Cover Image for Gaban (गबन) by Munshi Premchand - Novel
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उपन्यास•1931•53 अध्याय•12h 21m

गबन

Gaban

प्रेमचंद का उपन्यास 'गबन' रमानाथ की कहानी है जो अपनी पत्नी जालपा के गहनों के शौक को पूरा करने के लिए गबन कर बैठता है।

पात्र:रमानाथ, जालपा, देवीदीन, रतन, वकील साहब
सेटिंग:20वीं सदी के प्रारंभ में शहरी भारत, इलाहाबाद

अध्याय 8 / 53

15 मिनट पठन • 2,222 शब्द

अध्याय 8: गबन

सवेरा होते ही दयानाथ गहने लेकर सराफ़ के पास पहुँचे और हिसाब होने लगा। सराफ़ के १५०० आते थे; मगर वह केवल १५०० के गहने लेकर सुन्तुष्ट न हुआ। बिके हुए गहनों को वह बट्टे पर ही ले सकता था। बिकी हुई चीज़ कौन वापस लेता है। जाकड़ पर दिये होते, तो दूसरी बात थी। इन चीज़ों का तो सौदा हो चुका था। उसने कुछ ऐसी व्यापारिक सिद्धान्त की बातें कीं, दयानाथ को कुछ ऐसा शिकंजे में कसा कि बेचारे को हाँ-हाँ करने के सिवा और कुछ न सूझा। दफ्तर का बाबू चतुर दूकानदार से क्या पेश पाता? १५०० में २५०० के गहने भी चले गये, ऊपर से ५० और बाकी रहे गये। इस बात पर पिता-पुत्र में कई दिन खूब वाद-विवाद हुआ। दोनों एक दूसरे को दोषी ठहराते रहे। कई दिन आपस में बोलचाल बन्द रही; मगर इस चोरी का हाल गुप्त रखा गया। पुलिस को खबर हो जाती, तो भंडा फूट जाने का भय था। जालपा से यही कहा गया कि माल तो मिलेगा नहीं, व्यर्थ का झंझट भले ही होगा। जालपा ने भी सोचा, जब माल ही न मिलेगा तो रपट व्यर्थ क्यों की जाय।

जालपा को गहनों से जितना प्रेम था, उतना कदाचित् संसार की और किसी वस्तु से न था, और उसमें आश्चर्य की कौन-सी बात थी। जब वह तीन वर्ष की अबोध बालिका थी, उस वक्त उसके लिए सोने के चूड़े बनवाये गये थे। दादी जब उसे गोद खिलाने लगती, तो गहनों की ही चर्चा करती–तेरा दूल्हा तेरे लिए बड़े सुन्दर गहने लायेगा। ठुमक-ठुमककर चलेगी।

जालपा पूँछती–चाँदी के होंगे कि सोने के, दादी जी?

दादी कहती–सोने के होंगे बेटी, चाँदी के क्यों लायेगा? चाँदी के लाये तो तुम उठाकर उसके मुँह पर पटक देना।

मानकी छेड़कर कहती–चाँदी के तो लायेगा ही। सोने के उसे कहाँ मिल जाते हैं।

जालपा रोने लगती, इस पर बूढ़ी दादी, मानकी, घर की महरियाँ, पड़ोसिनें और दीनदयाल–सब हँसते। उन लोगों के लिए यह विनोद का अशेष भंड़ार था।

बालिका जब ज़रा और बड़ी हुई, तो गुड़ियों के ब्याह करने लगी। लड़के की ओर से चढ़ावे जाते, दुलहिन को गहने पहनाती, डोली में बैठाकर बिदा करती, कभी-कभी दुलहिन गुड़िया अपने गुड्डे दूल्हे से गहनों के लिए मान करती, गुड्डा बेचारा कहीं न कहीं से गहने लाकर स्त्री को प्रसन्न करता था। उन्हीं दिनों बिसाती ने उसे वह चन्द्रहार दिया, जो अब तक उसके पास सुरक्षित था।

