देहातों में प्रोपेगैंडा की ज़रूरत
Dehaton Mein Propaganda Ki Zaroorat
नमक सत्याग्रह के दौरान स्वतंत्रता आंदोलन और राजनीतिक चेतना को शहरों से आगे देश के गांवों तक पहुंचाने की आवश्यकता पर प्रेमचंद का सम्पादकीय।
Editorials
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रेमचंद द्वारा लिखित सामयिक, सामाजिक और राजनीतिक सम्पादकीय।
37 रचनाएँ
Dehaton Mein Propaganda Ki Zaroorat
नमक सत्याग्रह के दौरान स्वतंत्रता आंदोलन और राजनीतिक चेतना को शहरों से आगे देश के गांवों तक पहुंचाने की आवश्यकता पर प्रेमचंद का सम्पादकीय।
Dominion Aur Swarajya
प्रेमचंद का सम्पादकीय 'डोमिनियन और स्वराज्य' अंग्रेजों और अभिजात वर्ग द्वारा समर्थित 'डोमिनियन स्टेटस' का विरोध करते हुए जनसाधारण और किसानों के सच्चे 'स्वराज्य' का समर्थन करता है।
Golmez Conference
प्रेमचंद ने लंदन में आयोजित गोलमेज सम्मेलन का विश्लेषण करते हुए भारतीय प्रतिनिधियों को ब्रिटिश सरकार के दिखावटी सुधारों और रक्षा-वित्त सम्बन्धी छलपूर्ण 'सेफगार्ड्स' से सावधान किया है।
Hans Ke Janm Par
प्रेमचंद का 'हंस' पत्रिका के प्रवेशांक का सम्पादकीय ''हंस' के जन्म पर' नवयुग के आगमन में पत्रिका की नीति और स्वाधीनता संग्राम में साहित्य की भूमिका को रेखांकित करता है।
Hindu-Muslim Bant-Bakhre Ka Prashna
हिन्दू-मुस्लिम अधिकारों और प्रतिनिधित्व के बंटवारे के प्रश्न पर राष्ट्रीय एकता और उदारता का समर्थन करता प्रेमचंद का सम्पादकीय।
Jail Sudhar
प्रेमचंद का सम्पादकीय 'जेल सुधार' औपनिवेशिक जेल व्यवस्था के वर्गीकरण पर प्रहार करते हुए जेलों को दंडालय के बजाय चरित्र-सुधार केंद्र बनाने की वकालत करता है।
Japan Ke Log Lambe Ho Rahe Hain
प्रेमचंद का सम्पादकीय नोट 'जापान के लोग, लम्बे हो रहे हैं' बेहतर खान-पान से जापानियों के शारीरिक विकास की तुलना भारत में गरीबी और कुपोषण की त्रासदी से करता है।
Kya Musalman Congress Ke Saath Nahin Hain
प्रेमचंद का सम्पादकीय 'क्या मुसलमान कांग्रेस के साथ नहीं हैं?' औपनिवेशिक दुष्प्रचार का खंडन करते हुए स्वाधीनता संग्राम में मुसलमानों की व्यापक और सक्रिय भागीदारी को सप्रमाण सिद्ध करता है।
Machinegun Aur Shanti
ब्रिटिश हुकूमत द्वारा मशीनगनों और दमनकारी हिंसा के बल पर थोपी जाने वाली बनावटी शांति पर प्रेमचंद का तीखा सम्पादकीय।
Mahatma Ji Ka Viceroy Se Nivedan
प्रेमचंद का सम्पादकीय 'महात्मा जी का वाइसराय से निवेदन' दांडी मार्च से पूर्व वाइसराय को लिखे गए गांधीजी के ऐतिहासिक पत्र और शोषित जनता के अधिकारों का विश्लेषण करता है।
Nawan Ordinance
प्रेमचंद ने कांग्रेस की संपत्तियां जब्त करने वाले नवें आर्डिनेन्स की निरर्थकता बताते हुए कहा है कि जनता की अगाध सहानुभूति ही राष्ट्र का अटूट कोष है।
Galpak Ka Prastav
प्रेमचंद का सम्पादकीय 'गल्पांक का प्रस्ताव' 'चांद' पत्रिका द्वारा कहानी विशेषांक (गल्पांक) प्रकाशित करने के प्रस्ताव और हिन्दी गल्प के विकास पर विचार व्यक्त करता है।