Cover Image for Gaban (गबन) by Munshi Premchand - Novel
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उपन्यास•1931•53 अध्याय•12h 21m

गबन

Gaban

प्रेमचंद का उपन्यास 'गबन' रमानाथ की कहानी है जो अपनी पत्नी जालपा के गहनों के शौक को पूरा करने के लिए गबन कर बैठता है।

पात्र:रमानाथ, जालपा, देवीदीन, रतन, वकील साहब
सेटिंग:20वीं सदी के प्रारंभ में शहरी भारत, इलाहाबाद

अध्याय 17 / 53

9 मिनट पठन • 1,255 शब्द

अध्याय 17: गबन

नौ दिन गुजर गये। रमा रोज प्रातः दफ्तर जाता और चिराग जले लौटता। वह रोज यही आशा लेकर जाता कि आज कोई बड़ा शिकार फँस जायेगा। पर वह आशा न पूरी होती। इतना ही नहीं। पहले दिन की तरह फिर भाग्य का सूर्य न चमका। फिर भी उसके लिए कुछ कम श्रेय की बात नहीं थी कि नौ दिनों में ही उसने सौ रुपये, जमा कर लिये थे। उसने एक पैसे का पान भी न खाया था। जालपा ने कई बार कहा, चलो कहीं घूम आवें, तो उसे भी उसने बातों में ही टाला। बस कल का दिन और था। कल आकर रतन कंगन माँगेगी तो उसे क्या जवाब देगा। दफ्तर से आकर वह इसी सोच में बैठा हुआ था। क्या एक महीने भर के लिए और न मान जायेगी। इतने दिन वह और न बोलती तो शायद वह उससे उऋण हो जाता। उसे विश्वास था कि मैं उससे चिकनी-चुपड़ी बातें करके राज़ी कर लूँगा। अगर उसने जिद की तो मैं उससे कह दूँगा, सराफ रुपये नहीं लौटता।

सावन के दिन थे, अँधेरा हो चला था, रमा सोच रहा था, रमेश बाबू के पास चलकर दो-चार बाज़ियाँ खेल आऊँ; मगर बादलों को देख-देख रुक जाता था। इतने में रतन आ पहुँची। वह प्रसन्न न थी। उसकी मुद्रा कठोर हो रही थी। आज वह लड़ने के लिए घर से तैयार होकर आयी है और मुहब्बत मुलाहजे़ की कल्पना को भी कोसों दूर रखना चाहती है।

जालपा ने कहा–तुम खूब आयीं। आज मैं भी ज़रा तुम्हारे साथ घूम आऊँगी। इन्हें काम के बोझ से आजकल सिर उठाने की भी फुरसत नहीं है।

रतना ने निष्ठुर से कहा–मुझे आज बहुत जल्द घर लौट जाना है। बाबूजी को कल की याद दिलाने आयी हूँ।

रमा उसका लटका हुआ मुँह देखकर ही मन में सहम रहा था। किसी तरह उसे प्रसन्न करना चाहता था। बड़ी तत्परता से बोला–जी हाँ, खूब याद है, अभी सराफ की दुकान से चला आ रहा हूँ। रोज़ सुबह-शाम घंटे भर हाजिरी देता हूँ, मगर इन चीजों में समय बहुत लगता है दाम तो कारीगरी के हैं। मालियत देखिए तो कुछ नहीं। दो आदमी लगे हुए हैं, पर शायद अभी एक महीने से कम में चीज़ तैयार न हो; पर होगी लाजवाब। जी खुश हो जायेगा।

पर रतन ज़रा भी न पिघली। तिनककर बोली–अच्छा ! अभी महीना भर और लगेगा। ऐसी कारीगरी है कि तीन महीने में न हुई ! आप उससे कह दीजिएगा मेरे रुपये वापस कर दें आशा के कंगन देवियाँ पहनती होंगी, मेरे लिए ज़रूरत नहीं।

