Cover Image for Gaban (गबन) by Munshi Premchand - Novel
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उपन्यास•1931•53 अध्याय•12h 21m

गबन

Gaban

प्रेमचंद का उपन्यास 'गबन' रमानाथ की कहानी है जो अपनी पत्नी जालपा के गहनों के शौक को पूरा करने के लिए गबन कर बैठता है।

पात्र:रमानाथ, जालपा, देवीदीन, रतन, वकील साहब
सेटिंग:20वीं सदी के प्रारंभ में शहरी भारत, इलाहाबाद

अध्याय 5 / 53

12 मिनट पठन • 1,777 शब्द

अध्याय 5: गबन

नाटक उस वक्त ‘पास’ होता है, जब रसिक-समाज उसे पसन्द कर लेता है। बरात का नाटक उस वक्त पास होता है जब राह चलते आदमी उसे पसन्द कर लेते हैं। नाटक की परीक्षा चार-पाँच घण्टे तक होती रहती है बरात की परीक्षा के लिए केवल इतने ही मिनटों का समय होता है। सारी सजावट, सारी दौड़-धूप और तैयारी का निबटारा पाँच मिनटों में हो जाता है। अगर सबके मुँह से ‘वाह-वाह’ निकल गया तो तमाशा पास, नहीं तो फेल। रुपया, मेहनत, फिक्र, सब अकारथ। दयानाथ का तमाशा पास हो गया। शहर में वह तीसरे दर्जे में आता, गाँव में अव्वल दर्जे में आया। कोई बाजों की धों-धों पों-पों सुनकर मस्त हो रहा था, कोई मोटर को आँखें फाड़-फाड़कर देख रहा था। कुछ लोग फुलवारियों के तख्त देखकर लोट-लोट हो जाते थे। आतिशबाजी ही मनोरंजन का केन्द्र थी। हवाइयाँ जब सन्न से ऊपर जातीं और आकाश में लाल, हरे, नीले, पीले कुमकुम से बिखर जाते; जब चर्खियाँ छूटतीं और उनमें नाचते हुए मोर निकल आते, तो लोग मंत्रमुग्ध से हो जाते थे। वाह, क्या कारीगरी है।

जालपा के लिए इन चीजों का लेशमात्र भी आकर्षण न था। हाँ, वह वर को एक आँख देखना चाहती थी, वह भी सबसे छिपकर; पर उस भीड़-भाड़ में ऐसा अवसर कहाँ। द्वारचार के समय उसकी सखियाँ उसे छत पर खींच ले गयीं और उसने रमानाथ को देखा। उसका सारा विराग, सारी उदासीनता सारी मनोव्यथा मानो छूमन्तर हो गयी थी। मुँह पर हर्ष की लालिमा छा गयी। अनुराग स्फूर्ति का भंडार है।

द्वारचार के बाद बरात जनवासे चली गयी। भोजन की तैयारियाँ होने लगीं। किसी ने पूरियाँ खायीं, किसी ने उपलों पर खिचड़ी पकायी। देहात के तमाशा देखने वालों के मनोरंजन के लिए नाच-गाना होने लगा।

