मानव हृदय एक रहस्यमय वस्तु हे। कभी तो वह लाखों की ओर आँख उठाकर नहीं देखता ओर कभी कोड़ियों पर फिसल पड़ता है। कभी सेकड़ों निर्दोषों की हत्या पर 'आह” तक नहीं करता ओर कभी एक बच्चे को देखकर रो देता है। प्रतापचन्द्र ओर कमलाचरण में यद्यपि सहोदर भाइयों का-सा प्रेम था, तथापि कमला की आकस्मिक मृत्यु का जो शोक चाहिये वह न हुआ। सुनकर वह चोंक अवश्य पड़ा ओर थोड़ी देर के लिए उदास भी हुआ, पर शोक जो किसी सच्चे मित्र की मृत्यु से होता है उसे न हुआ। निस्संदेह वह विवाह के पूर्व ही से विरजन को अपनी समझता था तथापि इस विचार में उसे पूर्ण सफलता कभी प्राप्त न हुई।
समय-समय पर उसका विचार इस पवित्र सम्बन्ध की सीमा का उल्लंघन कर जाता था। कमलाचरण से उसे स्वतः कोई प्रेम न था। उसका जो कुछ आदर, मान ओर प्रेम वह करता था, कुछ तो इस विचार से कि विरजन सुनकर प्रसन्न होगी और इस विचार से कि सुशील की मृत्यु का प्रायश्चित इसी प्रकार हो सकता हे। जब विरजन ससुराल चली आयी, तो अवश्य कुछ दिनों प्रताप ने उसे अपने ध्यान में न आने दिया, परन्तु जब से वह उसकी बीमारी का समाचार पाकर बनारस गया था और उसकी भेंट ने विरजन पर संजीवनी बूटी का काम किया था, उसी दिन से प्रताप को विश्वास हो गया था कि विरजन के हृदय में कमला ने वह स्थान नहीं पाया जो मेरे लिए नियत था।
प्रताप ने विरतणन को परम करुणापूर्ण शोक-पत्र लिखा पर पत्र लिखता जाता था ओर सोचता जाता था कि इसका उस पर क्या प्रभाव होगा? सामान्यतः समवेदना प्रेम को प्रोढ़ करती हे। क्या आश्चर्य है जो यह पत्र कुछ काम कर जाय? इसके अतिरिक्त उसकी धार्मिक प्रवृत्ति ने विकृत रुप धारण करके उसके मन में यह मिथ्या विचार उत्पन्न किया कि ईश्वर ने मेरे प्रेम की प्रतिष्ठा की ओर कमलाचरण को मेरे मार्ग से हटा दिया, मानो यह आकाश से आदेश मिला हे कि अब में विरजन से अपने प्रेम का पुरस्कार लूँ। प्रताप यह जो जानता था कि विरजन से किसी ऐसी बात की आशा करना, जो सदाचार ओर सभ्यता से बाल बराबर भी हटी हुई हो, मूर्खता है। परन्तु उसे विश्वास था कि सदाचार ओर सतीत्व के सीमान्तर्गत यदि मेरी कामनाएँ पूरी हो सकें, तो विरजन अधिक समय तक मेरे साथ निर्दयता नहीं कर सकती।
एक मास तक ये विचार उसे उद्विग्न करते रहे। यहाँ तक कि उसके मन में विरजन से एक बार गुप्त भेंट करने की प्रबल इच्छा भी उत्पन्न हुईं। वह यह जानता था कि अभी विरजन के हृदय पर तत्कालीन घाव है ओर यदि मेरी किसी बात या किसी व्यवहार से मेरे मन की दुश्चेष्टा की गन्ध निकली, तो में विरजन की दृष्टि से हमेशा के लिए गिर जाऊँगा। परन्तु जिस प्रकार कोई चोर रुपयों की राशि देखकर थधेर्य नहीं रख सकता है, उसकी प्रकार प्रताप अपने मन को न रोक सका। मनुष्य का प्रारब्ध बहुत कुछ अवसर के हाथ से रहता है। अवसर उसे भला नहीं मानता हे ओर बुरा भी। जब तक कमलाचरण जीवित था, प्रताप के मन में कभी इतना सिर उठाने को साहस न हुआ था। उसकी मृत्यु ने मानो उसे यह अवसर दे दिया। यह स्वार्थपरता का मद यहाँ तक बढ़ा कि एक दिन उसे ऐसा भास होने लगा, मानों विरजन मुझे स्मरण कर रही है। अपनी व्यग्रता से वह विरजन का अनुमान करेन लगा। बनारस जाने का इरादा पक्का हो गया।