रमानाथ–एक महीना न लगेगा, मैं जल्दी ही बनवा दूँगा। एक महीना तो मैंने अन्दाज़न कह दिया था। अब थोड़ी ही कसर रह गयी है। कई दिन तो नगीने तलाश करने में लग गये।

रतन–मुझे कंगन पहनना ही नहीं है भाई। आप मेरे रुपये लौटा दीजिए बस। सुनार मैंने भी बहुत देखे हैं। आपकी दया से इस वक्त भी तीन जोड़े कंगन मेरे पास होंगे, पर ऐसी धाँधली कहीं नहीं देखी।

धाँधली के शब्द पर रमा तिलमिला उठा–धाँधली नहीं मेरी हिमाकत कहिए। मुझे क्या ज़रूरत थी कि अपनी जान संकट में डालता। मैंने तो पेशगी रुपये इसलिए दे दिये कि सुनार खुश होकर जल्दी बना देगा। अब आप रुपये माँग रही हैं, सराफ रुपये नहीं लौटा सकता।

रतन ने तीव्र नेत्रों से देखकर कहा–क्यों, रुपयें क्यों न लौटायेगा !

रमानाथ–इसलिए कि जो चीज़ आपके लिए बनायी है, उसे वह कहाँ बेचता फिरेगा। सम्भव है, साल-छः महीनें में बिक सके। सबकी पसन्द एक-सी तो नहीं होती।

रतन ने त्योरियाँ चढ़ाकर कहा–मैं कुछ नहीं जानती, उसने देर की है, उसका दण्ड भोगे। मुझे कल या तो कंगन ला दीजिए या रुपये। आपसे यदि सराफ़ से दोस्ती है, आप मुलाहिजा़ और मुरव्वत के सबब से कुछ न कह सकते हों, तो मुझे उसकी दुकान दिखा दीजिए। नहीं आपको शर्म आती हो तो उसका नाम बता दीजिए, मैं पता लगा लूँगी। वाह अच्छी दिल्लगी है। दूकान नीलाम करा लूँगी। जेल भिजवा दूँगी। इन बदमाशों से लड़ाई के बगैर काम नहीं चलता।

रमा अप्रतिभ होकर जमीन की ओर ताकने लगा। वह कितनी मनहूस घड़ी थी, जब उसने रतन से रुपये लिये ! बैठे-बिठाये विपत्ति मोल ली।

जालपा ने कहा–सच तो है, इन्हें क्यों नहीं सराफ़ की दूकान पर ले जाते, चीज आँखों से देकर इन्हें सन्तोष हो जायेगा।

रतन–मैं अब चीज लेना नहीं चाहती।

रमा ने काँपते हुए कहा–अच्छी बात है, आपको रुपये कल मिल जायँगे।

रतन–कल किस वक़्त?

रमानाथ–दफ्तर से लौटते वक्त लेता आऊँगा।

रतन–पूरे रुपये लूँगी। ऐसा न हो कि सौ-दो-सौ रुपये देकर टाल दे।

रमानाथ–कल आप अपने सब रुपये ले जाइयेगा।

यह कहता हुआ रमा मरदाने कमरे में आया, और रमेश बाबू के नाम एक रुक्का लिखकर गोपी से बोला–इसे रमेश बाबू के पास ले जाओ। जवाब लिखाते आना।

फिर उसने एक दूसरा रुक्का लिखकर विश्वम्भर को दिया कि माणिकदास को दिखाकर जवाब लाये।

विश्वम्भर ने कहा-पानी आ रहा है।

रमानाथ–तो क्या सारी दुनिया बह जायेगी ! दौड़ते हुए जाओ।

विश्वम्भर–और वह जो घर पर न मिलें?