ज़रा और बड़ी हुई तो बड़ी-बूढ़ियों में बैठकर गहनों की बातें सुनने लगी। महिलाओं के उस छोटे से संसार में इसके सिवा और कोई चर्चा ही न थी। किसने कौन-कौन गहने बनवाये, कितने दाम लगे, ठोस हैं या पोले जड़ाऊ है या सादे, किस लकड़ी के विवाह में कितने गहने आये–इन्हीं महत्त्वपूर्ण विषयों पर नित्य आलोचना-प्रत्यालोचना टीका-टिप्पणी होती रहती थी। कोई दूसरा विषय इतना रोचक इतना ग्राह्य हो ही न सकता था।

इस आभूषण-मंडित संसार में पली हुई जालपा का यह आभूषण-प्रेम स्वाभाविक ही था। महीने भर से ऊपर हो गया। उसकी दशा ज्यों-की-त्यों है। न कुछ खाती-पीती है न किसी से हँसती-बोलती है। खाट पर पड़ी हुई शून्य नेत्रों से शून्याकाश की ओर ताकती रहती है। सारा घर समझाकर हार गया, पड़ोसिनें समझाकर हार गयीं, दीनदयाल आकर समझ गये, पर जालपा ने रोग-शय्या न छोड़ी। उसे अब घर में किसी पर विश्वास नहीं है, यहाँ तक कि रमा से भी उदासीन रहती है। वह समझती है सारा घर मेरी उपेक्षा कर रहा है। सब के सब मेरे प्राण के ग्राहक हो रहे हैं। जब इनके पास इतना धन है, तो फिर मेरे गहने क्यों नहीं बनवाते? जिससे हम सबसे अधिक स्नेह रखते हैं, उसी पर सबसे अधिक रोष भी करते हैं। जालपा को सबसे अधिक क्रोध रमानाथ पर था। अगर यह अपने माता-पिता से जोर देकर कहते, तो कोई इनकी बात न टाल सकता; पर यह कुछ कहें भी? इनके मुँह में तो दही जमा हुआ है। मुझसे प्रेम होता, तो यों निश्चिन्त न बैठे रहते। जब तक सारी चीजें न बनवा लेते, रात को नींद न आती। मुँह देखे की मुहब्बत है, माँ-बाप कैसे कहें, जायेंगे तो अपनी ही ओर मैं कौन हूँ !

वह रमा से केवल खिंची ही नहीं रहती थी, वह कभी कुछ पूछता तो दो-चार जली-कटी सुना देती। बेचारा अपना सा मुँह लेकर रह जाता। गरीब अपने ही लगायी हुई आग में जला जाता था। अगर वह जनता की उन डींगों का यह फल होगा तो वह ज़बान पर मुहर लगा लेता। चिन्ता और ग्लानि उसके हृदय को कुचले डालती थी। कहाँ सुबह से शाम तक हँसी-कहकहे, सैर-सपाटे में कटते थे, कहाँ अब नौकरी की तलाश में ठोकरें खाता फिरता था। सारी मस्ती गायब हो गयी। बार-बार अपने पिता पर क्रोध आता, यह चाहते तो दो-चार महीने में सब रुपये अदा हो जाते, मगर इन्हें क्या फिक्र। मैं चाहे मर जाऊं, पर यह अपनी टेक न छोड़ेंगे। उसके प्रेम से भरे हुए, निष्कपट हृदय में आग-सी सुलगती रहती थी। जालपा का मुरझाया हुआ मुख देखकर उसके मुँह से ठंडी साँस निकल जाती थी। वह सुखद प्रेम-स्वप्न इतनी जल्द भंग हो गया, क्या वे दिन फिर कभी आयेंगे? तीन हज़ार के गहने कैसे बनेंगे? अगर नौकर भी हुआ, तो ऐसा कौन-सा बड़ा ओहदा मिल जायेगा? तीन हजार तो शायद तीन जन्म में भी जमा न हों ! वह कोई ऐसा उपाय सोच निकालना चाहता था, जिससे वह जल्द-से-जल्द अतुल संपत्ति का स्वामी हो जाय। कहीं उसके नाम कोई लाटरी निकल आती ! फिर तो जालपा को आभूषणों से मढ़ देता। सबसे पहले चन्द्रहार बनवाता। उनमें हीरे जड़े होते। अगर इस वक्त जाली नोट बनाना आ जाता, तो वह अवश्य बनाकर चला देता।

