Cover Image for Gaban (गबन) by Munshi Premchand - Novel
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उपन्यास•1931•53 अध्याय•12h 21m

गबन

Gaban

प्रेमचंद का उपन्यास 'गबन' रमानाथ की कहानी है जो अपनी पत्नी जालपा के गहनों के शौक को पूरा करने के लिए गबन कर बैठता है।

पात्र:रमानाथ, जालपा, देवीदीन, रतन, वकील साहब
सेटिंग:20वीं सदी के प्रारंभ में शहरी भारत, इलाहाबाद

अध्याय 20 / 53

9 मिनट पठन • 1,339 शब्द

अध्याय 20: गबन

रमा शाम को दफ्तर से चलने लगा, तो रमेश बाबू दौड़े हुए आये और कल रुपये लाने की ताकीद की। रमा मन में झुँझला उठा। आप बड़े ईमानदार की दुम बने हैं ! ढोंगिया कहीं का अगर अपनी ज़रूरत आ पड़े, तो दूसरों के तलवे सहलाते फिरेंगे; पर मेरा काम है तो आप आदर्शवादी बन बैठे। यह सब दिखाने के दाँत हैं, मरते समय इसके प्राण भी जल्दी नहीं निकलेंगे !

कुछ दूर चलकर उसने सोचा, एक बार फिर रतन के पास चलूँ। पर ऐसा कोई न था जिससे मिलने की आशा होती। वह जब उसके बँगले पर पहुँचा, तो वह अपने बगीचें में गोल चबूतरे पर बैठी हुई थी। उसके पास ही एक गुजराती जौहरी बैठा सन्दूक से सुन्दर आभूषण निकाल-निकालकर दिखा रहा था। रमा को देखकर बहुत ही खुशी हुई। आइए बाबू साहब देखिए सेठजी कैसी अच्छी-अच्छी चीजें लाये हैं। देखिए कितना सुन्दर है, इसके दाम बाहर सौ रुपये बताते हैं।’

रमा ने हार को हाथ में लेकर देखा और कहा–हाँ चीज तो अच्छी मालूम होती है !

रतन–दाम बहुत कहते हैं।

जौहरी–बाईजी, ऐसा हार अगर कोई दो हज़ार में ला दे, तो जो जुर्माना कहिए, दूँ, बारह सौ मेरी लागत बैठ गयी है।

रमा ने मुस्कराकर कहा–ऐसा न कहिए सेठजी, जुर्माना देना पड़ जायेगा।

जौहरी–बाबू साहब हार तो सौ रुपये में भी आ जायेगा और बिलकुल ऐसा ही। बल्कि चमक-दमक में इससे भी बढ़कर। मगर परखना चाहिए। मैंने खुद ही आपसे मोल-तोल की बात नहीं की। मोल-तोल अनाड़ियों से किया जाता है। आपसे क्या मोल-तोल। हम लोग निरे रोजगारी नहीं है बाबू साहब, आदमी का मिजाज देखते हैं। श्रीमती जी ने क्या अमीराना मिज़ाज दिखाया है कि वाह !

रतन ने हार को लुब्ध नेत्रों से देखकर कहा–कुछ तो कम कीजिए सेठजी। आपने तो जैसे कसम खा ली !

जौहरी–कमी का नाम न लीजिए हूजूर । यह चीज आपकी भेंट हैं।

रतन–अच्छा अब एक बात बतला दीजिए, कम से कम आप इसका क्या लेंगे?

जौहरी ने कुछ क्षुब्ध होकर कहा–बारह सौ रुपये और बारह कौड़ियाँ होंगी, हूजूर आपसे कसम खाकर कहता हूँ, इसी शहर में पन्द्रह सौ का बेचूँगा। और आपसे कह जाऊँगा, किसने लिया।

यह कहते हुए जौहरी ने हार को रखने का केस निकाला। रतन को विश्वास हो गया, यह कुछ कम न करेगा। बालकों की भाँति अधीर होकर बोली–आप तो ऐसा समेटे लेते हैं कि हार को नज़र लग जायेगी।

जौहरी–क्या करूँ हूजूर ! जब ऐसे दरबार में चीज़ की कदर नहीं होती, तो दुःख होता ही है।

रतन ने कमरे में जाकर रमा को बुलाया और बोली–आप समझते हैं यह कुछ और उतरेगा?