रमानाथ–मिलेंगे। वह इस वक्त कहीं नहीं जाते।

आज जीवन में पहला अवसर था कि रमा ने दोस्तों से रुपये उधार माँगे। आग्रह और विनय के जितने शब्द उसे याद आये, उनका उपयोग किया। उसके लिए यह बिलकुल नया अनुभव था। जैसे पत्र आज उसने लिखे, वैसे ही पत्र उनके पास कितनी ही बार आ चुके थे। उन पत्रों को पढ़कर उसका हृदय कितना द्रवित हो जाता था; पर विवश होकर उसे बहाने करने पड़ते थे। क्या रमेश बाबू भी बहाना कर जायेंगे? उनकी आमदनी ज्यादा है, खर्च कम, वह चाहें तो रुपये का इन्तजार कर सकते हैं। क्या मेरे साथ इतना सुलूक भी न करेंगे? अब तक दोनों लड़के लौटकर नहीं आये। वह द्वार पर टहलने लगा। रतन की मोटर अभी तक खड़ी थी। इतने में रतन बाहर आयी और उसे टहलते देखकर भी कुछ बोली नहीं। मोटर पर बैठी और चल दी।

दोनों कहाँ रह गये अब तक ! कहीं खेलने लगें होंगे। शैतान तो हैं ही। जो कहीं रमेश रुपये दे दें, तो चाँदी है। मैंने दो सौ नाहक माँगे, शायद इतने रुपये उनके पास न हों। ससुरालवालों की नोच-खसोट से कुछ रहने भी तो नहीं पाता। माणिक चाहे तो हज़ार पाँच सौ दे सकता है; लेकिन देखा चाहिए, आज परीक्षा हो जायगी, आज अगर इन लोगों ने रुपये न दिए, तो फिर बात भी न पूछूँगा। किसी का नौकर नहीं हूँ कि जब वह शतरंज खेलने को बुलायें, तो दौड़ा चला जाऊँ। रमा किसी की आहट पाता, तो उसका दिल जोर से धड़कने लगता था। आखिर विश्वम्भर लौटा, माणिक ने लिखा था–आजकल बहुत तंग हूँ। मैं तो तुम्हीं से माँगने वाला था।

रमा ने पुर्जा फाड़कर फेंक दिया। मतबली कहीं का ! अगर सब-इन्सपेक्टर ने माँगा होता तो पुर्जा देखते ही रुपये लेकर दौड़े जाते। खैर देखा जायेगा। चुंगी के लिए माल तो आयगा ही। इसकी कसर तब निकल जायेगी।

इतने में गोपी भी लौटा। रमेश ने लिखा था–मैंने अपने जीवन में दो-चार नियम बना लिये हैं और बड़ी कठोरता से उनका पालन करता हूँ। उनमें से एक नियम यह भी है कि मित्रों से लेन-देन का व्यवहार न करूँगा। अभी तुम्हें अनुभव नहीं हुआ है लेकिन कुछ दिनों में हो जायेगा कि जहाँ मित्रों से लेन-देन शुरू हुआ, वहाँ मनमुटाव होते देर नहीं लगती। तुम मेरे प्यारे दोस्त हो, मैं तुमसे दुश्मनी नहीं करना चाहता। इसलिए मुझे क्षमा करो।

रमा ने इस पत्र को भी फाड़कर फेंक दिया और कुर्सी पर बैठकर दीपक की ओर टकटकी बाँधकर देखने लगा। दीपक उसे दिखायी देता था, इसमें सन्देह है। इतनी ही एकाग्रता से वह कदाचित् आकाश की काली, अभेद्य मेघ राशि की ओर ताकता !

मन की एक दशा वह भी होती है, जब आँखें खुली होती है और कुछ नहीं सूझता; कान खुले रहते हैं और कुछ नहीं सुनायी देता।

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शोध एवं शोध-पत्रों के लिए अकादमिक संदर्भ

Premchand, Munshi. "गबन." *Munshi Premchand Digital Archive*, 1931, https://munshipremchand.com/works/novels/gaban. Accessed 22 Sep. 2026.