दो बजे थे। रात्रि का समय था। भयावह सन्नाटा छाया हुआ था। निद्रा ने सारे नगर पर एक घटाटोप चादर फेला रखी थी। कभी-कभी वृक्षों की सनसनाहट सुनायी दे जाती थी। धुआँ ओर वृक्षों पर एक काली चद्दर की भाँति लिपटा हुआ था ओर सड़क पर लाललेनें धुएँ की कालिमा में ऐसी दृष्टि गत होती थीं जेसे बादल में छिपे हुए तारे। प्रतापचन्द्र रेलगाड़ी पर से उतरा। उसका कलेजा बांसों उछल रहा था ओर हाथ-पाँव काँप रहे थे। वह जीवन में पहला ही अवसर था कि उसे पाप का अनुभव हुआ! शोक है कि हृदय की यह दशा अधिक समय तक स्थिर नहीं रहती।
वह दुर्गन्ध-मार्ग को पूरा कर लेती है। जिस मनुष्य ने कभी मदिरा नहीं पी, उसे उसकी दुर्गन््ध से घृणा होती है। जब प्रथम बार पीता हे, तो घण्टों उसका मुख कड़वा रहता है और वह आश्चर्य करता है कि क्यों लोग ऐसी विषेली ओर कड़वी वस्तु पर आसक्त हैं। पर थोड़े ही दिनों में उसकी घृणा दूर हो जाती है ओर वह भी लाल रस का दास बन जाता है। पाप का स्वाद मदिरा से कहीं अधिक भयंकर होता हे।
प्रतापचन्द्र अंधेरे में धीरे-धीरे जा रहा था। उसके पाँव वेग से नहीं उठते थे क्योंकि पाप ने उनमें बेड़ियाँ डाल दी थी। उस आहलाद का, जो ऐसे अवसर पर गति को तीत्र कर देता है, उसके मुख पर कोई लक्षण न था। वह चलते-चलते रुक जाता ओर कुछ सोचकर आगे बढ़ता था। प्रेत उसे पास के खड्डे में केसा लिये जाता हे?
प्रताप का सिर धम-धम कर रहा था और भय से उसकी पिंडलियाँ काँप रही थीं। सोचता-विचारता घण्टे भर में मुंशी श्यामाचरण के विशाल भवन के सामने जा पहुँचा। आज अन्धकार में यह भवन बहुत ही भयावह प्रतीत होता था, मानो पाप का पिशाच सामने खड़ा है। प्रताप दीवार की ओट में खड़ा हो गया, मानो किसी ने उसके पाँव बाँध दिये हैं। आध घण्टे तक वह यही सोचता रहा कि लोट चलूँ या भीतर जाऊँ? यदि किसी ने देख लिया बड़ा ही अनर्थ होगा।
विरजन मुझे देखकर मन में कया सोचेगी? कहीं ऐसा न हो कि मेरा यह व्यवहार मुझे सदा के लिए उसकी दृष्टि से गिरा दे। परन्तु इन सब सन्देहों पर पिशाच का आकर्षण प्रबल हुआ। इन्द्रियों के वश में होकर मनुष्य को भले-बुरे का ध्यान नहीं रह जाता। उसने चित्त को दृढ़ किया। वह इस कायरता पर अपने को धिक्कार देने लगा, तदन्तर घर में पीछे की ओर जाकर वाटिका की चहारदीवारी से फाँद गया। वाटिका से घर जाने के लिए एक छोटा-सा द्वार था। देवयोग से वह इस समय खुला हुआ था। प्रताप को यह शकुन-सा प्रतीत हुआ। परन्तु वस्तुतः यह अधर्म का द्वार था। भीतर जाते हुए प्रताप के हाथ थर्रने लगे। हृदय इस वेग से धड़कता था; मानो वह छाती से बाहर निकल पड़ेगा। सका दम घुट रहा था। धर्म ने अपना सारा बल लगा दिया। पर मन का प्रबल वेग न रुक सका। प्रताप द्वार के भीतर प्रविष्ट हुआ। आंगन में तुलसी के चबूतरे के पास चोरों की भाति खड़ा सोचने लगा कि विरजन से क्योंकर भेंट होगी? घर के सब किवाड़ बन्द हे? क्या विरजन भी यहाँ से चली गयी? अचानक उसे एक बन्द दरवाजे की दरारों से प्रकाश की झलक दिखाई दी। दबे पाँव उसी दरार में आँखें लगाकर भीतर का दृश्य देखने लगा।
विरजन एक सफेद साड़ी पहले, बाल खोले, हाथ में लेखनी लिये भूमि पर बेठी थी ओर दीवार की ओर देख-देखकर कागज पर लिखती जाती थी, मानो कोई कवि विचार के समुद्र से मोती निकाल रहा है। लेखनी दाँतों तले दबाती, कुछ सोचती ओर लिखती फिर थोड़ी देर के पश्चात् दीवार की ओर ताकने लगती। प्रताप बहुत देर तक श्वास रोके हुए यह विचित्र दृश्य देखता रहा। मन उसे बार-बार ठोकर देता, पर यह धर्म का अन्तिम गढ़ था। इस बार धर्म का पराजित होना मानो हृदम में पिशाच का स्थान पाना था। धर्म ने इस समय प्रताप को उस खड्डे