रमानाथ–मेरी समझ में तो चीज़ एक हजा़र से ज्यादा की नहीं है।

रतन–ऊँह होगा। मेरे पास तो छः सौ रुपये हैं। आप चार सौ रुपये का प्रबन्ध कर दें तो ले लूँ। यह इसी गाड़ी से काशी जा रहा है। उधार न मानेगा। वकील साहब किसी जलसे में गये हैं, नौ दस बजे के पहले न लौंटेगे। मैं आपको कल रुपये लौटा दूँगी।

रमा ने बड़े संकोच के साथ कहा–विश्वास मानिए, मैं बिलकुल खाली हाथ हूँ। मैं तो आपसे रुपये माँगने आया था। मुझे बड़ी शक्त जरूरत है। वह रुपये मुझे दे दीजिए, मैं आपके लिए कोई अच्छा-सा हार यहीं से ला दूँगा। मुझे विश्वास है, ऐसा हार सात-आठ सौ में मिल जायेगा।

रतन–चलिए मैं आपकी बातों में नहीं आती। छः महीने में एक कंगन तो बनवा न सके, अब हार क्या लायेंगे ! मैं यहाँ कई दुकानें देख चुकी हूँ, ऐसी चीज शायद कहीं निकले। और निकले भी तो इसके ड्योढ़े दाम देने पड़ेंगे।

रमानाथ–तो इसे कल क्यों न बुलाइए, इसे सौदा बेचने की गरज होगी, तो आप ठहरेगा।

रतन–अच्छा कहिए, देखिए क्या कहता है।

दोनों कमरे के बाहर निकले, रमा ने जौहरी से कहा–तुम कल आठ बजे क्यों नहीं आते?

जौहरी–नहीं हूजूर, कल काशी में दो चार बड़े रईसों से मिलना है। आज के न जाने से बड़ी हानि हो जायेगी।

रतन–मेरे पास इस वक्त छः सौ रुपये हैं, आप हार दे जाइए, बाकी के रुपये काशी से लौटकर ले जाइएगा।

जौहरी–रुपये का कोई हर्ज न था, महीने दो महीने में ले लेता; लेकिन हम परदेशी लोगों का क्या ठिकाना, आज यहाँ हैं, कल वहाँ हैं, कौन, जाने यहाँ फिर कब आना हो। आप इस वक्त एक हजार दे दें, दो सौ फिर दे दीजिएगा।

रमानाथ–तो सौदा न होगा।

जौहरी–इसका अख्तियार आपको है; मगर इतना कहे देता हूँ कि ऐसा माल फिर न पाइएगा।

रमानाथ–रुपये होंगे तो माल बहुत मिल जायेगा।

जौहरी–कभी-कभी दाम रहने पर भी अच्छा माल नहीं मिलता।

यह कहकर जौहरी ने फिर हार को केस में रक्खा और इस तरह सन्दूक समेटने लगा, मानों वह एक क्षण भी न रुकेगा।

रतन का रोआँ-रोआँ काम बना हुआ था, मानो कोई कैदी अपनी किस्मत का फैसला सुनने को खड़ा हो, उसके हृदय की सारी ममता, ममता का सारा अनुराग, अनुराग की सारी अधीरता, उत्कंठा और चेष्टा उसी हार पर केन्द्रित हो रही थी, मानो उसके प्राण उसी हार के दामों में जा छिपे थे, मानों उसके जन्म-जन्मान्तरों की संचित अभिलाषा उसी हार पर मँडरा रही थी। जौहरी को सन्दूक बन्द करते देखकर वह जलविहीन मछली की भाँति तड़पने लगी। कभी वह सन्दूक खोलती कभी वह दराज खोलती; पर रुपये कहीं न मिले।

सहसा मोटर की आवाज सुनकर रतन ने फाटक की ओर देखा। वकील साहब चले आ रहे थे। वकील साहब ने मोटर बरामदे के सामने रोक दी और चबूतरे की तरफ चले। रतन ने तबूतरे के नीचे उतरकर कहा–आप तो नौ बजे आने को कह गये थे?