दस बजे सहसा फिर बाजे बजने लगे। मालूम हुआ कि चढ़ाव आ रहा है। बरात में हर एक रस्म डंके की चोट पर अदा होती है। दूल्हा कलेवा करने आ रहा है, बाजे बजने लगे। समधी मिलने आ रहा है, बाजे बजने लगे। चढ़ाव ज्योंही पहुँचा, घर में हचचल मच गयी। स्त्री-पुरुष, बूढे-जवान, सब चढ़ाव देखने के लिए उत्सुक हो उठे। ज्यों-ही किश्तियाँ मंडप में पहुँची, लोग सब काम छोड़कर देखने दौड़े। आपस में धक्कम-धक्का होने लगा। मानकी प्यास से बेहाल हो रही थी, कण्ठ सूखा जाता था, चढ़ाव आते ही प्यास भाग गयी। दीनदयाल मारे भूख-प्यास के निर्जीव से पड़े थे, यह समाचार सुनते ही सचेत होकर दौड़े। मानकी एक एक चीज को निकाल-निकालकर देखने और दिखाने लगी। वहाँ सभी इस कला के विशेषज्ञ थे। मर्दों ने गहनें बनवाये थे, औरतों ने पहने थे, सभी आलोचना करने लगे। चूहेदन्ती कितनी सुन्दर है, कोई दस तौले की होगी। वाह ! साढ़े ग्यारह तोले से रत्ती भर भी कम निकल जाये, तो कुछ हार जाऊँ। यह शेरदहाँ तो देखो, क्या हाथ की सफाई है ! जी चाहता है कारीगर के हाथ चूम लें। यह भी बारह तोले से कम न होगा। वाह ! कभी देखा भी है, सोलह तोले से कम निकल जाये, तो मुँह न दिखाऊँ। हाँ, माल उतना चोखा नहीं है। यह कंगन तो देखो, बिलकुल पक्की जड़ाई है, कितना बारीक काम है कि आँख नहीं ठहरती। कैसा दमक रहा है। सच्चे नगीने हैं। झूठे नगीनों में यह आब कहाँ ! चीज तो यह गुलबंद है, कितने खूबसूरत फूल हैं ! और उनके बीच के हीरे चमक रहे हैं ! किसी बंगाली सुनार ने बनाया होगा। क्या बंगालियों ने कारीगरी का ठेका ले लिया है, हमारे देश में एक से एक कारीगर पड़े हुए हैं। बंगाली सुनार उनकी क्या बराबरी करेंगे।

इसी तरह एक-एक चीज़ की आलोचना होती रही। सहसा किसी ने कहा–चन्द्रहार नहीं है क्या।

मानकी ने रोनी सूरत बनाकर कहा–नहीं आया।

एक महिला बोली–अरे, चन्द्रहार नहीं आया !

दीनदयाल ने गम्भीर भाव से कहा–और सभी चीजें तो हैं, एक चन्द्रहार ही तो नहीं है।

उसी महिला ने मुँह बनाकर कहा–चन्द्रहार की बात ही और है !

मानकी ने चढ़ाव को सामने से हटाकर कहा–बेचारी के भाग में चन्द्रहार लिखा ही नहीं है।

इस गोलाकार जमघट के पीछे अंधेरे में आशा और आकांक्षा की मूर्ति-सी जालपा भी खड़ी थी। और सब गहनों के नाम कान में आते थे, चन्द्रहार का नाम न आता था। उसकी छाती धक-धक कर रही थी। चन्द्रहार नहीं है क्या? शायद सबके नीचे हो। इस तरह वह मन को समझाती रही। जब मालूम हो गया, चन्द्रहार नहीं है, तो उसके कलेजे पर चोट सी लग गयी। मालूम हुआ, देह में रक्त की एक बूँद भी नहीं है। मानो उसे मूर्च्छा आ जायेगी। वह उन्माद की सी दशा में अपने कमरे में आयी और फूट-फूटकर रोने लगी। वह लालसा जो आज सात वर्ष हुए, उसके हृदय में अंकुरित हुई थी, जो इस समय पुष्प और पल्लव से लदी खड़ी थी, उस पर वज्रपात हो गया। वहा हरा-भरा लहलहाता हुआ पौधा जल गया–केवल उसकी राख रह गयी। आज ही के दिन पर तो उसके समस्त आशाएँ अवलम्बित थीं। दुर्दैव ने आज वह अवलम्ब भी छीन लिया। उस निराशा के आवेश में उसका ऐसा जी चाहने लगा कि अपना मुँह नोच डाले। उसका बस चलता तो वह चढ़ाव को उठाकर आग में फेंक देती। कमरे में एक आले पर शिव की मूर्ति रखी हुई थी। उसने उसे उठाकर ऐसा पटका, कि उसकी आशाओं की भाँति वह भी चूर-चूर हो गयी। उसने निश्चिय किया कि मैं कोई आभूषण न पहनूँगी। आभूषण पहनने से होता ही क्या है। जो रूप-विहीन हों, वे अपने को गहने से सजायें, मुझे तो ईश्वर ने यों ही सुन्दरी बनाया है, मैं गहने न पहनकर भी बुरी न लगूँगी। सस्ती चीजें उठा लायें; जिसमें रुपये खर्च होते थे, उसका नाम ही न लिया। अगर गिनती ही गिनानी थी, तो इतने ही दामों से इसके दूने गहने आ जाते।