में गिरने से बचा लिया, जहाँ से आमरण उसे निकलने का सोभाग्य न होता। वरन् यह कहना उचित होगा कि पाप के खड्डे से बचानेवाला इस समय धर्म न था, वरन् दुष्परिणाम और लज्जा का भय ही था। किसी-किसी समय जब हमारे सद्भाव पराजित हो जाते हैं, तब दुष्परिणाम का भय ही हमें कर्त्तव्यच्युत होने से बचा लेता है। विरजन को पीले बदन पर एक ऐसा तेज था,जो उसके हृदय की स्वच्छुता और विचार की उच्चता का परिचय दे रहा था। उसके मुखमण्डल की उज्ज्वलता ओर दृष्टि की पवित्रता में वह अग्नि थी ;जिसने प्रताप की दुश्चेष्टाओं को क्षणमात्र में भस्म कर दिया ! उसे ज्ञान हो गया ओर अपने आत्मिक पतन पर ऐसी लज्जा उत्पन्न हुई कि वहीं खड़ा रोने लगा।
इन्द्रियों ने जितने निकृष्ट विकार उसके हृदय में उत्पन्न कर दिये थे, वे सब इस दृश्य ने इस प्रकार लोप कर दिये, जेसे उजाला अंधेरे को दूर कर देता है। इस समय उसे यह इच्छा हुई कि विरजन के चरणों पर गिरकर अपने अपराधों की क्षमा माँगे। जेसे किसी महात्मा संन््यासी के सम्मुख जाकर हमारे चित्त की दशा हो जाती हे, उसकी प्रकार प्रताप के हृदय में स्वतः प्रायश्चित के विचार उत्पन्न हुए। पिशाच यहाँ तक लाया,पर आगे न ले जा सका। वह उलटे पाँवों फिरा और ऐसी तीब्रता से वाटिका में आया ओर चारदीवारी से कूदा, मानो उसका कोई पीछा करता है।
अरूणोदय का समय हो गया था, आकाश मे तारे झिलमिला रहे थे ओर चक्की का घुर-घुर शब्द कर्णगोचर हो रहा था। प्रताप पाँव दबाता, मनुष्यों की आँखें बचाता गंगाजी की ओर चला। अचानक उसने सिर पर हाथ रखा तो टोपी का पता न था ओर न जेब में घड़ी ही दिखाई दी। उसका कलेजा सजन्न-से हो गया। मुँह से एक हृदय-वेधक आह निकल पड़ी।
कभी-कभी जीवन में ऐसी घटनाएँ हो जाती हे, जो क्षणमात्र में मनुष्य का रुप पलट देती है। कभी माता-पिता की एक तिरछी चितवन पुत्र को सुयश के उच्च शिखर पर पहुँचा देती है और कभी स्त्री की एक शिक्षा पति के ज्ञान-चक्षुओं को खोल देती है।
गर्वशील पुरुष अपने सगों की दृष्टियों में अपमानित होकर संसार का भार बनना नहीं चाहते। मनुष्य जीवन में ऐसे अवसर ईश्वरदत्त होते हैं। प्रतापचन्द्र के जीवन में भी वह शुभ अवसर था, जब वह संकीर्ण गलियों में होता हुआ गंगा किनारे आकर बेठा ओर शोक तथा लज्जा के अश्रु प्रवाहित करने लगा। मनोविकार की प्रेरणाओं ने उसकी अधोगति में कोई कसर उठा न रखी थी परन्तु उसके लिए यह कठोर कृपालु गुरु की ताड़ना प्रमाणित हुई। कया यह अनुभव सिद्ध नहीं है कि विष भी समयानुसार अमृत का काम करता हे?
जिस प्रकार वायु का झोंका सुलगती हुई अग्नि को दहका देता हे, उसी प्रकार बहुधा हृदय में दबे हुए उत्साह को भड़काने के लिए किसी बाह्य उद्योग की आवश्यकता होती है। अपने दुखों का अनुभव ओर दूसरों की आपत्ति का दृश्य बहुधा वह वेराग्य उत्पन्न करता है जो सत्संग, अध्ययन ओर मन की प्रवृत्ति से भी संभव नहीं। यद्यपि प्रतापचन्द्र के मन में उत्तम ओर निस्वार्थ जीवन व्यतीत करने का विचार पूर्व ही से था, तथापि मनोविकार के धक्के ने वह काम एक ही क्षण में पूरा कर दिया, जिसके पूरा होने में वर्ष लगते। साधारण दशाओं में जाति-सेवा उसके जीवन का एक गोण कार्य होता, परन्तु इस चेतावनी ने सेवा को उसके जीवन का प्रधान उद्देश्य बना दिया। सुवामा की हार्दिक अभिलाषा पूर्ण होने के सामान पेदा हो गये। क्या इन घटनाओं के अन्तर्गत कोई अज्ञात प्रेरक शक्ति थी? कौन कह सकता हे?