वकील–वहाँ कोरम ही पूरा न हुआ, बैठकर क्या करता। कोई दिल से काम करना नहीं चाहता, सब मुफ्त में नाम कमाना चाहते हैं। यह क्या कोई जौहरी है?

जौहरी ने उठकर सलाम किया।

वकील साहब रतन से बोले–क्यों, तुमने कोई चीज़ पसन्द की?

रतन–हाँ, एक हार पसन्द किया है, बारह सौ रुपये माँगते हैं।

वकील–बस ! और कोई चीज़ पसन्द करो। तुम्हारे पास सिर की कोई अच्छी चीज नहीं है।

रतन–इस वक्त मैं यही हार लूँगी। आजकल सिर पर चीजें कौन पहनता है।

वकील–लेकर रख लो, पास रहेगी तो कभी पहन भी लोगी। नहीं तो कभी दूसरों को पहने देख लिया, तो कहोगी, मेरे पास होता, मैं भी पहनती।

वकील साहब को रतन से पति का-सा प्रेम नहीं, पिता का–सा स्नेह था। जैसे कोई स्नेही पिता मेले में लड़कों से पूछ-पूछकर खिलौने लेता है, वह भी रतन से पूछ-पूछकर खिलौने लेते थे। उसके कहने भर की देर थी। उनके पास उसे प्रसन्न करने के लिए धन के सिवा और चीज़ ही क्या थी। उन्हें अपने जीवन में एक आधार की ज़रूरत थी–सदेह आधार की, जिसके सहारे वह इस जीर्ण दशा में जीवन संग्राम में खड़े रह सकें, जैसे किसी उपासक को प्रतिमा की ज़रूरत होती है। बिना प्रतिमा के वह किस पर फूल चढ़ाये, किसे गंगा जल से नहलाये, किसे स्वादिष्ट चीजों का भोग लगाये। इसी भाँति वकील साहब को भी पत्नी की जरूरत थी। रतन उसके लिए सन्देह कल्पना मात्र थी जिससे उनकी आत्मिक पिपासा शान्त होती थी। कदाचित् रतन के बिना उनका जीवन उतना ही सूना होता, जितना आँखों के बिना मुख।

रतन ने केस में से हार निकालकर वकील साहब को दिखाया और बोली–इसके बारह सौ रुपये माँगते हैं।

वकील साहब की निगाह में रुपये का मूल्य उसकी आनन्ददायिनी शक्ति थी। अगर हार रतन को पसन्द है तो उन्हें इसकी परवाह न थी कि उसके दाम क्या देने पड़ेंगे। उन्होंने चेक निकालकर जौहरी की तरफ देखा और पूछा–सच-सच बोलो, कितना लिखूँ ! अगर फ़र्क पड़ा तो तुम जानोगे।

जौहरी ने हार को उलट-पलटकर देखा और हिचकते हुए बोला–साढे़ ग्यारह सौ कर दीजिए। वकील साहब ने चेक लिखकर उसको दिया, और वह सलाम करके चलता हुआ।

रतन का मुख इस समय वसंत की प्राकृतिक शोभा की भाँति विंहसित था। ऐसा गर्व, ऐसा उल्लास उसके मुख पर कभी न दिखायी दिया था। मानों उसे संसार की सम्पत्ति मिल गयी है।

हार को गले में लटकाये वह अन्दर चली गयी। वकील साहब के आचार-विचार में नयी और पुरानी प्रथाओं का विचित्र मेला था। भोजन वह अभी तक किसी ब्राह्मण के हाथ का भी नहीं खाते थे। आज रतन उसके लिए अच्छी-अच्छी चीजें बनाने गयी, अपनी कृतज्ञता को वह कैसे ज़ाहिर करें?

रमा कुछ देर तक तो बैठा साहब का योरोप-गान सुनता रहा, अन्त को निराश होकर चल दिया।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "गबन." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1931, https://munshipremchand.com/works/novels/gaban. Accessed 22 Sep. 2026.