एक दिन वह शाम तक नौकरी की तलाश में मारा-मारा फिरता रहा। शतरंज की बदौलत उसका कितने ही अच्छे-अच्छे आदमियों से परिचय था; लेकिन वह संकोच और डर के कारण किसी से अपनी स्थिति प्रकट न कर सकता था। यह भी जानता था कि यह मान-सम्मान उसी वक्त तक है, जब तक किसी के सामने मदद के लिए हाथ नहीं फैलाता। यह आन टूटी फिर कोई बात भी न पूछेगा। कोई ऐसा भलामानस न दीखता था, जो सब कुछ बिना कहे ही जान जाये, और उसे कोई अच्छी सी जगह दिला दे। आज उसका चित्त बहुत खिन्न था। मित्रों पर ऐसा क्रोध आ रहा था कि एक-एक को फटकारे और आयें तो द्वार से दुत्कार दे। अब किसी ने शतरंज खेलने को बुलाया, तो ऐसी फटकार सुनाऊँगा कि बच्चा याद करें; मगर वह ज़रा गौर करता तो उसे मालूम हो जाता कि इस विषय में मित्रों का उतना दोष न था, जितना खुद उसका। कोई ऐसा मित्र न था, जिससे उसने बढ़-बढ़कर बातें न की हों। यह उसकी आदत थी। घर की असली दशा को वह सदैव बदनामी की तरह छिपाता रहा। और उसी का फल था कि इतने मित्रों के होते हुए भी बेकार था। वह किसी से अपनी मनोव्यथा न कह सकता था और मनोव्यथा साँस की भाँति अन्दर घुटकर असह्य हो जाती है। घर में आकर मुँह लटकाये हुए बैठ गया।

जागेश्वरी ने पानी लाकर रख दिया और पूछा–आज तुम दिन भर कहाँ रहे? लो हाथ-मुँह धो डालो।

रमा ने लोटा उठाया ही था कि जालपा ने आकर उग्र भाव से कहा–मुझे मेरे घर पहुँचा दो, इसी वक्त !

रमा ने लोटा रख दिया और उसकी ओर इस तरह ताकने लगा, मानों उसकी बात समझ में न आयी हो।

जागेश्वरी बोली–भला इस तरह कहीं बहू-बेटियाँ बिदा होती हैं। कैसी बात करती हो बहू?

जालपा–मैं उन बहू बेटियों में नहीं हूँ। मेरा जिस वक्त जी चाहेगा जाऊँगी, मुझे किसी का डर नहीं है। जब यहाँ कोई मेरी बात नहीं पूछता, तो मैं भी किसी को अपना नहीं समझती। सारे दिन अनाथों की तरह पड़ी रहती हूँ। कोई झाँकता तक नहीं। मैं चिड़ियाँ नहीं हूँ, जिसका पिंजड़ा दाना-पानी रखकर बन्द कर दिया जाय। मैं भी आदमी हूँ। अब इस घर में मैं क्षण-भर न रुकूँगी। अगर मुझे कोई कुछ भेजने न जायेगा, तो अकेली ही चली जाऊँगी। राह में कोई भेड़िया नहीं बैठा है, जो मुझे उठा ले जायेगा और उठा भी ले जाये, तो क्या ग़म। यहाँ कौन सा सुख भोग रही हूँ।

रमा ने सावधान होकर कहा–आखिर कुछ मालूम भी हो तो, क्या बात हुई?

जालपा–बात कुछ नहीं हुई, अपना जी है। यहाँ नहीं रहना चाहती।

रमानाथ–भला इस तरह जाओगी तो तुम्हारे घरवाले क्या कहेंगे, कुछ यह भी तो सोचो !

