसा कोई टुटपूँजिया समझ लिया हे?
यह कहकर दस रुपये का एक नोट जेसे निकालकर दिखाया।
सुशीला -- कितने का नोट हे?
मुंशीजी -- पचास रुपये का, हाथ से लेकर देख लो।
सुशीला - ले लूँगी, कहे देती हूँ।
मुंशीजी -- हाँ-हाँ,ले लेना, पहले बता तो सही।
सुशीला -- लल्लू का हे लाइये नोट, अब में न मानूँगी। यह कहकर उठी और मुंशीजी का हाथ थाम लिया।
मुंशीजी -- ऐसा क्या डकेती है? नोट छीने लेती हो।
सुशीला -- वचन नहीं दिया था? अभी से विचलने लगे।
मुंशीजी -- तुमने बुझा भी, सर्वथा भ्रम में पड़ गयीं।
सुशीला -- चलो-चलो, बहाना करते हो, नोट हड़पने की इच्छा हे। क्यों लल्लू, तुम्हारी ही चिट्ठी हे न?
प्रताप नीची दृष्टि से मुंशीजी की ओर देखकर धीरे-से बोला -- मैंने कहाँ लिखी?
मुंशीजी -- लजाओ, लजाओ।
सुशीला -- वह झूठ बोलता है। उसी की चिट्ठी हे, तुम लोग गँठकर आये हो।
प्रताप -- मेरी चिट्ठी नहीं है,सच। विरजन ने लिखी हे।
सुशीला चकित होकर बोली -- विरजन की? फिर उसने दोड़कर पति के हाथ से चिट्ठी छीन ली ओर भोंचक्की होकर उसे देखने लगी, परन्तु अब भी विश्वास आया। विरजन से पूछा - क्यों बेटी, यह तुम्हारी लिखी है?
विरजन ने सिर झुकाकर कहा - हाँ।
यह सुनते ही माता ने उसे कंठ से लगा लिया।
अब आज से विरजन की यह दशा हो गयी कि जब देखिए लेखनी लिए हुए पन्ने काले कर रही है। घर के धन्धों से तो उस पहले ही कुछ प्रयोजन न था, लिखने का आना सोने में सोहागा हो गया। माता उसकी तललीनता देख-देखकर प्रमुदित होती पिता हर्ष से फूला न समाता, नित्य नवीन पुस्तकें लाता कि विरजन सयानी होगी, तो पढ़ेगी। यदि कभी वह अपने पांव धो लेती, या भोजन करके अपने ही हाथ धोने लगती तो माता महरियों पर बहुत कद्ध होती -- आँखें फूट गयी है। चर्बी छा गई है। वह अपने हाथ से पानी उँडेल रही हे ओर तुम खड़ी मुँह ताकती हो।
इसी प्रकार काल बीतता चला गया, विरजन का बारहवाँ वर्ष पूर्ण हुआ, परन्तु अभी तक उसे चावल उबालना तक न आता था। चूल्हे के सामने बेठन का कभी अवसर ही न आया। सुवामा ने एक दिन उसकी माता ने कहा -- बहिन विरजन सयानी हुई, क्या कुछ गुन-ढंग सिखाओगी।
सुशीला -- क्या कहूँ, जी तो चाहता है कि लग्गा लगाऊँ परन्तु कुछ सोचकर रुक जाती हूँ।
सुवामा -- क्या सोचकर रुक जाती हो?
सुशीला -- कुछ नहीं आलस आ जाता हे।
सुवामा -- तो यह काम मुझे सॉंप दो। भोजन बनाना स्त्रियों के लिए सबसे आवश्यक बात हे।
सुशीला -- अभी चूल्हे के सामन उससे बेठा न जायेगा।
सुवामा -- काम करने से ही आता है।
सुशीला -- (झेंपते हुए) फूल-से गाल कुम्हला जायेंगे।
सुवामा -- (हँसकर) बिना फूल के मुरझाये कहीं फल लगते हैं? दूसरे दिन से विरजन भोजन बनाने लगी। पहले दस-पाँच दिन उसे चूल्हे के सामने बेठने में बड़ा कष्ट हुआ। आग न जलती, फुँकने लगती तो नेत्रों से जल बहता। वे बूटी की भाँति लाल हो जाते। चिनगारियों से कई रेशमी साड़ियाँ सत्यानाश हो गयीं।
हाथों में छाले पड़ गये। परन्तु क्रमशः सारे क्लेश दूर हो गये। सुवामा ऐसी सुशीला स्त्री थी कि कभी रुष्ट न होती, प्रतिदिन उसे पुचकारकर काम में लगाये रहती।
अभी विरजन को भोजन बनाते दो मास से अधिक न हुए होंगे कि एक दिन उसने प्रताप से कहा -- लललू,मुझे भोजन बनाना आ गया।
प्रताप -- सच ।
विरजन -- कल चाची ने मेरा बनाया भोजन किया था। बहुत प्रसन्न हुए।
प्रताप -- तो भई, एक दिन मुझे भी नेवता दो।
विरजन ने प्रसन्न होकर कहा -- अच्छा,कल।
दूसरे दिन नो बजे विरजन ने प्रताप को भोजन करने के लिए बुलाया। उसने जाकर देखा तो चोका लगा हुआ है। नवीन मिट्टी की मीठी-मीठी सुगन्ध आ रही है। आसन स्वच्छता से बिछा हुआ है। एक थाली में चावल और चपातियाँ हैं। दाल और तरकारियाँ अलग-अलग कटोरियों में रखी हुई हैं। लोटा और गिलास पानी से भरे हुए रखे हैं। यह स्वच्छुता ओर ढंग देखकर प्रताप सीधा मुंशी संजीवनलाल के पास गया ओर उन्हें लाकर चोके के सामने खड़ा कर दिया। मुंशीजी खुशी से उछल पड़े।
चट कपड़े उतार, हाथ-पेर धो प्रताप के साथ चोके में जा बेठे। बेचारी विरजन क्या जानती थी कि महाशय भी बिना बुलाये पाहुने हो जायेंगे। उसने केवल प्रताप के लिए भोजन बनाया था। वह उस दिन बहुत लजायी ओर दबी आँखों से माता की ओर देखने लगी। सुशीला ताड़ गयी। मुस्कराकर मुंशीजी से बोली -- तुम्हीरे लिए अलग भोजन बना है। लड़कों के बीच में क्या जाके कूद पड़े?
वृजरानी ने लजाते हुए दो थालियों में थोड़ा-थोड़ा भोजन परोसा।
मुंशीजी -- विरजन ने चपातियाँ अच्छी बनायी हैं। नर्म, श्वेत और मीठी।
प्रताप -- मैंने ऐसी चपातियाँ कभी नहीं खायीं। सालन बहुत स्वादिष्ट है।
“विरजन ! चाचा को शोरबेदार आलू दो, यह कहकर प्रताप हँसने लगा। विरजन ने लजाकर सिर नीचे कर लिया। पतीली शुष्क हो रही थी।
सुशीला -- (पति से) अब उठोगे भी, सारी रसोई चट कर गये, तो भी अड़े बैठे हो!
मुंशीजी -- कया तुम्हारी राल टपक रही हे?
निदान दोनों रसोई की इतिश्री करके उठे। मुंशीजी ने उसी समय एक मोहर निकालकर विरजन को पुरस्कार में दी।