वह इसी क्रोध में भरी बैठी थी कि उसकी तीन सखियाँ आकर खड़ी हो गयीं। उन्होंने समझा था, जालपा को अभी चढ़ाव की कुछ खबर नहीं है। जालपा ने उन्हें देखते ही आँखें पोंछ डाली और मुस्कराने लगी।

राधा मुस्कराकर बोली–जालपा, मालूम होता है, तूने बड़ी तपस्या की थी, ऐसा चढ़ाव मैंने आज तक नहीं देखा था। अब तो तेरी सब साध पूरी हो गयी।

जालपा ने अपनी लम्बी-लम्बी पलकें उठाकर उसकी ओर ऐसे दीन नेत्रों से देखा, मानों जीवन में अब उसके लिए कोई आशा नहीं है–हाँ बहन, सब साध पूरी हो गयी।

इन शब्दों में कितनी अपार मर्मान्तक वेदना भरी हुई थी, इसका अनुमान तीनों युवतियों में कोई भी न कर सकी। तीनों कुतूहल से उसकी ओर ताकने लगीं, मानो उसका आशय उनकी समझ में न आया हो।

बासन्ती ने कहा–जी चाहता है, कारीगर के हाथ चूम लूँ।

शहजादी बोली–चढ़ाव ऐसा ही होना चाहिए, कि देखने वाले फड़क उठें।

बासन्ती–तुम्हारी सास बड़ी चतुर जान पड़ती हैं, कोई चीज नहीं छोड़ी।

जालपा ने मुँह फेरकर कहा–ऐसा ही होगा।

राधा–और तो सब कुछ है, केवल चन्द्रहार नहीं है।

शहजादी–एक चन्द्रहार के न होने से क्या होता है बहन, उसकी जगह गुलूबन्द तो है।

जालपा ने वक्रोक्ति के भाव से कहा–हाँ देह में एक आँख न होने से क्या होता है। और सब अंग होते ही हैं आँखें हुईं तो क्या, न हुईं तो क्या !

बालकों के मुँह से गम्भीर बातें सुनकर हमें हँसी आ जाती है, उसी तरह जालपा के मुँह से यह लालसा से भरी हुई बातें सुनकर राधा और बासन्ती अपनी हँसी को रोक न सकीं। हाँ, शहजादी को हँसी न आयी। यह आभूषण-लालसा उसके लिए हँसने की बात नहीं, रोने की बात थी। कृत्रिम सहानुभूति दिखाती हुई बोली–सब न जाने कहाँ के जंगली हैं कि और सब चीजें तो लाये, चन्द्रहार न लाये, जो सब गहनों का राजा है। लाला अभी आते हैं तो पूछतीं हूँ, कि तुमने यह कहाँ की रीति निकाली है–ऐसा अनर्थ भी कोई करता है।

राधा और बासन्ती दिल में काँप रही थीं कि जालपा कहीं ताड़ न जाये। उनका बस चलता तो शहजादी का मुँह बन्द कर देतीं, बार-बार उसे चुप रहने का इशारा कर रही थीं; मगर जालपा को शहजादी का यह व्यंग समवेदना से परिपूर्ण जान पड़ा। सजल नेत्र होकर बोली–क्या करोगी पूछकर बहन, जो होना था सो हो गया !

शहजादी–तुम पूछने को कहती हो, मैं रुलाकर छोड़ूँगी। मेरे चढ़ाव पर कंगन नहीं आया था, उस वक्त मन ऐसा खट्टा हुआ कि सारे गहनों पर लात मार दूँ। जब तक कंगन न बन गये, मैं नींद भर सोयी नहीं।

राधा–तो क्या तुम जानती हो, जालपा का चन्द्रहार न बनेगा?