जालपा–यह सब सोच चुकी हूँ, और ज्यादा नहीं सोचना चाहती। मैं जाकर अपने कपड़े बाँधती हूँ और इसी गाड़ी से जाऊँगी।

यह कहकर जालपा ऊपर चली गयी। रमा भी पीछे-पीछे यह सोचता हुआ चला, इसे कैसे शान्त करूँ।

जालपा अपने कमरे में जाकर बिस्तर लपेटने लगी कि रमा ने उसका हाथ पकड़ लिया और बोला–तुम्हें मेरी कसम जो इस वक्त जाने का नाम लो !

जालपा ने त्योरी चढ़ाकर कहा–तुम्हारी कसम कि हमें कुछ परवा नहीं है।

उसने अपना हाथ छुड़ा लिया और फिर बिछावन लपेटने लगी। रमा खिसियाना-सा होकर एक किनारे खड़ा हो गया। जालपा ने बिस्तरबन्द से बिस्तरे को बाँधा और फिर अपने सन्दूक को साफ़ करने लगी। मगर अब उसमें वह पहले-सी तत्परता न थी, बार बार सन्दूक बन्द करती और खोलती। वर्षा बन्द हो चुकी थी, केवल छत पर रुका हुआ पानी टपक रहा था।

आखि़र वह उसी बिस्तर के बण्डल पर बैठ गयी और बोली–तुमने मुझे कसम क्यों दिलायी?

रमा के हृदय में आशा की गुदगुदी हुई। बोला–सिवा इसके मेरे पास तुम्हें रोकने का और क्या साधन था?

जालपा–क्या तुम चाहते हो कि मैं यहीं घुट-छुटकर मर जाऊँ?

रमानाथ–तुम ऐसे मनहूस शब्द क्यों मुँह से निकालती हो? मैं तो चलने को तैयार हूँ, न मानोगी तो पहुँचाना ही पड़ेगा। जाओ, मेरा ईश्वर मालिक है; मगर कम-से-कम बाबूजी और अम्मा से पूछ लो।

बुझती हुई आग में तेल पड़ गया। जालपा तड़पकर बोली–वह मेरे कौन होते हैं, जो उनसे पूछूँ?

रमानाथ–कोई नहीं होते?

जालपा–कोई नहीं ! अगर कोई होते, तो मुझे यों न छोड़ देते। रुपये रखते हुए कोई अपने प्रियजनों का कष्ट नहीं देख सकता। ये लोग क्या मेरे आँसू न पोंछ सकते थे? मैं दिन-के-दिन यहाँ पड़ी रहती हूँ, कोई झूठों भी पूछता है आती है? मुहल्ले की स्त्रियाँ मिलने आती हैं, कैसे मिलूँ? यह सूरत तो मुझसे नहीं दिखायी जाती। न कहीं आना न जाना, न किसी से बात न चीत, ऐसे कोई कितने दिन रह सकता है? मुझे इन लोगों से अब कोई आशा नहीं रही। आखिर दो लड़के और भी तो हैं, उनके लिए कुछ जोड़ेंगे कि तुम्हीं को दे दें !

रमा को बड़ी-बड़ी बातें करने का फिर अवसर मिला। वह खुश था कि इतने दिनों के बाद आज उसे प्रसन्न करने का मौका तो मिला। बोला–प्रिये, तुम्हारा ख़्याल बहुत ठीक है। ज़रूर यही बात है। नहीं तो ढाई-तीन हज़ार उनके लिए क्या बड़ी बात थी? पचासों हजार बैंक में जमा हैं, दफ़्तर तो केवल दिल बहलाने जाते हैं।

जालपा–मगर हैं मक्खीचूस पल्ले सिरे के !

रमानाथ–मक्खीचूस न होते, तो इतनी सम्पत्ति कहाँ से आती !

जालपा–मुझे तो किसी की परवाह नहीं है जी, हमारे घर किस बात की कमी है ! दाल-रोटी वहाँ भी मिल जायगी। दो चार सखी-सहेलियाँ हैं खेत-खलियान हैं, बाग बगीचे हैं, जी बहलता रहेगा।

रमानाथ–और मेरी क्या दशा होगी, जानती हो? घुल-घुलकर मर जाऊँगा। जब से चोरी हुई है, मेरे दिल पर जैसी गुज़रती है, वह दिल ही जानता है। अम्मा और बाबूजी से एक बार नहीं, लाखों बार कहा, जोर देकर कहा कि दो-चार चीज़े तो बनवा ही दीजिए; पर किसी के कान पर जूँ तक न रेंगी। न जाने क्यों मुझसे आँखें फेर लीं।

जालपा–जब तुम्हारी नौकरी कही लग जाय, तो मुझे बुला लेना।

रमा–तलाश कर रहा हूँ। बहुत जल्द मिलने वाली है। हज़ारों बड़े-बड़े आदमियों से मुलाकात है, नौकरी मिलते क्या देर लगती है, हाँ, ज़रा अच्छी जगह चाहता हूँ।

जालपा–मैं इन लोगों का रुख समझती हूँ। मैं भी यहाँ अब दावे के साथ रहूँगी। क्यों, किसी से नौकरी के लिए कहते नहीं हो?

रमानाथ–शर्म आती है किसी से कहते हुए।

जालपा–इसमें शर्म की कौन सी बात है? कहते शर्म आती हो, तो खत लिख दो।

रमा उछल पड़ा, कितना सरल उपाय था और अभी तक यह सीधी-सी बात उसे न सूझी थी। बोला–हाँ, यह तुमने बहुत अच्छी तरकीब बतलायी। कल ज़रूर लिखूँगा।

जालपा–मुझे पहुँचाकर आना, तो लिखना। कल ही थोड़े लौट आओगे।

रमानाथ–तो क्या तुम सचमुच जाओगी? तब मुझे नौकरी मिल चुकी और ख़त लिख चुका ! इस वियोग के दुःख में बैठकर रोऊँगा कि नौकरी ढूँढूँगा। नहीं, इस वक्त जाने का विचार छोड़ों। नहीं, सच कहता हूँ मैं कहीं भाग जाऊँगा। मकान का हाल देख चुका। तुम्हारे सिवा और कौन बैठा हुआ है, जिसके लिए यहाँ पड़ा सड़ा करूँ। हटो तो जरा मैं बिस्तर खोल दूँ।

जालपा ने बिस्तर पर से जरा खिसककर कहा–मैं बहुत जल्द चली आऊँगी। तुम गये और मैं आयी।

रमा ने बिस्तर खोलते हुए कहा–जी नहीं, माफ कीजिए, इस धोखे में नहीं आता। तुम्हें क्या, तुम तो सहेलियों के साथ विहार करोगी, मेरी खबर तक न लोगी, और यहाँ मेरी जान पर बन आवेगी। इस घर में फिर कैसे क़दम रक्खा जायगा।

जालपा ने एहसान जताते हुए कहा–आप ने मेरा बँधा-बँधाया बिस्तर खोल दिया, नहीं तो आज कितने आनन्द से घर पहुँच जाती। शहज़ादी सच कहती थी, मर्द बड़े टोनहे होते हैं। मैंने आज पक्का इरादा कर लिया था कि चाहे ब्रह्मा उतर आवें, पर मैं न मानूँगी। पर तुमने दो ही मिनट में मेरे सारे मन्सूबे चौपट कर दिये। कल खत लिखना ज़रूर। बिना कुछ पैदा किये अब निर्वाह नहीं है।

रमानाथ–कल नहीं, मैं इसी वक्त जाकर दो-तीन चिट्ठियाँ लिखता हूँ।

जालपा–पान तो खाते जाओ।

रमानाथ ने पान खाया और मर्दाने कमरे में आकर खत लिखने बैठे।

मगर फिर कुछ सोचकर उठ खड़े हुए और एक तरफ को चल दिये। स्त्री का सप्रेम आग्रह पुरुष से क्या नहीं करा सकता।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "गबन." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1931, https://munshipremchand.com/works/novels/gaban. Accessed 22 Sep. 2026.