शहजादी–बनेगा तब बनेगा, इस अवसर पर तो नहीं बना। दस-पाँच की चीज तो है नहीं, कि जब चाहा बनवा लिया, सैकड़ों का खर्च है, फिर कारीगर तो हमेशा अच्छे नहीं मिलते।

जालपा का भग्न हृदय शहजादी की इन बातों से मानों जी उठा, वह रुँधे कण्ठ से बोली–यही तो मैं भी सोचती हूँ बहन, जब आज न मिला तो फिर क्या मिलेगा !

राधा और बासन्ती मन ही मन शहजादी को कोस रही थीं, और थप्पड़ दिखा-दिखाकर धमका रही थीं; पर शहजादी को इस वक्त तमाशे का मजा आ रहा था। बोली–नहीं, यह बात नहीं है जल्ली, आग्रह करने से सब कुछ हो सकता है, सास-ससुर को बार-बार याद दिलाती रहना। बहनोईजी से दो-चार दिन रूठे रहने से भी बहुत कुछ काम निकल सकता है। बस यही समझ लो, कि घरवाले चैन न लेने पायें, यह बात हरदम उनके ध्यान में रहे। उन्हें मालूम हो जायेगा कि बिना चन्द्रहार बनवाये कुशल नहीं। तुम जरा भी ढीली पड़ी और काम बिगड़ा।

राधा ने हँसी रोकते हुए कहा–इनसे न बने तो तुम्हें बुला लें क्यों? अब उठोगी कि सारी रात उपदेश ही करती रहोगी !

शहजादी–चलती हूँ, ऐसी क्या भागड़ पड़ी है। हाँ, खूब याद आयी, क्यों जल्ली, तेरी अम्माजी के पास बड़ा अच्छा चन्द्रहार है। तुझे न देंगी?

जालपा ने एक लम्बी साँस लेकर कहा–क्या कहूँ बहन, मुझे तो आशा नहीं है।

शहजादी–एक बार कहकर देखो तो, अब उनके कौन पहनने-ओढ़ने के दिन बैठे हैं।

जालपा–मुझसे तो न कहा जायगा।

शहजादी–मैं कह दूँगी।

जालपा–नहीं नहीं, तुम्हारे हाथ जोड़ती हूँ। मैं जरा उनके मातृस्नेह की परीक्षा लेना चाहती हूँ।

बासन्ती ने शहजादी का हाथ पकड़कर कहा–अब उठेगी भी कि यहाँ सारी रात उपदेश ही देती रहेगी।

शहजादी उठी, पर जालपा रास्ता रोककर खड़ी हो गयी और बोली–नहीं अभी बैठो बहन तुम्हारे पैरों पड़ती हूँ।

शहजादी–जब यह दोनों चुड़ैलें बैठने भी दें। मैं तो तुम्हें गुर सिखाती हूँ, और यह दोनों मुझ पर झल्लाती हैं। सुन नहीं रही हो, मैं भी विष की गाँठ हूँ।

बासन्ती–बिष की गाँठ तो तू है ही।

शहजादी–तुम भी तो ससुराल से सालभर बाद आयी हो, कौन-कौन सी नयी चीजें बनवा लायीं?

बासन्ती–और तुमने तीन साल में क्या बनवा लिया?

शहजादी–मेरी बात छोड़ो, मेरा खसम तो मेरी बात ही नहीं पूछता।

राधा–प्रेम के सामने गहनों का कोई मूल्य नहीं।

शहजादी–तो सूखा प्रेम तुम्ही को फले।

इतने में मानकी ने आकर कहा–तुम तीनों यहाँ बैठी क्या कर रही हो, चलो वहाँ लोग खाना खाने आ रहे हैं।

तीनों युवतियाँ चली गयीं। जालपा माता के गले में चन्द्रहार की शोभा देखकर मन-ही-मन सोचने लगी–गहनों से इनका जी अब तक नहीं भरा !

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "गबन." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1931, https://munshipremchand.com/works/novels/gaban. Accessed 22 Sep. 2026.